मोनमार्ट पहाड़ी पर बिखरे हैं पेरिस के इतिहास, कला और राजनीति के किस्से
Memories from Montmartre and Sacré-Cœur
आइफ़िल टावर के ऊपर से पेरिस शहर को रात में देखने का अनुभव अनूठा है। पास गुजरती सेन नदी, दोनों ओर ऐतिहासिक अट्टालिकाएँ, खिलौनों-सी रेंगती बसें, मोटरगाड़ियाँ और पेरिस के रंग-बिरंगे नज़ारे। ये सब हमें लुभाते हैं। पर इन सबके बीच है एक ऐसी इमारत जो बरबस अपनी ओर हमारा ध्यान खींचती है, उसका नाम है सेक्रेकर (Sacré-Cœur)।
पेरिस के उत्तर पूर्व में मोनमार्ट (Montmartre) पहाड़ी की चोटी पर स्थित सेक्रेकर एक चर्च की इमारत है। उसका गोल गुंबद पेरिस के ताज की तरह चमकता है। उसके सामने महानगर की बाकी सारी इमारतें बौनी दिखती हैं। न्यू गॉथिक स्टाइल में बने इस चर्च की सुंदरता को देखने सैलानी दूर-दूर से आते हैं। यह पेरिस के पाँच टूरिस्ट आकर्षण केंद्रों में से एक है।
सेक्रेकर को पहली बार मैंने पौम्पीडू सेंटर से देखा था। उसकी सबसे ऊपरी मंजिल से, दिन में। तभी से मेरे मन में उसे देखने की इच्छा जग गई। रात में आइफ़िल टावर से उसके भव्य नज़ारे को देखने के बाद हमने वहाँ जाने का निश्चय किया। एक नवंबर की शाम हम तीन लोग तन्मय, बंदना और मैं निकल पड़े मोनमार्ट की ओर।
19वीं शताब्दी के मध्य तक मोनमार्ट पहाड़ी और उसके आसपास का इलाका पेरिस महानगर का हिस्सा नहीं था। नेपोलियन तृतीय के शासनकाल (1860) में यह 18वें डिस्ट्रिक्ट के रूप में शहर का हिस्सा बना। डिस्ट्रिक्ट का भी नाम पड़ा मोनमार्ट। मोनमार्ट नाम से जुड़ी एक रोमांचक दंतकथा है।
सन 250 के आसपास मोनमार्ट पहाड़ी पर डेनिस नामक एक ईसाई संत रहते थे। संभवतः वे पेरिस के पहले ईसाई संत थे। फ्रांस में उस वक्त रोमन साम्राज्य का शासन था, जिसमें ईसाई धर्म के प्रचार की अनुमति नहीं थी। यही कारण है कि संत डेनिस को मृत्युदंड दिया गया। उन पर आरोप था कि वे ईसाई धर्म का प्रचार करते हैं। स्थानीय रोमन शासक के आदेश से उनके सिर को धड़ से अलग कर दिया गया। कहते हैं कि सिर जब धड़ से अलग हुआ तब वे उसे हाथ में लेकर बहुत दूर तक पहाड़ी की ढलान पर नीचे दौड़ते रहे। आखिर में जहाँ वे रुके, वहीं उनकी मृत्यु हो गई। बाद में वहाँ एक चर्च बनाया गया। उस समय यूरोप में ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या बहुत कम थी। कालांतर में जब उनकी संख्या बढ़ी तो उन्होंने संत डेनिस को शहीद घोषित कर दिया और इस पहाड़ी का नाम पड़ा मोनमार्ट। Mountain के Mont और Martyr के Mart को जोड़कर बना Montmartre, मतलब शहीदों की पहाड़ी।
यह तो हुई एक दंतकथा। पर सच्चाई यह भी है कि दुनिया भर में मशहूर होने से पहले मोनमार्ट पहाड़ी पर एक साधारण सा गाँव बसा था। ढलानों पर अंगूर के बाग, गेहूँ, बार्ली के मिल और विंडमिल हुआ करते थे। उनमें से एक-दो मिल, अंगूर के बाग और विंडमिल आज भी मौजूद हैं जो पुराने समय की याद दिलाते हैं।
अब यह कहना तो मुश्किल है कि किस समय, कौन और कैसे पहले पहुँचा। पर एक बात तय है कि 19वीं सदी में मोनमार्ट सस्ती शराब और सस्ते किराए के घरों के लिए जाना जाने लगा। चित्रकार, कवि, लेखक, संगीतकार और कलाकार यहाँ आकर बसने लगे। कैफ़े और मयखाने खुलने लगे। एक के बाद एक कैबरे हॉल की स्थापना होती गई। यह रात की रंगीनियों के लिए जाना जाने लगा। धनाढ्य लोग यहाँ आकर अपना मनोरंजन करते थे, पैसे लुटाते थे। यहाँ देह व्यापार भी होता था।
19वीं सदी के अंत तक मोनमार्ट पेरिस के (शायद पूरी दुनिया के) सबसे रंगीन इलाके के रूप में मशहूर हो चुका था। उस वक्त के कलाकारों में कौन होगा जिसने यहाँ समय नहीं बिताया, जिसने यहाँ शराब नहीं पी, जिसने यहाँ सेक्स नहीं किया…? चाहे वह मोने हो, रेनो, वैन गॉग, पिकासो या मैटिसी… सूची लंबी है। मोनमार्ट से जुड़े कलाकारों के जीवन, उनके किस्से, अफ़वाह और स्कैंडल्स आज भी लोगों को आकर्षित करते हैं।
मोनमार्ट के कुछ प्रसिद्ध कैबरे हॉल में से एक था कैबरे मूलां रूज़ (Moulin Rouge)। उसी मूलां रूज़ से हमारी पैदल यात्रा की शुरुआत हुई। हमारे गाइड ने हमें पहले ही बता दिया था कि वह लाल छाता ओढ़े पाँच बजे वहाँ हमारा इंतज़ार करेगा। जब हम मेट्रो के ब्लैंश (Blanche) स्टेशन पर उतरे, तब वह हमें दूर से ही दिख गया। कैबरे मूलां रूज़ के साए में लाल छाता ओढ़े खड़ा था। दो-चार सैलानी वहाँ पहले से ही जमा थे। पहुँचने पर गाइड हमें सड़क की दूसरी ओर ले गया। मूलां रूज़ के ठीक सामने, जहाँ से उसकी ऐतिहासिक बिल्डिंग हमें स्पष्ट दिख रही थी। और उसके ऊपरी हिस्से पर वह विंडमिल भी, जो उसकी ख़ास पहचान है।
19वीं सदी के उत्तरार्ध तक मोनमार्ट कैबरे संस्कृति के गढ़ के रूप में पूरे यूरोप में प्रसिद्ध हो गया था। मूलां रूज़ उसका एक जीता-जागता उदाहरण था। पेरिस के अमीर लोगों को आकर्षित करने के लिए, उनके मनोरंजन को विशेष ध्यान में रखकर 1889 में इसकी स्थापना हुई। मूलां रूज़ की कुछ खास विशेषताओं में शामिल थे—उसका ख़ूबसूरत हॉल, उसकी वास्तुकला, संगीत, नृत्य, हास्य-व्यंग्य की महफ़िल और शैम्पेन से भरी शाम।
ज़ाहिर है कि मूलां रूज़ में जब कला अपने विविध रूपों में उपलब्ध थी तब बहुत सारे रचनाकार, कलाकार, कवि, लेखक भी उससे जुड़े थे। एक विशेष प्रकार का डांस वहाँ काफ़ी लोकप्रिय हुआ, जिसका नाम था कनकन (Cancan)। इसमें नृत्यांगनाएँ अपने निर्वस्त्र पैरों को काफ़ी ऊपर तक ले जाती थीं। उस वक्त की नृत्यांगनाओं में दो प्रमुख नाम हैं—ला गुलू और जेन एवरिल। इनकी नृत्य प्रस्तुति के पहले पोस्टर पर उन्हें प्रस्तुत करने वालों में जिस एक खास नाम का जिक्र जरूरी है, वे हैं प्रसिद्ध फ्रांसीसी कलाकार टुलुज़-लॉट्रैक। अपनी कलाकृतियों में उन्होंने मोनमार्ट की नृत्यांगनाओं के अलावा वहाँ की वेश्याओं के सामान्य जीवन का सुंदर चित्रण किया है। इम्प्रेशनिज़्म और क्यूबिज़्म के बीच सेतु स्थापित करने वाले पॉल सीज़ैन और वैन गॉग जैसे कलाकारों की सूची में टुलुज़-लॉट्रैक का नाम महत्वपूर्ण है।
जिस मूलां रूज़ के लिए टुलुज़-लॉट्रैक पोस्टर बनाया करते थे, उसी के सामने हम खड़े थे। हमारे ग्रुप के बाकी सैलानी भी पहुँच चुके थे। लगभग 15 सैलानियों के साथ पहाड़ी पर चढ़ने की हमारी पैदल यात्रा शुरू हुई। कुछ ही मिनटों में हम एक मकान के सामने पहुंच गए, जिसके दरवाज़े का रंग गाढ़ा बैंगनी था। गाइड ने हमें बताया कि इसी की पहली मंजिल पर मशहूर चित्रकार वैन गॉग ने कुछ समय बिताया था।
इम्प्रेशनिज़्म के बाद पश्चिमी कला को प्रभावित करने वाले चित्रकारों में वैन गॉग का नाम सबसे ऊपर माना जाता है। उनका जन्म नीदरलैंड में हुआ था। 37 वर्ष के अपने जीवन के छोटे अंतराल में उन्होंने क़रीब 2100 कलाकृतियों की रचना की। ज्यादातर रचनाओं का सृजन जीवन के अंतिम दो वर्षों में किया। 1890 में उनकी मृत्यु हो गई। 1886 और 1887 में मोनमार्ट के इसी घर में वे अपने भाई लियो के साथ रहते थे। लियो एक कला संग्रहकर्ता थे। कला व्यापारी भी थे। वे वैन गॉग को पेंटिंग करने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे।
वैन गॉग की मोनमार्ट सीरिज़ नामक पेंटिंग्स की एक श्रृंखला है जिसमें उन्होंने मोनमार्ट के जीवन का सुंदर चित्रण किया है। इस श्रृंखला में वहाँ की प्राकृतिक छटा, वहाँ की गलियों एवं आसपास के ग्रामीण इलाकों को विशेष जगह दी है। 1886 में उनकी पेंटिंग्स का रंग फीका दिखता है। पर 1887 से टुलुज़-लॉट्रैक जैसे साथी चित्रकारों का उनकी पेंटिंग्स पर प्रभाव स्पष्ट है। क्योंकि उसके बाद उन्होंने थोड़े गाढ़े रंगों का इस्तेमाल किया है। वैन गॉग की रचनाओं में मोनमार्ट के बगीचे और विंडमिल बार-बार उभरते हैं। गाइड ने रास्ते में हमें मोनमार्ट के ऐतिहासिक अंगूर के एक बाग और दो विंडमिल के दर्शन भी कराए।
फिर हम एक ऐसी जगह पर पहुँचे, जहाँ बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली कलाकार पाब्लो पिकासो अपने करियर के शुरुआती वर्षों में रहते थे। जहाँ अपनी पार्टनर फ़र्नांडे ओलिवियर के साथ रहकर उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण कलाकृतियों का सृजन किया था।
सन 1900 में पहली बार पिकासो स्पेन से यूरोपीय कला की राजधानी पेरिस आए। उनकी उम्र 19 वर्ष थी। 1904 में वे फ़र्नांडे ओलिवियर के संपर्क में आए। मोनमार्ट में फ़र्नांडे कलाकारों के लिए मॉडलिंग किया करती थीं। ख़ुद भी एक चित्रकार थीं। पिकासो और फ़र्नांडे एक-दूसरे से प्रेम करने लगे और मोनमार्ट में साथ-साथ रहने लगे। फ़र्नांडे पिकासो की रचनाओं की पहली प्रेरणा स्रोत मानी जाती हैं। वे पिकासो की उस वक्त की कई महत्वपूर्ण कलाकृतियों में दिखाई पड़ती हैं।
यही वो वक्त था जब कला की दुनिया में पिकासो की पहचान बढ़ने लगी थी। उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर होने लगी थी। अपनी कलाकृतियों में अब वे कुछ नए प्रयोग करने लगे थे। 1907 का उनका मास्टरपीस, ‘ले डेमोज़िल्स डी’एविग्नन’ (Les Demoiselles d’Avignon), इसी दिशा में उनका एक प्रयास था। इस पेंटिंग में एक महिला की आकृति उनकी पार्टनर फ़र्नांडे से मिलती है।
यह पिकासो के करियर का वह दौर था जब वे महसूस करने लगे थे कि जीवन के यथार्थ को हू-ब-हू पेश करने के लिए फ़ोटोग्राफी अपने आप में काफ़ी है। पेंटिंग उसका मुक़ाबला नहीं कर सकती। पेंटिंग के वजूद को अगर बचाना है तो उसके सृजन में कुछ नए प्रयोग करने होंगे। पिकासो एवं उनके सहयोगियों की इसी सोच का परिणाम था क्यूबिज़्म। यह कला के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी आंदोलन था एवं पाब्लो पिकासो उसके प्रणेता थे।
क्यूबिज़्म में ज्यामितीय आकारों के माध्यम से विषय को बहुआयामी बनाया जाता है जिसके कारण कलाकृतियों को देखने, परखने और उनकी व्याख्या करने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। विषय में अमूर्त व सूक्ष्म तत्वों का भी प्रयोग होता है। पिकासो का ले डेमोज़िल्स डी’एविग्नन क्यूबिज़्म में उनके प्रयोग का पहला उदाहरण था।
मोनमार्ट में फ़रनान्डे के साथ बिताए सात वर्ष पिकासो के करियर के लिए बहुत अहम थे। उनके शुरुआती वर्ष संघर्षों से भरे थे। पर बाद में यहीं उन्हें सफलता मिली। उनकी ख्याति फैलने लगी थी। 1911 में पाब्लो पिकासो फ़र्नांडे ओलिवियर से अलग हो गए।
फ़रनान्डे ओलिवियर ने पिकासो के साथ बिताए गए अपने उन दिनों पर दो किताबें लिखीं। इनमें अन्य बातों के अलावा पिकासो के व्यक्तित्व के कुछ नकारात्मक पहलुओं का भी चित्रण है। संस्मरण में एक जगह फ़रनान्डे लिखती हैं कि कई बार ईर्ष्यावश पिकासो मुझे एक कमरे में बंद करके चला जाता था। लेकिन मैं ख़ुश रहती थी। चाय, किताबें, दीवान के साथ कुछ सफ़ाई का काम करके अपने आप को व्यस्त रखती थी।
पाब्लो पिकासो के निवास स्थान से आगे बढ़ते हुए हम एक ऐसे मोड़ पर पहुँचे जहाँ से अचानक हमें सेक्रेकर की भव्य इमारत दिखाई पड़ी। तब तक शाम हो चुकी थी। आसपास की बत्तियाँ जल चुकी थीं। सेक्रेकर की सफ़ेद इमारत प्रकाश में नहा रही थी। मोड़ पर खड़े होकर हम उसका अवलोकन करने लगे।
यात्रा का अंतिम पड़ाव हमारे सामने था। सेक्रेकर पहुँचने का रास्ता हमें दिख रहा था। दूरी ज्यादा नहीं थी। लेकिन चढ़ाई बिल्कुल सीधी और तीव्र थी।
पहाड़ी के घुमावदार रास्तों पर चढ़ते हुए अब हम थक गए थे। हमारे समूह के बाकी सभी सैलानी हमसे उम्र में छोटे थे। उनके लिए तो नहीं, लेकिन हमारे लिए यात्रा का यह अंतिम हिस्सा थोड़ा चुनौतीपूर्ण लग रहा था। इसीलिए गाइड ने जब वहाँ रोककर हमें एक कहानी सुनाना शुरू किया, तब थोड़ी राहत मिली। मोनमार्ट से जुड़ी यह कहानी केवल फ्रांसीसी इतिहास की नहीं, बल्कि विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह है सेक्रेकर के निर्माण की पृष्ठभूमि से भी जुड़ी, पेरिस कम्यून की कहानी।
मार्च 1871 में मोनमार्ट की इसी चोटी पर फ्रांसीसी सेना के एक विद्रोह में सिपाहियों ने अपने ही दो जनरल की गोली मारकर हत्या कर दी। सिपाहियों ने उसके बाद अन्य लोगों के साथ मिलकर एक सरकार की स्थापना की, जो केवल दो महीने तक ही चली। पर पेरिस कम्यून के नाम से मशहूर वह सरकार विश्व भर में शोषित और वंचित वर्ग के लोगों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बन गई। हमारे गाइड ने संक्षेप में हमें पेरिस की उन परिस्थितियों से अवगत कराया, जिन्होंने पेरिस कम्यून को जन्म दिया था।
सन 1870 के फ्रांस-जर्मनी युद्ध में फ्रांस बुरी तरह हार गया था। फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय एक लाख से भी ज्यादा सैनिकों के साथ बंदी बना लिए गए। जर्मन सेना ने कुछ महीनों तक पेरिस की घेराबंदी कर ली, जिसके कारण वहाँ के आम आदमी के खाने तक के लाले पड़ गए। पेरिस पर अकाल की भयंकर मार पड़ी।
जनवरी 1871 में फ्रांस में जो सरकार बनी, उसमें ज़्यादातर लोग पारंपरिक, रूढ़िवादी विचारों के समर्थक थे। सरकार के मुखिया थे एडोल्फ़ थियर्स। उन्होंने जर्मन चांसलर ओटो वॉन बिस्मार्क के साथ शांति समझौते में घुटने टेक दिए। मुआवज़े के तौर पर एक भारी रकम के साथ जर्मनी को कुछ भूभाग भी सौंपने को तैयार हो गए।
पेरिस में ग़रीब तबके के लोग पहले से ही ख़फ़ा थे। सरकार की नीतियों के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। सेना के एक वर्ग में भी अपने वरिष्ठ अधिकारियों एवं सरकार की नीतियों के खिलाफ़ रोष था। जर्मनी के साथ इस शांति समझौते के बाद उनका रोष और बढ़ गया। नतीजा यह हुआ कि मोनमार्ट की चोटी पर सैनिकों के एक समूह ने विद्रोह कर दिया। अपने ही दो जनरल को गोलियों से भून डाला। वहाँ के तोपखाने पर कब्ज़ा कर लिया। मोनमार्ट की इस घटना के बाद विद्रोह में शामिल लोगों ने सरकारी इमारतों पर कब्ज़ा कर लिया। फ्रांस की एडोल्फ़ थियर्स की सरकार को बाध्य होकर पीछे हटना पड़ा। पेरिस छोड़कर वे वरसाई चले गए। इधर विद्रोह में शामिल लोगों ने मिलकर एक नई सरकार का गठन किया जिसका नाम पड़ा पेरिस कम्यून।
कम्यून में ज्यादातर पेरिस के मजदूर, कारीगर, शिल्पकार, छोटे व्यापारी शामिल थे। इनमें सैनिक भी थे, खासकर वे जो एडोल्फ़ थियर्स की सरकार से क्षुब्ध थे। पेरिस के लोग दो भागों में बंट गए थे। समाज का शोषित, वंचित वर्ग कम्यून के समर्थन में था। उन्हें कम्यूनार्ड्स कहा जाता था। समाज का अमीर, सुविधा संपन्न वर्ग एडोल्फ़ थियर्स की सरकार के समर्थन में था।
कम्यून की यह क्रांतिकारी सरकार फ्रांस में एक बेहतर लोकतंत्र चाहती थी। एक ऐसा लोकतंत्र जो आम आदमी की आकांक्षाओं को पूरा कर सके। दुर्भाग्यवश यह केवल दो महीने चली। पर इन्हीं दो महीनों में उन्होंने बदलाव की दिशा में जो क़दम उठाए, उनमें प्रमुख थे सरकार में जनता का उचित प्रतिनिधित्व, महिलाओं को वोट का अधिकार, समान वेतन इत्यादि। राजनीति में धर्म के हस्तक्षेप के भी वे खिलाफ़ थे। चर्च एवं पादरियों के अनावश्यक प्रभाव को खत्म करना चाहते थे।
72 दिनों बाद एडोल्फ़ थियर्स की सेना ने पेरिस कम्यून को हराकर फिर से पेरिस में अपनी सत्ता कायम कर ली। काफ़ी खून-खराबा हुआ। हज़ारों की संख्या में कम्यूनार्ड्स मारे गए। कुछ देश छोड़कर चले गए। कुछ को मृत्युदंड मिला, कुछ को देश-निकाला। लेकिन पेरिस कम्यून की छोटी अवधि की सरकार के परिणाम दूरगामी हुए। केवल फ्रांस पर ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर।
उस दौरान कार्ल मार्क्स जीवित थे। इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना का विश्लेषण करते हुए उन्होंने ‘इसे नए समाज का एक अग्रदूत’ कहा। रूस में साम्यवादी क्रांति के अगुआ लेनिन तथा चीन के माओत्से तुंग दोनों के लिए यह प्रेरणा का स्रोत बन गया। रूसी क्रांति के 72 दिन पूरे होने पर लेनिन खुशी से झूमने लगे कि उनकी क्रांति ने पेरिस कम्यून की अवधि को पूरा कर लिया। दिलचस्प है कि जिस पेरिस कम्यून का मार्क्सवादी या साम्यवादी विचारों से कोई संबंध नहीं था, जो फ्रांसीसी समाज में व्याप्त असंतोष का एक स्वाभाविक नतीजा था, वह बाद में चलकर साम्यवादियों के लिए एक आदर्श बन गया।
फ्रांस के इतिहास की इसी पृष्ठभूमि में सेक्रेकर का निर्माण हुआ। 1873 में फ्रांस की नेशनल असेंबली ने मोनमार्ट की उसी चोटी पर एक चर्च के निर्माण का निर्णय लिया जहाँ से कम्यूनार्ड्स ने क्रांति की शुरुआत की थी। असेंबली में ज्यादातर सदस्य रूढ़िवादी परंपरा के थे। उनके अनुसार ‘यह चर्च हमारी उन गलतियों के पश्चाताप के लिए ज़रूरी है जिन्होंने हमें दुख दिए हैं’। स्पष्ट है कि कम्यून को वे इतिहास की एक ग़लती बता रहे थे। कम्यून के समर्थकों ने उस समय भी सेक्रेकर का विरोध किया था। वे आज भी उसका विरोध करते हैं। यही कारण है कि वामपंथी व समाजवादी विचारधारा के लोग सेक्रेकर को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। दो परस्पर विरोधी गुटों में संघर्ष का प्रतीक यह विशाल चर्च 1914 में बनकर तैयार हुआ।
कहानी के साथ हमारा वॉकिंग टूर खत्म हो चुका था। गाइड हमसे विदा ले चुका था। और हम सेक्रेकर की उस भव्य इमारत के सम्मुख खड़े थे जिसे पिछले कुछ दिनों से हमने पेरिस की गलियों, सड़कों या फिर भवनों के ऊपर चढ़कर देखा था। वहाँ से हमें अब पूरा पेरिस दिख रहा था। शाम की रंगीन बत्तियों में जगमगाते हॉसमान बिल्डिंग्स, प्राचीन महल, यहाँ तक कि आइफ़िल टावर भी, सेक्रेकर के सामने बौने प्रतीत हो रहे थे।
— अरुण जी
अरुण एक लेखक, अनुवादक तथा शिक्षाविद् हैं। वे हिंदी और अंग्रेज़ी में नियमित रूप से लिखते हैं। आप उनके लेख और कविताएँ यहाँ पढ़ सकते हैं: arupedia.com
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यह यात्रा-संस्मरण पाठक को केवल पेरिस की गलियों में घुमाता ही नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवेश से भी जीवंत रूप से जोड़ता है। मोनमार्ट की जीवंतता, कलाकारों के संघर्ष (वैन गॉग, पिकासो), 'पेरिस कम्यून' की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और अंत में सेक्रेकर के भव्य रूप का वर्णन इतने सहज और रोचक ढंग से किया गया है कि पूरा दृश्य आँखों के सामने जीवंत हो उठता है।
ऐतिहासिक तथ्यों, कलात्मक संदर्भों और व्यक्तिगत अनुभवों का यह संतुलन इस लेख को अत्यंत पठनीय, समृद्ध और उच्च स्तरीय बनाता है। एक उत्कृष्ट और प्रेरणादायक रचना