सरोजिनी नायडू: सिर्फ़ कविता नहीं, क्रांति की विरासत
Understanding the legacy of Sarojini Naidu beyond poetry
भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात जब भी चलती है तब चर्चा तिलक, गाँधी, नेहरू और पटेल से शुरू होकर टैगोर, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस के आते-आते खत्म हो जाती है। इन सब को याद करने में कोई बुराई नहीं है, आखिरकार ये भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक थे। लेकिन इस संग्राम में महिलाओं का भी बड़ा योगदान रहा है, जिसे भुला देना सही नहीं होगा। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की ऐसी ही एक प्रमुख नायिका थीं—सरोजिनी नायडू।
सरोजिनी नायडू का नाम लेते ही हमें स्कूल में पढ़ाई गईं बातें याद आ जाती हैं—वे भारत की पहली महिला गवर्नर थीं और उन्हें Nightingale of India कहा जाता है। हम में से ज़्यादातर लोगों को उनके बारे में इससे ज़्यादा जानकारी शायद ही होती है। मुझे भी नहीं थी। लेकिन जब मैंने टी.सी.ए. राघवन की किताब‘Circles of Freedom’ और अन्य कुछ जगहों पर उनके बारे में पढ़ा तब पता चला कि वे सिर्फ़ एक कवयित्री नहीं थी, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा थीं। वे स्वतंत्रता संग्राम की एक अग्रणी नेता थीं, साथ ही उन्होंने महिला अधिकारों और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए भी काफ़ी काम किया था। उन्हें सिर्फ़ एक कवयित्री कहना एक तरह से उनके योगदान को कम आंकना है।
हाल ही में, 13 फ़रवरी को उनकी जयंती थी। भारत में यह दिन राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। कुछ ही दिनों में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस भी आने वाला है। तो आइए इस अवसर पर कोशिश करते हैं सरोजिनी नायडू के जीवन और कार्य को संक्षेप में समझने की।
बुलबुल-ए-हिंद
सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी, 1879 को हैदराबाद के एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता, डॉ. अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक विख्यात शिक्षाविद्, समाज सुधारक तथा हैदराबाद में निज़ाम के कॉलेज के प्राचार्य थे। वे डॉक्टर और साइंस की डिग्री हासिल करने वाले पहले भारतीय भी थे। सरोजिनी की माता, वरदा सुंदरी देवी, एक कवयित्री थीं और बांग्ला भाषा में सुंदर रचनाएँ लिखती थीं।
इस तरह सरोजिनी को बचपन में ही ज्ञान, विज्ञान और साहित्य की विरासत मिली थी। उनके घर पर देश-विदेश और सभी धर्म के विद्वानों का आना-जाना लगा रहता था। इसी वातावरण का परिणाम था कि उनपर बचपन से ही धार्मिक सहिष्णुता के संस्कार हुए और उन्होंने उर्दू, तेलुगु, अंग्रेज़ी, बांग्ला और हिंदी जैसी कई भाषाओं में माहिरी भी हासिल कर ली। कविता के प्रति उनके प्रेम की शुरुआत भी यहीं से हुई।
सरोजिनी नायडू बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान थीं। उन्होंने सिर्फ़ 12 साल की उम्र में सर्वोच्च रैंक के साथ मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर हैदराबाद के निज़ाम ने उन्हें विदेश में पढ़ाई करने के लिए स्कॉलरशिप प्रदान की। 16 वर्ष की उम्र में वे इंग्लैंड चली गईं। उन्होंने पहले लंदन के किंग्स कॉलेज और बाद में कैम्ब्रिज के गिर्टन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। इंग्लैंड में रहते हुए ही उनकी पहचान एडमंड गॉस और आर्थर सिमंस जैसे उस दौर के प्रसिद्ध अंग्रेज़ी कवियों से हुई, जिन्होंने सरोजिनी की काव्य प्रतिभा को निखारने में काफ़ी सहायता की।
शुरुआत में सरोजिनी अंग्रेजी कवियों के प्रभाव में पश्चिमी विषयों पर कविताएँ लिखती थीं। लेकिन एडमंड गॉस ने उन्हें सलाह दी कि वे अपनी कविताओं में भारत सभ्यता और लोकजीवन को स्थान दें। इसके बाद सरोजिनी की कविताओं में मानो भारत का विश्वरूप दर्शन होने लगा। उनका पहला कविता संग्रह ‘द गोल्डन थ्रेशोल्ड’ 1905 में लंदन में प्रकाशित हुआ, जिसने उन्हें भारत तथा विदेश में एक महत्त्वपूर्ण कवयित्री के रूप में स्थापित किया। गौरतलब है कि इससे पहले किसी भारतीय कवि को विदेश में इतनी प्रसिद्धि नहीं मिली थी। (टैगोर की गीतांजलि अभी नहीं आई थी, वह 1910 में प्रकाशित हुई।) उनका दूसरा कविता संग्रह, ‘द बर्ड ऑफ टाइम’ 1912 में तथा उनका तीसरा कविता संग्रह ‘द ब्रोकन विंग’ 1917 में प्रकाशित हुआ। उनकी कविताओं में भारत की व्यापक विविधता का अत्यंत मोहक दर्शन मिलता है। भारतीयता और मधुरता से ओतप्रोत उनकी कविताओं को पढ़कर ही महात्मा गाँधी ने उन्हें बुलबुल-ए-हिंद (Nightingale of India) कहा था। ये तो हुई उनकी कविताओं की बात, अब आगे उनके जीवन के अन्य पहलुओं को समझते हैं।
आज़ादी और महिला अधिकारों की बुलंद आवाज़
सरोजिनी नायडू अपने समय से सदियों आगे थीं। 1898 में जब वे लंदन से भारत लौटीं तो उन्होंने डॉ. मुथ्याला गोविंदराजुलु नायडू से प्रेम विवाह किया। डॉ. नायडू गैर-बंगाली थे और दूसरी जाति के थे। जरा सोचिए आज भी जहाँ भारतीय समाज पर जाति की जकड़ इतनी मज़बूत है तो सवा सौ साल पहले क्या स्थिति रही होगी? भले ही सरोजिनी और डॉ. नायडू के घरवाले इस विवाह के लिए राज़ी थे, लेकिन उस वक्त की सामाजिक स्थिति में यह फ़ैसला क्रांतिकारी ही था।
लंदन से लौटने के बाद धीरे-धीरे सरोजिनी नायडू की रुची भारतीय राजनीति और समाजसेवा में बढ़ने लगी। 1902 के आसपास उनकी मुलाकात गोपाल कृष्ण गोखले से हुई। गोखले ने उन्हें अपने राजमहल से निकलने और अपने आप को भारत माता की सेवा में समर्पित करने की सलाह दी। गोखले की सलाह पर उन्होंने राजनीति में कदम रखा। आगे 1914 में उनकी मुलाकात महात्मा गाँधी से हुई। गाँधी के चंपारण सत्याग्रह ने उनको इतना प्रेरित किया कि उन्होंने अपने आपको पूरी तरह स्वतंत्रता संग्राम में झोंक दिया। 1917 में उनका तीसरा कविता संग्रह प्रकाशित हुआ और उसके बाद अगले 32 साल तक उन्होंने कोई खास कविताएँ नहीं लिखीं और एक तरह से देशप्रेम के लिए अपने बचपन से संजोए काव्यप्रेम को तिलांजलि दे दी। अब तक राष्ट्रीय पटल पर सरोजिनी एक प्रभावशाली नेता के रूप में उभर चुकी थीं। 1915 से 1918 के बीच उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया और युवाओं तथा महिलाओं में राष्ट्रवाद की अलख जगाई। उन्होंने छुआछूत और महिला निरक्षरता जैसी सामाजिक कुरीतियों पर भी कड़ा प्रहार किया।
महिलाओं की शिक्षा और समान अधिकार के लिए सरोजिनी ने आजीवन भरसक प्रयास किए। 1917 में एनी बेसेंट द्वारा भारतीय महिला संघ (WIA) की स्थापना में उनका अहम योगदान रहा। मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड से लेकर कांग्रेस की विशेष सभा तक और लंदन से लेकर बॉम्बे (अब मुंबई) तक हर मंच पर सरोजिनी नायडू ने महिला मताधिकार की ज़ोरदार वकालत की। उनका कहना था कि महिलाओं की आज़ादी के बिना भारत सही मायने में आज़ाद नहीं हो सकता।
सरोजिनी नायडू के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ आया 1925 में, जब वे राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं (उनसे पहले एनी बेसेंट अध्यक्ष बनी थीं, लेकिन वे भारतीय मूल की नहीं थीं)। इस पद तक पहुँच कर उन्होंने न सिर्फ़ राष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रभाव साबित किया, बल्कि यह भी दिखा दिया कि भारतीय महिलाएँ भी राष्ट्र का नेतृत्व करने में सक्षम हैं। करोड़ों भारतीय महिलाओं के लिए वे एक जीता-जागता प्रेरणा स्रोत बन गईं। गाँधीजी के अहिंसा और सत्याग्रह जैसे तरीकों ने जहाँ महिलाओं के लिए स्वतंत्रता आंदोलन के दरवाजे खोले, वहीं सरोजिनी नायडू जैसी नायिकाओं ने बड़े पैमाने पर महिलाओं को प्रत्यक्ष रूप से आंदोलन में शामिल किया।
1930 का नमक सत्याग्रह (दांडी यात्रा) भारतीय इतिहास की एक युगांतरकारी घटना थी। दांडी में नमक उठाने के बाद गाँधी धरसाना जाने वाले थे, लेकिन उससे पहले ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। तब उन्होंने इस आंदोलन की कमान सरोजिनी नायडू को सौंपी। एक महिला को आंदोलन का नेतृत्व सौंपे जाने पर पहले तो कुछ नेता नाराज़ हो गए, पर बाद में यही आंदोलन ऐतिहासिक साबित हुआ। ब्रिटिश पुलिस के बेरहम लाठीचार्ज और अत्याचार के सामने सरोजिनी और उनके साथी अडिग खड़े रहे। उनकी इस वीरता की खबर दुनिया भर के सैकड़ों अखबारों में छपी, जिससे ब्रिटिश हुकूमत की वैश्विक स्तर पर छी थू हुई। दूसरी ओर, इस आंदोलन ने स्वतंत्रता सेनानियों के पूर्ण स्वराज के इरादों को कई गुना मज़बूत कर दिया। 1931 में सरोजिनी दूसरी गोलमेज परिषद में भारतीय महिलाओं की प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुईं। यहाँ भी उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के साथ-साथ महिला अधिकारों की पुरजोर वकालत की। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वे कई बार जेल भी गईं। 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में शामिल होने पर उन्हें गिरफ्तार करके पुणे के आगा खान पैलेस में 21 महीनों तक नज़रबंद रखा गया। इस दौरान गाँधीजी भी यहीं नज़रबंद थे।
महिला अधिकारों पर भूमिका: आलोचना और वास्तविकता
Geraldine Forbes जैसे इतिहासकारों ने सरोजिनी नायडू की उस भूमिका पर आलोचना की है, जो वे महिला अधिकारों के लिए अपनाती हैं। Geraldine अपनी किताब Women in Modern India में कहते हैं कि महिला अधिकारों की माँग करते समय वे महिलाओं को पुरुषों के बराबर खड़ा करने के बजाय उन्हें ‘पारंपरिक और आज्ञाकारी भारतीय नारी’ के रूप में दिखाती हैं। वे अपने भाषणों में अक्सर पुरुषों के अनुभव और ज्ञान की प्रशंसा करती हैं, जिससे ऐसा लगता है कि वे महिलाओं के लिए समानता के बजाय रियायतें माँग रही हैं। वे महिलाओं के लिए अधिकार भी यह कहकर माँगती थीं कि इससे वे बेहतर माँ बन सकेंगी और राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकेंगी।
उदा. साल 1918 में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में (बॉम्बे) जब उन्होंने ने महिला मताधिकार की माँग रखी, तब उसे यह कहकर विरोध किया गया कि अगर महिलाएँ राजनीति में उतरीं तो उनकी की गरिमा कम हो जाएगी (politics would make women less feminine)। इसके ज़वाब में नायडू कहती हैं:
“Never, never, for we realize that men and women have their separate goals, separate destinies and that just as man can never fulfill the responsibility or the destiny of a woman, a woman cannot fulfill the responsibility of man... We ask for the vote, not that we might interfere with you in your official functions, your civic duties, your public place and power, but rather that we might lay the foundation of national character in the souls of the children that we hold upon our laps, and instill into them the ideals of national life.”
दरअसल, सरोजिनी नायडू की यह भूमिका कमज़ोरी नहीं बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति थी। इसे समझने के लिए उस समय के राजनीतिक हालात और पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता को समझना चाहिए। भारत में उस समय पुरुष समाज इस बात से डरा हुआ था कि यदि महिलाओं को अधिकार मिले, तो वे विलायती औरतों जैसी निरंकुश हो जाएँगी और परिवार टूट जाएँगे। वैसे भी पुरुष, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं से ज़्यादा असुरक्षित महसूस करते हैं (यही बात वर्जिनिया वुल्फ़ ने भी कही है)। सरोजिनी पुरुषों की इस भावना को भलीभाँती जानती थीं। वे यह भी जानती थीं कि अगर उन्होंने आक्रामक रुख अपनाया, तो कांग्रेस और मुस्लिम लीग के रूढ़िवादी नेता उनके खिलाफ़ हो जाएँगे और फिर महिलाओं को मताधिकार मिलना और भी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए शायाद उन्होंने महिला अधिकारों की माँग को कुछ इस तरह से पेश किया कि वह पुरुषों को खतरे के बजाय उनसे माँगा गया ‘उपहार’ या ‘उपकार’ लगे।
ज़रूरी नहीं कि सरोजिनी नायडू की इस भूमिका से हम सभी सहमत हों। लेकिन उन्होंने यह दृष्टिकोण क्यों अपनाया ये समझने के लिए उस दौर के हालातों को समझना और अपने आप को वहाँ रखकर सोचना ज़रूरी है। और ये भी ज़रूरी है कि हम उनका मूल्यांकन सिर्फ़ उनके शब्दों से नहीं, उनके कर्मों से करें। कहने को तो वे भले ही कहती थीं कि हमें तो बस मताधिकार चाहिए, हम ज़्यादा कुछ नहीं माँगेगे वगैरह, लेकिन वास्तव जीवन में तो वे हर मोर्चे का नेतृत्व करती थीं, हर महफ़िल का केंद्र होती थीं और अपने आप को किसी भी पुरुष से रत्तीभर भी कम नहीं समझती थीं।
एकता और ज़िंदादिली का प्रतीक
सरोजिनी नायडू के व्यक्तित्व का दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण पहलू था हिंदू-मुस्लिम एकता। उनकी परवरिश हैदराबाद की उस गंगा-जमूनी तहजीब में हुई थी, जहाँ संस्कृतियों का मिलन स्वाभाविक था। पाकिस्तान में भारत के राजदूत रहे टी.सी.ए. राघवन की किताब‘Circles of Freedom’ में इस बात का विस्तार से वर्णन मिलता है। सरोजिनी मानती थीं कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है और यदि ये दो बड़े समुदाय एक साथ नहीं आते, तो स्वराज का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता। 1916 के लखनऊ समझौते में उनकी भूमिका एक सेतु की तरह थी, जिसने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को एक मंच पर लाने का काम किया।
राघवन की किताब से हमें यह भी पता चलता है कि सरोजिनी नायडू कितनी ज़िंदादिल और मिलनसार थीं। वे हमेशा दोस्तों से घिरी रहती थीं। 1913-14 के दरमियान जब वे इलाज के लिए लंदन गईं तभी उनकी पहचान असफ़ अली, सैयद महमूद और सैयद हुसैन जैसे युवा राष्ट्रवादियों से हुई। तब से वे इन युवाओं की मार्गदर्शक और बड़ी बहन (आक्का) ही बन गईं। वे न केवल उन्हें राजनीति के गुर सिखाती थीं, बल्कि उनके व्यक्तिगत संकटों में भी उनके साथ खड़ी रहती थीं। एक तरफ़ वे महात्मा गांधी जैसी महान हस्ती की करीबी सलाहकार रहीं, वहीं दूसरी तरफ़ असफ़ अली जैसे युवा नेताओं की प्रेरणा।
सरोजिनी के बारे में एक और गौरतलब बात यह है कि उनकी तबीयत अक्सर खराब रहती थी। लेकिन उन्होंने कभी इस कमज़ोरी को अपने काम के बीच आने नहीं दिया। 1943 में जब वे आगा खान पैलेस में नज़रकैद थीं, तब उनकी सेहत बहुत ज़्यादा खराब हो गई थी। इसी दौरान गाँधी ने भी 21-दिनों का अनशन शुरू कर दिया था। ऐसे में अगर सरोजिनी को कुछ हो जाता तो लोक विद्रोह का बड़ा खतरा ब्रिटिश सरकार को साफ़ नज़र आ रहा था। इसी खतरे से डरकर उन्होंने सरोजिनी को छोड़ने का निर्णय लिया। तब उन्होंने सरकार को लिखा,
“All my life I have been in poor health and there is therefore no special need for special anxiety on that score . . . It is clearly my duty as well as earnest desire to be with Mahatma Gandhi and render him every assistance in my power. I could not on moral grounds justify to myself the unseemliness of taking advantage of purely technical reasons however valid”
सरोजिनी ने भारत को वैश्विक स्तर पर एक महान और ज़िम्मेदार देश के रूप में पेश किया। आज़ादी के ठीक पहले 1947 में दिल्ली में ‘एशियाई रिलेशन्स कॉन्फ्रेंस’ का आयोजन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता सरोजिनी नायडू ने की थी। इस सम्मेलन में उन्होंने विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों को जिस तरह से संबोधित किया, उसने भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को एक नई ऊँचाई दी। उनके भाषण में एशियाई देशों ने भारतीय नेतृत्व की क्षमता और विद्वत्ता की झलक पाई।
अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ। सरोजिनी नायडू आज़ाद भारत की पहली महिला राज्यपाल बनीं। तत्कालीन संयुक्त प्रांत (आज के उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड) की राज्यपाल के रूप में शपथ लेते हुए उन्होंने दुनिया के सभी देशों से आह्वान किया:
“We are reborn today out of the crucible of our sufferings, Nations of the world, I greet you in the name of India, my mother, my mother whose home has a roof of snow, whose walls are of living seas, whose doors are always open to you. Do you seek shelter or succor, do you seek love or understanding, come to us. Come to us in faith, come to us in hope, come to us believing that all gifts are ours to give. I give for the whole world the freedom of this India, that has never died in the past, that shall be indestructible in the future, and shall lead the world to ultimate peace.”
संयुक्त प्रांत के राज्यपाल का ओहदा संभालने पर, ब्रिटिश काल में जिस राजभवन में आम जनता कदम तक नहीं रख सकती थी, उसके दरवाजे उन्होंने आम जनता के लिए खोल दिए। सरोजिनी ने अपने काम में लोकतांत्रिक पद्धति और पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित भी की। लेकिन 1948 में हुई महात्मा गाँधी की हत्या ने उन्हें भीतर बहुत ही गहरी चोट पहुँचाई। इसके बाद उनकी तबीयत धीरे-धीरे और खराब होने लगी। आखिरकार, 2 मार्च 1949 को भारत की इस बुलबुल-ए-हिंद ने अपने प्यारे भारतवासियों को हमेशा के लिए अलविदा कहते हुए अंतिम साँस ली।
सरोजिनी नायडू की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा,
“The captains and kings of my generation depart, old friends and dear comrades pass away, and now the dearest and brightest of them is gone. I feel desolate of heart and willowed in spirit. Though Sarojini Devi’s strength ebbed out, her indomitable spirit held aloft. Men and women of this country, have you, the spirit to carry the torch and hold it aloft? May It be given to us to give India what she gave.”
इसी तरह सरदार पटेल भी उनके जाने से बहुत आहत हुए। उनकी यादों को उन्होंने कुछ इन शब्दों में बयाँ किया:
“I am deeply grieved to hear of Mrs. Naidu’s death.... It is difficult to reconcile oneself to the loss of that familiar figure always bubbling with good spirits and full of life and laughter. Her presence in any room or gathering was as though several candles had been suddenly lit; wherever she went she shed a light and lustre which could penetrate through the darkest gloom. The charm of her personality and the magic of her words endeared her to millions to whom she was aptly known as ‘The Nightingale of India’. Alas, we shall miss that silvery voice, those expressive eyes and those meaningful gestures which added such emotional appeal to her words. During our long struggle for freedom, she represented in her person the grim determination and the heavy sacrifices of Indian womanhood.”
सरोजिनी नायडू के व्यक्तित्व की झलक पाने के लिए आप उनका 1946 में संविधान सभा दिया गया भाषण सुन सकते हैं। इसमें न केवल उनकी ज़िंदादिली और प्रभाव की झलक मिलती है, बल्कि यह भी देखने को मिलता है कि किस तरह जब वे अपने आप को एक अदनी सी औरत कहती हैं तो पूरा सभागृह हँस पड़ता है, क्योंकि उन सभी को पता है कि यह बिल्कुल भी कोई दबी-कुचली महिला नहीं हैं, बल्कि एक बॉस औरत है।
अफ़सोस की बात तो यह है कि हमने उनके इतने कामों को भुलाकर, उन्हें बस एक कवयित्री के रूप में याद रखा!
—परीक्षित सूर्यवंशी
1946 - Dr. Sarojini Naidu’s Constituent Assembly Speech
PRE-BOOK पुलियाबाज़ी मैगज़ीन मार्च 2026
पुलियाबाज़ी मैगज़ीन मार्च 2026 कुछ ही दिनों में आ रही है और इसकी Pre-booking शुरू हो गई है। इस बार की थीम Rule of Law यानी कानून का राज है। इस अंक में आप कानून के राज के अलग-अलग पहलुओं पर विशेषज्ञों के लेख पढ़ पाएँगे, जिनमें शामिल हैं Trilegal के संस्थापक अक्षय जेटली, प्रसिद्ध रिसर्चर और लेखक ओर्नित शनी और रोहित डे, पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट अमेय नाइक आदि।
अपनी कॉपी आज ही बुक करें:
We welcome articles/blogs/experiences from our readers and listeners. If you are interested in getting your writing featured on Puliyabaazi, please send us your submissions at puliyabaazi@gmail.com. Check out this article for submission guidelines.



