— अभेद मनोचा
मैं एक पंजाबी परिवार से आता हूँ और पंचकूला में बड़ा हुआ हूँ। भले ही वह हरियाणा में है, लेकिन सांस्कृतिक रूप से पंजाब के काफ़ी करीब है। बचपन से ही पंजाब की संस्कृति, उसकी ज़मीन और उसके लोगों पर मुझे गर्व रहा है। लेकिन पिछले एक दशक में एक सूक्ष्म लेकिन लगातार हो रहा बदलाव देखने को मिला है। अखबारों की सुर्खियाँ बदल गई हैं। बढ़ती बेरोजगारी, नशाखोरी की समस्या, उद्योगों का बाहर जाना अब आम खबरें बन गई हैं। दो साल पहले RBI की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें पंजाब की खराब होती सरकारी वित्तीय स्थिति की बात की गई थी। और आज जब भी मैं घर जाता हूँ, हर बार कोई न कोई अप्रिय खबर ज़रूर सुनने में आती है। इसलिए मुझे लगता है कि यह समझना ज़रूरी है कि आखिर पंजाब के साथ क्या गलत हुआ।
पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है, जिसने विभाजन के दौरान भारी हिंसा और विस्थापन देखा। परिवार टूटे, ज़मीन बँटी, व्यापार नेटवर्क खत्म हुए। लाहौर जैसे शहर का खोना भी एक बड़ा नुकसान था, जो पंजाब का आर्थिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक केंद्र था। इसका असर शुरुआती दशकों में ज़रूर रहा होगा। लेकिन समय के साथ घाव भर जाते हैं। आज पंजाब की आर्थिक गिरावट को सिर्फ़ विभाजन से जोड़ना सही नहीं होगा। अगर ऐसा होता, तो राजस्थान और गुजरात जैसे दूसरे बॉर्डर स्टेट्स भी वैसा ही प्रदर्शन करते। लेकिन उन्होंने बेहतर किया है।
एक और कारण अक्सर 1966 में पंजाब के पुनर्गठन को बताया जाता है। हरियाणा अलग हुआ, हिमाचल को कुछ इलाके मिले और चंडीगढ़ एक साझा राजधानी बन गया। इसके बाद जल विवाद भी शुरू हुए। यह ज़रूर एक फैक्टर है, लेकिन यहाँ भी एक दिलचस्प बात है। हरियाणा वही क्षेत्र था जिसे कभी पंजाब का पिछड़ा हिस्सा समझा जाता था। आज वही पंजाब से काफ़ी आगे निकल चुका है। इसका मतलब यह है कि समस्या सिर्फ़ सीमाओं के पुनर्गठन में नहीं है।
हरित क्रांति: एक स्वर्ण युग
भारत के इतिहास में, और खासकर पंजाब के संदर्भ में, सबसे निर्णायक घटनाओं में से एक रही है हरित क्रांति। उस समय देश गंभीर खाद्य संकट से जूझ रहा था और अनाज के आयात पर काफ़ी हद तक निर्भर था। इसी दौर में गेहूँ और धान की ज़्यादा पैदावार वाली किस्मों का इस्तेमाल शुरू हुआ, साथ ही रासायनिक खाद, कीटनाशक, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सिंचाई विस्तार ने मिलकर हरित क्रांति की नींव रखी। और इसका केंद्र बना पंजाब।
कृषि उत्पादकता में ज़बरदस्त उछाल आया। MSP खरीद प्रणाली ने किसानों को गेहूँ और धान के लिए एक स्थिर बाज़ार दिया, जिससे वे इन फसलों की ओर और ज़्यादा आकर्षित हुए। राज्य ने तेजी से सिंचाई और बुनियादी ढांचों को बढ़ाया, जिसमें नहरों के साथ-साथ निजी बोरवेल का भी तेजी से विस्तार हुआ। इसके बाद यांत्रिकीकरण आया, और ट्रैक्टर्स, थ्रेशर्स तथा हार्वेस्टर्स गाँव-गाँव में आम हो गए।
दरअसल, पंजाब उन शुरुआती राज्यों में था जहाँ हर गाँव तक बारहमासी सड़कें और बिजली पहुँचाई गई। ये दोनों चीजें हरित क्रांति के लिए बेहद ज़रूरी थीं। बिजली की ज़रूरत थी बोरवेल सिंचाई के लिए, और अच्छी सड़कें ज़रूरी थीं ताकि खेतों तक लागत सामग्री (inputs) पहुँच सकें और वहाँ से उत्पादन बाज़ार तक जा सके।
जैसे-जैसे कृषि से आय बढ़ी, वैसे-वैसे पंजाब में पूँजी भी बढ़ी, जिसने तेज़ी से औद्योगीकरण को जन्म दिया। खेती से जो सरप्लस आया, उसने एक तरह की छोटी ‘औद्योगिक क्रांति’ की शुरुआत कर दी। 1980 के शुरुआती वर्षों तक लुधियाना होज़िअरी से लेकर हाइड्रोलिक पंप तक तरह-तरह के उत्पाद बनाने लगा था। स्थानीय स्तर पर इसे ‘Manchester of the East’ कहा जाने लगा। इसी तरह जालंधर खेल सामग्री के उत्पादन का एक बड़ा केंद्र बन गया।
इस छोटे से इंडस्ट्रीयल बूम का सबसे बड़ा सितारा था Hero Cycles। Incremental Engineering और Productivity Improvements जैसी नई रणनीतियों ने हीरो साइकिल का नाम भारत के घर-घर तक पहुँचा दिया। उदारीकरण-पूर्व दौर में हीरो साइकिल का विकास किसी चमत्कार से कम नहीं था। उस समय के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने हीरो ग्रुप को काफ़ी समर्थन दिया और केंद्र सरकार के साथ मिलकर उत्पादन सीमा में छूट दिलाने के लिए लॉबीइंग भी की (यह वह दौर था जब अर्थव्यवस्था पर कड़े नियंत्रण थे)।
लेकिन पंजाब के लिए यह औद्योगीकरण का दौर ज़्यादा लंबे समय तक नहीं टिक पाया।
हरित क्रांति: एक सुनहरा पिंजरा
समय के साथ पंजाब का कृषि मॉडल गेहूँ और धान के इर्द-गिर्द बहुत ज़्यादा केंद्रित हो गया। हरित क्रांति के दौरान जो एक सफल रणनीति के रूप में शुरू हुआ था, वह धीरे-धीरे एक तरह की संरचनात्मक निर्भरता (Structural Dependence) में बदल गया। 1980 और 1990 के दशक में सिंचाई तेज़ हुई और भूजल दोहन भी तेजी से बढ़ा, जिसका बड़ा कारण था सब्सिडाइज्ड बिजली के साथ बोरवेल का तेजी से फैलना। कुछ समय तक बढ़ता हुआ उत्पादन इन अंदरूनी समस्याओं को छुपाता रहा। लेकिन धीरे-धीरे पैदावार में बढ़ोतरी रुकने लगी, जबकि खाद, डीज़ल और कीटनाशक जैसी सामग्री की लागत खरीद मूल्य से कहीं तेज़ी से बढ़ने लगी।
1990 के दशक तक आते-आते मध्य पंजाब के कई इलाकों में गिरता हुआ भूजल स्तर साफ़ दिखने लगा था। जैसे-जैसे उत्पादकता में बढ़ोतरी धीमी हुई, किसानों ने उत्पादन बनाए रखने के लिए और ज़्यादा पानी और ज़्यादा रसायनों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इससे एक दुष्चक्र बन गया। मिट्टी की गुणवत्ता गिरती गई, पानी और नीचे जाता गया और रसायनों का खतरा बढ़ता गया। आज पंजाब के बड़े हिस्से भूजल में भारी कमी का सामना कर रहे हैं। लंबे समय तक रसायनों के इस्तेमाल से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं ने भी एक नई चिंता खड़ी कर दी है। पंजाब से राजस्थान के एक कैंसर हॉस्पिटल तक चलने वाली ‘Cancer Train’ इसी संकट की गंभीरता दर्शाती है।
कृषि का यह वर्चस्व सिर्फ़ पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पंजाब की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को भी गहराई से प्रभावित किया। सरकार द्वारा खरीद की गारंटी और विभिन्न सब्सिडियों और प्रोत्साहनों के कारण खेती एक फ़ायदे का सौदा बन गई, जिसमें जोखिम बहुत ही कम था। इससे कृषि क्षेत्र को काफ़ी राजनीतिक प्रभाव भी प्राप्त हुआ। छोटे और सीमांत किसान भी इस मॉडल की ओर आकर्षित हुए। इन नीतियों ने ग्रामीण आय को स्थिर ज़रूर रखा, लेकिन पंजाब की अर्थव्यवस्था का कृषि-आधारित से उद्योग-आधारित बनने का स्वाभाविक सफ़र भी रोक दिया।
इन सब्सिडीज़ को कायम रखने का आर्थिक बोझ भी कम नहीं था। कृषि को मुफ़्त या सस्ती बिजली देने के लिए इंडस्ट्री को ऊँची दरों से बिजली दी गई, ताकि सब्सिडी की भरपाई हो सके। इससे इंडस्ट्री की ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ गई। समय के साथ, बढ़ती लागत और पड़ोसी राज्यों की बेहतर नीतियों के कारण कई कंपनियों ने विस्तार या स्थानांतरण का फ़ैसला किया। हीरो ग्रुप का हरियाणा जाना इसी का एक उदाहरण है, जहाँ उसने अपने मोटरसाइकिल प्लांट लगाए।
चूँकि कृषि क्षेत्र अभी भी मैन्युफेक्चरिंग और सेवा क्षेत्रों के मुकाबले लाभदायक और राजनीतिक दृष्टि से संरक्षित था, कम ही लोग कृषि से बाहर शिफ्ट हुए। पूँजी और नीति दोनों ही अलग-अलग तरह की इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के बजाय प्रचलित कृषि व्यवस्था को कायम रखने में लगे रहे। पंजाब के कृषि मॉडल की सफलता ने ही अनजाने में एक संतुलित और लचीले आर्थिक ढाँचे के विकास को कुंठित कर दिया।
इस मंदी को 1980 के दशक के उग्रवाद ने और गहरा कर दिया। यहाँ यह ज़रूरी नहीं कि हम उग्रवाद के कारणों को समझें, लेकिन इतना समझना ज़रूरी है कि किसी भी तरह की राजनीतिक उथल-पुथल, हिंसा और अस्थिरता निवेशकों का विश्वास हिला देती हैं, व्यापार का विस्तार धीमा करती हैं और पूँजी के पलायन को बढ़ावा देती हैं। किसी भी उद्यमी के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है स्थिरता। जहाँ कानून-व्यवस्था को लेकर अनिश्चितता होती है, वहाँ निवेश नहीं आता। पंजाब में पूरी तरह आर्थिक पतन तो नहीं हुआ, लेकिन विकास की रफ़्तार ज़रूर रुक गई। इसके साथ ही प्रशासन का ध्यान भी विकास से हटकर सुरक्षा की ओर चला गया, जिससे धीरे-धीरे राज्य और नागरिकों के बीच भरोसा कमज़ोर पड़ने लगा।
यह सब ठीक उसी समय हो रहा था जब 1991 का उदारीकरण आने वाला था। कई राज्यों के लिए यह एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। गुजरात ने उत्पादन को तेजी से बढ़ाया, महाराष्ट्र ने अपनी औद्योगिक और वित्तीय बुनियाद और मज़बूत की, तमिलनाडु ने ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स की एक सशक्त इकोसिस्टम खड़ी की, और कर्नाटक देश की IT राजधानी बनकर उभरा।
लेकिन पंजाब ने खुद को इस बदलाव के हिसाब से नहीं ढाला। इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे थे: उग्रवाद का असर, राजनीतिक सतर्कता, सब्सिडी के कारण बढ़ता आर्थिक बोझ, और कृषि-आधारित विकास पर निरंतर निर्भरता। उदारीकरण को विविधीकरण के अवसर के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय, पंजाब ने काफ़ी हद तक अपने पुराने आर्थिक ढाँचे को ही बनाए रखा।
यह पूरी तरह तर्कहीन भी नहीं था। 1970 और 1980 के दशकों में यही मॉडल विकास, स्थिरता और खुशहाली दे चुका था। खेती पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता के शुरुआती संकेत दिख रहे थे, लेकिन वे अभी तक किसी बड़े आर्थिक संकट में नहीं बदले थे। असली समस्या थी बदलाव को अपनाने में देरी। जैसे-जैसे बाकी भारत वैश्विक बाज़ारों से जुड़ रहा था और निवेश के लिए मुकाबला कर रहा था, पंजाब की नीतियाँ अब भी सरकारी सहायता प्राप्त खेती को बचाने और बढ़ावा देने पर टिकी थीं। एक सुरक्षित, सरकारी खरीद पर आधारित अर्थव्यवस्था से निकलकर एक प्रतिस्पर्धी और विविध अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने के लिए राजनीतिक जोखिम और संस्थागत सुधारों की ज़रूरत थी। लेकिन यह बदलाव पर्याप्त तेजी और गंभीरता के साथ कभी नहीं आया।
ठहरी हुई अर्थव्यवस्था
पंजाब ने अपनी ऐतिहासिक स्थिति के मुकाबले और तेज़ी से बढ़ते राज्यों की तुलना में काफ़ी कमज़ोर प्रदर्शन किया है। कम से कम वित्त वर्ष 1991 से ही पंजाब लगातार राजस्व घाटे (Revenue Deficit) में रहा है, जबकि भारत का औसत (median) राज्य वित्त वर्ष 2007 के बाद से ज़्यादातर समय सरप्लस में रहा है (FY21 में कोविड के कारण आई थोड़ी गिरावट को छोड़कर)।
पंजाब की कुल राजस्व प्राप्ति (जिसमें राज्य स्तरीय कर, करबाह्य आय और केंद्र से मिलने वाला हिस्सा शामिल है) भी एक औसत राज्य के मुकाबले लगभग 6 percentage points कम है।
इसका एक कारण यह है कि वित्त आयोग के फॉर्मूले के अनुसार कम प्रति व्यक्ति आय वाले राज्यों को केंद्र से ज़्यादा हिस्सा मिलता है, ताकि वे तेजी से आगे बढ़ सकें। इसके बावजूद पंजाब की कुल आय का लगभग 46% हिस्सा केंद्र से आता है। इसका मतलब यह है कि पंजाब अपने खुद के आय के स्रोत विकसित करने में पीछे रह गया है। जबकि अन्य राज्यों के मुकाबले समृद्ध राज्य होने के नाते, पंजाब की कर संकलन क्षमता ज़्यादा होनी चाहिए थी।
इसके उलट, इसके पड़ोसी हरियाणा का प्रदर्शन इस मामले में काफ़ी बेहतर रहा है। हरियाणा की कुल आय का सिर्फ़ लगभग 20% हिस्सा बाहर से आता है, बाकी तकरीबन 80% रेवेन्यू वह खुद कर और करबाह्य स्रोतों से जुटाता है।

इससे एक बात साफ़ होती है कि मज़बूत और प्रभावी कर संग्रह प्रणाली विकसित करना भी उतना ही ज़रूरी है, जिसमें पंजाब पीछे रह गया है। इसका असर राज्य के खर्च पर भी साफ़ दिखता है, खासकर पूँजीगत व्यय (CapEx) में कमी के रूप में।
पहली नज़र में पंजाब का राजस्व खर्च (Revenue Expenditure) ठीक लगता है। पंजाब का यह खर्च GSDP का 17.4% है, जो भारतीय राज्यों के औसत 18.8% के आसपास ही है। लेकिन असली सवाल यह है कि यह पैसा खर्च कहाँ हो रहा है?
एक स्वस्थ राज्य में राजस्व खर्च का बड़ा हिस्सा जनकल्याण में जाता है। लेकिन पंजाब में इसका बड़ा हिस्सा ‘अनिवार्य खर्च’ (Committed Expenditure) में चला जाता है। 2025-26 के अनुमान के अनुसार, पंजाब लगभग 82,174 करोड़ रूपए वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे खर्चों पर खर्च करेगा, जो उसकी कुल राजस्व प्राप्ति का करीब 74% है।
इससे राज्य एक तरह की आर्थिक ज़ंजीर (Fiscal Straitjacket) में बंध जाता है। यानी राज्य को हर 100 रूपए में से लगभग 74 रूपए पहले ही खर्च करने पड़ते हैं, इससे पहले कि वह एक नया अस्पताल, एक आधुनिक स्कूल या एक हाईवे बनाने के बारे में सोच सके।
खेती पर भारी सब्सिडी, अनिवार्य खर्चों का बोझ, सीमित कर आधार और अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने के लिए पर्याप्त पूँजीगत निवेश (CapEx) न कर पाने के कारण पंजाब का Debt-to-GDP रेशियो देश के सबसे ऊँचे स्तरों में से एक बन गया है। नीति आयोग के अनुसार, सबसे आशावादी स्थिति में भी इस कर्ज़ में कमी बहुत सीमित रहने वाली है।
आप पूरी रिपोर्ट यहाँ देख सकते हैं। पंजाब से जुड़े चार्ट मैंने इसी रिपोर्ट से लिए हैं।
पंजाब का यह पतन अचानक नहीं हुआ है, और न ही यह किसी एक नीतिगत गलती का परिणाम है। शुरुआती कृषि उत्पादन ने समृद्धि तो दी, लेकिन साथ ही एक संरचनात्मक निर्भरता भी पैदा कर दी। राजनीतिक प्रोत्साहनों ने इस निर्भरता को और मज़बूत किया, जिससे सुधार करना मुश्किल हो गया। कृषि पर अत्यधिक ध्यान और उग्रवाद जैसे कारणों से औद्योगिक विकास रुक गया। जब बाकी राज्य अलग-अलग क्षेत्रों में प्रगति कर रहे थे, पंजाब अपनी मंद होती कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से ही चिपका रहा। समय के साथ बढ़ते आर्थिक बोझ ने विकास के नए इंजनों में निवेश की राज्य की क्षमता को और सीमित कर दिया।
आज जब तमिलनाडु और हरियाणा जैसे राज्य इंडस्ट्री 4.0 और इलेक्ट्रॉनिक्स में निवेश कर रहे हैं, जबकि पंजाब अपनी बुनियादी आर्थिक स्थिति संभालने के लिए ही संघर्ष कर रहा है। अपनी अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढाँचे में आमूल-चूल परिवर्तन किए बिना, पंजाब का इस स्थिति से बाहर निकलना मुश्किल ही नहीं, लगभग नामुमकिन है।
मानवीय कीमत
जब एक राज्य अपने बजट का बड़ा हिस्सा सब्सिडी और कर्ज़ चुकाने में खर्च कर देता है, तो उसके पास नए उद्योगों को बढ़ावा देने, सुस्त IT क्षेत्र को फिर से खड़ा करने या विश्व स्तरीय रिसर्च यूनिवर्सिटीज़ बनाने के लिए कोई पैसा नहीं बचता। दूसरी तरफ़, खेती की लागत लगातार बढ़ती रही, जबकि फसलों के दाम उस हिसाब से नहीं बढ़े। इसका सीधा असर यह हुआ कि युवा पीढ़ी का खेती की ओर रुझान कम होता गया।
आज पंजाब के युवाओं के पास दो ही विकल्प हैं: या तो वे ऐसी अर्थव्यवस्था में रहे जहाँ खेती के अलावा कोई अवसर नहीं है, या फिर राज्य से बाहर चले जाएँ। यही कारण है कि पंजाब से बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ा है, जिसमें कई बार अवैध मार्गों का इस्तेमाल भी होता है या फिर परिवार अपनी ज़मीन बेचकर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या UK जाने के लिए पैसे जुटाते हैं।
इसे सिर्फ़ प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह एक तरह का पूँजी पलायन (कैपिटल फ्लाइट) भी है। जब परिवार अपने बच्चों को विदेश भेजने के लिए जमीन बेचते हैं, तो पंजाब सिर्फ़ अपने प्रतिभाशाली युवाओं को ही नहीं खोता, बल्कि वह पूँजी भी खो देता है जो राज्य के भीतर निवेश हो सकती थी।
अवसर के अभाव वाले इस माहौल में, नशाखोरी का बढ़ना भी एक तरह की ‘आर्थिक हताशा’ का संकेत है।
पंजाब में शराब की लत का अनुपात 6% है, जो राष्ट्रीय औसत से दोगुना है। नशीले पदार्थों के नशे की दर करीब 2.5% है, जो राष्ट्रीय औसत से चार गुना है। NSSO के स्वास्थ्य खर्च के आँकड़ों से यह भी पता चलता है कि पंजाब के परिवारों का अपनी जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च औसत भारतीय परिवार से ज़्यादा है, और वे मुख्य रूप से निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर हैं। यह सब इस बात की ओर इशारा करता है कि राज्य में सरकारी स्वास्थ्य खर्च को बढ़ाने की कितनी आवश्यकता है।
जब एक राज्य अपने भविष्य में निवेश करने की क्षमता खो देता है, तो उसका भविष्य या तो देशांतर कर जाता है, या धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।
दूसरे राज्यों के लिए एक चेतावनी
पंजाब की मौजूदा स्थिति एक त्रासदी है। लेकिन यह सिर्फ़ पंजाब की कहानी नहीं है। भारत के कई अन्य राज्य भी इसी तरह के आर्थिक बोझ की ओर बढ़ रहे हैं। इसलिए इस संदर्भ में मध्य प्रदेश को देखना दिलचस्प होगा।
आज मध्य प्रदेश वही ‘कृषि उत्पादन में उछाल’ देख रहा है जो पंजाब ने 1960-80 के दशक में देखा था। फ़र्क बस इतना है कि वहाँ की सरकार इस बात को लेकर ज़्यादा सजग दिखती है कि यह उछाल आगे चलकर एक ‘सुनहरा पिंजरा’ न बन जाए।
फिलहाल मध्य प्रदेश भी काफ़ी हद तक वही रणनीति दोहरा रहा है, जो पंजाब ने अपनाई थी: चावल-सोयाबीन-गेहूँ की एक ही तरह की फसल उगाने (मोनोकल्चर) पर भारी निर्भरता। लेकिन इस मॉडल की मर्यादाएँ अब दिखने लगी हैं। पराली जलाना बढ़ रहा है, भूजल स्तर गिर रहा है, यानी प्राकृतिक दबाव के शुरुआती संकेत नज़र आने लगे हैं।
सरकार ने विविधता लाने की दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। फल और सब्जियों का उत्पादन बढ़ा है, जो प्रति एकड़ ज़्यादा मुनाफा देते हैं और उनमें ज़्यादा मेहनत की ज़रूरत भी होती है। लेकिन इसके बावजूद खेती का मध्य प्रदेश की GSDP में योगदान लगभग 43% है, जो किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक रूप से ज़्यादा है।
पंजाब से सबसे बड़ा सबक यही मिलता है कि अच्छे समय में बनी बचत को कर के रूप में इकट्ठा करके उसे भविष्य के लिए निवेश करना ज़रूरी है, खासकर औद्योगिक बुनियाद बनाने के लिए। मध्य प्रदेश इस गलती से बचने की कोशिश कर रहा है और इंदौर व भोपाल जैसे शहरों में निवेश आकर्षित करने पर जोर दे रहा है। लेकिन एक व्यापक समस्या यह भी है कि भारत के ज़्यादातर राज्यों में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा एक स्तर पर आकर रुक जाता है।

वर्तमान में एक औसत भारतीय राज्य अपने GSDP का लगभग 4% पूँजीगत खर्च (CapEx) पर खर्च करता है, और वह भी दबाव में है। हरियाणा जैसे औद्योगिक राज्य ने वित्त वर्ष 2023 में केवल 1.8% ही खर्च किया। इसके पीछे दो बड़े कारण हो सकते हैं:
पहला, जैसे-जैसे राज्य अमीर होते हैं, उन्हें वित्त आयोग के फॉर्मूले के कारण केंद्र से मिलने वाला हिस्सा कम हो जाता है।
दूसरा, जैसे-जैसे राज्य बड़े होते हैं, वे GSDP के अनुपात में राजस्व बनाए रखने के लिए पर्याप्त राज्य क्षमता विकसित नहीं कर पाते।
इसका नतीजा यह होता है कि उनकी वित्तीय स्थिति दोनों तरफ से दबाव में आ जाती है। पंजाब में यह साफ़ दिखा है, और अब हरियाणा, आंध्र प्रदेश तथा मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी इसके संकेत दिख रहे हैं।
हाल ही में नीति आयोग ने राज्यों की राजकोषीय स्थिति (Fiscal Health) पर एक रिपोर्ट जारी की है, जिसे ज़रूर पढ़ना चाहिए। खासकर राजस्व के मामले में कई राज्यों की स्थिति चिंताजनक है।

पंजाब की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि किसी एक दौर में “सबसे आगे” होना, चाहे वह गेहूँ के उत्पादन में हो या IT में, इस बात की गारंटी नहीं देता कि आप अगले दौर में भी आगे रहेंगे। आज की अर्थव्यवस्था में इस तरह के जाल से बचने का एक ही तरीका है: बदलती परिस्थिति के अनुसार लगातार बदलते रहना।
परिशिष्ट
इस लेख के लिए रिसर्च करते समय कई दिलचस्प लेख पढ़ने को मिले, जिनमें से कुछ यहाँ साझा कर रहा हूँ:
सच कहूँ तो, जब तक मैंने राज्य का लेखा-जोखा देखा नहीं था, तब तक मुझे भी अंदाज़ा नहीं था कि स्थिति इतनी खराब है।
इस आखिरी लेख में “चाइना फैक्टर” का भी ज़िक्र है, जिसने अपने भारी सरकारी सब्सिडी वाले उत्पादों के माध्यम से दुनिया भर के उद्योगों को अस्त-व्यस्त कर दिया है।
— अभेद मनोचा
हिंदी संपादन: परीक्षित सूर्यवंशी
अभेद फार्मास्युटिकल और बायोटेक कंपनियों को रणनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए डेटा-आधारित समाधान प्रदान करते हैं। उन्होंने अशोका यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की है और वे तक्षशिला इंस्टिट्यूटशन के भी छात्र रह चुके हैं।
An older version of the article was published in English here: What went wrong with Punjab?
अभेद के अन्य लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Manocha Opinion
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