भारत का विकास पथ कैसा हो?
Book review: Accelerating India’s Development: A State-Led Roadmap for Effective Governance by Karthik Muralidharan
भारत का विकास तेज़ी से कैसे हो? इस सवाल का जवाब अलग-अलग विद्वानों ने अपने-अपने विचारों के अनुसार दिया है। अर्थशास्त्रियों की बात करें तो इस पर दो विचारधाराएँ मुख्य रूप से दिखाई देती हैं। पहली विचारधारा Economic Growth यानी आर्थिक वृद्धि पर ज़ोर देती है। इस विचारधारा के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि देश की प्रगति के लिए GDP, प्रति व्यक्ति आय (per capita income), औद्योगिक उत्पाद आदि में वृद्धि ज़रूरी है। इसलिए सरकार को इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने पर ज़्यादा खर्च करना चाहिए। इससे बाकी चीज़ें भी अपने आप होती हैं। भारत में जगदीश भगवती और अरविंद पनगढ़िया जैसे अर्थशास्त्री इस विचारधारा के समर्थक हैं।
वहीं दूसरी विचारधारा Development Economics यानी मानव विकास पर ज़ोर देती है। इस विचारधारा के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सिर्फ़ आर्थिक वृद्धि पर ध्यान देने से समाज में विषमता बढ़ती है। इसलिए सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के माध्यम से नागरिकों का जीवन स्तर सुधारने पर ज़्यादा खर्च करना चाहिए। अमर्त्य सेन और Jean Drèze जैसे अर्थशास्त्री इस विचारधारा की तरफ़दारी करते हैं। इन दोनों ही विचारधाराओं के अपने-अपने अच्छे और बुरे पहलू हैं।
प्रो. कार्तिक मुरलीधरन इस विषय में एक अलग सोच प्रस्तुत करते हैं। अपनी किताब “Accelerating India’s Development: A State-Led Roadmap for Effective Governance” में वे कहते हैं कि हमें आर्थिक वृद्धि और विकास इन दोनों में से किसी एक को चुनने की ज़रूरत ही नहीं है। हम ये दोनों लक्ष्य पा सकते हैं यदि हम स्टेट कैपेसिटी अर्थात राज्य की क्षमता बढाएँ। प्रो. मुरलीधरन का कहना है कि फ़िलहाल हमारी राज्य क्षमता इतनी कम है कि हम कोई भी चीज़ ठीक से नहीं कर पाते। इस बात को वे एक मज़ेदार और सटीक उदाहरण के ज़रिये समझाते देते हैं।
मान लीजिए हमारे पास एक कार है और हम आपस में लड़ रहे हैं कि इसे कौन चलाएगा और कहाँ जाएगा। हम जाना तो कई जगह चाहते हैं पर समय सीमित है और हमारी कार 1950 की पुरानी एम्बेसडर है! प्रो. मुरलीधरन कहते है कि जैसे कोई कितना ही कुशल ड्राइवर क्यों न हो वह इस कार को एक निश्चित स्पीड से ज़्यादा तेज़ नहीं चला सकता, उसी तरह राज्य की क्षमता बढ़ाए बगैर हम चाहे कुछ भी कर लें, देश का विकास एक निश्चित गति से ज़्यादा तेज़ नहीं हो सकता।
प्रो. मुरलीधरन कहते हैं कि हम वृद्धि, विकास और गति सब कुछ हासिल कर सकते हैं अगर हम अपनी कार को अपडेट करें, मतलब राज्य की क्षमता बढ़ाएँ। हमारी राज्य क्षमता की स्थिति आज क्या है, इसकी कमियाँ और चुनौतियाँ कौन सी हैं और इन्हें दूर कर राज्य की क्षमता कैसे बढ़ाई जा सकती है, इन सभी बातों को प्रो. मुरलीधरन ने अपनी किताब में विस्तार से समझाया है। इस लेख में हम इन्हीं बातों को संक्षेप में समझने की कोशिश करेंगे।
भारत की राज्य क्षमता कम क्यों हैं?
आज़ादी के पचहत्तर साल में भारत ने कई बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कीं। आज़ादी के वक़्त कइयों ने यह कहकर हमारा मज़ाक उड़ाया था कि, एक लोकतंत्र तो दूर इस देश का एक रहना भी नामुमकिन है। आज भारत न केवल एकता की एक जीती-जागती मिसाल बना हुआ है, बल्कि अपना संवैधानिक ढाँचा और लोकतंत्र भी काफ़ी हद तक टिकाए हुए है। आर्थिक मोर्चे पर देखें तो दुनिया के कुछ गिने-चुने देश और उनसे भी कम लोकतांत्रिक देश इतने लंबे समय तक भारत जितना विकास दर रख पाएँ हैं। इसी प्रकार हमारे प्रशासन ने भी सराहनीय काम किया है। दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव, टीकाकरण, जनगणना और सबसे सस्ता मून-लैंडिंग तक हमने सफलतापूर्वक कर दिखाया है। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में भी हम कारगर साबित हुए हैं।
लेकिन एक तरफ़ जहाँ निश्चित काम, लक्ष्य और समय सीमा वाले ‘मिशन मोड़’ में हमने बेहतरीन काम कर दिखाया हैं, वहीं दूसरी ओर हमारे नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और न्याय जैसी बुनियादी सेवाएँ प्रदान करने में हम काफ़ी हद तक पिछड़ गए हैं।
भारत के विकास रथ के दो पहिये
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि आज शासन-प्रशासन में जो भी अच्छा-बुरा है उसके दो मुख्य किरदार हैं—राजनेता और नोकरशहा। राजनेताओं को अक्सर भ्रष्ट और सत्ता के भूखे माना जाता है, जबकि नोकरशाहों को जोखिम से भागने वाले और आलसी। हालाँकि इसमें कुछ सच्चाई है, लेकिन यह आरोप हमेशा सच और उचित नहीं होता। राजनेताओं और नोकरशाहों की अपनी चुनौतियाँ और मर्यादाएँ होती हैं। इसलिए पहले इन चुनौतियों को समझते हैं और फिर उनके समाधान की बात करते हैं।
राजनेताओं की आफ़त
भारत और पश्चिमी देशों में लोकतंत्र की स्थापना और विकास जिस प्रकार हुआ, उसमें एक बुनियादी फ़र्क है। ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में सभी नागरिकों को शुरू से मताधिकार नहीं दिया गया था। वहाँ काफ़ी जद्दोजहद के बाद महिलाओं, अश्वेतों, गुलामों आदि को आज़ादी और मताधिकार मिले। जबकि भारत में पहले चुनाव से सभी को मताधिकार दिया गया। दूसरी बात, कॉलोनियों से की गई लुट और गुलामों के शोषण के बल पर ये देश पहले अमीर बनें और फिर इन्होंने लोकतंत्र बहाली की।
भारत में लोकतंत्र है और फर्स्ट-पास-द-पोस्ट (FPTP) चुनाव पद्धति है। इस पद्धति में जिस उम्मीदवार को डाले गए वोटों में सबसे ज़्यादा वोट पड़ते हैं उसे विजेता घोषित किया जाता है। भारत में आमतौर पर किसी भी चुनाव में कई उम्मीदवार खड़े होते हैं और कुल 50 से 70% वोटिंग होती है। ऐसे में जीतने वाला उम्मीदवार कई बार 25% से कम रजिस्टर्ड वोटरों के समर्थन से भी चुनाव जीत सकता है। इसलिए इस पद्धति के चुनाव में राजनेता अक्सर सभी वोटरों पर ध्यान देने के बजाय अपने निष्ठावान वोटर गुट पर सबसे ज़्यादा ध्यान देते हैं। इसे एक उदाहरण से समझते हैं।
दूसरी समस्या है ‘Politics of Scarcity’ यानी अभाव की राजनीति। चूँकि हमारे संसाधन सीमित हैं, सार्वजनिक वस्तुएँ और सेवाएँ सभी को नहीं मिल सकतीं। फिर ये किसे मिलती हैं? ये उन्हीं को मिलती हैं जो बाहुबली होते हैं। ये बाहुबली इन संसाधनों पर कब्ज़ा जमा लेते हैं और इन्हें अपने ही लोगों में बाँटते हैं। इसी से गुंडों का राजनीति में प्रवेश सुलभ होता है। जब ऐसे गुंडे राजनीति में आ जाते हैं तो वे राज्य की क्षमता बढ़ाने वाली नीतियों का विरोध करते हैं क्योंकि अगर राज्य की क्षमता बढ़ती है और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को अच्छी सार्वजनिक सेवाएँ मिलती हैं तो स्वाभाविक रूप से इन गुंडों का महत्व कम हो जाता है।
तीसरी समस्या है चुनावी खर्च। जब राजनीतिक पार्टियों को चुनावों में हज़ारों करोड़ खर्च करने पड़ते हैं, तब उनकी सरकार व्यापक जनहित के बजाय फंडरेजिंग पर ज़्यादा ध्यान देती है। इसी से भ्रष्टाचार जन्म लेता है और फिर परियोजनाओं से लेकर कानून तक ऐसे बनाएँ जाते हैं जो नागरिकों से ज़्यादा पार्टी को फंड देने वालों का भला करते हैं। बड़े पैमाने पर होने वाला चुनावी खर्च भारतीय लोकतंत्र की कई समस्याओं का मूल कारण है।
हालाँकि इस स्थिति में अब धीरे-धीरे बदलाव देखा जा रहा है। जैसे-जैसे समाज में पढ़े-लिखे वोटरों की संख्या बढ़ती है, वे राज्य की क्षमता और नागरिकों के अधिकारों के प्रति अधिक सजग होते हैं। वे वोट बैंक पॉलिटिक्स की मर्यादाएँ तथा शासन प्रणाली और राज्य क्षमता में सुधार का महत्व समझने लगते हैं। इससे भारत में भी राजनेताओं पर सुशासन के लिए दबाव बढ़ रहा है।
नोकरशाही का बोझ
भारत में लगभग दो करोड़ सरकारी कर्मचारी हैं। इनमें से तकरीबन 25% केंद्रीय और 75% राज्य सरकारी कर्मचारी हैं। इन कर्मचारियों में सर्वोच्च स्तर पर IAS अधिकारी होते हैं जो नीति निर्माण में योगदान देते हैं और विभिन्न विभागों के प्रमुख के रूप में काम करते हैं। मध्यम स्तर के अधिकारी मैनेजर का काम करते हैं और सबसे नीचे ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले फ्रंटलाइन वर्कर्स होते हैं। कुल सरकारी कर्मचारियों में शिक्षक, स्वास्थ्य कर्मी और पुलिस कांस्टेबल जैसे फ्रंटलाइन कर्मियों की संख्या 80-90% तक होती है।
भारत में आबादी की तुलना में सरकारी कर्मचारियों की संख्या बहुत कम है यह नीचे दिए गए आलेख से देखा जा सकता है।
एक तरफ़ जहाँ कर्मचारियों की कम है, वहीं दूसरी तरफ़ सरकारी कर्मचारियों की अनुपस्थिति भी एक बड़ी समस्या है। फ्रंटलाइन कर्मचारियों पर नज़र रखने वाले सुपरवाइजर ही न होने से कई कर्मचारी अक्सर काम पर नियमित रूप से नहीं जाते। इसकी एक प्रमुख वजह यह भी है कि वर्तमान शासन प्रणाली में सरकारी कर्मचारी सेवा के लिए जवाबदेह नहीं हैं। सरकारी सिस्टम में प्रत्यक्ष काम से ज़्यादा कागज़ी कार्रवाई को ही ज़्यादा अहमियत दी जाती है।
जब किसी व्यक्ति को काम की आज़ादी और परिणामों की ज़िम्मेदारी होती है, तब वह अच्छा काम करता है। लेकिन हमारे सरकारी सिस्टम में इससे बिलकुल उलटी स्थिति है। सरकारी कर्मचारी कोई भी निर्णय अपनी मर्जी से नहीं ले सकते, छोटे-छोटे कामों के लिए भी उन्हें बहुत सारी पेपरबाज़ी करनी पड़ती है। अच्छा काम न करने पर कोई सवाल नहीं करता, लेकिन काम करते हुए कोई गलती हो गई तो वह बहुत महँगी पड़ती है। इसलिए ज़्यादातर कर्मचारी जोखिम टालते हैं और ‘जैसे थे’ स्थिति में रहना पसंद करते हैं।
सरकारी कर्मचारियों को अपने कौशल और काम की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता। कर्मचारियों का प्रमोशन केवल ज्येष्ठता के आधार पर होता है, न कि उनके कौशल और काम के आधार पर। इसके अलावा इस सिस्टम में और भी कई समस्याएँ हैं जैसे—बड़े अधिकारियों का (एक जगह) अत्यल्प कार्यकाल, मध्यम और कनिष्ठ स्तर के कर्मचारियों में क्षमता की कमी, नौकर भर्ती में भ्रष्टाचार आदि।
भारत में मध्यम और कनिष्ठ स्तर के सरकारी कर्मचारियों की सैलरी प्रति व्यक्ति आय की तुलना में बहुत ज़्यादा है। एक भारतीय सरकारी कर्मचारी की औसतन सैलरी हमारे per capita GDP के 7.2 गुना है, जबकि दूसरे एशियाई देशों में यही अनुपात 3 गुना और OECD राष्ट्रों में मात्र 1.6 गुना है। सरकारी नौकरी के और भी कई लाभ हैं, इसलिए भारत की जनता में आज भी सरकारी नौकरी का आकर्षण कायम है।
इसी आकर्षण के चक्कर में लाखों भारतीय युवा अपने जीवन के कई साल गँवा देता हैं और उतने ही इसे पाने के लिए मुँह-माँगी क़ीमत देने को तैयार होते हैं। वहीं दूसरी ओर राजनेताओं को भी चुनावों के लिए बड़े पैमाने पर पैसों की ज़रूरत होती है। इसी वजह से सरकारी नोकर भर्ती में बड़े घोटाले होते हैं। इस प्रकार भर्ती हुए कर्मचारियों में काम करने के लिए न तो पर्याप्त ज्ञान और कुशलता होती है और न ही प्रेरणा। उलटे ये कर्मचारी नौकरी पाने के लिए दिए गए पैसे वसूलने के लिए खुद भ्रष्टाचार का सहारा लेने में कुछ भी गैर नहीं मानते।
राज्य क्षमता बढ़ाना भारत के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता क्यों होनी चाहिए?
भारत की राज्य क्षमता बढ़ाना एक लंबे दौर का प्रोजेक्ट है लेकिन इससे मिलनेवाले लाभ अतुलनीय हैं। कई अनुसंधानों और प्रयोगों में यह पाया गया है कि बजट बढ़ाने के बजाय परियोजना के कार्यान्वयन को प्रभावी किया जाए तो नागरिकों को कम से कम दस गुना ज़्यादा लाभ मिलता है। 2018 में तेलंगाना सरकार ने किसानों के लिए 10,000 करोड़ की फ्लैगशिप स्कीम ‘रयथू बंधू’ लागू की। इस दौरान सरकार ने एक कॉल सेंटर की स्थापना की और 25,000 किसानों को रेंडम तरीके से फोन करके पूछा गया कि क्या उन्हें पैसे मिले या नहीं। ब्लॉक-लेवल अधिकारियों को सिर्फ़ इतना बताने से कि किसानों से सीधे संपर्क किया जा रहा है, उनके काम में अभूतपूर्व बदलाव दिखाई दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि कॉल सेंटर पर किए गए हर एक रुपये के खर्च की तुलना में किसानों को पच्चीस रुपये ज़्यादा मिले और सौ रुपये समय पर मिलें। मनरेगा के पेमेंट के लिए (अविभाजित) आंध्रप्रदेश में बायोमेट्रिक प्रणाली लगाने, स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति पर निगरानी करने आदि जैसे उपायों से भी कुछ ऐसे ही परिणाम मिलें।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अमीर देश जब गरीब थे उस समय की तुलना में आज हमारे पास काफ़ी बेहतर डेटा, प्रमाण और टेक्नोलॉजी हैं। इसलिए अगर हम सोच-समझकर राज्य क्षमता बढ़ाने में निवेश करते हैं तो हमारी GDP कम होते हुए भी बहुत बेहतर परिणाम हासिल कर सकते हैं।
राज्य की क्षमता कैसे बढ़ाई जाए?
प्रो. मुरलीधरन कहते हैं कि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए हमें गुणवत्ता आधारित विकास को तेज़ करना होगा। गुणवत्ता आधारित विकास का मतलब है GDP वृद्धि के साथ ही हमारे नागरिकों के जीवन स्तर में भी सुधार होना। किताब के अगले अध्यायों में इन दोनों लक्ष्यों को पाने के लिए हम विभिन्न क्षेत्रों में क्या-क्या सुधार कर सकते हैं, इसपर चर्चा की है। चूँकि एक लेख में इन सभी क्षेत्रों और सुधारों की चर्चा करना संभव नहीं है, हम कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में उनके सुझावों को समझने की कोशिश करते हैं।
नौकरशाही को कार्यक्षम कैसे बनाएँ?
कार्तिक कहते हैं कि हमारी नौकरशाही को कार्यक्षम बनाना हमारी राजनीतिक प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए हमें सबसे पहले सरकारी नौकर भर्ती, पोस्टिंग और ट्रांसफर में होने वाले भ्रष्टाचार को समाप्त करना होगा। शीर्ष स्तर के अधिकारियों के कार्यकाल में स्थिरता लानी होगी और अधिकांश सरकारी कर्मचारियों को काम की आज़ादी देकर परिणामों के प्रति जवाबदेह बनाना होगा। ये बदलाव लाने के लिए हमें सरकार के सभी स्तरों पर डेटा और टेक्नोलॉजी आधारित गवर्नन्स में निवेश करना होगा।
नीतियों का डेटा और परिणाम आधारित मूल्यांकन
नीतियाँ तभी प्रभावी होती हैं जब वे ज़मीनी हकीकत से जुड़ी होती हैं और वे हकीकत से तभी जुड़ सकती हैं जब वे पूरे और अपडेटेड डेटा पर आधारित होती हैं। इसलिए भारत सरकार को बेहतर डेटा संकलन और विश्लेषण की क्षमता विकसित करनी होगी। इसके लिए प्रशासनिक रिकॉर्ड्स को डिजिटाइज़ और एकीकृत करना होगा। पारंपरिक सरकारी सर्वेक्षणों (जैसे NSS, NFHS) में कई साल लग जाते हैं, इसके बजाय टेक्नोलॉजी की मदद से रियल-टाइम डेटा जुटाना होगा। डेटा इकट्ठा करते समय निजता और सहमति का ध्यान रखना भी ज़रूरी है। डेटा नागरिकों की निगरानी के लिए नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर सेवा देने के उद्देश्य से इकट्ठा किया जाना चाहिए।
इस डेटा को सिर्फ़ सरकारी अफसरों के लिए नहीं, आम जनता के लिए भी उपलब्ध कराना चाहिए। विभिन्न सरकारी विभाग और योजनाओं का डेटा सार्वजनिक डैशबोर्ड पर डालने से जवाबदेही और जन भागीदारी दोनों बढ़ सकते हैं। सरकार को विश्वविद्यालयों और रिसर्च संस्थानों को साथ लेकर इस डेटा का विश्लेषण करना चाहिए ताकि नीतियों का बेहतर आकलन हो सके। कोई नीति कितनी कारगर है, यह उसके परिणामों से निश्चित होना चाहिए। इससे ‘Evidence-based’ नीतियाँ बनेंगी जो केवल कल्पनाओं पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर आधारित होंगी।
कर्मचारी प्रबंधन
सरकार की नीतियाँ कितनी भी अच्छी क्यों न हों, उनका कार्यान्वयन करने वाले जबतक अच्छे नहीं होंगे तक वे सफल नहीं होंगी। इसलिए सरकारी कर्मचारियों का प्रभावी प्रबंधन सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। कार्तिक कहते हैं कि सरकार को एक डिजिटल ह्युमन रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम (HRMIS) विकसित करना चाहिए, जिसमें कर्मचारियों की शिक्षा, रुचि, कौशल, ज़िम्मेदारियाँ, परफॉर्मन्स, पोस्टिंग, ट्रांसफ़र आदि से संबंधित सारी जानकारी हो। ऐसा सिस्टम होने से कर्मचारियों से संबंधित सभी निर्णय जल्दी और पारदर्शक रूप से लिए जा सकेंगे। जिनमें कौशल की कमी है, उन्हें प्रशिक्षण दिया जा सकेगा और कुशल कर्मचारियों को प्रमोशन दिया जा सकेगा। रियल-टाइम डेटा के आधार पर कर्मचारियों की निगरानी की जा सकेगी और उन्हें अपने काम के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जा सकेगा।
अनुभव-आधारित प्रशिक्षण और भर्ती कार्यक्रम
कार्तिक कहते हैं कि सरकार को व्यापक तौर पर अनुभव-आधारित प्रशिक्षण एवं भर्ती कार्यक्रम शुरू करने चाहिए। इससे बजट में बढ़ोतरी किए बिना ही सरकारी सेवाओं की व्याप्ति और गुणवत्ता में भारी सुधार हो सकता है। इस कल्पना का सार है—शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक सुरक्षा आदि जैसे क्षेत्रों में 2 से 4 वर्ष के व्यावहारिक अनुभव-आधारित ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू करना। इस प्रोग्राम में 12वी पास छात्र दाखिला ले सकेंगे। वे साल में 3-4 महीने थ्योरी पढ़ेंगे और बाकी 8-9 महीने संबंधित विभाग में काम करेंगे। ये उम्मीदवार अपने ही जिले में काम करेंगे और उन्हें कुछ स्टाइपेंड भी दिया जाएगा।
इस कार्यक्रम के कई फ़ायदे हैं। एक तो प्रत्यक्ष काम करते हुए सीखने से छात्रों को मिलने वाले प्रशिक्षण की गुणवत्ता कई गुना बेहतर होगी। दूसरा ये जहाँ काम करेंगे वहाँ के स्टाफ़ की क्षमता बढ़ेगी और सेवा में बेहतरी आएगी। तीसरा, इससे सरकार पर कोई विशेष आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ेगा। चौथा, ये उम्मीदवार अपने ही जिले में काम करेंगे तो अनुपस्थिति कम होगी और जवाबदेही का अहसास रहेगा। इस प्रकार अनुभव-आधारित प्रशिक्षण पूरा करने पर इन्हें सरकारी तथा निजी दोनों क्षेत्रों में नौकरी मिल सकेगी। अगर ये सरकारी नौकरी में जाते हैं तो पहले से प्रशिक्षित होने से बेहतर सेवा दे पाएँगे और अगर सरकारी नौकरी नहीं भी मिली, तो निजी क्षेत्र में कुशल कर्मचारी के तौर पर काम कर पाएँगे।
प्रो. मुरलीधरन कर्मचारी प्रबंधन के लिए और भी कुछ उपाय सुझाते हैं, जैसे आजीवन भर्ती के बजाय फिक्स्ड-टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर भर्ती करना और महत्वपूर्ण कामों के लिए ज़्यादा समय और पेपरबाज़ी के लिए कम समय देना आदि।
सरकारी खर्च और आय
अगले चैप्टर्स में कार्तिक सरकारी खर्च और आय से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण सुझाव देते हैं। इनमें बजट का मूल्यांकन परिणामों के आधार पर करना, सरकारी खर्च और आय दोनों की गुणवत्ता सुधारने के लिए राज्य स्तर पर ‘पब्लिक फाइनेंस कमीशन’ बनाना, 500 करोड़ से ऊपर के हर प्रस्ताव के लिए स्वतंत्र विश्लेषण अनिवार्य करना और उसे सार्वजनिक करना, पेंशन और ब्याज जैसे स्थायी खर्चो को कम करने के लिए न्यू पेंशन जैसी नई नीति को बढ़ावा देना, और नए कर्ज उपभोग के लिए न लेकर, उत्पादक कामों के लिए लेना आदि शामिल हैं।
संघवाद और विकेंद्रीकरण
प्रो. मुरलीधरन ने संघवाद (federalism) और विकेंद्रीकरण (decentralization) पर भी काफ़ी जोर दिया है। उनका कहना है कि भारत एक बहुत ही सेंट्रलाइज्ड देश है, यहाँ कि केंद्र सरकार के पास काफ़ी ज़्यादा राजनीतिक और आर्थिक अधिकार हैं। इन अधिकारों का विकेंद्रीकरण करने से निर्णय प्रक्रिया में तेज़ी और सुधार आता है। हम अक्सर मानते हैं कि चीन में लोकतंत्र न होने से वहाँ अधिकारों का केंद्रीकरण हो गया होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। चीन ने अपने आर्थिक अधिकारों का बहुत बड़े पैमाने पर विकेंद्रीकरण किया है और उसकी अविश्वसनीय प्रगति का एक रहस्य यह भी है। चीन में कुल बजट का 51% हिस्सा स्थानीय निकायों द्वारा स्वतंत्रतापूर्वक खर्च किया जाता है, जबकि भारत में यह कुल खर्च का मात्र 3% है।
कार्तिक कहते हैं कि भारत को छोटे राज्य, जिले, उप जिले और स्थानीय निकाय बनाने चाहिए और उन्हें स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की पूरी आज़ादी देनी चाहिए। स्थानीय संस्थाओं को स्थानीय परिस्थिति की समझ दूर बैठी केंद्र सरकार से कहीं बेहतर होती है, इसलिए वे बेहतर निर्णय ले सकते हैं।
शिक्षा और कौशल
अगर कोई आपसे पूछे कि भारत की सबसे बड़ी समस्या क्या है तो शायद आप कहेंगे बेरोज़गारी, गरीबी या आर्थिक असमानता। लेकिन कार्तिक कहते हैं कि इन सब की जड़ है हमारी खराब शिक्षा प्रणाली। भारत हर साल शिक्षा पर 7.5 लाख करोड़ रुपये खर्च करता है। इसमें से ज़्यादातर हिस्सा शिक्षकों के वेतन, स्कूल के निर्माण, रखरखाव पर खर्च होता है। लेकिन ग्रामीण सरकारी स्कूलों में पाँचवी कक्षा के आधे बच्चे दूसरी कक्षा की किताब भी ठीक से नहीं पढ़ सकते। हर साल तकरीबन एक करोड़ बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी कर चुके होते है पर उन्हें कोई बुनियादी कौशल अवगत नहीं होता। जब इन बच्चों की बुनियाद ही कच्ची होती है तो ये कॉलेज और स्किल प्रोग्राम्स में भी कुछ सीख नहीं पाते। फिर जब वे नौकरी ढूँढ़ने निकलते हैं तो उन्हें रोज़गार मिलना भी मुश्किल हो जाता है। रोज़गार न मिलने से बेरोज़गारी और गरीबी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती है।
सिर्फ़ Quantity नहीं, Quality भी चाहिए
भारतीय सरकारें इनपुट पर बहुत ध्यान देती हैं जैसे कितने स्कूल हैं, कितने शिक्षक हैं, कितने बच्चों के नाम स्कूल में दाखिल हो चुके हैं आदि। हालाँकि ये ज़रूरी हैं और इनमें से कुछ मापदंडों पर हमने अच्छी प्रगति भी की है, जैसे 2022 में भारत के 6 से 14 वर्ष के लगभग 98% बच्चों के नाम स्कूल में दर्ज थे। लेकिन इसके ‘आउटपुट’ पर हमारा ज़्यादा ध्यान नहीं है। यानी इन बच्चों को इन स्कूलों से मिलने वाली शिक्षा सुधारने में हमारे प्रयास कम पड़ रहे हैं।
शिक्षा में सुधार कैसे लाएँ?
हमारी शिक्षा प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए—प्राथमिक शिक्षा पूरी करने वाले सभी बच्चों को कम से कम बेसिक पढ़ाई-लिखाई और गणित आना चाहिए। इसके लिए हमें बच्चों की क्षमता के अनुसार उनके ग्रुप बनाकर उन्हें बुनियादी शिक्षा देनी पड़ेगी। अभिजीत बनर्जी और एस्थर डफ्लो इसे ‘Teaching at the Right Level’ (TaRL) कहते हैं।
अभी शिक्षकों को अच्छा काम करने पर न कोई प्रोत्साहन मिलता है, न ही अनुपस्थित रहने पर कोई खास जवाबदेही होती है। यदि हम शिक्षकों की सैलरी के कुछ हिस्से को बच्चों की शैक्षिक प्रगति से जोड़ दें तो इसके परिणाम बहुत ही असरदार हो सकते हैं। ऐसे प्रयोग हुए हैं और उनके परिणाम भी बहुत अच्छे देखे गए हैं।
कौशल विकास
भारत में हजारों स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम चलाए जाते हैं लेकिन इनमें से ज़्यादातर छात्रों को नौकरी दिलाने में असफल होते हैं और नौकरी मिलती भी है तो भी वह अस्थायी होती है। क्यों? क्योंकि जो बच्चे इन प्रोग्राम्स में आते हैं उनके बेसिक कॉन्सेप्ट ही कमज़ोर होते हैं। इसीलिए उन्हें ट्रेनिंग में भी दिक्कतें आती हैं। ट्रेनिंग संस्थानों की गुणवत्ता और इंसेंटिव भी संदेहास्पद होते हैं।
इसलिए मुरलीधरन कहते हैं कि कौशल विकास को स्कूली शिक्षा में ही शामिल करना चाहिए। पहले बच्चों को बुनियादी पढ़ाई-लिखाई सिखानी चाहिए और फिर उन्हें वास्तविक दुनिया की ज़रूरतों के अनुसार ट्रेनिंग देना चाहिए। कई विकसित देशों में छात्रों को छठी या आठवीं कक्षा से ही वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाती है। इस तरह बच्चे स्कूली शिक्षा के दौरान ही उपयुक्त कौशल प्राप्त कर सकते हैं और आगे ज़्यादा पढ़-लिख न सकने पर भी रोज़गार हासिल कर सकते हैं।
इन ट्रेनिंग प्रोग्राम्स की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए एम्प्लॉयर, पाठ्यक्रम निर्माता, प्रशिक्षक शिक्षक और प्रशासन सभी को साथ मिलकर ये प्रोग्राम बनाने चाहिए।
रोज़गार, उत्पादकता और आर्थिक वृद्धि
भारत को एक युवा देश कहा जाता है, लेकिन अगर हम इन युवाओं को अच्छी शिक्षा, कौशल और रोज़गार के अवसर प्रदान कर सकें तो यही युवा शक्ति, समाज में असंतोष और अपराध का कारण बन सकती है।
भारत का असली संकट बेरोज़गारी नहीं, उत्पादकता की कमी है। भारत में लेबर फ़ोर्स पार्टीसिपेशन रेट (LFPR) 56% है। यानी 15 से 64 की उम्र के 56% लोग ही किसी न किसी प्रकार का काम कर रहे हैं या काम की तलाश में हैं। इनमें से लगभग 30% वेतनधारी हैं, 20% दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं और 50% अपने आप को सेल्फ-एम्प्लॉयड कहते हैं। इन सेल्फ-एम्प्लॉयड में अधिकांश किसान, सड़क किनारे ठेला लगाने वाले आदि हैं, जिनकी आय बहुत कम है। इसका मतलब है, भारत की बहुत थोड़ी सी आबादी ठीक-ठाक कमाती है, बाकी ज़्यादातर लोगों को जीने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तरक्की तो बहुत दूर की बात है। इस तरह भारत में खुली बेरोज़गारी तो कम दिखती है, लेकिन छुपी बेरोज़गारी बहुत ज़्यादा है।
दूसरी चिंता की बात है भारत के लेबर फ़ोर्स में महिलाओं की घटती सहभागिता। इसके कई कारण हैं जैसे कार्यस्थल पर असुरक्षित वातावरण, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, असंगठित क्षेत्र में होने वाला महिलाओं का शोषण आदि। अपनी आधी आबादी को इस तरह पीछे छोड़कर भारत विकसित राष्ट्र कैसे बन सकता है?
इस प्रकार भारत में नौकरी और उत्पादकता की कमी के कई कारण हैं, जिनमें शिक्षा की गुणवत्ता, कौशल की कमी, पूँजी की अनुपलब्धता, सरकारी नियमों का चंगुल, सार्वजनिक सेवाओं की कमी, सामाजिक वातावरण इत्यादि शामिल हैं।
इन समस्याओं को सुलझाने के लिए कार्तिक कुछ उपयुक्त सुझाव देते हैं।
राज्यस्तर पर नौकरी और उत्पादकता बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए। फ़िलहाल राज्य के किसी भी मंत्रालय या अधिकारी पर नौकरियाँ बढ़ाने की ज़िम्मेदारी नहीं है, इसलिए इस बारे में जवाबदेही भी नहीं है। सरकार को राज्य स्तर पर एक मिशन तैयार कर सचिव-स्तर के किसी अधिकारी को इस काम की ज़िम्मेदारी देनी चाहिए।
राज्य सरकारें अक्सर उद्योगों को टैक्स में छूट या ज़मीन देकर लुभाने की कोशिश करती हैं लेकिन इससे समग्र आर्थिक वातावरण नहीं सुधरता। इसके बजाय उन्हें बिजली, पानी, सड़क, कानून-व्यवस्था जैसी सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ानी चाहिए, जिससे सभी प्रकार की आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है। अगर किसी लॉ-स्किल लेबर-इंटेंसिव (कम कौशल वाले और ज़्यादा रोज़गार देनेवाले) उद्योग को सब्सिडी देनी भी पड़ती है तो वह पूँजी के बजाय मज़दूरों के लाभ के स्वरूप में होनी चाहिए। निवेश से संबंधित कई प्रकार की सरकारी समस्याओं को हल करने के लिए SEZ का उपयोग करना चाहिए।
शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भर्ती करने से सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ती है और पूरे समाज को लाभ होता है। फ़िलहाल सरकारी नौकरी में कम लोगों को अधिक वेतन दिया जा रहा है इसके बजाय उचित वेतन पर अधिक लोगों को भर्ती करना ज़्यादा उपयोगी होगा।
भारत में लाखों युवा सालों तक सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहते हैं और कोई उपयुक्त कौशल नहीं सीखते। इसलिए सरकार को भर्ती प्रक्रिया में रट्टा मारकर पास की गई परीक्षा के मुकाबले, कौशल और परफॉर्मन्स को ज़्यादा महत्व देना चाहिए, इससे युवाओं में कौशल विकास होगा, जो उन्हें अन्य क्षेत्र में नौकरी पाने के लिए भी काम आएगा। सरकारी नौकरियों के लिए आजीवन भर्ती करने के बजाय 3-5 साल के कॉन्ट्रेक्ट करने चाहिए और उनका परफॉर्मन्स के आधार पर नवीकरण करना चाहिए।
न्याय व्यवस्था में सुधार
भारत की अदालतों में 3 करोड़ से ज़्यादा मामले एक साल से ज़्यादा समय से लटके हुए हैं। इनमें से कुछ तो 10-15 सालों से लंबित हैं। साल-दर-साल इनकी संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। लाखों लोग न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं और दूसरी ओर लाखों अन्य जमानत न मिल पाने के कारण जेल में बंद हैं, जबकि उनका अपराध अभी साबित भी नहीं हुआ है। न्याय में होनेवाली यह देरी न्याय नकारने के बराबर है।
इस देरी की एक प्रमुख वजह है जजों की कमी। भारत में हर दस लाख लोगों के लिए सेंक्शन यानी मंज़ूर जजों की संख्या मात्र 20 है, जबकि UK में यह 51 और USA में 107 है। इन मंजूर पदों में भी कई पद खाली पड़े हैं। भारतीय अदालतों में कर्मचारी और इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों की इस कमी का मुख्य कारण बजट की कमी है। GDP रेशियो की दृष्टि से देखें तो USA अपनी न्याय व्यवस्था के लिए हमसे दस गुना ज़्यादा प्रावधान करता है।
एक तरफ़ जहाँ जज और कर्मचारी कम हैं, वहीं दूसरी तरफ़ हमारी अदालती कार्यवाही की प्रक्रिया भी कोई कम जटिल नहीं है। एक आम कोर्ट केस में केस फाइलिंग से लेकर फ़ैसला मिलने तक 15 प्रक्रियाएँ होती हैं, जिनकी वजह से अच्छी से अच्छी परिस्थिति में भी एक केस का फ़ैसला आने में पूरा एक साल लग सकता है। और एक चीज़ है अजर्नमेंट्स। वकीलों द्वारा गवाह और सबूत इकट्ठा करने के लिए अजर्नमेंट माँगी जाती है। हालाँकि यह क़ानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है, हमारे यहाँ इसमें बहुत ज़्यादा अनिश्चितता है। कोर्ट शुरू होने पर कौन सी केस में अजर्नमेंट होगी और कौन सी में नहीं, यह निश्चित नहीं होता, इसलिए हर दिन लगभग 100 तक केसेस लिस्ट की जाती हैं और इन सब मामलों के वकील और वादी कोर्ट के बाहर अपना नंबर आने की राह देखते बैठते हैं। इस प्रकार एक आम आदमी को भारतीय अदालतों में न्याय के बजाय बस ‘तारीख-पे-तारीख’ मिलती है!
हाल ही में हुई एक स्टडी में पाया गया है कि एक जज बढ़ाने से साल में 200 लंबित केस हल हुए और बैकलॉग 10% से कम हुआ। इतना ही नहीं, इससे उस जिले में बैंक के क्रेडिट सर्कुलेशन के साथ ही कुल मज़दूरी और मुनाफ़े में भी अच्छी बढ़ोतरी हुई। चूँकि ये सभी बदलाव फॉर्मल सेक्टर में हुए, इससे सरकार का राजस्व बढ़ा और सरकार को एक अतिरिक्त जज के खर्चे की तुलना में छह गुना लाभ हुआ। समाज को मिलने वाला समग्र लाभ तो 30 गुना से भी ज़्यादा रहा।
न्याय व्यवस्था की यही अहमियत समझते हुए सरकार को न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर जल्द-से-जल्द नियुक्तियाँ करनी चाहिए। जिला न्यायाधीशों की कार्य क्षमता बढ़ाने के लिए 2 साल का जुडिशियल क्लर्कशीप प्रोग्राम शुरू किया जाना चाहिए। इसमें LL.B. फ़ाइनल इयर के छात्र या अभी पास हुए स्नातक एक परीक्षा के माध्यम से चुने जा सकते हैं। ये उम्मीदवार जज के लिए रिसर्च, राइटिंग और फैक्ट-फाइंडिंग जैसे काम कर सकेंगे, जिनकी वजह से जज का काफ़ी समय बचेगा और वे ज़्यादा मामलों का निपटारा कर पाएँगे। साथ ही अदालती कामकाज़ में टेक्नोलॉजी का उपयोग बढ़ाने से भी प्रक्रियाएँ तेज़ होंगी और देरी कम होगी। साथ ही सरकार को चाहिए कि पुराने, जटिल और अस्पष्ट कानूनों रद्द करें तथा मौजूदा कानूनों को सरल और स्पष्ट बनाए।
इस प्रकार, राज्य की कार्य क्षमता बढ़ाने से न केवल नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार आएगा, बल्कि अर्थव्यवस्था में तेज़ी भी आएगी। यह क्षमता कैसे बढ़ाई जा सकती है, इसके उपर्युक्त उपायों समेत कई अन्य उपाय कार्तिक मुरलीधरन ने अपनी किताब में दिए हैं। पॉलिसीमेकर्स से लेकर पब्लिक पॉलिसी के विद्यार्थियों तक, सभी को यह किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए और इसके सुझावों को वास्तविकता में लाने की कोशिश करनी चाहिए।
— परीक्षित सूर्यवंशी
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