सच्चे नारीवाद की शर्तें । Fundamentals of Feminism
Understanding feminism through Virginia Woolf’s ‘A Room of One’s Own’
फेमिनिज़्म यानी नारीवाद की बात जब भी निकलती है तो ज़्यादातर पुरुष मुँह मोड़ लेते हैं। उन्हें लगता है कि नारीवाद तो सिर्फ़ महिलाओं के लिए है, इसका पुरुषों से क्या लेना-देना? कई पुरुष ही नहीं, यहाँ तक कि महिलाएँ भी इसे पुरुष-विरोधी समझ लेती हैं। ज़ाहिर है, इन्हें न नारीवाद पता है, न ही वास्तविकता। सच कहूँ तो कुछ साल पहले तक नारीवाद के बारे में मैं भी नहीं था। लेकिन कुछ अच्छे लोगों का लिखा पढ़ने का मौका मिला और कई भ्रम दूर हुए।
नारीवाद जितना महिलाओं के लिए ज़रूरी है, उससे भी ज़्यादा पुरुषों के लिए ज़रूरी है। क्यों? क्योंकि यह हम सभी को लिंग-आधारित पहचान से ऊपर उठकर इंसान बनना सिखाता है। अगर आप भी सच्चा नारीवाद समझना चाहते हैं, तो सौ साल पहले लिखी गई, वर्जिनिया वुल्फ की यह किताब ज़रूर पढ़िए, जिसका नाम है: ‘A Room of One’s Own’.
वर्जिनिया वुल्फ 20वीं सदी के महान लेखकों में से एक थीं। वे अपने आधुनिकतावादी विचारों के लिए जानी जाती हैं। साल 1929 में प्रकाशित हुई ‘A Room of One’s Own’ उनकी सबसे प्रसिद्ध किताबों में से एक है। इस किताब को नारीवाद के बुनियादी दस्तावेजों में से एक माना जाता है। दरअसल, यह किताब वुल्फ के दो भाषणों पर आधारित है जो उन्होंने अक्तूबर 1928 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के दो महिला कॉलेजों में दिए थे।
वर्जिनिया जब कॉलेज में गईं, तब उन्हें भाषण के लिए विषय दिया गया था ‘Women and Fiction’। इसी धागे को पकड़कर उन्होंने यह पूरा निबंध लिखा है। इसमें वे दिखाती हैं कि किस प्रकार यह पुरुष-प्रधान समाज सदियों से, जाने-अनजाने में, पुरुषों के लिए ही चीज़ें बनाता आ रहा है। (ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी को भी महिलाओं के लिए कॉलेज शुरू करने में कई सदियाँ लगीं।) पुरुषों को महिलाओं का ख़याल कभी आया नहीं और ख़याल आकर भी महिलाएँ कुछ कर नहीं पाई क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे। अगर महिलाओं को कुछ करना है तो उनके पास आर्थिक और मानसिक आज़ादी होना बहुत ज़रूरी है। इसे वे कुछ इस प्रकार कहती हैं, जो इस किताब का मुख्य संदेश है और सबसे प्रसिद्ध कोट भी:
“A woman must have money and a room of her own if she is to write fiction.”
अपना तर्क साबित करने के लिए कोई रूखा भाषण देने के बजाय, वे एक काल्पनिक कहानी सुनाती हैं और वास्तविकता को इतने तटस्थ रूप से पेश करती हैं कि पढ़नेवाला उनसे सहमत हुए बगैर रह नहीं सकता। किताब की शुरुआत एक काल्पनिक पात्र मैरी बेटन से होती है, जो एक कॉलेज में गई हैं। यहाँ उनके साथ पग-पग पर भेदभाव होता है। अपनी ही सोच में डुबी वे किसी घास पर चलने लगती हैं, तो गुस्से से भरा चौकीदार उतरने का इशारा करता है। घास पुरुषों के लिए है, महिलाओं के लिए कंकड़वाला रास्ता है। वे लाइब्रेरी में जाने की कोशिश करती हैं, तो दूर से ही उन्हें रोक दिया जाता है क्योंकि बिना किसी पुरुष के साथ या बिना सिफ़ारिश पत्र के महिलाओं का वहाँ प्रवेश वर्जित है। इतना ही नहीं, पुरुषों और महिलाओं का खाना भी बिल्कुल अलग-अलग है।
इस किताब की खासियत यह है कि इसके काल्पनिक उदाहरण भी वास्तविकता पर आधारित हैं। मतलब इसके पात्र भले ही काल्पनिक हों, लेकिन उस दौर में महिलाओं के साथ बिल्कुल ऐसा ही व्यवहार होता था। महिलाओं को कुछ कर पाने के लिए आर्थिक आज़ादी इतनी ज़रूरी क्यों है, यह बताने के लिए लेखिका अपनी खुद की कहानी भी सुनाती हैं। वे कहती हैं कि हाल ही में उनकी एक मौसी से उन्हें विरासत में हर साल के 500 पाउंड मिलने लगे हैं। इन पैसों की वजह से अब उन्हें पहले जैसे छोटे-मोटे काम नहीं करने पड़ते और वे लिखने को समय दे पाती हैं। जब उन्हें विरासत का खत मिला, उसी समय ब्रिटेन में महिलाओं को वोट देने का अधिकार भी मिला था। इस पर वे कहती हैं:
“Of the two—the vote and the money—the money, I own, seemed infinitely the more important.”
पहले तो यह बात मुझे चौंकानेवाली लगी। वोट से ज़्यादा पैसा? एक बार तो आजकल के चुनाव भी याद आ गए! लेकिन फिर उनका पूरा स्पष्टीकरण पढ़ा और अपनी ही नासमझी समझ में आई। वे जिस दौर की बात कर रही थीं, वह 1918 का दौर था। उस समय महिलाओं को बहुत छोटे और हल्के काम दिए जाते थे। उन्हें भी ऐसे ही छोटे-मोटे काम करके अपना गुज़ारा करना पड़ता था। न सोचने का समय मिलता था, न ही लिखने का। किसी लेखक या कलाकार की प्रतिभा पर इस तरह जंग लगना, उसके लिए जीते जी मरने जैसा होता है। इसलिए तो वे कहती हैं कि इन पैसों ने उन्हें डर और कड़वाहट से आज़ादी दी। अब उन्हें किसी पुरुष की खुशामद नहीं करनी पड़ती, न झूठ बोलना पड़ता है और न ही किसी के लिए दिल में नफ़रत पैदा होती है। इन 500 पाउंड ने उन्हें सोचने और लिखने की आज़ादी दी। याद रहे, वुल्फ यहाँ सिर्फ़ शारीरिक गुलामी से ही नहीं, बल्कि मानसिक गुलामी से भी छुटकारे की बात कर रही हैं। इसके बारे में हम आगे और बात करेंगे।
इससे पहले देखते हैं इतिहास का वह उदाहरण, जो इस किताब का सबसे मार्मिक हिस्सा है। क्या आपने कभी सोचा है कि इतिहास में कोई महिला शेक्सपियर क्यों नहीं हुई? मान लीजिए कि विलियम शेक्सपियर की एक बहन थी, जुडिथ शेक्सपियर। जुडिथ भी उतनी ही प्रतिभावान थी जितना विलियम। विलियम स्कूल गया, उसने लैटिन सीखी, लंदन जाकर थिएटर में काम किया और महान बना। लेकिन जुडिथ के साथ क्या हुआ होगा? जुडिथ को घर पर रखा गया, उसने पढ़ना चाहा, तो उसे झिड़का गया और घर के काम करने को कहा गया। जब उसकी जबरन शादी तय की गई, तो वह भी विलियम की तरह भागकर लंदन गई, लेकिन वहाँ उसे उपहास और अत्याचार के अलावा कुछ नहीं मिला। आखिरकार, अपनी प्रतिभा को दबाते-दबाते वह पागल हो गई और एक सर्दी की रात उसने आत्महत्या कर ली।
लेखिका का यह थॉट एक्सपेरिमेंट हमें झकझोर देता है। वे कहती हैं कि इतिहास में जितनी भी अनाम कविताएँ या कहानियाँ हैं, उनमें से कई किसी महिला ने ही लिखी होंगी जो अपना नाम सामने नहीं ला सकती थी।
“When, however, one reads of a witch being ducked, of a woman possessed by devils, of a wise woman selling herbs, or even of a very remarkable man who had a mother, then I think we are on the track of a lost novelist, a suppressed poet, of some mute and inglorious Jane Austen, some Emily Bronte who dashed her brains out on the moor or mopped and mowed about the highways crazed with the torture that her gift had put her to. Indeed, I would venture to guess that Anon, who wrote so many poems without signing them, was often a woman.”
यह पढ़ते हुए आँखों में नमी आ गई और सोचा कितनी प्रतिभाएँ सिर्फ़ इसलिए दम तोड़ गईं क्योंकि उनके पास पैसा और सामाजिक आज़ादी नहीं थी। सबसे दुखद बात तो यह है कि यह तस्वीर आज भी पूरी तरह बदली नहीं है।
वर्जिनिया ने पुरुषों की मानसिकता पर भी एक कड़ा प्रहार किया है। वे कहती हैं कि सदियों से महिलाएँ पुरुषों के लिए एक जादुई आईने की तरह रही हैं, जिसमें पुरुष खुद को अपने असली कद से दोगुना बड़ा देखते हैं। वे हमेशा अपने आप को आसपास की आधी आबादी से श्रेष्ठ मानते हैं और यही मान्यता उनमें आत्मविश्वास भर देती है। अगर यह आईना हटा दिया जाए, अगर महिलाएँ सच बोलने लगें, तो पुरुषों की दुनिया हिल जाती है। इसीलिए तो किसी पुरुष की अपेक्षा, महिला की आलोचना पुरुष को कई गुना ज़्यादा आहत करती है।
लेकिन यहीं वुल्फ हमें आगाह करती हैं कि हमें अपने आप को क्रोध के हवाले भी नहीं करना चाहिए। जिस पर सदियों से अन्याय हुआ है उसे गुस्सा आना स्वाभाविक है। लेकिन अगर यही गुस्सा उसकी रचना में उतर आता है, तो वह कभी महान नहीं बन सकती। यह भी एक तरह की मानसिक गुलामी है। वे कहती हैं कि एक लेखिका जब इस गुलामी से छुटकारा पा लेती है, तभी उसकी कलाकृति सही मायने में दीप्तिमान (Incandescent) हो सकती है। खास बात यह है कि इस पूरी किताब में वर्जिनिया में वह नफ़रत कहीं नहीं दिखती।
किताब के अंत में वे एक बहुत ही गहरा विचार पेश करती हैं। वे कहती हैं कि एक महान मस्तिष्क एंड्रोजिनस (Androgynous) यानी उभयलिंगी होता है, जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों तत्व पूर्ण रूप से विकसित होते हैं। ऐसा मस्तिष्क, स्त्री और पुरुष दोनों की दृष्टि से सोचता है और एक परिपूर्ण रचना बनाता है। लेखिका का मानना है कि शेक्सपियर का मस्तिष्क ऐसा ही था। वे स्त्री या पुरुष होकर नहीं लिखते थे। वे बस लिखते थे। वे कहती हैं कि जब हम सिर्फ़ अपने जेंडर के चश्मे से दुनिया को देखते हैं, तो हमारी रचना अधूरी रह जाती है। सच्चे सृजन के लिए मस्तिष्क के दोनों हिस्सों का मिलन ज़रूरी है।
यह किताब पढ़कर मेरे दिल में कई ख़याल आए, महिलाओं तथा समाज के कमज़ोर तबकों पर होने वाले अन्याय से लेकर आज़ादी के कई अर्थ और द्वेषरहित जीवन की अहमियत तक। उम्मीद है, आपको भी यह छोटी सी किताब बहुत कुछ दे पाएगी।
अंत में, हम सभी को वर्जिनिया वुल्फ की यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए:
“Now my belief is that this poet (Judith Shakespeare) who never wrote a word and was buried at the cross–roads still lives. She lives in you and in me, and in many other women who are not here to–night, for they are washing up the dishes and putting the children to bed. But she lives; for great poets do not die; they are continuing presences; they need only the opportunity to walk among us in the flesh. (…) But I maintain that she would come if we worked for her, and that so to work, even in poverty and obscurity, is worth while.”
—परीक्षित
वर्जिनिया वुल्फ की किताब आप यहाँ पढ़ सकते हैं: A Room of One’s Own
पुलियाबाज़ी मैगज़ीन से
सिर्फ़ लड़ी नहीं, लिखी भी गई थी आज़ादी
—अरुण जी
कल्पना कीजिए कि ब्रिटिश राज के खिलाफ़ 1857 का सिपाही विद्रोह सफल हो जाता। हालाँकि यह एक कोरी कल्पना है। और इसका सफल होना लगभग असंभव था, फिर भी अगर हम कुछ समय के लिए यह मान भी लें कि भारत की आज़ादी की उस पहली लड़ाई में हम जीत जाते और अंग्रेज़ हार जाते तो कैसी होती हमारी आज़ादी? जनता के लिए उस आज़ादी का मतलब क्या होता?
उत्तर स्पष्ट है। हमारी आज़ादी उस वक्त वही होती, जो किसी राजा के आधीन उसकी प्रजा को मिलती है। आज़ादी का स्वरूप वह नहीं होता, जो हमें 1947 के बाद एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना के बाद मिला। हम किसी देसी राजा या नवाब के चंगुल में होते।
1857 से 1947 के बीच भारत में राजतंत्र से लोकतंत्र की इस यात्रा में आज़ादी की परिकल्पना और उसके स्वरूप में आमूल परिवर्तन हुए। आज़ादी के बीज को बोने, उसे सिंचित करने और उसे जन-जन तक पहुँचाने में लेखकों का अहम योगदान रहा। अलग-अलग भाषा, अलग-अलग क्षेत्र के लेखकों ने अपनी लेखनी से लोगों में जागरूकता पैदा की। समाज में व्याप्त रूढ़ियों को उजागर किया, लोगों को आईना दिखाया और लोकतांत्रिक विमर्श को एक मुकाम तक पहुँचाया।
19वीं सदी के शुरुआती दौर के अग्रणी लेखकों में सबसे पहला नाम हेनरी लुई विवयन डीरोज़िओ (Henry Louis Vivian Derozio) का आता है। बंगाल के बौद्धिक क्षितिज पर डीरोज़िओ का कार्यकाल छोटा ज़रूर था, लेकिन युवाओं पर उनका प्रभाव काफ़ी गहरा पड़ा। 1826 में महज़ 17 वर्ष की आयु में उन्होंने हिंदू कॉलेज (बाद में प्रेसीडेंसी कॉलेज) में अंग्रेज़ी साहित्य व इतिहास के प्राध्यापक के रूप अपना करियर शुरू किया। तब तक कलकत्ता में कवि और लेखक के रूप में उनकी पहचान बन चुकी थी। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘इंडिया माइ नेटिव लैंड’ राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अंग्रेज़ी की पहली कविता मानी जाती है।
डीरोज़िओ की यह कविता भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखने का शुरुआती प्रयास है। भारत उस समय इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, रूस जैसे किसी भी अन्य यूरोपीय देश से बिल्कुल भिन्न था। उसे एक राष्ट्र के रूप में देखना मुश्किल था। उसके राजनीतिक एकीकरण का बस एक ही आधार था और वह था—ब्रिटिश राज, जो देश के एक बड़े भूभाग को एक सूत्र में जोड़ता था।
ब्रिटिश राज की सत्ता का केंद्र था- बंगाल। कलकत्ता उसकी राजधानी थी। यूरोप में हो रहे राजनीतिक और सामाजिक बदलाव की हवा कलकत्ता सबसे पहले पहुँचती थी। पंद्रहवीं शताब्दी में प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना के बाद से यूरोप में आधुनिक विचारों का संचार तेज़ी से हो रहा था। आज़ादी, समानता, भाईचारा जैसे विचारों ने अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम एवं फ्रांसीसी क्रांति को जन्म दिया था। उनका प्रभाव बंगाल के बुद्धिजीवियों पर भी पड़ रहा था। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से वे इन विचारों से अवगत हो रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में बंगाल में नवजागरण की शुरुआत हो रही थी। भारत के लिए भी यह नवजागरण का आगाज़ था।
हेनरी डीरोज़िओ उसी नवजागरण की पहली आवाज़ बन कर उभरे थे। हिंदू कॉलेज के छात्रों के बीच वे काफ़ी लोकप्रिय थे। क्लासरूम के अंदर और क्लासरूम के बाहर भी, वे छात्रों का मार्गदर्शन करते थे। जीवन व समाज से जुड़े मुद्दों पर वे उन्हें तर्क एवं विवेक के प्रयोग के लिए प्रेरित करते थे। उन्होंने एकेडमिक एसोसिएशन नामक एक संस्था की स्थापना की, जिसके तहत छात्र किसी भी विषय पर विमर्श, वाद-विवाद कर सकते थे।
विडम्बना यह है कि इन्हीं कारणों से डीरोज़िओ रूढ़िवादी शक्तियों की आँखों में खटकने लगे। 1831 में कॉलेज के मैनेजमेंट ने उन्हें प्राध्यापक के पद से त्यागपत्र देने के लिए बाध्य कर दिया। छात्रों को ग़लत शिक्षा प्रदान करने के जो आरोप उन पर मढ़े गए थे, वे बिल्कुल निराधार थे। कॉलेज मैनेजमेंट के प्रतिनिधि डॉ. एच एच विल्सन और डीरोज़िओ के बीच हुए पत्राचार को पढ़कर समझ में आता है कि किस तरह डीरोज़िओ अपने प्रगतिशील विचारों की बलि चढ़ गए। छात्रों को हमेशा वे अपनी खुद की सोच विकसित करने के लिए प्रेरित करते थे। किसी भी विषय पर वे अपने विचार को थोपते नहीं थे। 1831 की ये घटना कट्टरता की आधुनिकता पर जीत थी।
कॉलेज की नौकरी छोड़ने के आठ महीने के अंदर ही हैजा से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके छात्रों ने कई पत्र-पत्रिकाओं की शुरुआत की। डीरेज़ियन्स के नाम से प्रसिद्ध इन्हीं छात्रों ने यंग बंगाल आन्दोलन की शुरुआत की।
बंगाल के युवाओं में आज़ादी के बीज का संचार करने वाला और भारत की राष्ट्रीयता को अपनी कविताओं में प्रस्तुत करने वाला यह लेखक धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया। 1923 में उन्हें फिर से प्रकाश में लाने का श्रेय जाता है फ्रांसिस ब्रैडली बर्ट नामक एक ब्रिटिश लेखक को, जो भारतीय प्रशासनिक सेवा में लम्बे समय तक कार्यरत रहे थे। उन्होंने डीरोज़िओ की चुनिंदा कविताओं को एक किताब की शक्ल में प्रकाशित करवाया। इसमें विल्सन के साथ हुए पत्राचार के अलावा ब्रैडली ने विस्तार से डीरोज़िओ के बारे में लिखा है। किताब का शीर्षक है ‘Poems of Henry Louis Vivian Derozio: A Forgotten Anglo-Indian Poet’।
हेनरी डीरोज़िओ अपनी कविताओं में राष्ट्र की छवि को उस वक्त ढूंढ़ रहे थे, जब भारत में राष्ट्र की परिकल्पना अपने शैशव काल में थी। भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में महाराजा रंजीत सिंह का साम्राज्य था। दिल्ली, लखनऊ, हैदराबाद, ग्वालियर जैसे प्रदेशों में ब्रिटिश राज का प्रभुत्व ज़रूर था, पर औपचारिक रूप से सत्ता अभी भी नवाबों, राजाओं के आधीन थी…
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