आर्थिक विकास में रेगुलेशन कैसे बना रोड़ा?
India's premature regulatory state and the journey towards liberalization
खेती की खोज के बाद, दुनिया के लगभग सभी समाज एक ही तरह आगे बढ़े। लोग वहीं बस्तियाँ बनाकर रहने लगे, जहाँ ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी चीज़ें आसानी से मिल जाती थीं, जैसे खाना, पानी और शुरुआती औज़ार। उस दौर में व्यापार बिल्कुल सीधा था: गेहूँ उगाने वाला किसान सीधे मोची से सौदा करता था और मोची बदले में अपने परिवार के लिए गेहूँ ले लेता था। हर कोई जानता था कि किसी चीज़ को बनाने में कितनी मेहनत लगी है, इसलिए चीज़ों की सही कीमत तय करना पूरे समाज के लिए बहुत आसान था।
लेकिन जैसे-जैसे ये बस्तियाँ बड़ी हुईं और आपस में जुड़ीं, व्यापार का तरीका बदलने लगा। कुछ महत्वाकांक्षी लोगों ने अपने काम को बड़ा रूप दिया। उन्होंने ‘इकोनॉमी ऑफ़ स्केल’ के फ़ायदों, कुशलता और तत्कालीन तकनीक का इस्तेमाल किया। (यहाँ तकनीक का मतलब इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी आधुनिक चीज़ें नहीं है, बल्कि कोई भी नया तरीका या प्रक्रिया है जिससे कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा काम हो सके, जैसे हाथ से कपड़ा बुनने के लिए हथकरघे यानी हैंडलूम का इस्तेमाल करना)।
इस बड़े बदलाव से उत्पादन और संपत्ति तो कई गुना बढ़ गए, लेकिन बाज़ार का वह सीधापन खो गया। ग्राहक अब सामान बनने की प्रक्रिया से पूरी तरह कट गया। कामयाब बिज़नेस मालिकों ने जमकर मुनाफ़ा कमाया। अपने काम में माहिर होने और भारी मात्रा में उत्पादन करने की वजह से इन नए कारोबारियों ने धीरे-धीरे अपने छोटे प्रतिस्पर्धियों को बाज़ार से बाहर कर दिया। जब पूरी आर्थिक ताकत कुछ ही हाथों में सिमट गई, तो बाज़ार का संतुलन बिगड़ने लगा। यहीं से मोनोपोली यानी एकाधिकार, मनमाने दाम और स्पर्धा न होने से सामान की गुणवत्ता में गिरावट जैसी समस्याएँ शुरू हुईं।
बाज़ार की इस कमज़ोरी को दूर करने के लिए नियमों और उन्हें लागू करने वाली संस्थाओं की ज़रूरत महसूस हुई, जैसे उस ज़माने के व्यापारी संगठन, यूनियन या फिर आगे चलकर सरकार।
वैसे तो प्राचीन दुनिया में भी नाप-तौल के कुछ तय पैमाने थे और सोना एक हद तक अंतरराष्ट्रीय चलन की तरह काम करता था। यहाँ तक कि टैक्स (जो सामान या सर्विस के रूप में दिया जाता था) वसूलने का नियम तो पैसे से भी पुराना है। लेकिन आधुनिक रेगुलेशन का जन्म औद्योगिक क्रांति के बाद हुआ, जिसका सबसे पहला और बड़ा उदाहरण था ब्रिटेन का 1844 का ‘रेलवे रेगुलेशन एक्ट’।
दुनिया के हर देश के रेगुलेशन का अपना इतिहास रहा है। कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाएँ कड़े नियमों से पूरी तरह बंधी हुई हैं, जहाँ सरकारी अफ़सरों को अपने मन से फ़ैसला लेने की छूट (discretion) बहुत कम है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में जो वहाँ के संविधान में लिखा है, बिल्कुल वैसा ही करना होता है।
दूसरी तरफ़, कुछ देश ऐसे भी हैं जो लिखित नियमों से ज़्यादा अफ़सरों के विवेक, अनौपचारिक तरीकों और पुरानी परंपराओं पर भरोसा करते हैं, जैसे ब्रिटेन और जापान। सरकारी अफ़सरों को मन से फ़ैसला लेने की जितनी ज़्यादा छूट होती है, आम जनता का सिस्टम पर भरोसा उतना ही कम होता है। हालाँकि विकसित देशों ने इस मनमानी पर मज़बूत और पारदर्शी संस्थाओं के ज़रिए लगाम कस ली है, जबकि भारत जैसे विकासशील देशों में यह छूट अक्सर सरकारी अफ़सरों की मनमानी, लालफ़िताशाही और काम में रोड़े अटकाने का ज़रिया बन जाती है।
जहाँ दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने पहले उत्पादन बढ़ने दिया और नियम बाद में बनाए, वहीं भारत ने इस मामले में उलटी गंगा बहा दी। हमने अपनी अर्थव्यवस्था बड़ी होने से पहले ही इतने रेगुलेशन लगा दिए कि वह बचपन में ही सुस्त पड़ गई।
जैसे-जैसे तकनीक में सुधार हुआ और समाज का आकार बढ़ा, रेगुलेशन का स्वरूप भी बदला। अब रेगुलेशन सिर्फ़ व्यापार के उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए नहीं, बल्कि बड़े और पेचीदा खतरों को पहले से भाँपने और उन्हें मैनेज करने के लिए बनाए जाने लगे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण परमाणु ऊर्जा है।
आज यही बहस हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर भी देख रहे हैं। आज के पॉलिसीमेकर और थिंकर इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि एक ऐसा संतुलन कैसे बनाया जाए, जिससे समाज भी सुरक्षित रहे और इनोवेशन से होने वाले आर्थिक लाभ भी हाथ से न निकलें।
अगर सही मायने में देखा जाए, तो रेगुलेशन ऐसे होने चाहिए, जो देश को आगे बढ़ने में मदद करें। जैसा कि Braithwaite कहते हैं: केंद्रीय बैंक सिर्फ़ आर्थिक संकट या मंदी नहीं रोकती, वह देश के विकास की दृष्टि से पूरी अर्थव्यवस्था मैनेज करती है। एनवायरमेंटल रेगुलेटर का काम प्रदूषण नियंत्रण से परे जाकर नदियों में मछलियों और जंगल में पेड़ों की संख्या बढ़ाकर पूरे पर्यावरण को पुनर्जीवित करना है।
लेबर मार्केट रेगुलेटर के नियम सिर्फ़ महिलाओं, दिव्यांगों या अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए नहीं होने चाहिए, बल्कि उनके लिए तरक्की के नए और बेहतर मौके बनाने वाले होने चाहिए। खाद्य मानक बोर्ड को लोगों को खराब या ज़हरीले खाने से तो बचाना चाहिए ही, साथ ही समाज को मिलने वाले भोजन की ताज़गी और उसमें मौजूद पोषण मूल्यों को बढ़ाने की कोशिश भी करनी चाहिए।
वसूली का जाल और परोपकार का भ्रम
रेगुलेशन का यह ढाँचा यह मानकर चलता है कि व्यवस्थाएँ पूरी तरह से जनता की भलाई के लिए काम करती हैं। लेकिन मानव इतिहास गवाह है कि ऐसा सोचना सिर्फ़ एक वहम है। असलियत तो यह है कि इंसानी सिस्टम पूरी तरह से निजी स्वार्थ, फ़ायदे और लेन-देन के गणित पर चलते हैं। कोई भी रेगुलेटर सिर्फ़ इसलिए काम नहीं करता क्योंकि उसे आम जनता की बहुत फ़िक्र है। सरकार और प्रशासन भी आखिरकार इंसानों से ही बने हैं, जो हमेशा अपने निजी फ़ायदे, राजनीतिक अस्तित्व और अपनी कुर्सी बचाने की होड़ में लगे रहते हैं।
अगर इतिहास देखें, तो घरेलू बाज़ार और व्यापारी व्यवस्थाएँ हमेशा से सरकार (या राजाओं) के सीधे दखल से ही खड़ी हुई थीं। पुराने ज़माने के शासक ‘बाज़ार के चौकों’ पर कड़ी निगरानी रखते थे ताकि कीमतें इतनी ज़्यादा न घटें-बढ़ें कि शहरों में दंगे हो जाएँ।
आज भारत की कृषि व्यवस्था पर लगा सरकारी नियंत्रण उसी पुरानी व्यवस्था की कार्बन कॉपी है। सरकार खाद-बीज जैसे इनपुट पर सब्सिडी देकर और फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की बेड़ियाँ लगाकर एक तरह से किसानों की आर्थिक आज़ादी का गला घोंट रही है। उन्हें सरकारी नियमों के एक ऐसे चक्रव्यूह में फँसा दिया गया है, जहाँ उन्हें बाज़ार के उतार-चढ़ाव को समझकर खुद फैसले लेने की क्षमता वाला कारोबारी माना ही नहीं जाता।
पुराने ज़माने का कोई शासक किसी बड़े व्यापारी के बढ़ते एकाधिकार को इसलिए नहीं रोकता था क्योंकि वह बाज़ार में पारदर्शिता लाना चाहता था। वह तो इसलिए दखल देता था क्योंकि व्यापारियों की बढ़ती ताकत से उसके राजपाट को खतरा होता था या उसके टैक्स का नुकसान हो रहा होता था।
ज़्यादातर मामलों में, इसका हल दोनों की मिलीभगत से निकलता था। शासक उस बड़े व्यापारी पर थोड़ा और टैक्स ठोक देता, लूट की कमाई में से अपना हिस्सा ले लेता और उन्हें अपनी मनमानी जारी रखने देता। शुरुआत से ही, सरकार कोई निष्पक्ष अंपायर नहीं रही है, वह खुद इस खेल का एक ऐसा हिस्सा है, जिसे पैसे वाले लोग आसानी से खरीद सकते हैं, डरा सकते हैं या अपने पाले में कर सकते हैं।
आधुनिक लोकतंत्रों ने इस पुराने सिस्टम में थोड़ा सुधार ज़रूर किया है। सत्ता में बने रहने के लिए आज की सरकारों को जनता का थोड़ा-बहुत ध्यान तो रखना ही पड़ता है। कुछ समाजों ने, खासकर नॉर्डिक देशों ने और एक हद तक अमेरिका ने, धीरे-धीरे चेक्स और बैलंन्सेस का एक ऐसा सिस्टम बनाया, जो खुद सरकार की ताक़त पर भी लगाम कसता है।
लेकिन, बुनियादी दोष आज भी वही है: आज भी शासन-प्रशासन इंसान ही चलाते हैं और वे अपने निजी फ़ायदे, राजनीतिक अस्तित्व और स्वार्थ से प्रेरित होते हैं।
चूँकि बाज़ार की हर छोटी-बड़ी गड़बड़ी पर नज़र रखने का ज़िम्मा सरकार का होता है, इसलिए उसे अर्थव्यवस्था की बारीक-से-बारीक जानकारी मिल जाती है। इसी जानकारी के ज़रिए उसे इतनी असीमित ताकत भी प्राप्त हो जाती है कि वह इन नियमों को ही अपनी अवैध कमाई का हथियार बना लेती है।
भारत में रेगुलेशन का उलटा इतिहास
यहीं विकसित देशों और भारत के बीच का एक बड़ा फ़र्क साफ़ नज़र आता है। दोनों ने इतिहास में जिस तरह रेगुलेशन लागू किया, वो रास्ते एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे। और मुझे पूरा यकीन है कि भारत की तरह ही दुनिया के कई और देशों की भी यही समस्या होगी।
पश्चिम में आधुनिक “रेगुलेटरी स्टेट” के बनने का इतिहास कुछ अलग है। वहाँ सरकार खुद सामान बेचने और सेवाएँ देने के काम से पीछे हट गई। इसके बजाय उसने स्वतंत्र रेगुलेटरी एजेंसियों के ज़रिए सिर्फ़ अर्थव्यवस्था को सही दिशा देने का काम चुना।
सबसे ज़रूरी बात यह थी कि विकसित देशों ने अपने बाज़ारों को पहले पूरी तरह से फलने-फूलने, बड़ा होने और नए आविष्कार करने का मौका दिया। जब बाज़ार बड़ा हो गया और उसमें कमियाँ दिखने लगीं, तब जाकर सरकार उन्हें ठीक करने के लिए बीच में आई। इसके अलावा, उन्होंने एक ऐसा बहुआयामी सिस्टम बनाया जिसमें आज़ाद अदालतें, जनता की आवाज़ उठाने वाले संगठन और सेल्फ-रेगुलेटिंग प्रफेशनल बॉडीज़ शामिल थीं। इन सबने मिलकर सरकार की ताकत पर लगाम लगाई, जिससे नियम जनता को दबाने वाले नहीं बल्कि उसकी मदद करने वाले बने रहे।
लेकिन भारत ने इस पूरी कहानी को ही उलट दिया और खुद को एक ऐसे चक्रव्यूह में धकेल दिया, जिससे बाहर निकलना आज बहुत मुश्किल है। आज़ादी के बाद भारत को विरासत में अंग्रेज़ों का बनाया हुआ एक ऐसा प्रशासनिक ढाँचा (बाबूशाही) मिला, जिसका एकमात्र मक़सद लोगों को गुलाम बनाए रखना और टैक्स वसूलना था। यही वजह थी कि आज़ाद भारत की सरकार प्राइवेट कंपनियों और पूँजी को हमेशा शक की निगाह से देखती थी। होना तो यह चाहिए था कि बाज़ार को नीचे से ऊपर की तरफ़ अपनेआप बढ़ने दिया जाता और जहाँ गड़बड़ी होती, उसे सुधारा जाता। लेकिन हमारी सरकार ने इसके ठीक उलट किया।
ऊपर से उस दौर में सोवियत संघ के प्लानिंग मॉडल का काफ़ी बोलबाला था, इसलिए भारत ने भी समाजवादी सोच को अपनाकर बाज़ार पर अपना कंट्रोल और ज़्यादा बढ़ा दिया। पहले दिन से ही सरकार माई-बाप और नियंत्रक बन गई। इसी से पैदा हुआ कुख्यात लाइसेंस राज।
मुझे अमित वर्मा के एक पॉडकास्ट में श्रुति राजगोपालन की कही एक बात याद आती है। उन्होंने बताया था कि हाल ही में हुए श्रम सुधारों से पहले तक, सरकार यह तक तय करती थी कि किसी फैक्ट्री के टॉयलेट में टाइल्स की ऊँचाई कितनी होगी और उसका लेआउट कैसा होगा! इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हमारी सरकार बिज़नेस के अंदरूनी मामलों में किस हद तक दखल देती रही है।
चूँकि भारत की सरकार ने देश में उद्योगों के पनपने से पहले ही पूरी अर्थव्यवस्था को अपनी मुट्ठी में कर लिया था, इसलिए सरकारी अफ़सरों की यह निगरानी हर मोड़ पर एक टोल बूथ यानी वसूली का अड्डा बन गई। अगर किसी उद्यमी को कुछ भी नया बनाने, कंपनी को बड़ा करने या नई खोज करने के लिए हर बार सरकार से परमिशन माँगनी पड़े, तो नियंत्रण की यह ताकत सीधे-सीधे वसूली का ज़रिया बन जाती है।
इस अजीबोगरीब और बेतुके सिस्टम का सबसे बड़ा उदाहरण इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति का किस्सा है। 1980 के दशक की शुरुआत में, सिर्फ़ एक मेनफ्रेम कंप्यूटर आयात करने के लिए नारायण मूर्ति को दिल्ली के 50 से ज़्यादा चक्कर काटने पड़े थे। सरकारी दफ़्तरों की भूलभुलैया में भटकते-भटकते सरकारी मंज़ूरी मिलने में पूरे 3 साल का लंबा वक्त लग गया। और मज़ाक देखिए, आखिरकार जब इस बाबूशाही ने कंप्यूटर मँगाने की परमिशन दी, तब तक वह कंप्यूटर मॉडल दुनिया के बाज़ार में पूरी तरह पुराना हो चुका था! बाज़ार में उससे कहीं सस्ता और बेहतर मॉडल आ चुका था, लेकिन उसे मँगाने के लिए फिर से वही कवायद करनी पड़ती।
यह है रेगुलेशन की उलटी गंगा बहाने की विनाशकारी कीमत। एक फलते-फूलते बाज़ार को सही दिशा देने के बजाय, भारतीय प्रशासन ने अपनी ताक़त का इस्तेमाल नई सोच और नए आविष्कारों को अंकुरित होने से पहले ही कुचलने के लिए किया।
इस तरह के मनमाने और हर चीज़ में दखलंदाज़ी करने वाले सिस्टम को कानूनी रूप देकर, भारत अपनी प्रशासनिक क्षमता (state capacity) को कभी मज़बूत नहीं कर सकता, बल्कि सिर्फ़ बाज़ार से हफ़्ता वसूली करने वाले नेताओं और अफ़सरों का थोक उत्पादन कर सकता है।
और यही हुआ भी है।
इस पुरानी लत (path dependency) की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि आज भारतीय अर्थव्यवस्था को आज़ाद (liberalize) करना एक पहाड़-जैसी चुनौती बन गया है। अमेरिका जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं की चुनौती है कि वहाँ बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियाँ बाहर से सरकार पर अपना कब्ज़ा जमाने की कोशिश करती हैं। इसके उलट, भारत एक अंदरूनी चक्रव्यूह में फँसा है, जहाँ खुद सरकार अपने ही बाज़ार का गला घोंट रही है। अब इसमें सुधार करने का मतलब है कि हमारे सरकारी तंत्र को अपनी मर्जी से उन शक्तियों और वसूली के रास्तों को छोड़ना होगा, जिसे वह पीढ़ियों से मज़बूत करता आया है।
यहाँ से आगे का रास्ता क्या है?
हाल ही में, मैं और मेरे कुछ दोस्त इसी बात पर चर्चा कर रहे थे कि आखिर ऐसा क्या हो सकता है जो भारत को डिरेगुलेशन करने पर मजबूर कर दे।
इसकी बहुत कम गुंजाइश है कि यह सुधार खुद सरकार की तरफ़ से होगा। चूँकि हमारा पूरा राजनीतिक ढाँचा खुद को बचाए रखने और कमाई करने के लिए बाज़ार पर पाबंदी लगाने पर ही टिका है, इसलिए सरकार से यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि वह अपनी मर्जी से डिरेगुलेशन कर देगी। साल 2014 के आस-पास उद्योगों को बढ़ावा देने की जो थोड़ी-बहुत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखी भी थी, वह चुनाव जीतने के क्रूर खेल में कहीं खो गई है। अब तो बस सब्सिडी और मुफ़्त की रेवड़ियाँ बाँटकर चुनाव जीतने की एक अंधी दौड़ चल पड़ी है।
अगर बदलाव अपनी मर्जी से नहीं आया, तो इसे मजबूरन लाना होगा, बिल्कुल वैसे ही जैसे हालात आज बने हुए हैं। भारत को बाहरी भू-राजनीतिक दबाव का बहाना करके अपने अंदरूनी सिस्टम को बदलना होगा। साथ ही, देश में एक जागरूकता अभियान खड़ा करना होगा, ताकि मतदाता मुफ़्त रेवड़ियों के बजाय आर्थिक आज़ादी और विकास की माँग करें।
अगर देश के अंदर से व्यवस्था को बदलने की इच्छाशक्ति नहीं दिख रही है, तो वैश्विक स्पर्धा ही सरकार को डिरेगुलेशन के लिए मजबूर कर सकती है। आज की आर्थिक सच्चाइयाँ आखिरकार हमारे नेताओं को बड़े जोखिम लेने और उन बेड़ियों को तोड़ने पर मजबूर कर रही हैं, जिन्हें उन्होंने खुद दशकों से संजोकर रखा था।
आज बड़े पैमाने पर किए जा रहे मुक्त व्यापार समझौते (FTA) इस बदलाव के लिए एक बाहरी चाबुक का काम कर रहे हैं। जब भारत अन्य देशों के साथ ऐसे समझौते करता है, तो सरकार को अपने अस्तव्यस्त नियमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से सीधा करना ही पड़ता है। दुनिया के बाज़ार में टिकने के लिए सरकार को मजबूरन ज़मीनी स्तर की अड़चनों को दूर करना पड़ता है। हाल ही में श्रम कानूनों में किए गए सुधार और बिजली क्षेत्र में आ रहे बदलाव इसी मजबूरी में उठाए गए शुरुआती कदम हैं।
लेकिन सिर्फ़ सरकार के स्तर पर सुधार करने से काम नहीं चलेगा, अब जनता को भी अपनी माँगों में सुधार करना होगा। मतदाताओं को अब यह तय करना होगा कि वे अपने चुने हुए नेताओं से आखिर क्या चाहते हैं। वैसे, बदलाव की थोड़ी सुगबुगाहट अब दिखने लगी है। दुनिया भर में देश की आर्थिक छवि का कमज़ोर होना, शहरों की खस्ता हालत के प्रति प्रशासन की लापरवाही और गाँवों में ठप पड़ती कमाई की वजह से आम लोगों में सरकार के खिलाफ असंतोष साफ़ महसूस किया जा सकता है।
फिर भी, जनता के इस गुस्से को एक स्थायी सुधार में बदलना बहुत बड़ी चुनौती है। भारत एक ऐसे पैटर्न में फँस चुका है, जहाँ लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी के हर छोटे-बड़े हिस्से पर सरकार का कब्ज़ा है। इस माई-बाप सरकार वाली आदत से पीछा छुड़ाना दोनों के लिए बहुत दर्दनाक होगा। सरकार को अपनी रोकने-टोकने की ताकत छोड़नी होगी और जनता को मुफ़्त में मिलने वाली सरकारी रेवड़ियों का मोह त्यागना होगा। इस बदलाव से राजनीतिक शोरगुल होगा और सालों से मलाई खा रहे गुटों की तरफ़ से भारी विरोध भी होगा। लेकिन अगर हमने आज यह बदलाव नहीं किया, तो आगे चलकर हमारे सामने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। हमारे पास वक्त बहुत कम है। दुनिया का यह सबसे युवा देश हमेशा युवा नहीं रहेगा। जो सरकार दूर की सोचने और उद्योग बढ़ाने के बजाय सिर्फ़ चुनाव जीतने के लिए मुफ़्त की योजनाएँ बाँटती रहेगी, उसे अंत में एक ऐसी सुस्त अर्थव्यवस्था मिलेगी जो अपने ही नौजवानों को रोज़गार नहीं दे पाएगी।
परिशिष्ट: यूनिट इकोनॉमिक्स - उत्पादन की लागत का गणित
अगर हम गहराई से समझना चाहते हैं कि सरकारी रेगुलेशन उद्योगों को बड़ा होने से कैसे रोकते हैं, तो हमें किसी भी सामान को बनाने की असली लागत (जिसे यूनिट इकोनॉमिक्स कहते हैं) के ढाँचे को समझना होगा।
मान लीजिए कि किसी चीज़ को भारत में बनाने में 10 डॉलर का खर्च आता है, जबकि वही चीज़ चीन में सिर्फ़ 5 डॉलर में बन जाती है (इस तुलना में हम चीन की सरकारी सब्सिडी को अलग रख रहे हैं)। अब एक बिजनेसमैन की नज़र से देखें, तो हमें यह देखना होगा कि आखिर हमारे पैसे कहाँ जा रहे हैं और यह अतिरिक्त 5 डॉलर का भारी अंतर आ कहाँ से रहा है।
आज हमारे सरकारी सिस्टम ने इस लागत के हर एक हिस्से को बिगाड़ कर रख दिया है। देखते हैं कैसे:
कच्चे माल की लागत: वैसे तो कच्चे माल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के बराबर होती है। लेकिन उस कच्चे माल को एक पक्के प्रोडक्ट में बदलने के लिए हमें उत्पादन के सभी घटकों की ज़रूरत होती है, जैसे मज़दूर, बिजली, पानी, पूँजी और इनोवेशन।
भारत में इनमें से हर एक चीज़ पर कड़े सरकारी प्रतिबंध लगाए जाते हैं, भारी टैक्स वसूला जाता है या मनमानी गाइडलाइंस थोप दी जाती हैं। नतीजा यह होता है कि फैक्ट्री शुरू होने से पहले ही उसके उत्पादन की कीमत आसमान छूने लगती है।
इंडस्ट्री-विशेष रेगुलेशन: उत्पादन कारकों की दिक्कतों के ऊपर हर एक इंडस्ट्री के लिए बने पेचीदा सरकारी नियम आते हैं। इनमें कभी न खत्म होने वाले कंप्लायंसेस, एक जैसी कई पर्यावरण मंज़ुरियाँ और फैक्ट्री इंस्पेक्टरों की मनमानी शामिल है। ये सारे अड़ंगे सरकारी बाबूओं को मनमर्ज़ी करने और घूसखोरी की पूरी छूट दे देते हैं।
उदाहरण के लिए, बायोसाइड्स (जैसे बायो-पेस्टिसाइड्स और बायो-फर्टिलाइजर्स) के सेक्टर को ही देख लीजिए। भारत में इसकी सरकारी मंज़ूरी मिलने में ही करीब 3 से 4 साल लग जाते हैं, जबकि ब्राज़ील में इसमें महज़ 6 महीने का समय लगता है। यही वजह है कि ब्राज़ील आज दुनिया का बायोमैन्यूफैक्चरिंग हब बनता जा रहा है और हम पीछे छूट रहे हैं।
लॉजिस्टिक्स और एक्सपोर्ट का खर्च: आखिर में, तैयार माल को अपने देश से दुनिया के बाज़ार तक पहुँचाने में भी काफ़ी पैसा लगता है। इसमें हमारे देश के अंदर लगने वाले टैक्स, कमज़ोर इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से होने वाली देरी से लेकर जहाँ निर्यात हो रहा है, उस देश के इम्पोर्ट टैरिफ तक शामिल हैं। FTAs के ज़रिए इस खर्च को कम किया जा सकता है।
अगर हम यह समझना चाहते हैं कि हमारा पैसा कहाँ जा रहा है और हम अपनी लागत कैसे कम कर सकते हैं, तो हमें इन सारे पहलुओं को एक सच्चे बिजनेसमैन की नज़र से देखना होगा।
रेगुलेशन के नाम पर लदे इन बेहिसाब खर्चों को एक-एक करके खत्म किए बिना भारत आगे नहीं बढ़ सकता। हमें उद्योगों को फलने-फूलने से पहले ही रेगुलेशन के जाल में उलझाकर मार देने वाले इस ढाँचे को बदलना होगा। तभी हम एक ऐसी अर्थव्यवस्था बन पाएँगे, जो वैश्विक बाज़ार में मज़बूती से खड़ी हो सके। आखिरकार, अगर सरकार को यह दिखेगा ही नहीं कि यथास्थिति बनी रहने से देश की अर्थव्यवस्था का कितना बड़ा नुकसान हो रहा है, तो भला वह इस व्यवस्था को बदलने के लिए कोई कदम क्यों उठाएगी?
— अभेद मनोचा
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
अभेद BiaSPARK में रिसर्च लीड हैं। वे कंपनियों को रणनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए डेटा-आधारित समाधान प्रदान करते हैं।
यह लेख अंग्रेज़ी में आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Evolution of regulation and how India has it backwards
अभेद के अन्य लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Manocha Opinion
पुलियाबाज़ी मैगज़ीन: तृतीय संस्करण
आप सभी को जिसका इंतज़ार था वह पुलियाबाज़ी का तीसरा अंक आ चुका है! इस अंक की थीम है ‘विश्व मंथन में भारत’ (India in the World)। इस अंक में आप भारत के नज़रिए से—टेक्नोलॉजी, अंतरराष्ट्रीय संबंध, परमाणु रणनीति, चीन और भारत के रिश्तों समेत, ऊर्जा नीति, नए दौर के युद्ध और अंतरिक्ष अनुसंधान तक कई विषयों पर लेख पढ़ सकेंगे। साथ ही, राष्ट्रवाद पर गाँधी-टागोर के विचार और समकालीन हिंदी कवियों की सशक्त कविताएँ भी आपको इस मैगज़ीन में मिलेंगी।
तो देर किस बात की? आज ही अपनी कॉपी बुक कीजिए नीचे दी गई लिंक पर:
पुलियाबाज़ी मैगज़ीन । Puliyabaazi Magazine
Order the magazine by scanning the QR Code below. You can order a single edition or a subscription of 4 editions.
पुलियाबाज़ी मैगज़ीन अब डिजिटल फ़ॉर्मेट में भी उपलब्ध!
हमारे कई पाठकों की माँग थी कि पुलियाबाज़ी मैगज़ीन डिजिटल फ़ॉर्मेट भी उपलब्ध कराई जाए। हमें ख़ुशी है कि हम उनकी यह माँग पूरी कर सके।
नीचे दी गई लिंक से आप पुलियाबाज़ी के तीनों अंक डिजिटल रूप में खरीद सकते हैं।
Puliyabaazi Hindi Magazine on Amazon
अनदेखा ढाँचा: Engineering Talent, Non-Profit Trade Bodies, Vibrant Public Libraries
यह चर्चा पिछले एपिसोड से चल रही चर्चा का दूसरा भाग है। पिछले हफ्ते हमने बात की थी AI और डिजिटल दुनिया के बारे में। इस हफ्ते हम अपनी नज़र दौड़ाते है उस अदृश्य इंफ्रास्ट्रक्चर पर जिसकी कमी की वजह से भारत कई मायनों में पीछे छूट जाता है। हम टटोलेंगे अमेरिका के ‘ट्रेड शोज़’ का गणित, समझेंगे हवाई जहाज़ के ईंधन पर लगने वाले टैक्स को, और आख़िर में बात होगी कि कैसे …
ख़राब सरकारी नियमों से चंगुलतोड़ का मैनिफेस्टो। A Framework for Deregulation in India.
एक गणतंत्र में संविधान के ज़रिये सरकार की शक्ति पर रोक लगायी जाती है, पर भारत में हम देखते हैं कि अक्सर होता इससे ठीक उल्टा है। सरकार ही भारतीय नागरिकों पर इतनी रोक लगाती है कि पूछो ही मत। और हम नागरिकों को भी इसकी इतनी आदत पड़ चुकी है कि हम पूछते भी नहीं कि ये नियम हम पर क्यों लगाए जा रहे हैं। प्रणय ने तो बेकार नियमों के इस जाल को सरकार का चंगुल कहा है।
भारत में ऊर्जा क्रांति के लिए एक दूरदर्शी सोच। A Vision for Clean Energy in India ft. Ajay Shah
दुनिया एक बड़े ऊर्जा परिवर्तन के मुहाने पर खड़ी है, जहाँ तेल और कोयले जैसे ईंधन के सामने सौर और पवन ऊर्जा के विकल्प अब मौजूद हैं। इसके बावजूद वे भारत की ऊर्जा खपत का केवल 3.2% हिस्सा है। ऐसा क्यों है? क्या इसमें हमारी नीतियाँ आड़े आ रही हैं? इस एपिसोड में चर्चा है भविष्य के ऐसे विज़न की जिसमें भारत स्मार्ट इलेक्ट्रिफिकेशन से सही मायने में साफ़ ऊर्जा की दिशा…
We welcome articles/blogs/experiences from our readers and listeners. If you are interested in getting your writing featured on Puliyabaazi, please send us your submissions at puliyabaazi@gmail.com. Check out this article for submission guidelines.









