डॉ. आंबेडकर के विचारों की धरोहर
Remembering the legacy of Dr. Ambedkar | Analysing Gen Z perspectives on spending
आज भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की जयंती है। वे हमेशा ‘Champion of the Downtrodden’ रहें। उन्होंने समाज के कमजोर तबकों, पिछड़े वर्गों, महिलाओं और मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। भारतीय संविधान के निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका निभाकर आधुनिक भारत की नींव रखी। रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया और भारतीय वित्त आयोग जैसी संस्थाओं की स्थापना भी उन्हीं की प्रेरणा से हुई।
डॉ. आंबेडकर को समझे बगैर भारत को बदलने की कोशिश करना वैसा ही है जैसे बिना बुनियाद की इमारत बनाना। इसलिए पुलियाबाज़ी पर डॉ. आंबेडकर और संविधान पर हमने कई अंक और लेख प्रकाशित किए हैं। आज उनकी जयंती के अवसर पर उनमें से कुछ आपके साथ साझा कर रहे हैं। ज़रूर सुनें।
…देश की सेवा करने वाले महान लोगों के प्रति कृतज्ञ होना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन कृतज्ञता की भी एक सीमा होती है। जैसा कि आयरलैंड के सपूत डैनियल ओ’कॉनेल ने कहा है कि,
“कृतज्ञता के नाम पर किसी भी पुरुष से उसका आत्मसम्मान नहीं छिना जा सकता, कृतज्ञता के नाम पर किसी भी स्त्री से उसकी पवित्रता नहीं छिनी जा सकती और कृतज्ञता के नाम पर किसी भी राष्ट्र से उसकी आजादी नहीं छिनी जा सकती।”
भारत के लिए यह सावधानी अन्य किसी भी देश से ज्यादा आवश्यक है। क्योंकि भारत में भक्ति या जिसे हम श्रद्धा या ‘व्यक्ति-पूजा’ कह सकते हैं, राजनीति में इतनी गहराई तक समाई हुई है, जितनी किसी और देश में नहीं है। धर्म में तो भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है, लेकिन राजनीति में यही भक्ति या व्यक्ति-पूजा, निश्चित ही पतन और अंततः तानाशाही की ओर ले जाती है… — डॉ. आंबेडकर के भाषण - अराजकता का व्याकरण (अनुवाद) से।
साथ ही भारतीय संविधान पर भी हमने कई एपिसोड किए हैं। हमारी अंक लड़ी पर जाकर आप उन्हें सुन सकते हैं।
अंक-लड़ी The Puliyabaazi Playlist
बचत या अनुभव: क्या है आज की पीढ़ी की पसंद?
The generational shift in spending patterns of Indian Gen Z vs the oldies
—जीत जोशी
मेरा जन्म 2002 में हुआ, यानी मैं Gen Z हुआ। मेरी परवरिश एक छोटे से शहर में हुई, फिर मैं पुणे और सिडनी जैसे बड़े शहरों में रहा और अब कुछ समय से मैं अहमदाबाद में रह रहा हूँ। जब आपकी अर्थशास्त्र की तालीम उन गुरुओं के साए में हुई हो जिनसे पढ़ने का मुझे मौका मिला, तो आपकी पूरी ज़िंदगी केस स्टडीज़, ऑब्जर्वेशन्स और एक्सपेरिमेंट्स की एक चलती-फिरती प्रयोगशाला बन जाती है।
आज मैं आपसे थोड़े अलग रिसर्च की बात करने वाला हूँ। मेरे और मेरे दोस्तों के माता-पिता पैसे कैसे खर्च करते हैं और मैं और मेरे दोस्त कैसे खर्च करते हैं—ये बात बताती है कि भारत कितना बदल गया है और कहाँ जा रहा है। और चूँकि मैं सिडनी में भी रहा हूँ, तो मुझे उनके और हमारे खर्च करने के तरीकों के बीच की बारीकियाँ भी देखने को मिली हैं।
ये खयाल आया कैसे?
कुछ महीनों पहले, मैं लकी अली के कॉन्सर्ट और ज़ाकिर खान के शो में गया था। पिछले साल सिडनी में रहते हुए मैंने स्कूबा डाइविंग और स्काईडाइविंग जैसे अनुभव भी लिए, जो मुझे बहुत पसंद आए। और हाँ, मुझे दिलजीत दोसांझ और कोल्डप्ले के टिकट न मिल पाने का FOMO भी हुआ (ज़ाहिर है, यह बात मैंने किसी को बताई नहीं)।
ये बातें मैंने आपको इसलिए बताईं ताकि आपको अंदाज़ा हो कि मेरी पीढ़ी पैसे कहाँ खर्च कर रही है। चीज़ों से ज़्यादा अनुभवों पर खर्च करने की ये आदत आज की पीढ़ी में काफ़ी दिखाई देती है।
एक दिन मेरी पापा से बात हो रही थी और वो मेरे कॉन्सर्ट्स पर पैसा और वक्त खर्च करने पर थोड़े नाराज़ थे। लेकिन ज़रा रुकिए, इससे पहले कि आप उनके बारे में कोई राय बना लें, मैं आपको बता दूँ कि ये वही पापा हैं जो महँगे रेस्टोरेंट्स, कोर्सेस, सब्सक्रिप्शन्स, ब्रांडेड कपड़े और यहाँ तक कि दिमाग की तरंगों को मापने वाली मेडिटेशन डिवाइस जैसी चीज़ों के लिए अपना कार्ड देने से पहले एक बार भी नहीं झिझकते।
तो उस बातचीत के बाद मेरे दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी,
“पर मेरी जेनरेशन तो मुझसे भी कहीं ज़्यादा कॉन्सर्ट्स में जाती है। मैं तो बस दो में गया हूँ। और भला ज़ाकिर खान को लाइव देखने की तुलना टीवी पर देखने से कैसे की जा सकती है?”
मैंने इस पूरे मामले को समझने के लिए तीन पहलुओं की कल्पना की। चलिए मैं आपको अपने इस अजीब रिसर्च के सफ़र पर ले चलता हूँ, जो मैंने Reddit, Substack, Instagram, YouTube, BookMyShow आदि के डेटा के आधार पर किया है।
ये तीन पहलू हैं:
व्यवहार: Gen Z पिछली पीढ़ियों की तुलना में अनुभवों पर ज़्यादा खर्च करती है।
संस्कृति: वो अनुभवों को ऐशोआराम नहीं, अपनी पहचान बनाने का ज़रिया मानती है।
इतिहास: पिछली पीढ़ी ने तंगी देखी और उसी में जीना भी सीख लिया। लेकिन आज की पीढ़ी विकसित होते भारत में बढ़ी है। इसलिए इन दोनों का पैसों की ओर देखने का नज़रिया अलग है।
मैंने क्या पाया?
मुझे लगता है कि हमारी पीढ़ी बहुत ही यथार्थवादी (realistic) है। आज जब कोई Gen Z नौकरी शुरू करता है, तो उसे अच्छी तरह पता होता है कि उसके मम्मी-पापा ने जिस तरह थोड़ी-थोड़ी बचत जोड़कर घर बना लिया या बच्चों की ज़िंदगी संवार दी, वैसा आज के दौर में कर पाना बहुत मुश्किल है।
आज की अर्थव्यवस्था जिस रफ़्तार से भाग रही है, उसमें अगर आप महीने के 10-15 हज़ार रुपये बचा भी लें, तो इस महंगाई में उसकी कीमत ऊँट के मुँह में जीरे जितनी ही होगी। तो इससे अच्छा क्यों न 15 हज़ार के जूते ही ले लें या 30 हज़ार की एक यादगार वीकेंड ट्रिप ही कर लें।
दुनिया इतनी अस्थिर है कि उन्हें कल पर भरोसा ही नहीं रहा। अब समझदार लोग कहेंगे कि भाई, अगर कल का भरोसा नहीं है, तो उस अनिश्चित कल के लिए ही बचत क्यों नहीं करते? लेकिन मेरी पीढ़ी के लिए delusion ही नया solution है।
ख़ुद को बहलाने से आर्थिक सच्चाई नहीं बदलती।
मेरी पीढ़ी के अर्थशास्त्री एक अजीब जगह खड़े हैं। वे उन्हीं दोस्तों में रहते हैं, जो ऐसे खर्च करते हैं, पर अर्थशास्त्र भी जानते हैं। मैं अपनी पीढ़ी की भावनाओं को समझता हूँ और इसलिए कभी-कभी सोशल मीडिया की चकाचौंध में बह भी जाता हूँ, लेकिन मुझे इस ‘नई ज़िंदगी’ के पीछे की आर्थिक हकीकत भी दिखाई देती है।
जैसा कि मैंने पहले कहा, मैं न तो अपनी पीढ़ी को कोस रहा हूँ और न ही पापा की। एक अर्थशास्त्री का काम है दुनिया को देखना, समझना और उस समझ को उन लोगों तक पहुँचाना जो अर्थशास्त्र की भाषा नहीं जानते।
Reddit और ब्लॉग्स पर जब मैं लोगों की बातें पढ़ता हूँ, तो एक बड़ा मुद्दा बार-बार दिखाई देता है, जो है भारत के बड़े शहरों का आर्थिक बोझ। ये एक ऐसी ‘शहरी-चक्की’ है, जहाँ इंसान खूब पिसता है, अच्छा-खासा कमाता भी है, पर फिर भी महीने के आखिर में जेब खाली ही रहती है। क्यों? क्योंकि यहाँ पर रहने, आने-जाने और अपने प्रोफ़ेशनल नेटवर्क को बनाए रखने के लिए जो खर्चा करना पड़ता है, वो पूरी कमाई चट कर जाता है। ये कोई शौक की बात नहीं है, बल्कि आधुनिक भारतीय पूंजीवाद की एक ढाँचागत समस्या है, जहाँ महँगाई तनख्वाह से लगातार ज़्यादा तेज़ बढ़ती है।
“40 साल की उम्र में PlayStation खरीदना वैसा नहीं होता, जैसा 23 की उम्र में होता है। 50 की उम्र में गोवा जाना वैसा नहीं होता, जैसा 25 की उम्र में होता है। कल के लिए बचत ज़रूर करो, पर आज की बलि देकर नहीं।” – Reddit पर एक Gen Z की कमेंट
“80% iPhone किश्तों पर लिए जा रहे हैं। छुट्टियाँ किश्तों पर मनाई जा रही हैं। ये सब बस एक दिखावा है... इससे तो बेहतर है तंगी में जिएँ, पर चैन की नींद सोएँ।” — सोशल मीडिया की “नकली अमीरी” पर कमेंट
“अगर आप 45,000 रुपये कमा रहे हैं और 2,000 बचा रहे हैं, तो ये कोई बचत नहीं है, बस गलती से बचे हुए पैसे हैं। आपकी आय 30 हज़ार से 50 हज़ार हो जाती है, पर क्या आपकी बचत भी उसी अनुपात में बढ़ती है? नहीं, आपका Zomato का बिल बढ़ जाता है।” — आर्थिक सलाह के थ्रेड पर Lifestyle Inflation पर कमेंट
ये बातें किस ओर इशारा कर रही हैं?
2000 के बाद पैदा हुई इस पीढ़ी के लिए खर्च करना खुद को ज़ाहिर करने का सबसे बड़ा ज़रिया है। वो जो चीज़ें खरीदते हैं या जो अनुभव इंटरनेट पर शेयर करते हैं, वो उनकी पहचान बनाने के साधन हैं। ये दुनिया को बताते हैं कि उनका टेस्ट कैसा है, उनका स्टेटस क्या है और वे दुनिया के किस कल्चर से ताल्लुक रखते हैं।
आज इंस्टाग्राम पर बनाई जाने वाली डिजिटल पहचान फिल्टर से सजी होती है। ऐशोआराम की चीज़ों के लिए EMI का बढ़ता चलन इसी पहचान की ज़रूरत से पैदा हुआ है। आजकल लोग खुलकर स्वीकार करते हैं कि इंटरनेशनल ट्रिप्स या महँगे गैजेट्स के लिए उन्होंने कर्ज़ लिया है। वे इसके ब्याज को एक टैक्स की तरह देखते हैं, जो वे आज अपनी मनचाही ज़िंदगी जीने के लिए दे रहे हैं।
बहुत से Gen Z और मिलेनियल ने अपने खर्च की आदतों की अपने माता-पिता की आदतों से तुलना की है। वे कहते हैं कि उनके माता-पिता को तंगी के साये (Scarcity Shadow) में जीना पड़ा। 1991 (उदारीकरण) से पहले विकल्प कम थे और अर्थव्यवस्था सुस्त थी। ऐसे दौर में बचत करना स्वाभाविक समझदारी थी। लेकिन Gen Z उदारीकरण के बाद वाले भारत में बढ़ी है, जहाँ ग्लोबल ब्रांड्स, हाई-स्पीड इंटरनेट और विदेश यात्रा के विकल्पों के कारण उनकी इच्छाओं की शुरुआत ही एक अलग स्तर से होती है।
ये बात मैंने अपनी रिसर्च में पढ़ी और मन में आया, अरे, ये तो मेरी अपनी सोच है। मुझे लगता है कि आकांक्षाएँ बड़ी संक्रामक होती हैं। जब आपके आस-पास सिर्फ़ तंगी हो, तो आप अमीरी का सपना कैसे देखेंगे? उसे जीने की हिम्मत कैसे करेंगे? जब न सोशल मीडिया था, न ही हॉलीवुड फिल्में देखने को मिलती थीं, तब आप उनकी इच्छा भी कैसे करते? हाँ, पुराने ज़माने में पश्चिमी साहित्य उपलब्ध था, पर वो भी भारतीय समाज में उतना गहरा नहीं उतरा था, जितना आज स्मार्टफ़ोन उतरा है।
अनदेखे विरोधाभास
लेकिन ये निष्कर्ष भी एकदम ब्लैक-एंड-व्हाइट नहीं है। मैंने अपनी ही उम्र के ऐसे लोग भी देखे जो तनख़्वाह का 70-90% हिस्सा बचत करते हैं, फिर भी छोटी सी चीज़ खरीदते वक्त भी अपराधी महसूस करते हैं। और ऐसे लोग भी देखे जो बाहर से तो अमीर दिखते हैं, पर असल में किस्तों पर ज़िंदगी चला रहे हैं। साथ ही, कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें बड़ी पुश्तैनी दौलत मिली है, पर वे बेहद सादगी से जीते हैं। यानी खर्च करना अमीरी की निशानी नहीं, न ही खर्च न करना समझदारी की। मतलब ये है कि हमारी पीढ़ी ख़ुद को एक बहुत कच्चे पैमाने से आँक रही है।
जब मैं ऑस्ट्रेलिया में था तब मैंने देखा कि सत्तर साल के लोग भी वैसी ही ज़िंदगी जीते थे, जैसी आज की पीढ़ी जीती है। दुनिया घूमना उनके लिए कोई पचास साल के बाद पूरा होने वाला सपना नहीं था, वो उनके हर साल के खर्च का हिस्सा था। ज़िंदगी का मतलब बड़ा घर बनाना या बच्चों की धूमधाम से शादी करना नहीं था। हर साल चार देश घूमना, सुकून भरी सुबह की कॉफ़ी पीना, पहाड़ों पर जाना, वीकेंड पर कैम्पिंग करना, उनके लिए यही ज़िंदगी थी।
मुझे लगता है कि आज भारत के अमीर जैसे खर्च कर रहे हैं, वैसा ही पश्चिमी लोग दो सदियों से करते आ रहे हैं। जैसे-जैसे भारत में पैसा आ रहा है, वैसे-वैसे हम चीज़ों से अनुभवों की ओर बढ़ रहे हैं। शहरी Gen Z आज के भारत की इस अमीरी का अनुभव लेने वाली पहली पीढ़ी है, और उसके पास इसे दिखाने के लिए सोशल मीडिया भी है।
मैं कहाँ गलत हो सकता हूँ?
हो सकता है कि मैं एक छोटे सैंपल से बड़े नतीजे निकाल रहा हूँ। सोशल मीडिया पर तो वही दिखते हैं जो बोलते हैं, चुपचाप बचत करने वाले कभी चर्चा में नहीं आते। तो संभव है कि Gen Z ज़्यादा फ़िज़ूल खर्च नहीं करती होगी। शायद बस वो ज़्यादा दिखती है।
पापा किस बात पर चिंतित थे?
पापा मेरे खर्च पर चिंतित नहीं थे। मुझे लगता है, आने वाले वक्त में जो अनिश्चितता उन्हें दिख रही थी, उसको लेकर चिंतित थे (और ये पूरी तरह मेरा अंदाज़ा है)। जब उनकी पीढ़ी जवान थी, स्थिरता धीरे-धीरे कमाई जाती थी और जल्दी खो भी जाती थी। नौकरियाँ कम थीं, सहारे कमज़ोर थे। महँगाई की मार तेज़ थी। इसलिए उनकी आर्थिक समझ थी—पहले सुरक्षा, फिर खर्चा।
हमारी पीढ़ी एक अलग भारत में बढ़ी। हमने राशन की लाइन से पहले मॉल देखा। तंगी से पहले ग्लोबल ब्रांड्स देखें। अभाव से पहले पसंदीदा चीज़ें देखीं।
इसलिए जब मैं अनुभव पर खर्च करता हूँ, तो पापा को उसमें खतरा दिखाई देता है, जबकि मुझे एक याद।
हम दोनों समझदार हैं। बस अलग-अलग दुनिया में बड़े हुए हैं।
आख़िरी बात
शायद हर पीढ़ी अगली पीढ़ी को पैसों के मामले में लापरवाह मानती है।
मुझे लगता है कि ये लापरवाह नौजवान बनाम समझदार बुज़ुर्गों वाली बात नहीं है। दरअसल, हर पीढ़ी की सोच उस वक्त की अर्थव्यवस्था बनाती है।
तंगी बचत करने वाले बनाती है और विकास खर्च करने वाले।
और अगर भारत बढ़ता रहा, तो आज की फ़िज़ूलखर्ची कल की आम बात बन जाएगी।
— जीत जोशी
यह लेख अंग्रेज़ी में आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Aaj kal ke bachhe
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लेख में दिए गए चित्र AI की मदद से बनाए गए हैं।
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पुलियाबाज़ी मैगज़ीन मार्च 2026
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