शिक्षा और संवाद पर फ्रांसिस बेकन की कालातीत सीख
Timeless essays of Francis Bacon on 'Studies' and 'Discourse'
इस हफ़्ते की टिप्पणी में हम साझा कर रहे हैं सोलहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ, दार्शनिक और लेखक फ्रांसिस बेकन के दो कालजयी निबंध। बेकन को अंग्रेज़ी निबंध और अनुभववाद (Empiricism) का पितामह कहा जाता है। गणितीय सूत्र जैसे संक्षिप्त वाक्य, अनुभवों का ठोस आधार और व्यावहारिक समझदारी से ओतप्रोत उनके निबंध दुनिया भर के पाठकों में काफ़ी लोकप्रिय हैं।
आज हमने जो दो निबंध चुने हैं, उनके पीछे खास वजहें हैं। पहला निबंध है ‘पढ़ाई’ पर। आजकल भारत में परीक्षाओं को लेकर काफ़ी उथल-पुथल मची हुई है। परीक्षाओं के कई पहलुओं पर चर्चाएँ भी हो रही हैं, लेकिन इन चर्चाओं में एक बात कहीं पीछे छूट गई है और वह है परीक्षाओं के परे, शिक्षा का मकसद क्या होना चाहिए। पहला निबंध इसी बात पर एक दार्शनिक सोच प्रदान करता है।
दूसरा निबंध है संवाद कला यानी बातचीत के हुनर पर। पुलियाबाज़ी में अच्छी चर्चा करना हमेशा से हमारी कोशिश रही है। और यह निबंध इसी पर प्रकाश डालता है कि एक अच्छी चर्चा कैसे की जाए।
तो पेश हैं फ्रांसिस बेकन के ये दो खास निबंध आपके लिए।
पढ़ाई (Of Studies)
अध्ययन या पढ़ाई मुख्यत: तीन मकसदों से की जाती है: मन के आनंद के लिए, दिखावे के लिए और अपनी काबिलियत बढ़ाने के लिए।
आनंद के लिए एकांत और फुर्सत में पढ़ाई की जाती है। बातचीत में इसका इस्तेमाल दिखावे के लिए किया जाता है। और काबिलियत के लिए की गई पढ़ाई, काम को समझने और बेहतर तरीके से करने में मददगार होती है। जो लोग किसी काम में अनुभवी होते हैं, वे वह काम तो कर सकते हैं और शायद छोटी-छोटी बातों में अंदाज़ा भी लगा सकते हैं। लेकिन आमतौर पर किसी भी काम की पूरी रूपरेखा तैयार करने, उसकी रणनीति बनाने और उसे सही ढंग से करने में, वही बेहतर होते हैं, जो पढ़े-लिखे होते हैं।
ज़िंदगी का बहुत ज़्यादा वक्त सिर्फ़ पढ़ाई में गँवा देना आलस है, बातचीत में इसका ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल करना दिखावा है और ज़िंदगी का हर फ़ैसला सिर्फ़ किताबों के सहारे लेना, इंसान को औरों की नज़र में मजाक बना देता है। पढ़ाई हमारी स्वाभाविक प्रतिभा को और निखारती है, लेकिन पढ़ाई खुद तब मुकम्मल होती है जब उसे व्यावहारिक अनुभव का साथ मिलता है। हमारी कुदरती क्षमताएँ उन जंगली पौधों की तरह हैं, जिन्हें सही आकार देने के लिए छँटाई (पढ़ाई) की ज़रूरत होती है।
किताबें भी जो राहें दिखाती हैं, वे बहुत सारी और अस्पष्ट हो सकती हैं। इसलिए सही राह चुनने के लिए किताबों के व्यापक ज्ञान को अनुभव की बाड़ ज़रूरी होती है।
चालाक लोग पढ़ाई को कमतर आँकते हैं, सीधे-सादे लोग इसकी तारीफ़ करते हैं, लेकिन समझदार लोग इसका सही इस्तेमाल करते हैं। किताबें खुद यह नहीं सिखातीं कि उनका उपयोग कैसे किया जाए, उनका सही इस्तेमाल करने की समझ किताबों के बाहर की और उनसे कहीं ऊपर की चीज़ है, जिसे हम सिर्फ़ दुनिया को करीब से देखने और समझने से ही हासिल कर सकते हैं। इसलिए कभी भी,
पढ़ाई किसी की बात का खंडन करने या उसे गलत साबित करने के मकसद से न करें।
जो पढ़ा है, उसे आँख बंद करके सच न मान लें।
और बातचीत के लिए नए-नए मुद्दे ढूँढ़ने के लिए भी न पढ़ें।
बल्कि इसलिए पढ़ें ताकि आप तथ्यों को ठीक से समझ सकें और उनका गहराई से विश्लेषण कर सकें।
कुछ किताबें सिर्फ़ चखने के लिए होती हैं, कुछ निगलने के लिए, और कुछ ऐसी होती हैं, जिन्हें अच्छी तरह चबाकर पचाना पड़ता है। कहने का मतलब यह है कि कुछ किताबों को बस ऊपर-ऊपर देखना काफ़ी होता है, कुछ को जल्दी-जल्दी और बिना ज़्यादा ध्यान दिए पढ़ा जा सकता है, लेकिन कुछ किताबें ऐसी होती हैं जिन्हें पूरी लगन, बारीकी और गहरे ध्यान से पढ़ना चाहिए। कुछ किताबों को आप दूसरों के ज़रिए भी पढ़वा सकते हैं, यानी किसी और के तैयार किए गए नोट्स या सारांश देख सकते हैं। लेकिन ऐसा सिर्फ़ कम महत्व के विषयों और हल्की-फुल्की किताबों के साथ ही किया जाना चाहिए। वरना, इस तरह निचोड़ निकाली हुई किताबें उस उबले और छने हुए पानी की तरह होती हैं, जो बिल्कुल बेस्वाद और बेजान लगता है।
वाचन इंसान को पूर्ण बनाता है, चर्चा उसे हाज़िरजवाब बनाती है और लिखने से वह सटीक और स्पष्ट बनता है। इसीलिए, जो इंसान कम लिखता है, उसकी याददाश्त बहुत तेज़ होनी चाहिए, जो चर्चाओं में कम शामिल होता है, उसे बहुत हाज़िरजवाब होना चाहिए और जो बहुत कम पढ़ता है, उसे बहुत चतुर होना चाहिए ताकि वो वह जानने का ढोंग कर सके, जो वह असल में जानता ही नहीं।
इतिहास इंसान को समझदार बनाता है, कविताएँ उसे कुशाग्र और संवेदनशील बनाती हैं।
गणित इंसान को बारीकियाँ पकड़ना सिखाता है।
विज्ञान उसकी सोच में गहराई लाता है।
नैतिक शिक्षा उसे गंभीर और ज़िम्मेदार बनाती है।
तथा तर्कशास्त्र और भाषण-कला (Rhetoric) उसे अपनी बात मज़बूती से रखने और चर्चा में शामिल होने के काबिल बनाते हैं।
एक लैटिन कहावत है, “Abeunt studia in mores”, मतलब अभ्यास ही आदत बन जाता है। हमारे दिमाग में ऐसी कोई कमी या कठिनाई नहीं होती, जिसे किसी न किसी तरह की पढ़ाई से दूर न किया जा सके।
यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे शरीर की अलग-अलग बीमारियों के लिए अलग-अलग कसरतें होती हैं। उदाहरण के लिए, बॉलिंग (एक पुराना खेल) करना पथरी और गुर्दे के लिए अच्छा माना जाता है, निशानेबाज़ी से फेफड़े और छाती मजबूत होते हैं, हल्की सैर पेट के लिए मुफ़ीद है और घुड़सवारी सिर के लिए फ़ायदेमंद होती है वगैरह।
इसलिए अगर किसी का दिमाग बहुत भटकता हो, तो उसे गणित पढ़ना चाहिए। क्योंकि गणित के सूत्रों और सिद्धांतों को समझते हुए अगर ध्यान एक पल के लिए भी भटका, तो पूरी कड़ी टूट जाती है और सब कुछ शुरू से करना पड़ता है।
अगर कोई चीज़ों के बीच का अंतर न समझ पाता हो या सही-ग़लत का भेद करने में कमज़ोर हो, तो उसे पुराने दार्शनिकों को पढ़ना चाहिए, क्योंकि वे बाल की खाल निकालने (Cymini sectores) में उस्ताद थे। और अगर कोई किसी मुद्दे की तह तक जाने में असमर्थ हो, या अपनी बात को साबित करने के लिए एक मिसाल से दूसरी मिसाल न जोड़ पाता हो, तो उसे कानूनी मुकदमों (वकीलों की बहस) का अध्ययन करना चाहिए।
इस तरह, दिमाग की हर कमज़ोरी के इलाज के लिए पढ़ाई में एक खास नुस्खा मौजूद है।
अंग्रेज़ी में यह निबंध आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Of Studies
संवाद कला (Discourse)
कुछ लोग सच खोजने और समझने के लिए बात नहीं करते। वे इस चाहत से बात करते हैं कि लोग उनकी बुद्धिमानी और बहस जीतने की क्षमता की तारीफ़ करें। मानो तारीफ़ इस बात की होनी चाहिए कि क्या कहा गया है, न कि इस बात की कि क्या कहा जाना चाहिए।
कुछ लोगों के पास कुछ घिसे-पिटे विषय और मुद्दे होते हैं, जिन पर वे सच तो बोलते हैं लेकिन उनकी बातों में कोई नयापन नहीं होता। विचारों की यह कंगाली अक्सर लोगों को उबाऊ लगती है, और जब सामने वाले को यह बात पता चल जाती है, तो वह इंसान मज़ाक का विषय बन जाता है।
बातचीत का सबसे गरिमापूर्ण तरीका यह है कि आप किसी विषय की शुरुआत करें, चर्चा को संतुलित रखें और फिर दूसरों को बोलने का मौका दें, क्योंकि ऐसा करके आप उस बातचीत की दिशा तय करते हैं। रोज़मर्रा की बातचीत को दिलचस्प बनाए रखने के लिए उसमें विविधता लाना और अलग-अलग चीज़ों को मिलाना अच्छा होता है, जैसे प्रसंग के अनुरूप दलील देना, कहानियों के साथ उनका मर्म बताना, सवाल पूछने के साथ-साथ अपनी राय भी रखना और हँसी-मज़ाक के साथ गंभीर बातें करना। किसी भी एक बात को ज़रूरत से ज़्यादा खींचना बेहद उबाऊ हो जाता है।
जहाँ तक मज़ाक की बात है, कुछ विषयों को इससे दूर रखना चाहिए, जैसे:
धर्म
राज्य (स्टेट) के मामले
महापुरुष
किसी व्यक्ति का कोई बेहद ज़रूरी काम
और ऐसी कोई भी बात जो दया या सहानुभूति की हक़दार हो।
फिर भी, कुछ लोग सोचते हैं कि जब तक वे कोई ऐसी चुभने वाली बात न कह दें जो किसी की दुखती रग पर चोट करे, तब तक उनकी बुद्धिमानी बेकार है। इस आदत पर लगाम कसनी चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे रोमन कवि ओविड ने कहा था कि,
“बच्चे, चाबुक कम चलाओ और लगाम को मज़बूती से थामे रखो।”
(Parce, puer, stimulis, et fortius utere loris)
दरअसल, इंसान को बातचीत में रोचकता और कड़वाहट के बीच का अंतर समझना चाहिए। बेशक, जिस व्यक्ति को ताने कसने की आदत होती है, वह अपनी हाज़िरजवाबी से दूसरों को डरा तो सकता है, लेकिन उसे दूसरों की याददाश्त से भी डरकर रहना चाहिए (क्योंकि लोग ऐसे तानों को कभी भूलते नहीं)।
जो इंसान सवाल पूछता है, वह बहुत कुछ सीखता है और दूसरों को संतुष्ट भी करता है, खासकर तब, जब उसके सवाल सामने वाले के ज्ञान और काबिलियत के हिसाब से पूछे गए हों। इससे सामने वाले को अपनी बात रखने में खुशी मिलती है और सवाल पूछने वाले का ज्ञान भी लगातार बढ़ता है। लेकिन ध्यान रहे, आपके सवाल सामने वाले को परेशान करने वाले नहीं होने चाहिए, क्योंकि वैसा करना बातचीत नहीं, बल्कि पूछताछ लगती है।
इसके साथ ही, इंसान को इस बात का पूरा ख्याल रखना चाहिए कि वह दूसरों को भी बोलने का मौका दे। इतना ही नहीं, अगर महफ़िल में कोई ऐसा शख्स है, जो अकेले ही सब पर हावी होना चाहता हो और सारा समय खुद ही हड़प लेना चाहता है, तो कोई न कोई तरीका निकालकर उसे शांत करना चाहिए ताकि बाकी लोग भी अपनी बात रख सकें।
बातचीत में एक और चतुराई है। कभी-कभी अगर आप किसी ऐसी बात को न जानने का दिखावा करते हो, जो आपको पता है तो आगे चलकर लोग सोचने लगते हैं कि आपको वह बात भी पता है, जो असल में आप नहीं जानते। इंसान को अपने बारे में बहुत कम और सोच-समझकर ही बोलना चाहिए।
मैं एक ऐसे शख्स को जानता हूँ जो अक्सर तंज़ कसते हुए कहा करता था कि “वह यकीनन कोई बहुत बड़ा ज्ञानी होगा, तभी तो वह अपने बारे में इतना ज़्यादा बोलता है!” खुद की तारीफ़ करने का सिर्फ़ एक ही शालीन तरीका है और वह है किसी दूसरे इंसान के अच्छे गुणों की तारीफ़ करना, खासकर तब जब वे गुण खुद आपमें भी हो।
बातचीत में किसी एक व्यक्ति पर सीधे व्यक्तिगत टिप्पणियाँ करने से बचना चाहिए। चर्चा तो एक खुले मैदान की तरह होनी चाहिए, जो किसी एक व्यक्ति की निजी चारदीवारी में सिमटकर न रह जाए।
मुझे इंग्लैंड के पश्चिमी हिस्से के दो रईसों का किस्सा याद आता है। उनमें से एक को लोगों पर ताना कसने की आदत थी, लेकिन वह अपने मेहमानों की खातिरदारी बड़े शाही अंदाज़ में करता था। दूसरा रईस अक्सर उन लोगों से पूछता था जो पहले वाले के यहाँ दावत खाकर आए होते थे, “सच-सच बताना, क्या वहाँ किसी का अपमान या कोई कड़वा मज़ाक नहीं हुआ?” इस पर मेहमान जवाब देते, “हाँ, ऐसी-ऐसी बात हुई थी।” तब वह दूसरा रईस कहता, “मुझे मालूम था, वह अपनी इस आदत से एक अच्छी दावत का मज़ा ज़रूर किरकिरा कर देगा।”
बातचीत में समझदारी रखना, वाक्पटुता से कहीं बढ़कर है। और सामने वाले के मिज़ाज के मुताबिक बात करना, महज़ अच्छे शब्दों की सजावट से कहीं ज़्यादा कीमती है।
बातचीत में बिना किसी संवाद या आदान-प्रदान के लगातार बोलते रहना दिमागी सुस्ती का लक्षण है। वहीं अगर कोई हाज़िरजवाबी में तो उस्ताद है, लेकिन किसी विषय पर गंभीर बात नहीं कर पाता, तो यह उसका छिछलापन और दिमागी कमज़ोरी दर्शाता है।
यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा हम जानवरों में देखते हैं, जो सीधे दौड़ने में कमज़ोर होते हैं, वे आड़ा-तिरछा मुड़ने में सबसे तेज़ होते हैं—जैसा शिकारी कुत्ते और खरगोश के बीच होता है।
अंत में, अपनी मुख्य बात पर आने से पहले बहुत ज़्यादा भूमिका बाँधना लोगों को थका देता है और बिना किसी भूमिका के सीधे मुद्दे पर कूद पड़ना बेहद रूखा लगता है।
अंग्रेज़ी में यह निबंध आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Of Discourse
—फ्रांसिस बेकन
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
We welcome articles/blogs/experiences from our readers and listeners. If you are interested in getting your writing featured on Puliyabaazi, please send us your submissions at puliyabaazi@gmail.com. Check out this article for submission guidelines.
पुलियाबाज़ी का तीसरा अंक जल्द ही आ रहा है! नीचे दी लिंक पर आप आगामी अंक का कवर पेज देख सकते हैं। बुकिंग शुरू होते ही हम आपको सूचित करेंगे।
पुलियाबाज़ी मैगज़ीन । Puliyabaazi Magazine
Order the magazine by scanning the QR Code below. You can order a single edition or a subscription of 4 editions.
हिंदी साहित्य का स्वाद: कविता, कहानियाँ और किस्से। A Brief History of Hindi Literature ft. Arun Jee
दोस्तों, आज पुलियाबाज़ी पर लेते है मज़ा हिंदी कविता और कहानियों का। हिंदी साहित्य के जन्म से लेकर उसके आधुनिक रूप में ढलने तक की कहानी हमें सुनाते हैं हमारे मेहमान डॉ. अरुण जी, जो एक लेखक और अनुवादक हैं, और यात्रावृतांत और साहित्य समीक्षा में खास दिलचस्पी रखते हैं। हिंदी साहित्य के मुख्य काल खंडों और उनसे जुड़े महान कवी-कवियित्रीयों से वे हमें अवगत कराते ह…
पुलियाबाज़ी वाली हिंदी का मतलब क्या? How Do We Discuss New Ideas in Hindi?
इस हफ़्ते पुलियाबाज़ी पर चर्चा पुलियाबाज़ी के बारे में ही। साल का आख़िरी एपिसोड है और अभी अभी पुलियाबाज़ी पत्रिका भी प्रकाशित हुई है, तो इस मौके पर इस पत्रिका की भाषा पर भी थोड़ी चर्चा हो जाये। हिंदी में अक्सर टेक्निकल शब्दों की कमी महसूस होती है, तो अर्थशास्त्र या लोकनीति से जुड़े अटपटे शब्दों के लिए हिंदी में शब्द कैसे खोजे? इसी बात पर आज की पुलियाबाज़ी सुनिए…
विज्ञान का विज्ञान। The Scientific Method ft. Nihar Shah
विज्ञान और अविज्ञान में क्या फर्क है? क्या विज्ञान करने का कोई एक विशेष तरीका होता है? क्या विज्ञान सच की खोज है या असत्य को निरंतर झूठ साबित करने की एक प्रक्रिया? इन्हीं विषयों पर ये पुलियाबाज़ी कंप्यूटर और मशीन लर्निंग वैज्ञानिक निहार शाह के साथ।






