भारत आज भी एक कृषि-प्रधान देश माना जाता है। आज भी भारत की लगभग आधी आबादी खेती-किसानी पर ही निर्भर है, जबकि विकसित देशों में यह संख्या सिंगल डिजिट तक कम हो गई है। हरित-क्रांति, सरकारी सब्सिडी, कर्ज़माफ़ी और कई तरह की योजनाओं के बावजूद, भारत की प्रति एकड़ उत्पादकता काफ़ी कम है।
डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने भारतीय कृषि की इस दुर्दशा की मूलगामी मीमांसा की थी। यह एक अजीब विडंबना है कि आज 100 साल बाद भी भारतीय कृषि पर उनके विचार उतने ही प्रासंगिक हैं। आज की टिप्पणी में हम डॉ. आंबेडकर के उन्हीं विचारों को समझेंगे उनके कालजयी निबंध—‘Small Holdings in India and Their Remedies’ (भारत में छोटे खेत और उनके उपाय) के सारांश के रूप में।
परिचय
सितंबर 1918 में जर्नल ऑफ द इंडियन इकोनॉमिक सोसाइटी में प्रकाशित डॉ. आंबेडकर का रिसर्च पेपर—‘Small Holdings in India and Their Remedies’ (भारत में छोटे खेत और उनके उपाय) भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था पर लिखा गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथा ऐतिहासिक आर्थिक दस्तावेज है।
उस समय भारत में ब्रिटिश राज था। भारतीय कृषि बार-बार पड़ने वाले अकाल, भीषण गरीबी और निम्न उत्पादकता जैसी समस्याओं से जूझ रही थी। अंग्रेज़ प्रशासक और तत्कालीन भारतीय अर्थशास्त्री कृषि की इस बदहाली का मुख्य कारण भारत में ज़मीनों के बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे होने (Small Holdings) और उनके बिखरे होने (Fragmentation) को मानते थे।
अधिकांश विचारकों का मानना था कि अगर कानून बनाकर खेतों को जोड़ दिया जाए और बड़ा कर दिया जाए, तो भारत की कृषि समस्या हल हो जाएगी। लेकिन डॉ. आंबेडकर ने अपने इस पेपर में पारंपरिक अर्थशास्त्रियों की इस धारणा की धज्जियाँ उड़ा दीं। उन्होंने आर्थिक तर्कों और आँकड़ों के माध्यम से यह साबित कर दिया कि खेतों का छोटा होना कृषि संकट का मूल कारण नहीं है, दरअसल यह भारत की बिगड़ी हुई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था (Bad Social Economy) का केवल एक लक्षण है।
डॉ. आंबेडकर की खासियत थी कि वे प्रतिपक्ष के विचारों का खंडन करने से पहले उनका विस्तार से वर्णन करते थे। भारतीय वाद-विवाद की इस प्राचीन पद्धति को ‘पूर्वपक्ष’ कहा जाता है। आंबेडकर ने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत से ही इस परंपरा का पालन किया और यही हमें इस शोध-पत्र में भी देखने को मिलती है।
आंबेडकर अपने लेख की शुरुआत उद्योगों के वर्गीकरण से करते हैं। वे कहते हैं कि प्राथमिक उद्योग वे होते हैं जो प्रकृति से सीधे उपयोगी सामग्री निकालते हैं, जैसे शिकार करना, पशुपालन, खनन और खेती। द्वितीयक उद्योग वे होते हैं जो प्राथमिक उद्योगों से प्राप्त कच्चे माल का इस्तेमाल करके नई वस्तुएँ बनाते हैं। यहीं आंबेडकर यह भी कहते हैं कि प्राथमिक उद्योगों में कृषि सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मनुष्य के अस्तित्व का मुख्य साधन यानी अन्न पैदा करती है और उद्योगों के लिए कच्चा माल भी प्रदान करती है।
भारत में खेत इतने छोटे और बिखरे हुए क्यों?
आंबेडकर दुनिया के अलग-अलग देशों में खेतों के आकार का तुलनात्मक टेबल प्रस्तुत करते हैं और अर्थशास्त्री एडम स्मिथ का हवाला देते हुए बताते हैं कि किसी देश में खेत बड़े होंगे या छोटे, यह वहाँ के सामाजिक और कानूनी इतिहास पर निर्भर करता है।
बड़े खेतों वाले देश, जैसे इंग्लैंड में युद्ध और सैन्य आवश्यकताओं के कारण ‘ज्येष्ठाधिकार कानून’ (Law of Primogeniture) लागू हुआ। इसके तहत पिता की मृत्यु के बाद पूरी ज़मीन केवल सबसे बड़े बेटे को मिलती थी ताकि संपत्ति के टुकड़े न हों। इसलिए इंग्लैंड में बड़े-बड़े खेत बने रहे। वहीं क्रांति के बाद फ्रांस और अन्य शांतिप्रिय यूरोपीय देशों में ‘समान विभाजन का कानून’ (Law of Equal Sub-division) अपनाया गया, जिसमें पिता की संपत्ति सभी बच्चों में बराबर बाँटी जाती थी। इससे वहाँ छोटे-छोटे खेत बने। भारत में भी शांतिपूर्ण सामाजिक संरचना और हिंदू व मुस्लिम उत्तराधिकार नियमों के कारण समान विभाजन वाला कानून लागू रहा है। परिणामस्वरूप, भारत में भी खेत छोटे होते गए।
भारत में इसके साथ ही खेतों का बड़े पैमाने पर विखंडन (fragmentation) भी हुआ, जिसकी वजह खेतों का सर्वे नंबर के अनुसार कई लोगों में बँटवारा थी। मान लीजिए एक पिता के पास 3 सर्वे नंबरों में 3 अलग-अलग खेत हैं और उसके 3 बेटे हैं, तो ठीक तो यह होता कि तीनों बेटे 1-1 पूरा खेत ले लेते। लेकिन यहाँ ऐसा नहीं होता। बेटे हर सर्वे नंबर में अपना-अपना हिस्सा माँगते हैं। इससे वही 3 खेत 9 टुकड़ों में बंट जाते हैं।
एकत्रीकरण के दो मुख्य सिद्धांत
बिखरे हुए खेतों को जोड़कर बड़े बनाने के लिए बड़ौदा समिति और प्रो. एच. एस. जीवोंस (Prof. H. S. Jevons) जैसे विद्वानों ने दो तरीके सुझाए थे:
आर्थिक इकाई का सिद्धांत (Principle of Economic Unit): यह तरीका कहता है कि पूरे गाँव की ज़मीन की सारी सीमाएँ मिटा दी जाएँ। सड़कें, सार्वजनिक स्थान आदि अलग निकालने के बाद, पूरी ज़मीन को नए सिरे से आर्थिक इकाइयों (एक परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त आकार के बड़े खेतों) में बाँट दिया जाए। फिर इन नए खेतों की नीलामी की जाए और इस नीलामी से जो पैसा आता है उसे मूल खेतों के मालिकों में उनकी ज़मीन के आकार के अनुसार बाँट दिया जाए।
मूल स्वामित्व का सिद्धांत (Principle of Original Ownership): गाँव के सभी किसानों के खेतों का मूल्यांकन पंचों द्वारा किया जाए। इसके बाद, हर किसान को उसकी पुरानी बिखरी हुई ज़मीन के कुल मूल्य के बराबर एक ही स्थान पर एक मुश्त (Compact Plot) ज़मीन दे दी जाए। यदि किसी के मूल्य में थोड़ा-बहुत अंतर आता है, तो उसका पैसों के रूप में मुआवजा दे दिया जाए।
भविष्य में विखंडन को कैसे रोका जाए?
सिर्फ़ एकत्रीकरण कर देना काफ़ी नहीं। अगर उत्तराधिकार का पुराना कानून वैसा ही बना रहा, तो अगली पीढ़ी में वह इकट्ठा किया गया खेत फिर से टुकड़ों-टुकड़ों में बंट जाएगा।
इसे रोकने के लिए दो मुख्य प्रस्ताव सामने आए थे:
बड़ौदा समिति का प्रस्ताव: ज़मीन के बंटवारे की एक न्यूनतम कानूनी सीमा तय कर दी जाए। यदि बंटवारा करने से खेत उस सीमा से छोटा होता हो, तो कानूनन बंटवारा रोक दिया जाए। ज़मीन या तो मिलकर जोती जाए, या किसी एक भाई को पूरी ज़मीन दे दी जाए और वह बाकी भाइयों को उनके हिस्से की ज़मीन का मुआवजा चुका दे।
जी. एफ. कीटिंग (G. F. Keatinge) का कानून: बंबई प्रेसिडेंसी के कृषि निदेशक कीटिंग ने एक बील तैयार किया था। इसके तहत किसी किसान को अपनी ज़मीन को आर्थिक क्षेत्र (Economic Holding) के रूप में पंजीकृत कराने की छूट दी जाए। एक बार पंजीकृत होने के बाद, वह खेत केवल एक ही व्यक्ति (ज्येष्ठ पुत्र या नामांकित वारिस) के नाम स्थानांतरित हो सकेगा। उसे टुकड़ों में बेचा या गिरवी भी नहीं रखा जा सकेगा। इसमें बाकी बेदखल भाइयों को कोई मुआवजा देने का प्रावधान भी नहीं था। जनता के भारी विरोध के चलते यह कानून पास नहीं हुआ था।
डॉ. आंबेडकर का युक्तिवाद
उपरोक्त सभी विचारों को सारांश रूप में पेश करते हुए आंबेडकर कहते हैं कि बड़ौदा समिति अकेले ज़मीन को एकत्रित करने और एकत्रित रखने का प्रयास करती है। प्रो. जीवोंस एकत्रित ज़मीन को संरक्षित करने का कोई उपाय नहीं देते। श्री कीटिंग को बिखरी हुई ज़मीन से कोई लेना-देना ही नहीं है। वे केवल अधिक विखंडन रोकने की चिंता करते हैं। लेकिन आर्थिक क्षेत्र के रूप में दर्ज होने के बाद भी खेत तो बिखरे हुए ही रहेंगे।
आंबेडकर यह भी दर्ज करते हैं कि इस सारी चर्चा में ये विद्वान ये तो भूल ही गए हैं कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में ज़मीन को सिर्फ़ एकत्रित करना और रखना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि बढ़ाना (enlargement) भी ज़रूरी है। केवल प्रो. जीवोंस इस बात का ख्याल रखते हैं, लेकिन वे भी किसी हठवादी की तरह कह देते हैं कि हर परिवार के पास 29 से 30 एकड़ ज़मीन होनी चाहिए। क्यों? क्योंकि इससे किसान का जीवन स्तर (Standard of Living) ऊँचा उठेगा! वे आगे इसका कोई विस्तृत विवेचन भी नहीं करते। बड़ौदा समिति इस बारे में और भी कन्फ्यूज़ नज़र आती है। वह एक आदर्श खेत के तीन जगह तीन अलग-अलग आकार देती है और कहती है ‘आर्थिक क्षेत्र’ इतना होना चाहिए, जिससे एक परिवार पूरी तरह व्यस्त रहे और उसका पेट भरे! श्री कीटिंग कहते हैं कि आर्थिक क्षेत्र वह है जो किसान को अपने सभी खर्चे निकालने के बाद अपने परिवार का सम्मानजनक तरीके से भरण-पोषण करने का अवसर दे।
आंबेडकर का उपभोग बनाम उत्पादन दृष्टिकोण
डॉ. आंबेडकर इन सभी की आर्थिक क्षेत्र (economic holding) की संकल्पना पर ही धावा बोलते हैं। अपना अकाट्य तर्क देते हुए वे कहते हैं कि जीवोंस, कीटिंग और बड़ौदा समिति, इन सभी ने आर्थिक क्षेत्र या आदर्श खेत की परिभाषा उपभोग (Consumption) की दृष्टि से की है, न कि उत्पादन (Production) की दृष्टि से। और यही उनकी सबसे बड़ी भूल है।
किसी किसान के परिवार में 5 सदस्य हो सकते हैं और किसी के परिवार में 15। खेत की उत्पादकता इस बात से तय नहीं होती कि वह किसान के परिवार के कितने सदस्यों का पेट भरता है, बल्कि इस बात से तय होती है कि खेत में लगाई गई पूँजी, श्रम और निवेश के अनुपात में कितना उत्पादन (Output) मिल रहा है।
अनुपात का नियम (Law of Proportion)
डॉ. आंबेडकर समझाते हैं कि मार्केट इकोनॉमी में उत्पादन हमेशा अनुपात के नियम (Law of Proportion) के आधार संचालित होता है। उत्पादन के मुख्य साधन हैं भूमि (Land), श्रम (Labour) और पूंजी (Capital)। अनुपात का नियम यह कहता है कि उत्पादन के इन सभी साधनों के बीच संतुलन होना चाहिए। यदि किसी एक साधन की मात्रा बहुत ज़्यादा हो जाए और बाकी साधनों की मात्रा कम रहे, तो कुल उत्पादन गिर जाता है।
इसके आधार पर डॉ. आंबेडकर आर्थिक क्षेत्र की अपनी परिभाषा देते हैं:
“केवल ज़मीन का आकार अपने आप में कोई आर्थिक अर्थ नहीं रखता। अर्थशास्त्र की भाषा में कोई भी खेत अपने आप में न तो बड़ा होता है न छोटा। एक खेत किसी किसान के लिए तब छोटा या बड़ा होता है, जब हम उसकी तुलना किसान के पास उपलब्ध अन्य साधनों (पूँजी, हल, बैल, श्रम आदि) से करते हैं।”
अगर किसी किसान के पास 50 एकड़ ज़मीन है, पर उसे कसने के लिए पर्याप्त श्रमबल और पूँजी नहीं है तो वह उसके लिए घाटे का सौदा (Uneconomic) साबित होगा, क्योंकि वह उस ज़मीन से संभव उत्पादन नहीं ले पाएगा। वहीं किसी के पास पर्याप्त पूँजी, आधुनिक उपकरण और सिंचाई के साधन हैं, तो उसके लिए एक छोटा खेत भी अत्यधिक लाभदायक (Economic) बन सकता है। इसलिए आंबेडकर कहते हैं कि आदर्श खेत ज़मीन के किसी निश्चित एकड़ या बीघे का नाम नहीं है। यह भूमि, पूँजी और श्रम का वह सही अनुपात है, जहाँ हर साधन का प्रति-इकाई योगदान (Pro-rata contribution) उच्चतम होता है।
भारतीय कृषि में संसाधनों की कमी
इस तरह खेतों को बड़ा करने के प्रस्ताव को निरर्थक साबित करने के बाद आंबेडकर पूछते हैं कि “क्या भारत में उत्पादन के अन्य साधन बढ़ गए हैं, लेकिन ज़मीन कम पड़ गई है?” और आँकड़ों के ज़रिए दिखाते हैं कि स्थिति इसके बिलकुल उलट है।
के. एल. दत्ता की रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन भारत में अकाल और गरीबी के कारण हल चलाने वाले बैलों और पानी की भारी कमी हो गई थी। किसान ठीक से खेती नहीं कर पा रहे थे क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे। एलियट जेम्स और एम. बी. नानावटी ने भी कुछ ऐसे ही तथ्य पेश किए थे। इन तथ्यों का विश्लेषण करते हुए डॉ. आंबेडकर ने एक ऐसा निष्कर्ष निकाला, जिसने पूरे देश को चौंका दिया था:
“उपलब्ध पूँजी, श्रम और कृषि उपकरणों की कमी को देखते हुए, भारत के मौजूदा खेत छोटे नहीं, बहुत बड़े हैं!”
भारतीय कृषि की मूल बीमारी, छिपी बेरोज़गारी
तब सवाल उठता है कि ज़मीन का आकार अगर समस्या नहीं है, तो समस्या क्या है? ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़े क्यों हो रहे हैं? क्यों लोग एक-एक इंच के लिए लड़ रहे हैं?
डॉ. आंबेडकर इसका जवाब विस्तार से देते हैं। सर जेम्स कैर्ड (Sir James Caird) का हवाला देते हुए वे बताते हैं कि इंग्लैंड में जहाँ 1 वर्ग मील ज़मीन पर 50 लोग काम करते हैं, वहीं भारत में उतनी ही ज़मीन पर 800 लोग टूट पड़ते हैं। इसका अर्थ यह है कि भारतीय कृषि पर निर्भर आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा वास्तव में अतिरिक्त और पूरी तरह बेकार (Idle labour) है! (इसी को आधुनिक अर्थशास्त्र में छिपी या अदृश्य बेरोज़गारी कहा जाता है)। जब किसी देश की आधी से ज़्यादा आबादी उत्पादन में बिना कोई योगदान दिए इस तरह निष्क्रिय बैठी रहती है, तो स्वाभाविक तौर पर उस देश की अर्थव्यवस्था पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है।
ज़मीन के टुकडें इसलिए होते हैं कि क्योंकि देश में खेती के अलावा रोज़गार का कोई और साधन (उद्योग/व्यापार) मौजूद ही नहीं है। हर व्यक्ति जीवित रहने के लिए ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े पर कब्जा पाना चाहता है। चाहे वह टुकड़ा कितना भी छोटा क्यों न हो!
किसान के पास पैसा क्यों नहीं है इसकी वजह बताते हुए आंबेडकर पूछते हैं कि पैसा यानी पूँजी क्या है? पूँजी और कुछ नहीं, बचत (Surplus) है। बचत तब होती है जब मनुष्य उपभोग से ज़्यादा उत्पादन करता है। लेकिन जब भारत में लाखों-करोड़ों लोग खेती में बेकार बैठे हैं, तो समाज में बचत होगी कैसे? जब बचत नहीं होती, तो पूँजी नहीं बनती और जब पूँजी नहीं बनती, तो नई तकनीक और साधन नहीं खरीदे जा सकते।
आंबेडकर का स्थायी समाधान: भारत का औद्योगीकरण
समस्या का इतना गहरा और वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद, डॉ. आंबेडकर पारंपरिक सुधारकों के सतही उपायों को पूरी तरह खारिज़ कर देते हैं और दावे के साथ कहते हैं कि भारतीय कृषि की समस्याओं का स्थायी और स्वाभाविक इलाज कृषि के भीतर नहीं, बल्कि उसके बाहर है। और वह है भारत का औद्योगिकीकरण (Industrialization)!
डॉ. आंबेडकर समझाते हैं कि जब देश में उद्योग और गैर-कृषि क्षेत्र (Non-agricultural sectors) विकसित होंगे, तो उसका कृषि पर अद्भुत और सकारात्मक प्रभाव (Reflex Effect) पड़ेगा:
छिपी बेरोज़गारी में कमी: उद्योग खेती में निष्क्रिय बैठे लाखों लोगों को खींचकर कारखानों में उत्पादक रोज़गार देंगे। इससे वे समाज पर बोझ बनने के बजाय खुद कमाएँगे और राष्ट्रीय आय में योगदान देंगे।
ज़मीन पर दबाव में कमी: जब लोग उद्योगों में काम करने शहरों में चले जाएँगे, तो ज़मीन पर से जनसंख्या का भीषण दबाव अपने आप हट जाएगा।
विखंडन के लालच का अंत: जब लोगों को उद्योगों में ज़मीन से ज़्यादा लाभदायक रोज़गार मिलने लगेगा, तो वे ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के लिए लड़ना बंद कर देंगे।
पूंजी निर्माण: उद्योगों और कारखानों से समाज में संपत्ति बढ़ेगी। इससे किसानों को भी अपनी उपज का अच्छा दाम मिलेगा। बचत बढ़ेगी, जिससे किसान नए कृषि उपकरण खरीद सकेंगे और कृषि का विकास होगा।
स्वाभाविक एकत्रीकरण: जब कृषि में पूँजी बढ़ेगी और ज़मीन पर लोगों का दबाव कम होगा, तो अनुपात के नियम के अनुसार किसान खुद-ब-खुद अपने खेतों को बड़ा करेंगे!
अमेरिकी इतिहास का सबूत
अपने इस सिद्धांत को साबित करने के लिए डॉ. आंबेडकर 1883 के अमेरिकी कृषि और औद्योगिक आँकड़ों का विवरण प्रस्तुत करते हैं।
अमेरिकी कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के जिन राज्यों में कुल आबादी के 70% से अधिक लोग केवल खेती में लगे थे, वहाँ खेतों की कीमत सबसे कम यानी केवल $5.28 प्रति एकड़ थी और किसान बेहद गरीब थे। इसके उलट, अमेरिका के जिन औद्योगिक राज्यों में 30% से कम लोग खेती में थे और बाकी लोग उद्योगों में थे, वहाँ खेतों की कीमत बढ़कर $40.91 प्रति एकड़ हो गई थी! जहाँ उद्योग ज़्यादा थे, वहाँ न केवल ज़मीन की कीमत ज़्यादा थी, बल्कि प्रति एकड़ पैदावार भी अधिक थी और कृषि मजदूरों की मजदूरी भी बहुत ज़्यादा थी। इससे यह सिद्ध होता है कि उद्योग केवल उद्योगपतियों को ही लाभ नहीं पहुँचाते, वे किसानों के भी सबसे बड़े मित्र और मददगार होते हैं।
अपने पेपर का अंत डॉ. आंबेडकर ब्रिटिश भारत के वरिष्ठ अधिकारी सर हेनरी कॉटन के प्रसिद्ध वाक्य से करते हैं: “There is danger of too much agriculture in India.”
बात का निचोड़
डॉ. आंबेडकर भारतीय कृषि की समस्याओं पर तत्कालीन विद्वानों के सभी सिद्धांतों को जड़ से खारिज़ करते हैं। पूर्वपक्ष रखने के बाद वे तर्क, आँकड़ों और सबूतों के ज़रिए अपनी बात रखते हैं:
खेत का आकार अपने आप में कोई मायने नहीं रखता: खेत का लाभदायी होना इस बात पर निर्भर करता है कि किसान के पास ज़रूरी पूँजी, उपकरण और श्रम हैं या नहीं।
उपभोग नहीं, उत्पादन है मानदंड: खेत की लाभ-हानि को परिवार के उपभोग से जोड़ना गलत है। इसे निवेश और उत्पादन के गणित से नापना चाहिए।
खेतों का टुकड़ों में बंटना सिर्फ़ एक लक्षण: खेतों के टुकड़ों में बंटने का असली कारण उत्तराधिकार का कानून नहीं, रोज़गार के अन्य साधनों का अभाव और ज़मीन पर भीषण जनसंख्या का दबाव है।
छिपी बेरोज़गारी पूंजी को नष्ट करती है: खेती पर निर्भर बेकार श्रम देश की बचत को खा जाता है, जिससे कृषि में पूँजी का निर्माण नहीं हो पाता।
औद्योगीकरण ही कृषि समस्या का सच्चा समाधान: जब तक खेती से अतिरिक्त आबादी को हटाकर उद्योगों और सेवाओं में स्थानांतरित नहीं किया जाएगा, तब तक भारत के किसानों की गरीबी, खेतों का विखंडन और निम्न उत्पादकता की समस्या कभी हल नहीं हो सकती।
डॉ. आंबेडकर ने आज से सौ साल पहले ही भारतीय कृषि की समस्या को भलीभाँति समझ लिया था और उसका एक बेहद कारगर इलाज़ भी सुझाया था। दुर्भाग्य से आज भी हम उस समस्या को पूरी तरह दूर नहीं कर पाए हैं। उम्मीद है एक दिन हम ज़रूर सफल होंगे और यही भारत के उस दूरदर्शी और महान सपूत को सच्ची श्रंद्धांजलि होगी।
— परीक्षित सूर्यवंशी
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