इस नए दौर में भारत की आर्थिक रणनीति क्या हो?
Indian economic strategy in the new globalisation
आज की टिप्पणी में हम पुलियाबाज़ी मैगज़ीन नवंबर 2025 की कवर स्टोरी साझा कर रहे हैं। भारतीय GST की मूल संकल्पना समेत कई आर्थिक सुधारों में अमूल्य योगदान देनेवाले विजय केलकर और अजय शाह का यह लेख कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इसमें उन्होंने बदलती वैश्विक परिस्थितियों का सामना करने के लिए अहम आर्थिक रणनीतियाँ सुझाई हैं, साथ ही व्यवहारिक उपाय भी दिए हैं। विशेष बात तो यह है कि नवंबर में छपे इस लेख के कुछ ही महीनों बाद सरकार ने इसमें से कुछ कदम उठाए भी हैं!
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खुली दुनिया में उभरती दरारों को पार करना आसान नहीं
—विजय केलकर और अजय शाह
दुनिया की एक कमाल की व्यवस्था अब रास्ता भटक गई है। पचास साल से अधिक समय तक दुनिया एक खुली व्यवस्था पर टिकी रही, जिसमें चीज़ें, सेवाएँ, पैसा और लोग आसानी से एक जगह से दूसरी जगह आ-जा सकते थे। यह व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी ताकतों ने गढ़ी थी। आज़ादी के बाद बाज़ार और दुनिया को लेकर हमारी तमाम शंकाओं के बावजूद, भारत को इस व्यवस्था से बड़ा फ़ायदा हुआ। 1991 से 2011 के बीच भारत की अर्थव्यवस्था (GDP) की रफ़्तार चार गुना हो गई थी। यह केवल हमारी अपनी काबिलियत का नतीजा नहीं था, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था की देन थी, जिसने भारतीय वस्तुओं और सेवाओं को नए बाज़ार दिए और भारत में पूँजी, तकनीक और कारोबारी ज्ञान पहुँचाया। विदेशी कंपनियों ने भारत की उत्पादकता और ज्ञान को नए पैमाने दिए। विदेशी वित्तीय कंपनियों ने हमारे हाई-टेक क्षेत्र को पूँजी दी। विदेशी ग्राहकों ने भारत से सेवाएँ खरीदीं, जो आज सालाना 400 अरब डॉलर के निर्यात तक पहुँच चुकी हैं। विदेशी कंपनियों ने CPU, ऑपरेटिंग सिस्टम, इंटरनेट और तमाम सिस्टम सॉफ़्टवेयर जैसी बुनियादी तकनीक दीं, जिन पर भारत की ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था खड़ी हुई। भारत की खुली अर्थव्यवस्था के पैरोकार—जगदीश भगवती और अशोक देसाई—पूरी तरह सही साबित हुए।
हमें सबसे पहले एक कड़वी सच्चाई स्वीकार करनी होगी: 1991 से 2011 तक भारत का विकास कुछ हद तक दुनिया की उदार अनदेखी पर टिका हुआ था। या कहें कि एक कूटनीतिक सिक्के पर, जो अब घिस चुका है। उन वर्षों में भारत ने हमेशा कायदे से काम नहीं किया। हमें तो लगा कि दुनिया भर में अपना माल और सेवाएँ बेचना हमारा हक है, पर हम भारत में विदेशी चीज़ों पर तरह-तरह की रोक लगाएँगे। ज़्यादातर दुनिया ने इस रवैये को ‘कोई बात नहीं’ के भाव से जाने दिया।
यह उदारता इसलिए थी, क्योंकि वे भारत को एक सभ्य, लोकतांत्रिक देश मानते थे और उन्हें विश्वास था कि समय के साथ यह एक सफल और ज़रूरी राष्ट्र बनेगा, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में ज़िम्मेदार भूमिका निभाएगा। पश्चिमी देशों का ‘आइडिया ऑफ़ इंडिया’ पर भरोसा था। वे मानते थे कि भारत समृद्धि की राह पर है और उसका साथ देना ज़रूरी है—चाहे भारत स्वदेशी नारों के चक्कर में बराबरी से हाथ न भी मिलाए।
दुनिया का यह ‘कोई बात नहीं’ वाला बर्ताव, भारत की 1991–2011 की विकास गाथा का एक अहम पहलू रहा है—जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
वह दौर अब ख़त्म हो चुका है
साल 2016 में कहानी एक टेढ़ा मोड़ ले लेती है। डोनाल्ड ट्रम्प का सत्ता में आना और उनकी “अमेरिका फ़र्स्ट” नीतियाँ, दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी खुली दुनिया का अंत थीं।
इसी समय, चीन भी दुनिया से दूर होने लगा—उनकी अपनी स्वदेशी नीति और व्यापार में बदमाशी, जिससे विदेशी कंपनियों के लिए चीन में काम करना मुश्किल हो गया। यह कोई क्षणिक रुकावट नहीं है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव है। यह है नया वैश्वीकरण, जहाँ पुरानी व्यवस्था के दो ध्रुव—अमेरिका और चीन—या तो इस व्यवस्था के विरोध में खड़े हैं या उसका गलत फ़ायदा उठाना चाहते हैं।
अभी तक तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था ट्रम्प के झटकों को झेल गई है। लेकिन इस खुशकिस्मती पर हमें बेफ़िक्र नहीं हो जाना चाहिए। अमेरिका को लेकर चार मुद्दों पर बड़ी चिंताएँ हैं:
घरेलू महँगाई, जिससे निपटने के लिए उन्हें सख्त मुद्रा नीति अपनानी पड़ेगी,
उनका निर्यात कमज़ोर पड़ना,
बढ़ती अनिश्चितता से निवेश पर बुरा असर
और शेयर मार्केट का दबाव
जैसे उदारीकरण और खुले व्यापार से GDP की रफ़्तार बढ़ती है, वैसे ही उसके उलट भी नियम चलते हैं: डी-ग्लोबलाइज़ेशन यानी वैश्विकता या खुली दुनिया से पीछे हटना, विकास को चोट पहुँचाएगा। और इस समस्या के दो बड़े केंद्र हैं—अमेरिका और चीन।
नतीजा यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का भविष्य और गौर से देखने पर और भी निराशाजनक नज़र आता है। जब अमेरिका की नीतियाँ किसी पिछड़े देश जैसी लगने लगेंगी तो विदेशी निवेशक हिचकिचाएँगे, जिससे वित्तीय बाज़ारों पर दबाव पड़ेगा। यह भारत के लिए खासकर खराब खबर है, क्योंकि आज भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया से गहराई से जुड़ चुकी है। अपने विकास की रफ़्तार बनाए रखने के लिए हमें एक मज़बूत और समृद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था की ज़रूरत है।
हमारे लिए यह 1991 जैसे संकट की घड़ी नहीं है। हमारी तिजोरी खाली नहीं हुई है, विदेशी मुद्रा भंडार टूटने की कगार पर नहीं है और न ही हमें अपना सोना गिरवी रखने की नौबत आई है।
लेकिन यह भी सच है कि यह पल उतना ही अहम है—शायद उससे भी ज़्यादा—क्योंकि यह हमारी लंबी दौड़ की दिशा बदलने वाला मोड़ है। पुरानी रणनीतियाँ अब काम नहीं करेंगी। हम अब और यह भरोसा नहीं कर सकते कि खुली दुनिया हमें हाथ थामकर ऊपर खींचती रहेगी। भारत की प्रगति का रास्ता कठिन हो गया है और इसके लिए हमें उपयुक्त जवाब तैयार करना होगा।
आज भारत के आर्थिक विचारकों की ज़िम्मेदारी है कि वे इन नए हालात का जवाब ढूँढ़ें। अच्छी बात यह है कि हाल ही में इस पर कई मज़बूत लेखन सामने आए हैं, जैसे- चिनॉय, दास, निनान, राव, सेनगुप्ता और शर्मा के वर्ष 2025 के काम। इस लेख में हम इन सभी विचारों को साथ रखकर एक पूरी तस्वीर बनाने की कोशिश करेंगे।
नया केंद्र बिंदु : OECD (बिन अमेरिका) से दोस्ती
इस नई दुनिया में पहला कदम है—अपने व्यापारिक संबंधों का पुनरावलोकन। अगर अमेरिका और चीन का साथ खटाई में है तो भारत का भविष्य कहाँ है? जवाब है- हमें होशियारी से एक नए केंद्र की ओर रुख करना होगा—OECD देशों का वह समूह, जिसमें अमेरिका न हो।
इस समूह में आते हैं- यूनाइटेड किंगडम, यूरोपीय संघ, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और कई अन्य देश। इनके साथ ही ताइवान जैसे उन्नत देश भी हैं, जो OECD के सदस्य नहीं हैं। ये सभी विकसित, नियमबद्ध अर्थव्यवस्थाएँ हैं, जो अब भी ज़्यादातर खुले वैश्विक ढाँचे में यकीन रखती हैं। हाँ, कुछ खामियाँ भी हैं—जैसे यूरोपीय संघ की कृषि नीतियाँ—लेकिन कुल मिलाकर यही आज की खुली दुनिया का सबसे समझदार और स्थिर केंद्र है।
इन देशों से जुड़ाव को प्राथमिकता देने के पीछे दो मज़बूत कारण हैं:
पहला, इनकी GDP बहुत ज़्यादा है ।
दूसरा, ये लोकतांत्रिक और खुलेपन के समर्थक ढाँचे पर चलते हैं और ‘दूसरे वैश्वीकरण’ के आधार पर खड़े हैं।
यह देश सधे हुए लोकतांत्रिक संस्थानों के ज़रिए चलते हैं—इनकी नीतियाँ किसी एक नेता की सनक पर नहीं बदलतीं। एक बार कोई समझौता हो गया तो वह लंबे समय तक चलता है। यही वह स्थिरता है, जिसकी ज़रूरत निजी कंपनियों को होती है, ताकि वे अपने फ़ैसले और निवेश उसी समय-सीमा में कर सकें।
हमें इन देशों के साथ दो मोर्चों पर काम करना होगा।
पहला, हमें इनके साथ मिलकर वैश्विक व्यापार की नई रूपरेखा बनानी चाहिए—जहाँ GATT या WTO के तहत, जो अनुचित चालें पहले बर्दाश्त की जाती थीं, उन्हें रोका जाए। यह भारत के लिए मौक़ा है कि वह इस नए ढाँचे का संस्थापक सदस्य बने। जब यह प्रणाली एक मज़बूत छोटे समूह में चल पड़ेगी तो इसे बाक़ी दुनिया के लिए भी खोला जा सकता है—बशर्ते वे साफ़ नियमों और deep globalisation पर सहमत हों। CPTPP (Comprehensive and Progressive Agreement for Trans-Pacific Partnership) और यूरोपीय संघ इसके आधुनिक उदाहरण हैं।
दूसरा, हमें इस ब्लॉक के हर देश के साथ नई शैली के मुक्त व्यापार समझौते (FTA/CECA) करने को अहमियत देनी चाहिए। इन्हें अब डीप ट्रेड एग्रीमेंट्स (DTA) यानी गहन व्यापार समझौते कहा जाता है, क्योंकि ये सिर्फ़ टैरिफ़ घटाने तक सीमित नहीं रहते—बल्कि नियमों और मानकों को एक करने, कानूनी व कारोबारी माहौल को स्थिर और भरोसेमंद बनाने और वस्तुओं, सेवाओं और पूँजी की सहज आवाजाही सुनिश्चित करने पर ज़ोर देते हैं। हालिया भारत-UK FTA एक सही शुरुआत है, लेकिन इसे बस शुरुआत ही समझना चाहिए।
ऐसे समझौते भारतीय कंपनियों को उन्नत वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ेंगे—बेहतर तकनीक, पूँजी और बाज़ार तक पहुँच का रास्ता खोलेंगे। यह रणनीति हमसे यह माँग करती है कि हम अपनी पुरानी संरक्षणवादी (protectionist), स्वदेशी सोच से पीछे हटें। लंबे समय तक हमने ऊँचे टैरिफ़, उलझाऊ गैर-शुल्क बाधाओं पर भरोसा किया और फ़ालतू की लक्ष्मण रेखाएँ खींच रखी हैं, जिनकी वजह से असली व्यापार समझौते पटरी से उतरते रहे। पर अब वह दौर गया, जो उदार छूट हमें पहले मिल जाती थी, अब नहीं मिलेगी। आज अगर भारत पुराने तरीके अपनाएगा तो दुनिया हमें भी उसी सिक्के से जवाब देगी—और यह जवाब हमारे लिए काफ़ी खट्टा होगा।
अमेरिका पहले ही पॉपुलिज़्म या भीड़प्रियता की आँधी से गुज़र रहा है; बाक़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं को उकसाकर हमें उनके आर्थिक राष्ट्रवाद का शिकार नहीं बनना चाहिए। संदेश बिल्कुल साफ़ होना चाहिए: भारत अब कोई रियायतें माँगने वाली उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एक गंभीर वैश्विक खिलाड़ी है—जो बराबरी का मैदान देने और गहरे वैश्वीकरण में हिस्सा लेने के लिए तैयार है।
हम अकेले नहीं हैं। समझदार नीति-विश्लेषक दुनिया भर में ट्रम्प-उपरांत व्यापारिक टूट-फूट को देखकर इसी तरह के रास्ते तलाश रहे हैं (Froman, 2025; Hinz इत्यादि, 2025)।
गहरे जुड़ाव से ऐसे नए आर्थिक अवसर खुलेंगे, जिनके बारे में आज तक सोचा भी नहीं गया।
उदाहरण के लिए, अगर जर्मन ऑटोमोबाइल उद्योग के साथ यूरोपीय संघ के ज़रिए एक गहन व्यापार समझौता (DTA) हो तो भारतीय कंपनियाँ BMW या Mercedes-Benz की सप्लाई चेन में शामिल हो सकती हैं—सिर्फ़ सस्ते पुर्ज़ों के लिए नहीं, बल्कि आने वाले कल की गाड़ियों के हाई-टेक घटकों और सॉफ़्टवेयर तक के लिए। इसके लिए मानकों और बौद्धिक संपदा सुरक्षा (IP protection) को मिलाना होगा।
इसी तरह जापानी इलेक्ट्रॉनिक्स या दक्षिण कोरियाई जहाज़ बनाने वाली इंडस्ट्रीज़ को देखिए। अगर इनके साथ गहन व्यापार समझौते हुए तो वे भारत को चीन+1 पार्टनर (या कहें OECD (बिन अमेरिका)+1) मान सकते हैं और भारत को अपनी उन्नत मैन्युफ़ैक्चरिंग में शामिल कर सकते हैं ।
रक्षा क्षेत्र में भी नए अवसर खुल रहे हैं। आज पोलैंड और दक्षिण कोरिया मिलकर रक्षा अनुसंधान और मैन्युफ़ैक्चरिंग में गहरे सहयोग की दिशा में बढ़ रहे हैं।
अगर भारत इनके साथ गहरे आर्थिक समझौते कर सके तो वह इस साझेदारी का निर्माण-आधार (manufacturing platform) बन सकता है—जहाँ भारतीय कौशल और हमारी भौगोलिक दूरी (remoteness) काम आए। इससे भारत को एक साथ दो बड़े फ़ायदे मिलेंगे:
अत्याधुनिक रक्षा तकनीक तक पहुँच
और बेहतर रक्षा उपकरणों का उत्पादन।
आत्मनिरीक्षण: अपनी बनाई बेड़ियाँ तोड़ना
OECD (बिन अमेरिका) समूह के साथ जुड़ाव हमारी लड़ाई का, बस आधा हिस्सा है। बाक़ी आधा और शायद ज़्यादा कठिन हिस्सा है अपने भीतर झाँकना। अगर हमें चुनिंदा और समझदार साझेदारों के एक छोटे समूह के साथ गहराई से और सफलतापूर्वक व्यापार करना है तो भारतीय कंपनियों को और ज़्यादा वैश्विक प्रतिस्पर्धी बनना होगा। इसके लिए एक व्यापक घरेलू सुधार एजेंडा चाहिए, जो हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ी बेड़ियों को तोड़ सके। आठ चीज़ें इसमें सबसे अहम हैं।
1. अप्रत्यक्ष कर (Indirect Taxes) व्यवस्था
मौजूदा GST व्यवस्था एक बड़ा सुधार है, लेकिन इसमें गहरी खामी है—यह एक्स्पोर्टर्स द्वारा चुकाए गए सभी अप्रत्यक्ष करों की पूरी भरपाई नहीं करती। “डेस्टिनेशन-बेस्ड कंज़म्पशन टैक्स” का मतलब है कि गैर-निवासियों से टैक्स नहीं लिया जाए। लेकिन आज भी कई टैक्स (जैसे सेस, बिजली, ईंधन, नगरपालिका टैक्स) उत्पादन लागत में फँसे रह जाते हैं और निर्यातक को रिफ़ंड नहीं मिलते। इसका नतीजा यह है कि भारतीय निर्यात अनावश्यक रूप से महँगे हो जाते हैं।
समाधान साफ़ है—इनपुट टैक्स क्रेडिट का पूरा प्रवाह सुनिश्चित हो, ताकि निर्यात पर पूरा रिफ़ंड मिल सके। साथ ही एक साधारण कार्बन टैक्स जोड़कर, हमें एक सिंगल, लो-रेट GST की ओर बढ़ना चाहिए (Kelkar और Shah, 2022; Kelkar, Modi और Shah, 2025)। यह न सिर्फ़ भारतीय माल को और प्रतिस्पर्धी बनाएगा, बल्कि वैश्विक मानकों (जैसे EU का Carbon Border Adjustment Mechanism) के अनुरूप भी होगा।
2. नियामक (Regulatory) सुधार
हमें Financial Sector Legislative Reforms Commission (FSLRC) की बौद्धिक नींव पर आगे बढ़ना होगा। FSLRC का मूल विचार था कि किसी भी नियामक संस्था को—जो विधायी, कार्यकारी और न्यायिक, तीनों शक्तियाँ अपने पास रखती है—checks and balances (नियंत्रण और संतुलन) के घेरे में लाया जाए।
यह सोच सिर्फ़ वित्तीय क्षेत्र तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसे भारत की सभी वैधानिक नियामक संस्थाओं पर लागू किया जाना चाहिए। जब नियामकों की मनमानी पर अंकुश लगेगा और उनका व्यवहार सुनिश्चित (predictable) बनेगा, तभी व्यापार में भरोसा पैदा होगा। यही भरोसा घरेलू कंपनियों और विदेशी निवेशकों—दोनों के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत है। दरअसल, यही है ‘deregulation’ शब्द का असली और समझदारी भरा मतलब (Shah, 2025; Krishnan, 2025)।
3. न्यायपालिका को दुरुस्त करना
यह पूरी रणनीति तब तक कामयाब नहीं हो सकती, जब तक भारत की न्यायपालिका और कानूनी ढाँचे में बुनियादी सुधार न हों। भारतीय अदालतों में मामलों का लंबा खिंचना और गलत फ़ैसले का जोखिम आर्थिक गतिविधि पर भारी बोझ डालते हैं। भारतीय और विदेशी दोनों कंपनियाँ ऐसे विवादों में उलझ जाती हैं, जो दशकों तक चलते रहते हैं। यह अनिश्चितता आधुनिक कारोबारी व्यवस्था के लिए घातक है, क्योंकि आज के व्यावसायिक संबंध कॉन्ट्रैक्ट्स पर टिके होते हैं—जो समय पर और भरोसेमंद तरीके से पूरे होने चाहिए। यही वजह है कि भारत पर एक बड़ा “इंडिया रिस्क प्रीमियम” चढ़ जाता है।
आज हमारे पास बेहतर न्याय व्यवस्था बनाने के लिए ज्ञान और अनुभव दोनों मौजूद हैं। ज़रूरत बस यही है कि इस दिशा में गंभीरता से अमल किया जाए (Shah, 2024)
4. शहर: जहाँ असली उत्पादन होता है
सेवाएँ हों या उद्योग—निर्यात-ओरिएंटेड उत्पादन असल में शहरों में ही होता है। इसीलिए भारत के शहर सुधार और हमारी उत्पादन-क्षमता के बीच सीधा रिश्ता है।
जब प्रतिभाशाली लोग अच्छे, रहने लायक शहरों में एक जगह जुटते हैं, तभी असली economies of agglomeration बनती हैं—यानी इकट्ठा होने के फ़ायदे मिलते हैं—लागत घटती है और उत्पादकता बढ़ती है। लेकिन अब तक विकेंद्रीकरण (decentralisation) और नगर नियोजन (town planning) जैसे मुद्दों पर प्रगति बेहद कम रही है। भारत में आज शहरी नीतियों और योजनाओं पर काफ़ी ज्ञान और अनुभव इकट्ठा हो चुका है—अब समय है इसको काम में लाने का ।
5. कृषि का जाम हटाना
हम बरसों से जानते हैं कि भारतीय कृषि गहरे संकट में है—कारण है राज्य का हर जगह दखल और सब्सिडी पर टिका एक टेढ़ा ढाँचा। यह व्यवस्था किसानों को गलत प्रोत्साहन देती है, खराब पोषण के ज़रिए स्वास्थ्य संकट पैदा करती है और पराली जलाने जैसी आदतों को बढ़ावा देती है।
इस क्षेत्र में संरक्षणवाद (protectionism) का बोझ पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था पर असमान रूप से भारी पड़ता है। असल उपाय यही है कि कृषि इनपुट और आउटपुट—दोनों—पर कीमतों का असली खेल (price system) चले:
लोगों को ज़मीन खरीदने-बेचने की आज़ादी मिले,
कृषि उत्पाद बेचने, उन्हें भंडारण करने और भारत के भीतर व बाहर ले जाने की आज़ादी हो,
और कमोडिटी फ़्यूचर्स मार्केट (commodity futures markets) में देश-विदेश में लेन-देन की छूट हो।
पर यह काम आधा-अधूरा सुधार करके नहीं होगा। इसके लिए राजनीतिक सूझबूझ और व्यापक सुधार कार्यक्रम चाहिए—जैसे 90 के दशक के structural adjustment programs। और इसकी शुरुआत उन इलाकों से करनी होगी, जहाँ राज्य का सबसे ज़्यादा हस्तक्षेप रहा है—यानी पंजाब और हरियाणा।
6. व्यापक आर्थिक मज़बूती (Macroeconomic Resilience)
इस उथल-पुथल भरे माहौल में भारत के लिए सबसे अहम काम है—अपनी व्यापक आर्थिक स्थिरता को बनाए रखना। स्थिरता का रास्ता न तो आत्मनिर्भरता के पुराने जज़्बे में है और न ही निजी क्षेत्र की ऊर्जा को दबाने में। इसका रास्ता है मज़बूत संस्थान बनाना, जो हर झटके को सह सकें।
भारत ने एक बड़ी छलाँग पहले ही लगाई है—महँगाई लक्ष्य प्रणाली (inflation targeting) अपनाकर। 2015 के बाद से CPI महँगाई काफ़ी हद तक काबू में रही है। अब चुनौती है कि इसे लगातार 4% लक्ष्य पर टिकाए रखा जाए।
इससे आगे, असली काम इन चार मोर्चों पर है:
राजकोषीय अनुशासन (Fiscal prudence): भारत का क़र्ज़/GDP अनुपात काफ़ी बढ़ चुका है और हर साल प्राइमरी घाटा बना रहता है। इसे सँभालने के लिए Fiscal Council जैसी संस्थाएँ चाहिए।
लचीली विनिमय दर (Exchange rate flexibility): विनिमय दर में ढील (floating exchange rate) आर्थिक झटकों को सँभालने का सबसे अच्छा साधन है। (Shah, 2024)
मज़बूत वित्तीय बाज़ार: हमें ऐसे वित्तीय बाज़ार बनाने होंगे, जो कठिन समय में भी झटके सह सकें। (Shah 2026)
वित्तीय दमन (Financial repression) हटाना: धीरे-धीरे उस व्यवस्था को तोड़ना होगा, जहाँ राज्य निजी बचतों को जबरन खींच लेता है। इससे भारत को देशी और विदेशी निवेशक अपनी मर्ज़ी से अधिक भरोसेमंद कर्ज़ देना चाहेंगे। (Chitgupi et. al. 2024)
7. फ़ाइनैंस है दिमाग़ और पैसा खुराक
भारत का वित्तीय क्षेत्र अब बुनियादी सुधार माँगता है—FSLRC को ही ध्यान में रखकर। आज भारतीय कंपनियाँ अपने वैश्विक प्रतिस्पर्धियों से पीछे हैं, क्योंकि उन्हें पूँजी ज़्यादा महँगी मिलती है। यह बोझ एक बिगड़ी हुई वित्तीय प्रणाली और आंशिक रूप से बंद पूँजी खाते (capital account) की वजह से है।
हमारे यहाँ वित्तीय दमन (financial repression) अब भी जारी है—जहाँ राज्य नियमों के ज़रिए निजी बचतों का बड़ा हिस्सा अपने लिए खींच लेता है। इसे हटाना होगा। असल में, वित्त अर्थव्यवस्था का “दिमाग” है—यही तय करता है कि सीमित घरेलू बचतें कहाँ लगें। जब वित्तीय सुधार होंगे तो यही दिमाग ज़्यादा गुणवत्तापूर्ण फ़ैसले ले पाएगा। और जब पूँजी खाते को सावधानी और क्रमबद्ध ढंग से उदार बनाया जाएगा, तब भारतीय कंपनियाँ विश्व बाज़ार से सबसे सस्ते भाव में पैसा उठा पाएंगी—और दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रतिस्पर्धा कर पाएँगी।
8. सूचना और संवाद में बेहतरी
आर्थिक नीति लोगों के व्यवहार और उम्मीदों को आकार देकर असर डालती है। इसमें सरकार की संचार रणनीति (communication strategy) अहम भूमिका निभाती है (Shah, 2018)। 1991 से 2011 के बीच भारत की तेज़ आर्थिक छलाँग का एक बड़ा आधार था—निजी क्षेत्र का यह भरोसा कि सुधारों की दिशा साफ़ है और चुनाव बदलने पर भी रणनीति नहीं डगमगाएगी। उस दौर में नीति-निर्माताओं ने जो कहा, वो किया।
आज का माहौल कठिन है—सोशल मीडिया के ज़माने में अफ़वाहें और अविश्वास ज़्यादा तेज़ी से फैलते हैं। ऐसे माहौल में सरकार के लिए सबसे बड़ी पूँजी है—सच्चाई के लिए जाने जाना। यही गुण निजी क्षेत्र की उम्मीदों और निवेश के माहौल को मज़बूत करेगा।
आज सभी बड़ी वैश्विक कंपनियाँ अमेरिका और चीन में अपने कामकाज को घटा रही हैं। अगर भारत ने समझदारी से पत्ते खेले तो हम OECD (बिन-US)+1 के रूप में उनकी अगली मंज़िल बन सकते हैं। इसके लिए भारत को विदेशी कंपनियों के साथ अपने व्यवहार में ठोस सुधार करने होंगे। हमें OECD-स्तर के tax treaties और निवेश सुरक्षा समझौते (bilateral investment protection agreements) बनाने होंगे। सबसे अहम कदम होगा संसद से एक साफ़ कानून पास करना, जो विदेशियों को भी बराबरी का दर्जा दे और आर्थिक राष्ट्रवाद की मानसिकता से बाहर निकले। दुनिया को यह साफ़ संदेश जाना चाहिए कि भारत कारोबार के लिए एक सुरक्षित और भरोसेमंद जगह है।
ताकतवर देशों से मज़बूती से बातचीत
जब भारत अपनी आंतरिक समस्याएँ सँभालेगा और नए व्यापारिक साझेदार बना लेगा, तभी वह ताकत की स्थिति से दुनिया के दो सबसे पेचीदा संबंध—अमेरिका और चीन—निभा पाएगा।
इन दोनों देशों की समस्याएँ पेचीदा हैं और इनका हल सीने पर हाथ मारकर राष्ट्रवाद दिखाने या ऊँची आवाज़ में बोलने से नहीं होगा। इनसे निपटने के लिए उनकी राजनीति और अर्थव्यवस्था की गहरी समझ चाहिए। दिखावे या तिरस्कार से भारतीय हित पूरे नहीं होंगे। सरकार को एक समझदार सलाहकार मंडल (brain trust) बनाना होगा, जो अमेरिका और चीन—दोनों की घरेलू राजनीति, उनकी आर्थिक कमज़ोरियाँ और उनके बातचीत के तौर-तरीके—को गहराई से समझे। डोकलाम और गलवान जैसी घटनाओं ने चीन के इरादों और तरीकों को लेकर भारत के बुद्धिजीवी जगत को आगाह कर दिया है। अब हमारे पास इस मोर्चे पर सोचने और रणनीति बनाने की गहराई मौजूद है (Bambawale et al., 2021)।
चीन के अतिउत्पादन (overproduction) की समस्या वास्तविक है और अभी है (Patnaik and Shah, 2024)। रोज़गार बनाए रखने के लिए अपनी कंपनियों को सब्सिडी देने की चीन की नीति एक तरह का आर्थिक युद्ध है, क्योंकि इससे दूसरे देशों में सस्ते निर्यात से बाज़ार भर जाते हैं। यह सिर्फ़ अनुचित ही नहीं, बल्कि भारत समेत दूसरे देशों के उद्योग क्षेत्र के लिए विनाशकारी भी है। चीन से आयातित वस्तुओं के खिलाफ़ कड़े अवरोध लगाना न केवल जायज़ है, बल्कि ज़रूरी भी है। हालाँकि ये पूरी तरह से संबंध तोड़ देने की दलील नहीं है। चीन के साथ जुड़ने के कई रास्ते हैं, जिन्हें अपनाया जा सकता है और अपनाना भी चाहिए। ख़ासकर उन क्षेत्रों में, जहाँ हमारे हित मेल खाते हैं, जैसे कि वैश्विक संस्थानों में या वैश्विक चुनौतियों से निपटने में। जैसे दुनिया को कार्बन-मुक्त बनाने के लिए चीन और भारत के बीच सहयोग ज़रूरी है।
अमेरिका एक अलग और शायद ज़्यादा बुनियादी, चुनौती है। अमेरिका, जिसने पुरानी विश्व व्यवस्था का निर्माण किया, अब आत्म-संदेह में लिपटा है और अपनी ही सोच से पीछे हट रहा है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ट्रम्प के बाद का अमेरिका फिर से मुक्त व्यापार समर्थक बन जाएगा। संरक्षणवाद का जिन्न अब बोतल से बाहर आ चुका है। जब तक अमेरिका फिर से सँभल नहीं जाता, हमारी मुख्य रणनीति यही होनी चाहिए कि हम अमेरिका-रहित OECD देशों के गुट को अपनाएँ। हमें चीन के साथ वहाँ जुड़ना चाहिए, जहाँ ये तर्कसंगत हो। साथ ही ये भी याद रखना चाहिए कि चीन ने पहले भी कई बार भारत के खिलाफ़ गलत रवैया अपनाया है। और हमें इंतज़ार करना चाहिए कि एक दिन अमेरिका फिर से अपनी पहचान ढूँढ़ पाए।
भारत के आर्थिक उदय का वह दौर अब बीत चुका है, जब हमें एक उदार और खुली वैश्विक व्यवस्था का सहारा मिला हुआ था। यह भले ही 1991 का संकट नहीं है, जहाँ हमें RBI का सोना गिरवी रखना पड़े, पर यह उतना ही निर्णायक पल है। हमारा भविष्य इस पर टिका है।
भारत के नेतृत्व को विपक्ष को साथ लेकर—जैसे अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद किया था—इस परिवर्तन को सामूहिक रूप से आगे बढ़ाना होगा। भारत के लिए, हमारी जनता और हमारी कंपनियों के लिए, यह वह समय है, जब हमें अपना लोहा दिखाना है और साबित करना है कि हम इस चुनौती से ऊपर उठ सकते हैं।
बात का निचोड़:
भारत वैश्वीकरण का एक बड़ा लाभार्थी रहा है।
लेकिन अब हमें मानना होगा कि वैश्वीकरण का स्वरूप बदल गया है—और यह भारत के हित में नहीं है।
यह भारत के इतिहास का एक अहम मोड़ है; हमें ठोस रणनीति बनानी होगी।
भारत को एक नए, गहरे वैश्वीकरण ढाँचे का सूत्रधार बनना चाहिए—जहाँ विकसित अर्थव्यवस्थाएँ (बिन अमेरिका) और भारत मिलकर आगे बढ़ें।
भारत को इन उन्नत देशों (बिन अमेरिका) के साथ गहन व्यापार समझौते (Deep Trade Agreements, DTA) करने चाहिए।
साथ ही, भारत में उत्पादन की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए घरेलू सुधार ज़रूरी हैं: वैश्वीकरण-लायक अप्रत्यक्ष कर (indirect taxes) व्यवस्था, नियामक (regulatory) सुधार, वित्तीय क्षेत्र सुधार, न्यायपालिका में सुधार, मज़बूत मैक्रो-आर्थिक संस्थान, बेहतर शहर, कृषि नीति की गाँठ खोलना और संवाद रणनीति में सच्चाई पर ज़ोर देना ।
यह सब करके हम एक मज़बूत स्थिति से अमेरिका और चीन के त्रुटिपूर्ण उद्देश्यों को निरस्त कर सकते हैं।
—डॉ. विजय केलकर पद्म विभूषण सम्मानित अर्थशास्त्री हैं, जिन्होंने भारत सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है और GST के निर्माण में अपना योगदान दिया है। फ़िलहाल वे पुणे इंटरनेशनल सेंटर के उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।
—अजय शाह अर्थशास्त्री हैं और उन्होंने भारत में हुए कई आर्थिक सुधारों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। फ़िलहाल वे XKDR Forum के सह-संस्थापक के रूप में कार्यरत हैं। आप उनकी चर्चाएँ Everything is Everything यूट्यूब शो पर सुन सकते हैं।
First published in: पुलियाबाज़ी मैगज़ीन | Puliyabaazi Magazine
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