विदेशी निवेशक क्यों छोड़ रहे भारतीय बाज़ार?
How can the government address foreign outflows and the Indian banking crisis?
— अनुपम मणूर
भारत की अर्थव्यवस्था में इन दिनों दो ऐसी घटनाएँ एक साथ हो रही हैं, जिनका आपस में कोई लेना-देना नहीं लगता। पहली, विदेशी निवेशक रिकॉर्ड तेज़ी से अपना पैसा निकालकर जा रहे हैं, जिसकी आजकल भरपूर चर्चा भी हो रही है। और दूसरी, भारतीय बैंकों के पास लोगों को क़र्ज़ देने के लिए डिपॉजिट (पैसा) ही नहीं बच रहा है। लेकिन सच तो यह है कि ये दोनों ही समस्याएँ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के इस तरह भागने की कुछ आम वजहें तो हम सभी जानते हैं: जैसे डॉलर का मज़बूत होना, पश्चिम एशिया में तनाव की वजह से बाज़ार में अनिश्चितता और विदेशी निवेशकों की जोखिम टालने की कोशिश। ये सारी बातें अपनी जगह सही हैं, लेकिन इनका नियंत्रण सरकार के हाथ में नहीं है। और ये पूरी कहानी भी नहीं बतातीं।
सबसे अहम बात यह है कि भारत ने विदेशी पूंजी पर जिस तरह से टैक्स लगाया है, वह ग्लोबल फाइनेंस के मानदंडों से बिल्कुल अलग है। विदेशी पैसा कहीं भी आ-जा सकता है, इसलिए निवेशक स्वाभाविक रूप से भारत की तुलना कोरिया, ताइवान, ब्राज़ील, सिंगापुर और हॉंगकॉंग जैसी दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से करते हैं। इन देशों में ऐसा कोई टैक्स नहीं लगता। उल्टे, भारत ने 2024 के बजट में शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन टैक्स 15% से बढ़ाकर 20% और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स 10% से बढ़ाकर 12.5% कर दिया।
इससे भी बुरी बात यह है कि यहाँ टैक्स डॉलर में हुए मुनाफ़े पर नहीं, बल्कि रुपये में हुए मुनाफ़े पर लगता है। मान लीजिए डॉलर के मुक़ाबले रुपया 85 से गिरकर 95 पर आ जाता है, तो एक विदेशी निवेशक को डॉलर के हिसाब से तो नुकसान हो रहा है। फिर भी, उसे भारत में रुपये में हुए नाममात्र मुनाफ़े पर टैक्स चुकाना ही पड़ता है।
निवेशक इस तरह का टैक्स भी सह लेते, अगर बाज़ार में कमाई का कोई बहुत बड़ा मौका होता, जैसा भारत में कोविड के बाद की तेज़ी में आया था। लेकिन आज जब दुनिया भर का पैसा AI कंपनियों की तरफ़ भाग रहा है और जिनकी टक्कर का हमारे पास फ़िलहाल कोई विकल्प नहीं है, तब निवेशक इसे क्यों सहेंगे?
एक बार जब विदेशी निवेशक पैसा निकालकर जाने लगते हैं, तो रुपया और कमज़ोर होता है, जिससे हमारा आयात महँगा हो जाता है। गिरते रुपये को बचाने के चक्कर में RBI को अपना रिज़र्व खर्च करना पड़ता है और कमज़ोर रुपये को देखकर नया विदेशी पैसा भारत आने से कतराता है। भारत अब इसी दुष्चक्र (self-reinforcing loop) में फँस गया है।
मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती। सरकार टैक्स से होने वाली इस कमाई का इस्तेमाल ईंधन और एनर्जी पर सब्सिडी देने के लिए करती है। लेकिन रुपये के गिरने की वजह से इस सब्सिडी का बिल और भी बड़ा हो गया है। वित्तीय गणित की अपनी अजीब विडंबना होती है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों का इस तरह बाहर निकलना चिंता की बात है, फिर भी इसकी वजह से बाज़ार में वैसी गिरावट नहीं आई जैसी आशंका थी। आजकल इसकी बड़ी वाहवाही हो रही है कि कैसे घरेलू निवेशकों ने इस झटके को संभाल लिया। इसे आत्मनिर्भर बाज़ार और वैश्विक उतार-चढ़ाव से मिली सुरक्षा के सबूत के तौर पर पेश किया जा रहा है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है जो उतना सुनहरा नहीं है।
पहली बात तो यह कि अगस्त 2023 से सितंबर 2025 के बीच 25 महीनों में भारतीय बाज़ार में जो 11.4 लाख करोड़ रुपये आए, उनमें से तीन-चौथाई (75%) पैसा म्यूचुअल फंड्स के ज़रिए आया। और इसमें से ज़्यादातर उन मध्यमवर्गीय परिवारों का है जो हर महीने अपनी गाढ़ी कमाई से SIP भरते हैं। यानी, अब ग्लोबल कंपनियों के बड़े फंड्स की जगह भारतीय मिडिल क्लास की बचत बाज़ार का जोखिम झेल रही है।
इससे भी बड़ी बात यह है कि शेयर बाज़ार का आधार बने इस नए ट्रेंड ने भारतीय बैंकिंग सिस्टम के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। लोग बैंकों से पैसा निकालकर SIP में डाल रहे हैं। आँकड़े देखें, तो 2020 से 2025 के बीच कुल घरेलू बचत में बैंक डिपॉजिट की हिस्सेदारी 41% से घटकर 35% रह गई थी, जबकि म्यूचुअल फंड का हिस्सा 2% से बढ़कर सीधे 13% पर पहुँच गया था। तुलना के लिए बता दें कि 2012 में बैंक डिपॉजिट का हिस्सा 58% हुआ करता था।
सरकार की टैक्स नीति इस बदलाव को और बढ़ावा दे रही है। बैंक FD के ब्याज पर इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से 30% तक टैक्स लग सकता है। दूसरी तरफ़, शेयर बाज़ार के मुनाफ़े (लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन) पर सिर्फ़ 12.5% टैक्स लगता है। स्वाभाविक है कि जो लोग बाज़ार में पैसा लगा सकते हैं, उनके लिए इक्विटी ज़्यादा आकर्षक हो गई है। यह कैसी विडंबना है कि FD के ब्याज पर गुज़ारा करने वाले एक 70 साल के बुज़ुर्ग को अपनी कमाई पर ज़्यादा टैक्स देना पड़ रहा है, जबकि एक अमीर निवेशक अपने मुनाफ़े पर कम टैक्स चुका रहा है!
बचत की इस कमी की वजह से बैंकों के पास कर्ज़ देने के लिए आवश्यक डिपॉजिट जमा नहीं हो पा रहे हैं। आज बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो 82% तक पहुँच गया है, जो पिछले 61 सालों में सबसे ज़्यादा है। बैंकों के पास सस्ता पैसा (करंट और सेविंग्स अकाउंट में पड़े पैसे) कम होता जा रहा है, जिससे उनके लिए फंड जुटाना महँगा हो गया है। डिपॉजिट पाने के लिए बैंकों को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ रही हैं, जिससे लोन महँगे हो रहे हैं। कामकाज के लिए बैंक लोन पर निर्भर छोटे व्यापारियों को अब भारी ब्याज चुकाना पड़ रहा है।
बैंकों की मुश्किलें और भी ज़्यादा हैं क्योंकि उनके पास जमा रुपयों में से 21% तो वे लोन के रूप में दे ही नहीं सकते। बैंकिंग के नियमानुसार, बैंक को हर 100 रुपये में से 3 रुपये कैश रिज़र्व (CRR) के तौर पर अलग रखने होते हैं और 18 रुपये सरकारी बॉन्ड (Statutory Liquidity Ratio) में लगाने पड़ते हैं। यह नियम बैंकों की सुरक्षा के लिए कम और सरकार की आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ज़्यादा काम आता है। जो सरकार हमेशा भारी वित्तीय घाटे (Deficit) में चलती है, उसे अपनी उधारी के लिए एक पक्का खरीदार चाहिए होता है और बैंकों का यह SLR नियम सरकार को वही गारंटी देता है।
दरअसल, विदेशी निवेशकों (FIIs) का पलायन और बैंकिंग संकट, इन दोनों समस्याओं के पीछे एक ही बुनियादी वजह है। भारत का फिस्कल डेफिसिट लंबे समय से GDP के करीब 5% पर बना हुआ है। इसकी वजह है कल्याणकारी योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाला भारी खर्च, जिसे कोई भी सरकार कम करने का जोखिम नहीं लेना चाहती। अब इस खर्च को पूरा करने के लिए सरकार को जहाँ से भी टैक्स वसूलने की गुंजाइश दिखती है, वह वहाँ हाथ डाल देती है।
चूँकि विदेशी निवेशक भारत में वोट नहीं देते, इसलिए 2024 के बजट में उनके निवेश पर कैपिटल गेन टैक्स आसानी से बढ़ा दिया गया। और चूँकि भारतीयों का बैंकों में जमा पैसा आसानी से देश छोड़कर जा नहीं सकता, सरकार ने SLR के रास्ते उसे अपनी उधारी चुकाने में लगा दिया। इसी तरह, आम परिवारों की ब्याज से होने वाली कमाई भी देश से बाहर नहीं जा सकती, इसलिए उस पर पूरा (30% तक) टैक्स लगा दिया गया है, जबकि शेयर बाज़ार के मुनाफ़े पर कम टैक्स की रियायत मिलती है।
अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दुष्परिणामों को नज़रअंदाज़ करके, हर संभव जगह से ज़्यादा से ज़्यादा पैसा निचोड़ने की सरकार की यह ज़िद सचमुच चिंताजनक है। वैसे तो इस समस्या का इलाज बिल्कुल आसान है, लेकिन इसके लिए ज़बरदस्त राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत है:
2024 में जो कैपिटल गेन टैक्स बढ़ाया गया था, उसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। दुनिया के कई अन्य देशों की तरह विदेशी निवेशकों के लिए इसे घटाकर शून्य के करीब लाना चाहिए। इसे विदेशियों के सामने झुकना नहीं, बल्कि वैश्विक स्पर्धा में भारतीय बाज़ार को बनाए रखने का एक ज़रूरी कदम माना जाना चाहिए।
बैंकों के लिए SLR की सीमा को कम किया जाना चाहिए और बॉन्ड मार्केट को और मज़बूत बनाना चाहिए, ताकि बैंकों के पास आम लोगों और कारोबारियों को लोन देने के लिए ज़्यादा पैसा बच सके।
लेकिन ये सारे सुधार हवा में नहीं हो सकते। इनमें से हर बदलाव के लिए सरकार को या तो अपने खर्चों में कटौती करनी होगी, या फिर टैक्स वसूलने के कुछ ऐसे नए और बेहतर रास्ते ढूँढ़ने होंगे जो अर्थव्यवस्था का दम न घोंटें। अफ़सोस की बात यह है कि अभी तक दोनों में से कुछ भी नहीं हुआ है। विदेशी पूंजी ने भारत को दिखा दिया है कि जब आप उस पर इस तरह टैक्स थोपते हैं, जैसे कि उसके पास दूसरा कोई विकल्प ही न हो, तो नतीजा क्या होता है।
— अनुपम मणूर
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
अनुपम तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं। वे ‘We, the Citizens’ के सह-लेखक हैं तथा देश के अग्रणी अखबारों में नियमित रूप से लिखते भी हैं।
यह लेख अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ सकते हैं: 2 Tax Tweaks To Secure Growth Story
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