पुलियाबाज़ी का चौथा अंक आ चुका है और इस अंक की थीम है ‘Vibrant Cities’ यानी जानदार शहर!
शहरों को हम विकास का इंजन कहते हैं पर क्या वजह है कि इन इंजनों में आज ट्रैफ़िक, प्रदूषण और गंदगी का जंग लग चुका है। कैसे हम अपने शहरों को फिर से जानदार बना सकते हैं, ताकि वे हमारी सिर्फ़ आर्थिक ही नहीं, बल्कि बौद्धिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति के आधार बन सकें? इसी पर चर्चा की गई है पुलियाबाज़ी के ताज़ा अंक में।
इस अंक में क्या है? शिवकुमार और शनाया की कवर स्टोरी में मुंबई और सूरत के चढ़ते-ढलते सूरज की एक लंबी दास्तान प्रस्तुत है। प्रणय-सार्थक शहरों की बदहाली के पीछे की अदृश्य पब्लिक फाइनेंस की कहानी को उजागर करते हैं। प्रमोद सार्वजनिक परिवहन के नक्शों के ज़रिए लंदन और बेंगलुरु की तुलना करते हैं। फिलीपींस की एवरिल हमारी निबंध प्रतियोगिता की विजेता हैं और उनका निबंध दुनियाभर के वाइब्रेंट शहरों में छुपा अनदेखा जादू खोजता है।
बतौर नागरिक हम अपने शहर को और जानदार कैसे बनाएँ? इस पर सौम्या नंदन बेंगलुरु में हुई एक सुंदर पहल साझा करती हैं। साथ ही पुस्तकालयों पर हुई पुलियाबाज़ी के कुछ अंश। डेटा फॉर इंडिया द्वारा प्रस्तुत लेख भारत की प्रगति की तस्वीर को आँकड़ों द्वारा बताता है। अरुण जी पटना की याद ताज़ा करते हैं, तो सौरभ 10 करोड़ के मेगाशहर पर एक क्रांतिकारी कल्पना। ऐसे ही मेगाशहरों को बनाने वाले प्रवासी मज़दूरों के सपनों की कहानी नानयांग यानी कि आज के सिंगापुर से।
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हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक ओ.पी. सिंह जी द्वारा लिखित आज का लेख पुलियाबाज़ी के इसी ताज़ा अंक से खास आपके लिए, ताकि आप इस मैगज़ीन की एक झलक पा सकें।
समाज को सुरक्षित कैसे बनाया जाए?
—ओ.पी. सिंह
हर ज़िले में एक दफ्तर होता है जहाँ हर महीने अपराधों की गिनती होती है। मेज़ पर चार्ट, दीवार पर आँकड़े और सामने की कुर्सियों पर थानेदार। इन थानेदारों का भाग्य इसी चार्ट के दो कॉलमों में बंद होता है, जिनमें से एक में वर्तमान और दूसरे में पिछले साल घटित अपराधों की संख्या होती है। कोई कहता है—हत्याएँ घटीं, बलात्कार घटे, चोरी घटी। एसपी सिर हिलाता है। कोई कहता है ड्रग्स के केस बढ़े, आर्म्स एक्ट के केस बढ़े। मीटिंग ख़त्म। मैं ऐसी सैकड़ों मीटिंगों में बैठा हूँ और बरसों तक मैं भी इसी को क़ानून-व्यवस्था समझता रहा।
उसी ज़िले में एक लड़की है, जो रात नौ बजे की बस में नहीं बैठती। एक दुकानदार है, जो शटर सात बजे डाउन कर देता है। एक बुज़ुर्ग है, जिसकी जेब कट गई है, फिर भी उसने थाने जाना मुनासिब नहीं समझा। उस चार्ट के किसी कॉलम में इन तीनों बातों के लिए कोई जगह नहीं है, जबकि असल में सुरक्षा यही है। बाक़ी सब लिखा-पढ़ी है।
सवाल यह है कि जो आँकड़े सदन में पढ़े जाते हैं और अखबार में छपते हैं, वे बनते कैसे हैं? हर ज़िले में पुलिस के काम को दो कसौटियों पर मापा जाता है। एक जुड़ी है व्यक्ति और संपत्ति के खिलाफ़ अपराधों से तो दूसरी आर्म्स एक्ट और NDPS एक्ट के तहत दर्ज मुकदमों से। व्यक्ति और संपत्ति के खिलाफ़ अपराध घटे, तो अच्छा। आर्म्स एक्ट और NDPS एक्ट के तहत दर्ज मुक़दमे बढ़े, तो अच्छा। एक कसौटी कहती है, कम लिखो। दूसरी कहती है, ज़्यादा लिखो। और दोनों पर्चों पर दस्तख़त एक ही थानेदार के हैं। इनमें से कोई गिनती यह नहीं नापती कि इससे लोगों के सुरक्षा भाव में क्या फ़र्क पड़ा। दोनों कसौटियाँ वही नापती हैं, जो थानेदार की कलम के नियंत्रण में है—FIR की संख्या। नतीजतन यहाँ लक्ष्य जन सुरक्षा नहीं रहता, लिखा-पढ़ी हो जाता है।
इस लेख का मकसद किसी अफ़सर को कटघरे में खड़ा करना नहीं है। यह व्यवस्था की बात है। जो आदमी आँकड़ा तैयार करता है, उसकी परीक्षा उसी आँकड़े से होती है। इन आँकड़ों को पूरा सच कोई नहीं मानता, फिर भी सभी इसे इस्तेमाल करते हैं पत्थर की लकीर की तरह।
2024 में देश का संज्ञेय (Cognizable) अपराध 6% घटा। तालियाँ बजीं। पर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) ने ख़ुद लिखा कि इस गिरावट की बड़ी वजह क़ानूनी प्रावधानों में बदलाव है। भारतीय न्याय संहिता में मारपीट का एक भाग असंज्ञेय (Non-cognizable) श्रेणी में डाल दिया गया है, जिससे इस धारा के तहत दर्ज मामले 30.58% घट गए। मतलब अपराध नहीं घटे, अपराध दर्ज होना घट गया। उसी साल हरियाणा ने निपटाए गए मुक़दमों में से 21.6% ‘झूठे’ क़रार देकर बंद कर दिए। यह अनुपात देशभर में सबसे ज़्यादा था। महिलाओं के खिलाफ़ अपराधों में से 35.7% झूठे पाए गए। इस आँकड़े के कई मतलब हो सकते हैं। कौन-सा सच है, इसे जानने का हमारे पास कोई औज़ार नहीं।
अब वो बात, जिसके लिए यह लेख लिखा गया है। अपराध के आँकड़े और लोगों द्वारा अनुभूत सुरक्षा का स्तर दो अलग-अलग चीज़ें हैं। हम जो गिन रहे हैं, वह पिछले साल के मुकाबले इस साल में दर्ज अपराधों की संख्या है, यानी कितना दर्ज हुआ, कितना निपटा। दूसरी बात है सुरक्षा की अनुभूति—रात को सड़क पर आदमी कितना महफूज़ महसूस करता है, औरत का फ़ोन हाथ में है या बटुए में, बच्चा अकेला स्कूल जा रहा है या नहीं। पहली चीज़ पुलिस का काम नापती है। दूसरी, लोगों की आपबीती बताती है। नागरिकों के लिए सिर्फ़ दूसरी बात मायने रखती है और राज्य (State) के पास उसी को नापने का कोई इंतज़ाम नहीं है। जो डर दुकानदार को शटर गिराने पर मजबूर करता है, वह किसी FIR में नहीं दिखता, पर उसकी क़ीमत रोज़ चुकाई जाती है—बंद दुकानों, छूटे कामों और घर बैठी लड़कियों के रूप में।
इसे ‘भावना’ कहकर खारिज करना आसान है। परंतु यह मात्र भावना नहीं, बल्कि आचरण है और आचरण को गिना जा सकता है। इसके लिए औज़ार बनाने की कोशिश भी हुई है। 2019 में गृह मंत्रालय ने ‘ऑल इंडिया सिटिज़न्स सर्वे ऑफ़ पुलिस सर्विसेज़’ कराया था, जिसमें 173 ज़िलों के सवा लाख घर शामिल थे। उसके नतीजे अभी प्रकाशित होने हैं। यह जानना रोचक होगा कि जिन राज्यों और जिलों ने घटते अपराध को अपनी उपलब्धि बता रखा है, वहाँ के नागरिकों ने पुलिस के काम के बारे में आखिर क्या कहा?
अपराध के आँकड़े बेशक गिनिए। साथ-साथ हर ज़िले के लिए एक सुरक्षा सूचकांक (Safety Index) भी बनाइए। उसे ही वह पैमाना बनाइए, जिस पर पुलिस इकाइयों की कार्यकुशलता नापी जाए और जिसके लिए वे होड़ करें। इसमें तीन बातें अवश्य डालें। पहली, वह संख्या जिसका रिकॉर्ड थानेदार की कलम का मोहताज नहीं हैं, जैसे हत्या, दुर्घटना में मौत, हिरासत में मौत, आत्महत्या। इन्हें एक से ज़्यादा विभाग गिनते हैं। इसी में वह संख्या भी जोड़ें जो थाने तक पहुँचती ही नहीं हैं, जैसे जन्म के समय लिंगानुपात, जो हरियाणा में 923 से 900 पर आ गया है। दूसरी बात, घर-घर का सर्वेक्षण। किसके साथ क्या बुरा हुआ, उसमें से कितना दर्ज हुआ, थाने जाने की हिम्मत कितनी है, रात नौ बजे लोग कितने बेखौफ़ होते हैं। तीसरी बात, पुलिस की जवाबी कार्रवाई की रफ़्तार कितनी है, जैसे हरियाणा में पिछले साल डायल 112 का रिस्पॉन्स टाइम 16 मिनट 14 सेकंड से घटकर 9 मिनट 33 सेकंड हो गया। जब यह नापा जा सका, तो बाकी चीज़ों को भी नापा जा सकता है।
इस पैमाने की ख़ूबी यह है कि इसमें हेराफेरी की कोई गुंजाइश नहीं है। अनायास चुने गए घरों को सर्वे में शामिल होने से थानेदार रोक नहीं सकता। उन्हें ‘झूठा’ करार देकर बंद नहीं कर सकता। न ही कोई संशोधन लाकर उनकी श्रेणी बदल सकता है। उसके पास दो ही रास्ते बचते हैं। एक तो जिले को सचमुच महफ़ूज़ करे, या फिर आँकड़ों को जस का तस स्वीकार करे। इसका फ़ैसला भी एक साल के नमूने पर नहीं, तीन साल के रुझान पर हो। सुरक्षा सूचकांक का काम जाँच शुरू करना है, किसी का करियर तबाह करना नहीं।
मैंने इस महीने हरियाणा के 22 ज़िलों के लिए ऐसा सूचकांक बनाने की कोशिश की। तीन दिन में हाथ खड़े कर दिए। ज़िले के स्तर का आँकड़ा मिलता ही नहीं। NCRB की ‘क्राइम इन इंडिया 2024’ रिपोर्ट के तीन में से एक भी खंड में जिलावार आँकड़ों की तालिका नहीं है। सड़कों पर होने वाली मौतों का आँकड़ा दबाना सबसे मुश्किल है, फिर भी 22 में से सिर्फ़ चार ज़िलों की सड़कों पर मरनेवालों की संख्या मिली, वह भी अखबार में छपी पुलिस ब्रीफ़िंग से। नागरिक अपने ही जिले की गिनती नहीं देख सकता। और जो नहीं दिखता, उसके लिए किसी को जवाब नहीं देना पड़ता। यही कमी है। अगर ये आँकड़े मिल जाते, तो शायद मेरा सूचकांक बन पाता। और सिर्फ़ मेरा ही क्यों, भारत के हर जिले का सूचकांक बन सकता है अगर हम यह डेटा इकट्ठा करें।
राज्य वही नापता है, जिसे वह ठीक करना चाहता है। भारत पुलिस के काम को रत्ती-रत्ती नापता है, पर नागरिकों के डर को बिल्कुल नहीं नापता। यह इत्तिफ़ाक़ नहीं, चयन है और इसे बदला जा सकता है। जिस दिन किसी जिले के एसपी की साख इस बात से तय होगी कि उसके जिले की लड़की रात की बस में बैठते समय सुरक्षित अनुभव करती है या नहीं, उस दिन पुलिस पहली बार वह नापेगी, जिसके लिए वह बनी थी। क्राइम रजिस्टर बताता है कि पुलिस ने क्या किया। सूचकांक बताएगा कि लोगों पर क्या बीतती है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि सुरक्षा दूसरे आँकड़े का नाम है।
— ओ.पी. सिंह
ओ.पी. सिंह हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक और आंतरिक सुरक्षा मामलों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ हैं।
आप उनके अन्य लेख यहाँ पढ़ सकते हैं: OP’s Substack
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