— नारायण रामचंद्रन और नित्यानंदम योगेश्वरन
ऐसा लगता है कि 19वीं सदी की तरह, आज एक बार फिर समुद्री चोकपॉइंट्स यानी समुद्र के संकरे रास्ते (अवरोध बिंदु) बेहद अहम हो गए हैं। आज युद्ध के तरीके ट्रैंच और टैंकों से आगे बढ़कर, बैलिस्टिक मिसाइल, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और हथियारबंद ड्रोन्स तक ज़रूर पहुँच गए हैं, लेकिन जहाज़ों की आवाजाही अभी भी भूगोल पर ही निर्भर है। वर्तमान वैश्विक परिस्थिति यही सत्य साबित करती है।

चित्र 1 में 28 अवरोध बिंदु/हब दिखाए गए हैं, जिनमें से 13 प्रमुख हैं और 15 छोटे हैं। पश्चिम से पूर्व की ओर प्रमुख अवरोध बिंदु हैं: पनामा कनाल, जिब्राल्टर स्ट्रेट (Strait), डोवर स्ट्रेट, ओरेसंड स्ट्रेट, बोस्पोरस स्ट्रेट, सुएज़ कनाल, बाब अल-मंडेब स्ट्रेट, होर्मुज स्ट्रेट, मलक्का स्ट्रेट, लोम्बोक-मकस्सर स्ट्रेट, ओम्बई स्ट्रेट, ताइवान स्ट्रेट और कोरिया स्ट्रेट। अन्य 15 छोटे अवरोध बंदुओं में मैगलन, फ्लोरिडा, विंडवर्ड पैसेज, युकाटन चैनल, मोज़ाम्बिक चैनल, केप ऑफ गुड होप, पाक (Palk), सुंडा, टोरेस, लूजोन, बोहाई, सुशिमा, सुगारू, सोया (La Pérouse) और ओसुमी स्ट्रेट शामिल हैं। चित्र 1 में दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्ग दिखाए गए हैं, जिनमें ग्रे रंग की लाइनों की मोटाई जहाज़ों की भीड़ दर्शाती है।
भारत में LPG की माँग, आपूर्ति और समुद्री रास्ते
लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) एक ऐसा ईंधन है जिसका इस्तेमाल आमतौर पर भारतीय घरों और व्यावसायिक जगहों पर खाना पकाने के लिए किया जाता है। यह गैस ज़्यादातर प्रोपेन (C₃H₈) और ब्यूटेन (C₄H₁₀) के मिश्रण से बनती है। यह पूरी तरह जलने वाला एक साफ़ ईंधन है और भारत में खाना पकाने के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। इसने काफ़ी हद तक पहले इस्तेमाल होने वाली लकड़ी और केरोसिन की जगह ले ली है।
LPG नेचरल गैस लिक्विड (NGL) निकालते समय बायप्रोडक्ट के रूप में या रिफाइनरी प्रक्रिया में डिस्टिलेट प्रोडक्ट के रूप में बनता है। बायप्रोडक्ट के रूप में इसे निकालने का खर्च रिफाइनरी के डिस्टिलेशन के मुकाबले काफ़ी कम होता है। यही एक बड़ी वजह है कि भारत अपनी सालाना ज़रूरत पूरी करने के लिए खुद इसे बनाने के बजाय अभी भी आयात पर निर्भर है।
दुनिया भर में LPG की सालाना माँग और आपूर्ति 340 मिलियन टन से ज़्यादा है। भारत में LPG की खपत दुनिया की कुल खपत के लगभग 10% यानी 31.3 मिलियन टन है, जिसका इस्तेमाल यहाँ मुख्यतः खाना पकाने के लिए होता है। कुल खपत में सबसे बड़ा हिस्सा यानी लगभग 87% घरेलू सेक्टर (14.2 किलो के सिलेंडर) का ही है। इस सेक्टर में मुख्य रूप से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) जैसी सरकारी नीतियों की वजह से वृद्धि हुई है, जिससे आज 33 करोड़ से ज़्यादा सक्रिय घरेलू कनेक्शन हो गए हैं। व्यावसायिक क्षेत्र (रेस्टोरेंट आदि) में 19 किलो, 47.5 किलो या 425 किलो के सिलेंडर इस्तेमाल होते हैं और कुल खपत में इनकी हिस्सेदारी लगभग 13% है।
भारत की कुल LPG ज़रूरत का लगभग 60% हिस्सा आयात से पूरा होता है। इसका मतलब है कि हम सालाना करीब 20 मिलियन टन LPG आयात करते हैं। एक विशाल गैस वाहक जहाज़ (VLGC) एक बार में लगभग 50,000 टन कंप्रेस्ड LPG लाता है। इस हिसाब से भारत को हर साल LPG के लगभग 400 जहाज़ों की ज़रूरत होती है। इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा पर्शियन गल्फ़ से टैंकरों द्वारा आता है। भारत के लिए LPG के प्रमुख सप्लायर कतर, यूएई, कुवैत और सऊदी अरब हैं।

इसके अलावा, भारत का लगभग 45% कच्चा तेल और 52% लिक्विफाइड नेचरल गैस (LNG) होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। LNG, LPG से अलग है क्योंकि यह मुख्य रूप से मीथेन से बनता है और इसका इस्तेमाल CNG गाड़ियों तथा शहरों में पाइप वाली गैस (PNG) के लिए होता है।
मौजूदा संघर्ष के कारण, ईरान होर्मुज से गुजरने वाले जहाज़ों को निशाना बना रहा है। ऊपर दिया गया नक्शा खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख और छोटे बंदरगाह दिखाता है, ओमान और सऊदी अरब के बंदरगाह ईरान के सीधे प्रभाव से बाहर हैं। भारत अपना 20-23% कच्चा तेल इराक से, 16-18% सऊदी अरब से और 8-10% यूएई से आयात करता है। साथ ही 50% LNG कतर से, 12% यूएई से और 4% ओमान से आता है। इन सभी को होर्मुज स्ट्रेट से होकर ही गुजरना पड़ता है। इसलिए भारत के सामने आज एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। सऊदी अरब के कुछ बंदरगाहों से दूसरे रास्ते तो हैं, पर वे बाब अल-मंडेब स्ट्रेट से गुजरते हैं। और वहाँ के सभी बंदरगाह टैंकर या कार्गो लोड करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं, इसलिए हमारे पास बहुत कम विकल्प हैं।
पर्शियन गल्फ़ का रास्ता होर्मुज स्ट्रेट से होकर ही जाता है। एक विकल्प यह हो सकता है कि सऊदी अरब के रेड सी (Red Sea) वाले बंदरगाहों, जैसे यानबू, जेद्दा या जिज़ान से ज़्यादा गैस मँगवाई जाए। हालाँकि सऊदी अरब की LPG दुनिया में सबसे सस्ती है, लेकिन इसमें दिक्कत यह है कि सऊदी अरब के Shaybah जैसे NGL फील्ड (जहाँ से बायप्रोडक्ट के रूप में LPG निकलती है) रेड सी के बंदरगाहों से 1000 किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर हैं। सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन फ़िलहाल सिर्फ़ कच्चा तेल ले जा सकती है, LPG या NGL नहीं। इसके अलावा, रेड सी के बंदरगाहों से गैस मँगाने का मतलब है कि जहाज़ों का बाब अल-मंडेब स्ट्रेट से गुजरना। यह एक और बेहद संवेदनशील अवरोध बिंदु है, जिसकी सबसे संकरी जगह पर सिर्फ़ 27 किमी चौड़ी है। येमेन व जिबूती के बीच स्थित इस चोकपॉइंट को येमेन के हूती विद्रोहियों से सीधा खतरा है। इन विद्रोहियों को ईरान के साथी माना जाता है और वे कभी भी मौजूदा हमलों में शामिल हो सकते हैं।
अगर जहाज़ होर्मुज के रास्ते ओमान की खाड़ी में या बाब अल-मंडेब के रास्ते एडन की खाड़ी (Gulf of Aden) में प्रवेश करते हैं, तो वे सीधे भारत के पश्चिमी तट पर पहुँच सकते हैं। जेद्दा से मुंबई का समुद्री रास्ता बाब अल-मंडेब होते हुए लगभग 2300 नॉटिकल मील का है, जबकि कतर से होर्मुज होते हुए मुंबई का रास्ता लगभग 1300 नॉटिकल मील है। जब यह लेख लिखा जा रहा है, तब अखबारों में खबरें हैं कि भारतीय जहाज़ों को होर्मुज से सुरक्षित गुजरने दिया जाएगा। लेकिन, इसमें शामिल जोखिम और बीमे की दिक्कतों को देखते हुए, अभी भी बहुत कम जहाज़ वहाँ से गुज़र रहे हैं।
भारतीय आयात में लगने वाले प्रमुख चोकपॉइंट्स और ट्रांजिट टाइम
टेबल 1: समुद्री रास्ते और अवरोध बिंदु जिनसे होकर भारत कच्चा तेल और गैस मँगाता है:
टेबल 1 से यह बात साफ़ होती है कि भारत में आने वाले कच्चे तेल और LNG/LPG को (खाड़ी देशों से आने के लिए) होर्मुज जलडमरूमध्य और (रूस/अरब प्रायद्वीप के पश्चिमी हिस्से से आने के लिए) सुएज़ कनाल जैसे चोकपॉइंट्स से गुजरना ही पड़ता है। खाड़ी देशों से आयात का रास्ता सबसे छोटा है, जहाँ से ज़्यादातर शिपमेंट 10 दिनों से भी कम समय में भारतीय बंदरगाहों पर पहुँच जाते हैं। वहीं रूस, अफ्रीका, नॉर्डिक क्षेत्रों और अमरीका से आयात में 12 से 50 दिन लग जाते हैं।
इन अवरोध बिंदुओं की संवेदनशीलता के कारण, दुनिया भर में चल रहे संघर्षों ने भारतीय आयात की जोखिम काफ़ी बढ़ा दी है।
टेबल 2: विभिन्न चोकपॉइंट्स पर भारत का जोखिम
संकरे समुद्री रास्तों से तेल और गैस का आयात फ़िलहाल हमारी मजबूरी है, लेकिन भारत के लिए सतर्क रहना बहुत ज़रूरी है। होर्मुज स्ट्रेट तो सीधे तौर पर युद्ध क्षेत्र में है ही, साथ ही येमेन संघर्ष और हूती हमलों के कारण बाब अल-मंडेब भी खतरे में है। सुएज़ कनाल और मलक्का स्ट्रेट को अभी कोई सीधा खतरा नहीं है, लेकिन दुनिया के हालात देखते हुए ये भी चिंता के विषय ज़रूर हैं।
जब खतरों की बात आती है, तो रास्ते की चौड़ाई भी बहुत मायने रखती है। संकरे चोकपॉइंट्स से गुजरने वाले जहाज़ों को निशाना बनाने के लिए ड्रोन्स, पानी के अंदर चलने वाले स्वचालित वाहन (UUV) और जमीन से दागी जाने वाली मिसाइलों का इस्तेमाल हो सकता है। होर्मुज स्ट्रेट सबसे चौड़ा है, इसके दोनों तटों के बीच 33 किलोमीटर का फ़ासला है। जबकि मलक्का स्ट्रेट सिर्फ़ 2.8 किलोमीटर चौड़ा है। इन संकरे रास्तों में समुद्री सुरंगें (mines) बिछाई जा सकती हैं और जहाज़ों को आसानी से निशाना भी बनाया जा सकता है। इसलिए यहाँ से गुजरने वाले जहाज़ों को ज़्यादा खतरा रहता है। हालाँकि केप ऑफ गुड होप वाले रास्ते में कम खतरा है, पर यह बहुत लंबा है। इसलिए इससे दूरी और यात्रा का समय दोनों बहुत ज़्यादा बढ़ जाते हैं।
पारंपरिक खतरों के अलावा, भारत के लिए अहम समुद्री रास्तों (विशेष रूप से पर्शियन गल्फ़ और रेड सी) के पास GNSS spoofing की घटनाएँ भी अक्सर देखी गई हैं (चित्र 3 देखें)। ऐसा क्षेत्रीय संघर्षों के कारण नेविगेशन में होने वाली रुकावटों की वजह से होता है। GNSS spoofing में फर्जी सिग्नल भेजकर GNSS रिसीवर (GPS जैसे) को उसकी असली लोकेशन, स्पीड या समय के बारे में धोखा दिया जाता है। और ये फर्जी सिग्नल असली सिग्नलों से भी ज़्यादा ताकतवर होते हैं।
जिन संघर्ष वाले इलाकों में एंटी-ड्रोन ऑपरेशन चलाए जा रहे हैं, वहाँ स्पूफिंग की घटनाएँ बढ़ रही हैं और इसका सिविल एविएशन पर भी काफ़ी बुरा असर पड़ रहा है। ये घटनाएँ ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) की लोकेशन और नेविगेशन को प्रभावित कर सकती हैं, जो सैटेलाइट के ज़रिये अपनी स्थिति बताता है। साथ ही, स्पूफिंग की बढ़ती घटनाएँ इस बात का संकेत देती हैं कि इस इलाके में कितने ड्रोन सक्रिय हैं। ड्रोन हमलों से जहाज़ों को कितना बड़ा खतरा होता है, यह तो हम मौजूदा संघर्ष में देख ही रहे हैं।

भारत के विकल्प
अल्पकालिक रणनीति
भारतीय परिवारों के लिए अभी सबसे अच्छा उपाय यही है कि LPG का सोच-समझकर इस्तेमाल करें। प्रेशर कुकर के उपयोग से खाना जल्दी बनता है और 30-50% गैस की बचत होती है। बड़े समूह के लिए एक साथ खाना बनाने से भी समय और LPG दोनों की बचत की जा सकती है। पानी उबालने या चाय बनाने जैसे छोटे-मोटे कामों के लिए इलेक्ट्रिक बर्तन और इंडक्शन स्टोव का इस्तेमाल किया जा सकता है। इंडक्शन स्टोव पर खाना पकाने से करीब 30% ऊष्मा बचती है। गैस का इस्तेमाल तभी सबसे सही है जब खाने को सीधे आग पर सेंकना हो, जैसे रोटी बनाना।
ये तो हुई घरेलू बचत की बात। इसके अलावा, भारत को ईरान के साथ अपनी कूटनीति जारी रखनी चाहिए ताकि होर्मुज स्ट्रेट से ज़्यादा से ज़्यादा जहाज़ सुरक्षित निकल सकें। होर्मुज से निकलने वाले हर तीन जहाज़ों से भारत के लिए दो दिन की सप्लाई सुनिश्चित होती है। भारत को सऊदी अरब और अमरीका से भी खरीद बढ़ानी चाहिए। सऊदी अरब की LPG के लिए रेड सी के बंदरगाहों के ज़रिये करार किए जाने चाहिए। रेड सी से आने वाले जहाज़ों को बाब अल-मंडेब स्ट्रेट से गुजरना होगा। अमरीका से आने वाला सबसे आम समुद्री रास्ता अटलांटिक महासागर से होते हुए, केप ऑफ गुड होप को चक्कर लगाकर भारत के पश्चिमी तट (जैसे मुंद्रा, वाडिनार और जामनगर) तक पहुँचता है।
दीर्घकालिक रणनीति
भारत अभी कच्चे तेल की रिफाइनिंग के दौरान बायप्रोडक्ट के तौर पर लगभग 12 मिलियन टन LPG बनाता है। इसका एक बड़ा हिस्सा पानीपत, मथुरा और वडोदरा की इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) रिफाइनरियों से आता है। हालाँकि बायप्रोडक्ट के तौर पर LPG बनाने में मुनाफ़ा कम होता है, फिर भी पश्चिम एशिया के झटकों से बचने के लिए भारत को अपना घरेलू उत्पादन बढ़ाना होगा।
फ़िलहाल भारत के पास विशाखापट्टनम और मंगलुरु में दो भूमिगत भंडार हैं। इनकी कुल क्षमता लगभग 1,50,000 टन है, जो 3 बड़े जहाज़ों (VLGCs) या लगभग 2 दिन की माँग के बराबर है। भारतीय घरों के लिए LPG की अहमियत को देखते हुए, कम से कम 3 मिलियन टन (30-40 दिन की माँग के बराबर) का स्ट्रैटेजिक LPG रिज़र्व (आपातकालीन भंडार) बनाना बहुत ज़रूरी है।
भारत को कुकिंग गैस की सप्लाई के लिए सिर्फ़ LPG पर निर्भर रहने के बजाय पाइप्ड नेचरल गैस (PNG) का भी विस्तार करना चाहिए। हालाँकि PNG भी आयात पर निर्भर है, लेकिन इसका सप्लाई चेन अलग है और यह नेचरल गैस से आती है, जिसका LNG कंटेनरों में बड़ी मात्रा में भंडारण किया जा सकता है। यह कोई स्थायी समाधान तो नहीं है, पर एक कारगर विकल्प ज़रूर है।
जैसे-जैसे भारत अपने नेट ज़ीरो लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है, यह भी ज़रूरी है कि खाना पकाने से जुड़े छोटे-मोटे कामों के लिए बिजली के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए। यह काम तभी सही मायनों में सफल होगा जब हमारा बिजली ग्रिड भी ग्रीन यानी रिन्यूएबल एनर्जी पर चलने वाला हो जाएगा। यह एक बहुत बड़ा लक्ष्य है और भारत को अभी से इस दिशा में काम शुरू कर देना चाहिए।
चीन और भारत के LPG इस्तेमाल में फ़र्क
जब बात LPG के इस्तेमाल की आती है, तो चीन और भारत में एक बहुत बड़ा रणनीतिक अंतर है। भारत LPG का इस्तेमाल मुख्य रूप से खाना पकाने वाली गैस के रूप में करता है। वहीं, चीन LPG का इस्तेमाल प्रोपलीन (propylene) बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में करता है, जिससे बाद में पॉलीप्रोपाइलीन बनता है।
हैरानी की बात यह है कि साफ़ ईंधन से खाना पकाने के मामले में चीन भारत से पीछे है, लेकिन चीन ने लकड़ी से सीधे PNG और बिजली से चलने वाले चूल्हों की ओर मोर्चा बढ़ाया है। इसके साथ ही उसने अपने इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड को ग्रीन बनाने में भी बहुत तरक्की की है। यही वजह है कि पर्शियन गल्फ़ से LPG की सप्लाई रुकने पर चीन को ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। हालाँकि चीन भी कच्चे तेल और LNG के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है, लेकिन वह अपने विशाल आपातकालीन भंडार की वजह से काफ़ी सुरक्षित है। लगभग 120 दिनों की क्षमता वाला चीन का भंडार “माँग के दिनों” के हिसाब से भारत से 3 गुना बड़ा है।
आगे की राह
भारत ने ज़्यादातर घरों में LPG पहुँचाने में ज़बरदस्त कामयाबी हासिल की है। शहरों में यह 90% से ज़्यादा घरों तक पहुँच गई है और गाँवों में भी यह आँकड़ा लगभग 70% है (हालाँकि गाँवों में दोबारा सिलेंडर भरवाने की दर शहरों के मुकाबले कम है)।
भले ही आज यह सोचना मुश्किल लगे, लेकिन भारत को आने वाले कुछ दशकों में खाना पकाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा बिजली पर शिफ्ट होना ही होगा। इसके साथ-साथ बिजली ग्रिड को ग्रीन बनाने का एक और भी बड़ा बदलाव भी करना होगा। अगर ऐसा हुआ तो भारत समुद्री रास्तों से जुड़े इन खतरों से काफ़ी हद तक सुरक्षित हो जाएगा।
— नारायण रामचंद्रन और नित्यानंदम योगेश्वरन
नारायण मॉर्गन स्टेनली इंडिया के कंट्री हेड रह चुके हैं। वे तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के सह-संस्थापक हैं और यहाँ समकालीन अर्थशास्त्र पढ़ाते हैं। आप उनके लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।
नित्यानंदम तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में Geospatial Research Programme के प्रोफ़ेसर तथा प्रमुख हैं। वे Takshashila Geospatial Bulletin के मुख्य लेखक भी हैं।
यह लेख अंग्रेज़ी में यहाँ प्रकाशित हुआ है: Geopolitics of LPG Supply in India
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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