भारत की AI रणनीति क्या होनी चाहिए?
What should India's strategy be to succeed in the age of AI?
—प्रणय कोटस्थाने
AI को लेकर आजकल जो चर्चाएँ होती हैं, वे अक्सर कुछ चुनिंदा मुद्दों के इर्दगिर्द ही घूमती रहती हैं, जैसे सबसे बड़े मॉडल्स कौन बना रहा है? क्या चीन को भेजे जाने वाले चिप्स पर नियंत्रण लगाया जाएगा? भारत सरकार ने कितने GPU का इंतज़ाम किया है? या फिर भारत के पैक्स सिलिका (Pax Silica) में शामिल होने से क्या फ़र्क पड़ेगा वगैरह। बेशक ये सभी सवाल महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सिर्फ़ इन्हीं सवालों को सबसे ज़्यादा अहमियत देना यानी घोड़े के आगे गाड़ी बाँधने जैसे होगा।
यहीं पर मुझे Michael Mazarr की नई किताब (RAND रिपोर्ट), ‘A New Age of Nations: Power and Advantage in the AI Era‘ बहुत अहम लगती है। बाज़ार में ऐसी ढेरों किताबें हैं जो अलग-अलग देशों के AI सामर्थ्य की तुलना करती हैं। लेकिन इनमें से ज़्यादातर सिर्फ़ तकनीकी चुनौतियों, जैसे GPU कितने हैं? डेटा सेंटर कहाँ हैं? मॉडल्स कितने सक्षम हैं आदि तक ही सिमट जाती हैं।
लेकिन मॅज़ार एक बहुत गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि “AI युग में कामयाबी एक तकनीकी चुनौती से कहीं ज़्यादा एक सामाजिक चुनौती होगी।” मतलब आने वाले वक्त में जीत सिर्फ़ उन देशों की नहीं होगी जो बेहतरीन मॉडल्स बनाएँगे, बल्कि उन देशों की होगी जो अपने समाज की काबिलियत बढ़ाने के लिए ज़रूरी कदम उठाएँगे।
किताब की शुरुआत में मॅज़ार AI जैसी जनरल-पर्पस टेक्नोलॉजी (समाज और अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर डालने वाली तकनीक उदा. बिजली, इंटरनेट) की क्रांतिकारी ताकत का ज़िक्र करते हैं। पिछली औद्योगिक क्रांतियों का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद, वे इस समस्या को कुछ यूँ समझाते हैं:
“दुनिया आज एक और तकनीकी क्रांति की दहलीज़ पर खड़ी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI इतिहास की अब तक की सबसे व्यापक और शक्तिशाली जनरल पर्पस टेक्नोलॉजी साबित हो सकती है। जैसे कभी औद्योगिक क्रांति ने दुनिया बदली थी, वैसे ही AI भी अब देशों की किस्मत का फैसला करेगी और ग्लोबल पावर का पूरा समीकरण ही बदल देगी।”
कुछ देश इस दौर के ब्रिटेन और जापान बनकर उभरेंगे, जो जल्द ही अपना वर्चस्व स्थापित कर लेंगे या फिर बहुत तेज़ी और समझदारी से दूसरों के पीछे चलकर कामयाब होंगे। कुछ देश ओटोमन साम्राज्य जैसे साबित होंगे, जो अपनी पुरानी सामाजिक और राजनीतिक आदतों के बोझ तले दबे रहेंगे और नए दौर की माँगों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाएँगे। तो कुछ और रूस की तरह पिछली सदी के पैमानों पर तो बहुत ताकतवर दिखेंगे और जिन्हें कोई नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएगा, पर वे नई तकनीक और सामाजिक बदलावों के मामले में दुनिया के प्रमुख देशों का मुकाबला नहीं कर पाएँगे।”
मॅज़ार आगे जो बात कहते हैं, वो आजकल की मान्यता के बिल्कुल उलट है। आज हर देश बस इसी होड़ में लगा है कि उसकी AI रणनीति क्या होनी चाहिए। पर मॅज़ार कहते हैं:
हमें AI रणनीति की ज़रूरत नहीं है। हमें ज़रूरत है हमारी क्षमता (competitive advantage) बढ़ाने वाली ऐसी रणनीति की, जो AI के दौर में मिलने वाले मौकों और ताक़त का इस्तेमाल करके अपने लक्ष्य हासिल कर सके।
अब सवाल आता है कि किसी समाज की क्षमता आखिर कैसे तय होती है? इसके लिए मॅज़ार अमरीकी रक्षा विभाग की एक पुरानी स्टडी का सहारा लेते हैं, जिसमें सात ऐसे सामाजिक लक्षणों की पहचान की गई थी, जो तय करते हैं कि कोई देश लंबे दौर की लड़ाई में टिका रहेगा या हार जाएगा।
ये सात बातें कुछ इस तरह हैं:
राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और इच्छाशक्ति
एकजुट राष्ट्रीय पहचान
तरक्की के साझा अवसर
एक सक्रिय और जागरूक समाज
कारगर सरकारी संस्थाएँ
सीखने वाला और लचीला बौद्धिक माहौल
विविधता और बहुलता (pluralism)
‘A New Age of Nations’ में, वे इसी कसौटी को AI पर लागू करते हैं और जाँचते हैं कि AI इनमें से हर एक कड़ी को कैसे मज़बूत या कमज़ोर कर सकती है।
ये बात मुझे बहुत महत्वपूर्ण लगी क्योंकि AI को लेकर जो भी चर्चाएँ होती हैं, वे अक्सर चिप्स, कंप्यूटिंग पावर, डेटा सेंटर्स और मॉडल्स पर ही केंद्रित रहती हैं। ये सब तो बस ऊपरी चीज़ें हैं। जैसा कि मैं अक्सर कहता हूँ, अगर आपको लगता है कि सिर्फ़ GPU ही किसी देश को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं, तो समझिये कि आप खेल शुरू होने से पहले ही हार चुके हैं। असली कसौटी तो ये है कि कोई समाज AI जैसी शक्तिशाली तकनीक को अपनाने, इसे ज़मीनी स्तर पर लागू करने और इसके असर को सँभालने के लिए कितना तैयार है?
नंदन नीलेकणी भी भारत के संदर्भ में कुछ ऐसी ही बात कहते रहे हैं। उनका मानना है कि भारत AI के इस्तेमाल का सबसे बड़ा केंद्र (use-case capital) बनेगा। उन्होंने डिफ्यूजन—यानी तकनीक को लैब से आम जनता तक बड़े पैमाने पर पहुँचाने—को असली ताकत (competitive edge) बताया है।
आधार का ही उदाहरण ले लीजिए। भारत में आधार इसलिए कामयाब नहीं हुआ क्योंकि हमने कोई बहुत बड़ी बायोमेट्रिक तकनीक का आविष्कार कर लिया था। वह इसलिए चला क्योंकि हमने अपनी संस्थाओं की पुनर्रचना की और हर सेक्टर ने उस तकनीक को अपने रोज़ाना कामकाज का हिस्सा बना लिया।
इसलिए डिफ्यूजन पर ज़ोर देना ज़रूरी है, पर ये भी सिर्फ़ ‘कैसे’ का जवाब देता है। मॅज़ार उससे भी एक कदम आगे जाकर पूछते हैं कि कोई समाज आखिर इस डिफ्यूजन के काबिल बनता कैसे है? इसका जवाब वही सात सामाजिक विशेषताएँ हैं। अगर हम इन सात पैमानों को एक जाँच के साधन की तरह देखें, तो हम समझ पाएँगे कि भारत आज कहाँ खड़ा है। भले ही यह रिपोर्ट अमेरिका के लिए लिखी गई हो, पर ये बातें हम पर भी उतनी ही लागू होती हैं।
तो आइए देखते हैं भारत इन पैमानों पर कहाँ है।
शुरुआत करते हैं ‘राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और इच्छाशक्ति’ से। शायद ये भारत का सबसे मज़बूत पहलू है। विकसित भारत 2047 के विज़न ने वो काम किया है, जिसे मॅज़ार बहुत ज़रूरी मानते हैं। इसने एक ऐसी उम्मीद जगाई है, जिसके सच होने की चाह हर राजनीतिक दल और समाज के हर तबके में पाई जाती है। भले ही पॉलिसी की बारीकियों पर असहमति हो, लेकिन हर सच्चा भारतीय चाहेगा कि आज़ादी की शताब्दी तक भारत एक विकसित राष्ट्र बने। इस राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को ही मॅज़ार वो ईंधन कहते हैं, जो किसी भी देश को लंबी रेस में टिकाए रखता है। हमारा AI मिशन हो, सेमीकंडक्टर को बढ़ावा हो या अभी हाल ही में हुई AI Impact Summit हो, ये सब इसी बड़ी कहानी का हिस्सा हैं। यहाँ भारत का स्कोर बहुत बढ़िया है, पर अक्सर हम इस मज़बूत पहलू को उतनी अहमियत नहीं देते जितनी देनी चाहिए।
दूसरा पहलू है—एकजुट राष्ट्रीय पहचान। यहाँ हमारा मामला थोड़ा पेचीदा है। भारत को हमेशा अपनी बेमिसाल विविधता में एकता बनाए रखनी पड़ी है। मॅज़ार का कहना है कि जिन समाजों में एक साझी पहचान होती है, वे तकनीकी बदलावों के दौर में बहुत तेज़ी से एकजुट होकर काम कर पाते हैं। हमारी भारतीय सभ्यता हमें एक मज़बूत बुनियाद तो देती है, पर लोकलुभावनवाद (populism) और सामाजिक ध्रुवीकरण भी हमारी एक कड़वी हकीकत है। ऊपर से सांप्रदायिकता और राजनीति-प्रेरित जाति जनगणना जैसे मुद्दे इस आग में तेल डालने का काम करते हैं। अब सवाल ये है कि क्या AI की ये क्रांति हमें जोड़ने वाली शक्ति बन पाएगी? जैसे हमारे स्पेस प्रोग्राम या UPI की कामयाबी ने हम सब को एक सामूहिक गर्व का एहसास कराया था। अगर AI का फायदा सबको मिलता दिखेगा, तो ये देश को और मज़बूत करेगा।
अब आते हैं सबसे ज़रूरी बात पर, ‘साझा अवसर’। यहाँ भारत के लिए सबसे बड़ी उम्मीद भी है और सबसे बड़ा खतरा भी। AI का वादा बहुत बड़ा है। चाहे बीमारी की पहचान करना हो, कानूनी सलाह हो, खेती-बाड़ी की जानकारी हो या अच्छी पढ़ाई-लिखाई हो, ये सब आम आदमी की पहुँच में ला सकता है। भारत की विशाल आबादी का मतलब है कि अगर AI के छोटे-छोटे एप्लीकेशन्स भी जनता तक पहुँच गए, तो इससे बहुत बड़ी वैल्यू पैदा होगी। इसीलिए कई भाषाओं में काम करने वाले टेक्स्ट-टू-स्पीच और स्पीच-टू-टेक्स्ट जैसे टूल्स पर इतना ज़ोर दिया जा रहा है। पर यहाँ एक खतरा भी है। खतरा ये है कि कहीं AI का सारा लाभ सिर्फ़ मुट्ठी भर अंग्रेज़ी बोलने वाले और शहरों में रहने वाले डिजिटल इंडियन्स तक ही सीमित न रह जाए। मॅज़ार का ये फ्रेमवर्क हमें याद दिलाता है कि वही समाज आगे बढ़ते हैं जहाँ तकनीकी क्रांति का फल सबमें बँटता है। अगर ये सिर्फ़ कुछ चुनिंदा लोगों के पास जमा होकर रह गया, तो हम पिछड़ जाएँगे।
चौथा पैमाना है ‘एक सक्रिय और जागरूक समाज’। मॅज़ार कहते हैं कि जिस समाज के नागरिक जागरूक होते हैं और जहाँ की आबादी में काम करने का उत्साह होता है, वो देश आगे बढ़ता है। अगर सच कहें तो भारत की आबादी ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है। यहाँ की आबादी बिल्कुल सुस्त नहीं है, बल्कि कुछ न कुछ करने के लिए हमेशा तैयार रहती है। असली चुनौती इस ऊर्जा को सही दिशा देने की है। अगर हमारे नौजवानों के पास काम नहीं होगा या वे अपनी काबिलियत के हिसाब से काम नहीं पाएँगे, तो यही जोश और सक्रियता इनोवेशन के बजाय हताशा में बदल सकते हैं।
अब आते हैं उस बात पर, जो मेरे हिसाब से भारत की सबसे कमज़ोर कड़ी है, ‘कारगर सरकारी संस्थाएँ’। मॅज़ार के इस पूरे फ्रेमवर्क में भारत का सबसे कमज़ोर स्कोर शायद यहीं होगा। हमारी सरकारी क्षमता (State capacity) की कमियाँ सबको पता हैं। सरकारी काम में AI लाने का मतलब सिर्फ़ नए सॉफ़्टवेयर खरीदना नहीं होता। इसका मतलब है सरकारी दफ़्तरों के काम करने के तरीके, उनके फ़ैसले लेने की प्रक्रिया और लोगों तक सुविधा पहुँचाने के पूरे सिस्टम को जड़ से बदलना। हमारे पास GST, CoWIN और DBT जैसे शानदार उदाहरण हैं। ये इसलिए सफल रहे क्योंकि इनमें नई तकनीक के साथ-साथ पूरे संस्थागत ढाँचे की पुनर्रचना की गई। लेकिन सुस्त सरकारी ढाँचे के समंदर में ये कामयाबियाँ बस छोटे-छोटे टापुओं जैसी हैं।
छठा पैमाना है ‘सीखने वाला और लचीला बौद्धिक माहौल’। यहाँ तस्वीर थोड़ी धुँधली है। भारत हर साल बड़ी तादाद में साइंस और इंजीनियरिंग ग्रेज्युएट तथा AI रिसर्चर बनाता है, जिनमें से कई विदेशों में काम करने चले जाते हैं। पर असली सवाल ये है कि क्या हमारी शिक्षा प्रणाली हमें वो लचीलापन, क्रिटिकल थिंकिंग सिखाती है, जो किसी भी तकनीकी क्रांति में सफलता के लिए ज़रूरी है? इस दौर में सिर्फ़ डिग्रियों से काम नहीं चलेगा, अब हमें बार-बार नई चीज़ें सीखनी पड़ेंगी। अच्छी बात ये है कि भारत के नौजवानों में कुछ नया सीखने की भूख बहुत है। ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स और अपनी भाषाओं में आ रहे टेक कंटेंट की बाढ़ इसका पुख्ता सबूत है। लोग तो सीखने को तैयार हैं, ज़रूरत है तो उन्हें सही रास्ता और साधन दिखाने की।
और आखिर में आती है ‘विविधता और बहुलता’। मॅज़ार कहते हैं कि जो समाज अलग-अलग विचारों का स्वागत करता है और जहाँ खुलकर बहस हो सकती है, वो समाज ज़्यादा इनोवेटिव होता है। ये बात तो भारत की रगों में है! हमारी भाषाओं, संस्कृतियों और अलग-अलग नज़रियों की विविधता हमारी सबसे बड़ी दौलत है। चुनौती बस ये है कि हम इस विविधता का सही इस्तेमाल कैसे करें। भारतीय भाषाओं में AI मॉडल्स बनाने की कोशिशें इस दिशा में एक सही कदम है, पर हमें अभी बहुत लंबा सफ़र तय करना है।
तो कुल मिलाकर सार यह है कि हमारा लेखा-जोखा न तो उतना डरावना है जितना कि तकनीक को कोसने वाले निराशावादी बताते हैं और न ही उतना सुहावना जितना कि सरकारी समिट के बड़े-बड़े विज्ञापनों में दिखाया जाता है।
मॅज़ार का ये ढाँचा बहुत अहम है क्योंकि ये AI की जंग को देखने का नज़रिया ही बदल देता है। ये एक कड़वी सच्चाई ये है कि भारत AI की रेस और एडवांस रिसर्च में अमरिका और चीन जितना पैसा नहीं लगा सकता, पर हमें ऐसा करने की ज़रूरत भी नहीं है। हमें तो एक ऐसा सामाजिक माहौल तैयार करना चाहिए, जिससे हम AI को अपनाने में और उसे समाज के आखिरी छोर तक पहुँचाने में दुनिया के सबसे माहिर खिलाड़ी बन सकें। लेकिन इसके लिए हमें सिर्फ़ सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर खरीदने का एजेंडा नहीं चाहिए, बल्कि अपने घर के अंदर के तौर-तरीकों को सुधारने का एजेंडा चाहिए।
ये किताब निश्चित ही आपके वक्त और ध्यान की हकदार है।
—प्रणय कोटस्थाने
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
यह लेख आप अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ सकते हैं: The Summit of AI’s Impact
Homework:
Barry Pavel का एक पेपर है—How Artificial General Intelligence Could Affect Rise and Fall of Nations। इसमें उन्होंने कुछ बहुत ही दिलचस्प परिस्थितियों (scenarios) के ज़रिये बताया हैं कि AI कैसे देशों की किस्मत तय कर सकता है। अगर मौका मिले, तो इसे भी ज़रूर देखिएगा।
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