भारत की ज़्यादातर सड़कें गाड़ियों के लिए बनाई गई हैं, लोगों के लिए नहीं। ये सिर्फ़ यहाँ से वहाँ जाने का रास्ता बनकर रह गई हैं, जिनसे किसी को कोई अपनापन महसूस नहीं होता। इस सोच ने वक्त के साथ हम शहरियों की ज़िंदगी बदल दी है। इसके कारण खेलकूद, बातचीत, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साथ मिलकर खुशियाँ मनाने की हमारी सार्वजनिक जगहें सिमटती चली गईं।
पांडुरंग नगर में ‘बेंगलुरु हब्बा’ के हिस्से के रूप में जब हमने ‘रास्ते हब्बा’ आयोजित करने का फ़ैसला किया, तब हमारा मकसद इसी सोच को चुनौती देना था। हम कोई बड़ी घोषणाएँ नहीं करना चाहते थे, बल्कि एक सीधा, पर चुनौतीपूर्ण सवाल पूछना चाहते थे: अगर कोई सड़क, सिर्फ़ एक दिन के लिए ही सही, वहाँ के लोगों को लौटा दी जाए, तो क्या हो सकता है?
हमारे पास इसकी कोई रूपरेखा नहीं थी। मोहल्ले में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। इसलिए हमारे पास कोई दिशानिर्देश नहीं था। हमारे पास अगर कुछ था तो बस एक दूसरे का भरोसा कि सामूहिक ज़िम्मेदारी और सहयोग की मदद से, कुछ समय के लिए ही सही, सड़क को एक सार्वजनिक स्थल में परिवर्तित कर सकते हैं। इसी भरोसे के साथ हमने पहला कदम उठाया।
‘रास्ते हब्बा’ की टीम के साथ पहली मीटिंग में हमने जानबूझ कर इंतज़ामों के बारे में बात नहीं की। हमने परिपेक्ष्य की बात की। इसमें हमने कुछ अहम मुद्दों पर चर्चा की जैसे, सड़कें हमारे लिए क्यों मायने रखती हैं, एक सामुदायिक कार्यक्रम किसी व्यवसायिक मेले जैसा क्यों नहीं लगना चाहिए और क्यों लोगों की और उस जगह की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता।
क्योंकि यह सिर्फ़ किसी उत्सव की बात नहीं थी, हम सार्वजनिक जीवन को संजीवनी देना चाहते थे। इसलिए हमने इस उत्सव के लिए मोहल्ले की मुख्य सड़क चुनी। अगर सहूलियत के लिए हम किसी किनारे की गली चुनते, तो यह पूरा अनुभव ही फीका पड़ जाता।
इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे मुश्किल काम कार्यक्रम तय करना या सरकारी मंज़ूरियाँ लेना नहीं था। वह था लोगों का भरोसा जीतना। हमने सिर्फ़ तीन रेसिडेंट वेलफ़ेयर एसोसिएशन्स के साथ शुरुआत की और उन्होंने नशा, अपहरण, लैंड माफिया, कानून-व्यवस्था और जवाबदेही से जुड़ी बेहद व्यावहारिक चिंताएँ जताईं। मैंने उनके इस डर को खारिज नहीं किया, उनके साथ बैठकर उनकी बातों को सुना। लोगों के साथ दो दशकों तक काम करते हुए मैंने सीखा है कि सिर्फ़ आश्वासनों से आप लोगों का भरोसा नहीं जीत सकते। इसमें सालों लगते हैं। यह एक लंबी प्रक्रिया है।
इसके बाद बैठकों का एक लंबा दौर चला, कभी शांतिमय वातावरण में तो कभी तनावपूर्ण माहौल में, लेकिन हर एक बैठक ज़रूरी थी। इस दौरान MoU पर भी काफ़ी विचार-विमर्श हुआ। जवाबदेही, मेडिकल इमरजेंसी और ट्रैफ़िक प्रबंधन जैसे मुद्दों पर चर्चाएँ हुईं। इस मंथन से एक रूपरेखा निकलकर आई: एक कोर ग्रुप और उसके साथ कई छोटे-छोटे ग्रुप बनाए गए, जिन्हें कानून-व्यवस्था, ट्रैफ़िक प्रबंधन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सुरक्षा और मेडिकल इमरजेंसी, बुनियादी सुविधाएँ, तथा सोशल मीडिया और कम्युनिकेशन जैसी अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ दी गईं। यह कोई आनन-फानन में किया गया फैसला नहीं था। यह समाज को जोड़ने की एक ज़मीनी स्तर की कोशिश थी। इसने कई मायनों में यह दिखाया कि एक बेहतरीन सार्वजनिक व्यवस्था को कैसे काम करना चाहिए। यह भी समझाया कि ऐसे कामों में साझा ज़िम्मेदारी, तय भूमिकाएँ और स्थानीय लोगों की भागीदारी का क्या महत्व है।
ट्रैफ़िक पुलिस, BBMP और स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर काम करना सिर्फ़ कागज़ी कार्रवाई नहीं थी, न ही यह किसी तरह का शक्ति-प्रदर्शन था। यह हमारे आपसी सहयोग का प्रतीक था। जब हमारे स्थानीय विधायक और कॉर्पोरेटर इस प्रोग्राम में शामिल हुए, तो वे मुख्य अतिथि के तौर पर नहीं, एक आम प्रतिभागी की तरह आए। यहाँ न कोई मंच था, न कोई आकर्षण का केंद्र और न ही कोई दिखावा। ये फ़ैसले भले ही छोटे दिखते हों, लेकिन ये उस सार्वजनिक जीवन की झलक थी, जिसे गढ़ने की हम कोशिश कर रहे थे।
इसके बाद सड़क पर जो नज़ारा देखने को मिला, वह समानता की एक मिसाल था। वहाँ न तो कोई VIP कतारें थीं, न कोई “मुख्य प्रस्तुति” और न ही कला के रूपों में कोई छोटे-बड़े का भेद। शास्त्रीय नृत्य के साथ-साथ नुक्कड़ नाटक चल रहे थे, बच्चों के परफॉर्मेंस के साथ लोक परंपराएँ पेश की जा रही थीं और फ़्लैश मॉब के साथ रॉक म्यूज़िक गूँज रहा था। संस्कृति लोगों से ठीक उसी जगह मिल रही थी जहाँ वे मौजूद थे, यानी सड़क पर। जब संस्कृति से ऊँच-नीच का भेद हट जाता है, तो लोगों की भागीदारी बढ़ जाती है। फिर लोग दर्शक बनकर नहीं आते, बल्कि आयोजन का हिस्सा बन जाते हैं।
सुरक्षा का इंतज़ाम भी पूरी मुस्तैदी के साथ किया गया था। मेडिकल इमरजेंसी की पूरी तैयारी, अग्निशमन सुरक्षा, आने-जाने के स्पष्ट रास्ते, हर उम्र के स्वयंसेवक और महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों व दिव्यांगजनों की भरपूर भागीदारी थी। हमारे चार पैरों वाले दोस्त, कुत्ते और बिल्लियाँ, भी इसमें शामिल हुए। और वह भी इतनी सहजता से कि बच्चों की आर्ट स्पेस में उनके आने से किसी के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई। समावेशिता कागज़ी दावों से निकलकर जब हकीकत में उतरती है तो कैसी दिखती है? बिल्कुल वैसी, जैसी हमने उस दिन रास्ते हब्बा में देखी!
पब्लिक पॉलिसी के नज़रिए से देखें तो ऐसे सामुदायिक आयोजनों से ऐसे फ़ायदे (positive externalities) मिलते हैं, जिन्हें किसी बैलेंस शीट में नहीं मापा जा सकता। इस कार्यक्रम के माध्यम से घर से काम करने वाली एक महिला उद्यमी को पहली बार अपने काम को नाम देने और उसे एक ब्रांड के रूप में बेचने का हौसला मिला। स्थानीय छोटे-छोटे ब्रांड्स को पहचान मिली। जो लोग बरसों से एक-दूसरे के पड़ोस में अलग-अलग दायरों में जी रहे थे, वे आपस में बातें करने लगे। हर उम्र के लोगों की इस भागीदारी ने उन पड़ोसियों के बीच भरोसे की दूरियों को मिटा दिया, जो सालों से एक ही सड़क पर रहने के बावजूद कभी ठीक से मिले नहीं थे। बच्चों को फिर से उनका खेल मिल गया और बुज़ुर्ग दर्शक बनने के बजाय एंकर बन गए। उस दिन सड़क पर छह हज़ार से ज़्यादा लोग उमड़े और इस सामुदायिक कार्यक्रम को सार्वजनिक जीवन की जिस ऊँचाई तक पहुँचाया, उसे छूना बड़े-बड़े सरकारी कार्यक्रमों के लिए भी अक्सर एक सपना होता है।
‘हसीरू दला’ टीम की अगुआई में की गई कचरा प्रबंधन व्यवस्था सिस्टम्स थिंकिंग का एक बेहतरीन उदाहरण थी। इस व्यवस्था के तहत डिस्पोजेबल्स के बजाय स्टील की प्लेटों का इस्तेमाल किया गया और ज़ीरो-वेस्ट का सख्त पालन किया गया। इसलिए प्रोग्राम खत्म होने के बाद सड़क पहले से भी ज़्यादा साफ़ दिखाई देने लगी। यह सिर्फ़ एक उत्सव नहीं था। यह कम लागत में बड़ा असर छोड़ने वाले शहरी नियोजन का एक उदाहरण था। यह इस बात का सबूत था कि केवल एक दिन की अच्छी तैयारी से हम सार्वजनिक जीवन के लिए इतना कुछ कर सकते हैं, जिसकी छाप भविष्य में लंबे समय तक टिक सकती है।
आयोजन में क्या हुआ, उससे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसके बाद लोगों के मन पर उसका असर क्या रहा। बच्चों ने पूछा कि क्या वे सड़क पर फिर से चित्र बना सकते हैं। मोहल्ले के लोग पूछने लगे कि अब आगे क्या करना है। बात यहाँ तक पहुँच गई कि एक फ़ेडरेशन भी बन गया। गाड़ियों के लिए सड़क भले दोबारा खोल दी गई, लेकिन लोगों के दिलों में संभावनाओं के जो दरवाज़े खुले, वे बंद नहीं हुए। ‘बेंगलुरु हब्बा’, ‘अनबॉक्सिंग बेंगलुरु’ तथा रविचंदर और प्रशांत प्रकाश जैसे लोगों के निरंतर सहयोग के बिना ये सब कुछ संभव ही नहीं था।
सड़क उत्सव की इस कहानी के बारे में मैं एक बात स्पष्ट कर दूँ: यह सब रातोंरात नहीं हुआ। बाहर से देखने पर जो सिर्फ़ एक दिन का उत्सव लग रहा था, वह दरअसल लगभग दो दशकों के लगातार और सादगी भरे उन प्रयासों का नतीजा था, जिनमें समय के साथ संबंधों में मजबूती, मुश्किल वक्त में एक दूसरे का साथ देना और उनका भरोसा जीतना शामिल हैं। एक समुदाय का निर्माण किसी प्रॉडक्ट लॉन्च की तरह अचानक नहीं होता। इसकी बुनियाद धीरे-धीरे डालनी पड़ती है। पब्लिक पॉलिसी के नज़रिए से अपने आप में यह काफ़ी अहम बात है। यह एक ऐसा सामाजिक ताना-बाना है, जिसके बिना कितना भी भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर, प्लानिंग या पैसा लगा दिया जाए, एक सच्चा सामूहिक जीवन खड़ा नहीं किया जा सकता। इसकी जगह दूसरी कोई चीज़ नहीं ले सकती। यहाँ लिया गया हर शॉर्टकट आगे चलकर कमज़ोरी बनकर सामने आता है। ऐसी सड़क के रूप में जिसे बिना डर के एक दिन के लिए भी बंद न किया जा सके। ऐसे पड़ोसियों के रूप में जो एक-दूसरे को पहचानते तक न हों। और एक ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र के रूप में जिसकी ज़िम्मेदारी लेने वाला कोई न हो। बीस साल इस क्षेत्र में बिताने के बाद मैं यह समझ पाई हूँ कि शहरी भारत में असली ‘इंफ्रास्ट्रक्चर गैप’ सड़कें या नालियाँ नहीं हैं, बल्कि उस सामाजिक ताने-बाने को धीरज और सादगी से बुनने की कमी है, जिस पर लोग सचमुच भरोसा कर सकें।
इसीलिए मुझे लगता है कि हमारी सोसायटियों और मोहल्लों को सजग होकर ‘तीसरी जगह’ (थर्ड स्पेस) बनने की ज़रूरत है। ऐसी जगह जो न तो घर हो और न ही दफ़्तर, बल्कि इन दोनों के बीच एक ऐसा सहज स्थल जहाँ इंसान बिना किसी प्रेशर के अपनापन महसूस कर सके। शहरी भारत के एक बड़े हिस्से के लिए यह तीसरी जगह ग़ायब हो चुकी है। हमारी पहली जगह हमारा घर है और दूसरी जगह हमारा दफ़्तर या फिर ट्रैफ़िकभरा रोज़ का वही रास्ता। आज इस तीसरी जगह के लिए हमारे पास शायद ही कुछ बचा है।
इसकी एक झलक हम हर साल भारत के गाँवों में देख सकते हैं, जहाँ ‘जत्रे’ (गाँव का मेला) या कोई पारंपरिक उत्सव कुछ दिनों के लिए मुख्य सड़क पर छा जाता है। दुकानदार अपनी दुकानें लगाते हैं, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था खुलकर खिलती है, शाम को परिवार एक साथ टहलते हैं और बिना किसी अपवाद के हर कोई इसका हिस्सा बनता है। यहाँ आयोजक और दर्शक के बीच कोई फ़र्क़ नहीं होता, हर किसी की भागीदारी स्वाभाविक होती है। जब भी मैं ऐसे किसी मेले को देखती हूँ, मुझे सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात से होती है कि यह सब कितना सहज लगता है। और आज शहरों में ऐसा कुछ करने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। यहाँ तो अब शायद ही कोई यह मानता है कि सड़क या छत उसकी अपनी है।
कोई अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स या जिंदादिल मोहल्ला इसे कुछ हद तक संभव बना सकता है, बशर्ते इसके आयोजन में छोटी से छोटी चीज़ों से भी सरकारी बाबुशाही को दूर रखा जाए। हफ़्ते में एक शाम छत पर इकट्ठा होकर कुछ पढ़ने, चित्र बनाने, बुनाई करने, साथ में खाना खाने या बच्चों के खेलते समय आपस में बातें करने के लिए हमें किसी कमिटी के प्रस्ताव की क्या ज़रूरत है? थोड़ा संगीत बजा दीजिए, माहौल अपने आप बन जाता है। कोई बोर्ड गेम ले आता है, तो कोई कुर्सियाँ और कुछ ही हफ़्तों में इस मेल-मुलाक़ात को किसी आयोजक की ज़रूरत नहीं रह जाती। काग़ज़ पर ये बेहद मामूली और छोटी बातें लग सकती हैं। लेकिन जिस तरह ट्रैफ़िक ने छोटे से सफ़र को भी मुश्किल बना दिया है और दफ़्तर के बाद हममें से ज़्यादातर लोगों ने घर से निकलना ही बंद कर दिया है, ऐसे में ये छोटे, नियमित और बिना किसी झंझट वाले मेले एक बेहद अहम काम कर रहे हैं। ये हमारी एक-दूसरे के साथ खड़े रहने और मिलने-जुलने की आदत को फिर से जगा रहे हैं।
शहरी भारत में कल्पना शक्ति की कमी नहीं है, कमी है तो भरोसेमंद मंचों की। ‘रास्ते हब्बा’ ऐसा ही एक मंच था, जिसे सालों की मेहनत से तैयार किया गया और सिर्फ़ एक दिन में परखा गया। हमारे मोहल्लों, छतों और आँगनों में बनने वाली तीसरी जगहें उसी मंच का छोटा और रोज़मर्रा का रूप हैं। इन्हें सिर्फ़ पॉलिसी के ज़रिए तैयार नहीं किया जा सकता, लेकिन पॉलिसी इनके लिए गुंजाइश ज़रूर बना सकती हैं। सड़कों को केवल गाड़ियों की आवाजाही का साधन मानने के बजाय एक सार्वजनिक जगह माननेवाली, आम लोगों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों के लिए कागज़ी अड़चनों को कम करनेवाली, और सामाजिक मेल-मिलाप को कोई ऑप्शनल चीज़ समझने के बजाय एक निवेश के रूप में देखनेवाली पॉलिसी इस प्रयास में सहायक हो सकती है।
सामुदायिक कार्यक्रमों के आयोजन से मुझे जो सीख मिली और उसके बाद छत पर हुई हर मुलाक़ात ने जिस पर मुहर लगाई, वह यही है कि: जब लोगों पर भरोसा रखकर उन्हें उनकी अपनी जगह सौंपी जाती है, तब वे उसका दुरुपयोग नहीं करते, बल्कि आत्मीयता और ज़िम्मेदारी से उसका सदुपयोग करते हैं। हालाँकि यह समुदाय एक उत्सव मनाने के बहाने जुड़ा, लेकिन अब यह साथ मिलकर काम करने के लिए भी पूरी तरह तैयार है। मेरे लिए सफलता का असली पैमाना यही है। महफ़िल में तो सभी साथ होते हैं, महफ़िल खत्म होने के बाद एक-दूसरे का हाथ थामे रहना ही सच्चा साथ है।
— सौम्या प्रभाकर
सौम्या तक्षशिला इंस्टीट्यूशन की चीफ़ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) हैं। वे कई सामाजिक उपक्रमों में शामिल रहती हैं और जिवंत सामाजिक स्थल बनाने में दिलचस्पी रखती हैं।
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी | संपादन: अरुण जी
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