—अजय शाह
दुनिया भर में चल रही उथल-पुथल ने हमारी घरेलू कमजोरियों को और भी चिंताजनक बना दिया है। ईरान युद्ध से तेल बाज़ार का बेड़ा गर्क हो गया है और जोखिम के सारे समीकरण बदल गए हैं। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ता है। 1970 के दशक से ही भारत के लिए यह एक बड़ी समस्या रही है।
आइए, हमारी इस बुनियादी कमजोरी को ज़रा आँकड़ों में समझते हैं। हमारी कुल ऊर्जा आपूर्ति में 21.7% हिस्सा आयात होने वाले कच्चे तेल का है। इसके अलावा 2.6% हिस्सा आयातित प्राकृतिक गैस का है। कुल मिलाकर, हमारी कुल ऊर्जा ज़रूरत का 24.3% हिस्सा आयात पर निर्भर है। राजनीतिक रूप से अस्थिर क्षेत्र (खाड़ी देशों) पर हमारी यह निर्भरता देश के लिए बड़े खतरे पैदा कर सकती है और भारत के रणनीतिक हलकों में लंबे समय से इस बात पर चिंता जताई जाती रही है।
ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि अब हमें यह परिस्थिति बदलनी चाहिए। इसका एक जवाब भी हमारे पास तैयार है: चूँकि सौभाग्य से भारत में इतनी धूप पड़ती है, रिन्यूएबल एनर्जी की आधुनिक तकनीकें अपनाकर हम ऊर्जा के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
हमारी ऊर्जा नीतियाँ क्यों सफल नहीं रही हैं?
आत्मनिर्भरता के इस सफ़र में हम आज कहाँ खड़े हैं? पिछले एक दशक में, भारत में आधुनिक रिन्यूएबल एनर्जी के उत्पादन में हर साल 8% की वृद्धि हुई है। यह आँकड़ा देखकर लगता है कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि 8% की दर से 10 साल में कुल उत्पादन लगभग दोगुना हो जाता है। लेकिन इस पूरी बढ़ोतरी के बावजूद, हमारी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। आज भी हमारी कुल ऊर्जा आपूर्ति में आधुनिक रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी सिर्फ़ 3.2% है। दशकों से चली आ रही हमारी ऊर्जा नीतियों की सच्चाई बस इस एक आँकड़े में दिख जाती है: कुल ऊर्जा में रिन्यूएबल एनर्जी का हिस्सा मात्र 3.2%!
हमें इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करना होगा: इतने सालों बाद भी रिन्यूएबल एनर्जी का हिस्सा सिर्फ़ 3.2% है, जबकि आयातित कच्चे तेल और गैस पर हमारी निर्भरता 24.3% है।
भविष्य में आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा अनिवार्य है। हमारी GDP तभी बढ़ सकती है जब हमारी ऊर्जा आपूर्ति भी उसी मात्रा में बढ़े। हमारी आबादी, तेजी से हो रहा शहरीकरण और औद्योगीकरण, ये सभी इस बात की गारंटी देते हैं कि आने वाले समय में ऊर्जा की माँग कई गुना बढ़ेगी। ऐसे में ऊर्जा आपूर्ति के विकल्पों में बुनियादी बदलाव करना ही होगा। फ़िलहाल हमारी कुल ऊर्जा आपूर्ति में 20% हिस्सा पारंपरिक बायोमास (लकड़ी, गोबर आदि) का है। ज़ाहिर है कि अगर हम एक विकसित अर्थव्यवस्था बनाना चाहते हैं, तो हमें बायोमास पर निर्भरता खत्म करनी होगी। इसके लिए उद्योग, परिवहन और घरेलू कामकाज का बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण करना होगा।
त्रिसूत्रीय समाधान
हमारी अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदलने और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, हम रिन्यूएबल एनर्जी में धीरे-धीरे होने वाली बढ़ोतरी के भरोसे नहीं बैठ सकते। हमें इस क्षेत्र में एक बहुत बड़ी छलाँग लगानी पड़ेगी। हम कुल ऊर्जा आपूर्ति में रिन्यूएबल एनर्जी का हिस्सा दस गुना बढ़ाकर उसे 32% तक कैसे ले जा सकते हैं?
3.2% तक पहुँचने में ही हमें 20 साल लग गए। अगर इसी तरह चलते रहे तो 32% के लक्ष्य तक पहुँचने में हमें कई दशक लग सकते हैं। इसलिए हमें हमारी ऊर्जा नीति पूरी तरह बदलनी होगी। सिर्फ़ सब्सिडी एडजस्ट करने या सरकारी विभागों को नए लक्ष्य थमा देने से यह फ़ासला तय नहीं होगा। निवेश जुटाने और सही दिशा में काम करने के लिए तीन बड़े ढाँचागत बदलाव जरूरी हैं:
पहला कदम: कीमत-आधारित बिजली बाज़ार
पहला कदम है बिजली क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव लाना। फ़िलहाल हमारी बिजली व्यवस्था सेंट्रल प्लानिंग पर चलती है। सरकारी संस्थाएँ ही तय करती हैं कि बिजली कैसे खरीदनी है, कितनी खरीदनी है और उसकी कीमत क्या होगी। यह व्यवस्था न तो पैसों का सही इस्तेमाल कर पाती है, न ही जोखिम लेने की प्रेरणा देती है और न ही नए विचारों को पनपने देती है। आज के आधुनिक और डिसेंट्रलाइज्ड ग्रिड मुख्य रूप से मौसम आधारित रिन्यूएबल एनर्जी पर चलते हैं। सेंट्रल प्लानिंग इनकी जटिलता को नहीं संभाल सकती। इसलिए हमें कीमत-आधारित व्यवस्था (price-system) अपनानी होगी। हमारा बिजली बाज़ार ऐसा होना चाहिए, जहाँ माँग और आपूर्ति के आधार पर बिजली की दरें रियल-टाइम में तय हों।
ऊर्जा नीतियाँ बनाने वाली मौजूदा प्रणाली रिन्यूएबल एनर्जी को एक समस्या की तरह देखती है, क्योंकि यह उनके पुराने ढाँचे में फिट नहीं बैठती। जबकि हमें इस पुराने ढाँचे को ही बदलने की जरूरत है, ताकि भारत एक आधुनिक ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण कर सके और प्रकृति से हमें मिलने वाली भरपूर धूप का पूरा लाभ उठा सके।
कोई भी आर्थिक गतिविधि तभी ठीक से चलती है जब वह बाज़ार की कीमतों और मुनाफ़े की दरों पर आधारित होती है। कीमत-आधारित प्रणाली निजी निवेशकों को रिन्यूएबल एनर्जी के उत्पादन, ट्रांसमिशन और भंडारण में निवेश के लिए आकर्षित करेगी। पैसा अपने आप ग्रिड की समस्याओं को सुलझाने वाले विकल्पों की ओर बहने लगेगा। अक्षय जेटली और मैं ऊर्जा क्षेत्र के इस गहरे सुधार को नारियल के पेड़ का सबसे निचला फल कहते हैं (हालाँकि इस क्षेत्र के सभी सुधार बहुत मुश्किल हैं, यह सुधार उन सब में थोड़ा सा कम मुश्किल है)। अभी सरकारी प्लानर्स राजनीतिक और नौकरशाही के चश्मे से सही तकनीक चुनने की कोशिश करते हैं। लेकिन बाज़ार ऐसा नहीं करता। वह खुद जोखिम लेता है और सबसे सस्ते व बेहतरीन विकल्प खोज निकालता है। सरकार को चाहिए कि वह एक ऐसा बाज़ार बनाए, जहाँ लाखों निजी उत्पादक और उपभोक्ता, बिना किसी दखलअंदाजी के तय होने वाली कीमतों के आधार पर, ऊर्जा उत्पादन और उपयोग के अपने निर्णय खुद ले सकें।
दूसरा कदम: कार्बन टैक्स
दूसरा कदम है बिजली निर्माण से होने वाले अप्रत्यक्ष नुकसान (externalities) पर टैक्स लगाना। हम जो भी ऊर्जा चुनते हैं, उसकी कुछ छिपी कीमत होती है। जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से होने वाला प्रदूषण लोगों की सेहत खराब करता है, जलवायु परिवर्तन बढ़ाता है और चूँकि यह एक अशांत क्षेत्र से आयात होता है, देश के लिए रणनीतिक खतरे भी पैदा करता है। इस तरह की बाज़ार विफलता (Market Failure) से निपटने के लिए अर्थशास्त्र Pigouvian taxation का उपाय सुझाता है। ऐसा ही एक टैक्स है कार्बन टैक्स। यह भारत के लिए सबसे उपयुक्त उपाय होगा। यह कार्बन उत्सर्जन की एक कीमत तय करेगा, जिससे प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों की कीमतें बढ़ेंगी और लोग स्वच्छ ऊर्जा की तरफ मुड़ेंगे। विकसित देशों में अब आयात पर कार्बन बॉर्डर टैक्स लगने लगा है, ऐसे में भारत में कार्बन टैक्स लागू होने से हमारे निर्यातकों को निर्यात में लाभ होगा और भारत की GDP तेज़ी से बढ़ेगी।
जब ज्यादा कार्बन पैदा करने वाले काम महँगे हो जाएँगे, तब निजी कंपनियाँ खुद अपनी सप्लाई चेन में बदलाव करेंगी। पैसा अपने आप ऊर्जा बचाने वाले तरीकों और रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ जाने लगेगा। एक तरह से, कार्बन टैक्स मुनाफ़े की चाहत का इस्तेमाल करके देश को स्वच्छ ऊर्जा की तरफ बढ़ाएगा। यह सच है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में पहले ही बहुत सारे टैक्स हैं और कोई भी नया टैक्स नहीं चाहता। इसलिए इसे इस तरह लागू किया जाए जिससे सरकार का कुल टैक्स रेवेन्यू न बढ़े। फ़िलहाल हमारे GST में बहुत सारे स्लैब हैं, पेचीदा वर्गीकरण है और टैक्स की दरें भी ज्यादा हैं। इससे व्यापार करना मुश्किल होता है और संसाधनों का सही इस्तेमाल नहीं हो पाता। कार्बन टैक्स से सरकार को जो कमाई होगी, उसका इस्तेमाल GST की दरों को कम करने और पूरे देश में एक समान और कम GST दर लागू करने में हो सकता है। काफ़ी समय से लंबित इस सुधार को पूरा करने के लिए यह एक अच्छा मौका है।
तीसरा कदम: विदेशी निवेश का स्वागत
तीसरा अहम पहलू है पैसा। रिन्यूएबल एनर्जी में बहुत पैसा लगता है। ये प्रोजेक्ट तभी सफल हो सकते हैं, जब उन्हें सस्ती दरों पर इक्विटी और लंबी अवधि के कर्ज मिलें। अगर हमें रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी दस गुना बढ़ानी है, तो इसके लिए बहुत बड़े निवेश की ज़रूरत होगी। यह निवेश बिजली का उत्पादन, भंडारण, ग्रिड का विस्तार और नई तकनीकों जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर में करना पड़ेगा। साथ ही, माँग के मोर्चे पर भी बड़ा निवेश चाहिए होगा, जैसे कि इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए। लेकिन न तो भारत सरकार के खजाने में इतना पैसा है कि वह अकेले इस विस्तार का खर्च उठा सके, और न ही हमारे घरेलू बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के पास इतनी क्षमता है। हमारी जरूरतें हमारी घरेलू बचत से कहीं ज्यादा हैं।
इसका समाधान है भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी जरूरतों को दुनिया के पूंजी बाज़ारों से जोड़ना। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूंजी के लेन-देन में आने वाली रुकावटों के कारण कर्ज लेना महँगा हो जाता है। कड़े नियम और चलन के उतार-चढ़ाव से संबंधित खर्चे FDI और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) को भारत आने से रोकते हैं। ऊर्जा क्षेत्र में इस बड़े बदलाव के लिए हमें अपने वित्तीय नियम में ढील देनी पड़ेगी। अगर पूंजी के आने-जाने पर लगी पाबंदियाँ हटा दी जाएँ, तो दुनिया भर की बचत का पैसा भारत के स्वच्छ ऊर्जा प्रोजेक्ट्स में आ सकेगा, जिससे इन परियोजनाओं के लिए पैसे जुटाने का पूरा गणित ही बदल जाएगा।
एक निर्णायक मोड़
दुनिया में चल रही भू-राजनीतिक खींचतान ने हमारी आर्थिक सच्चाई को उजागर कर दिया है। जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता भारत की स्थिरता पर पड़ी एक बड़ी बेड़ी है। इस बेड़ी से छुटकारा पाने के लिए हमें उन पुराने तरीकों को छोड़ना होगा जिन्होंने इसे बनाया है। आज रिन्यूएबल एनर्जी का हिस्सा 3.2% होना, दरअसल दशकों की सेंट्रल प्लानिंग, बिना मुआवजे के हो रहे पर्यावरणीय नुकसान और पूंजी पर लगे कड़े नियंत्रणों का ही नतीजा है।
अगर हमें 32% रिन्यूएबल एनर्जी के लक्ष्य तक पहुँचना है, तो हमें अपना रास्ता बदलना होगा। इसके लिए बेहद ज़रूरी है कि हमारी बिजली व्यवस्था—कीमत, कार्बन टैक्स और पूंजी के मुक्त प्रवाह पर आधारित हो।
—अजय शाह
यह लेख अंग्रेज़ी में 30 मार्च 2026 के बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित हुआ है।
अजय शाह के इस वर्ष बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपे लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं।
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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—अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार, पटना
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