कल्पक्कम का PFBR: मंज़िल अभी कितनी दूर?
Will Kalpakkam’s fast breeder reactor alone lead to nuclear rejuvenation?
— लौकेंद्र शर्मा
6 अप्रैल 2026 की तारीख भारतीय परमाणु कार्यक्रम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएगी। होमी भाभा ने करीब 70 साल पहले भारत के तीन चरणों वाले (थ्री-स्टेज) परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की परिकल्पना की थी। आज भारत ने उसके दूसरे चरण में कदम रखा है। कल्पक्कम के 500 मेगावाट (MW) प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने क्रिटिकैलिटी स्तर हासिल कर लिया है।

इसे थोड़ा आसान शब्दों में समझते हैं। परमाणु रिएक्टर में ईंधन के रूप में फिलहाल यूरेनियम या प्लूटोनियम का इस्तेमाल किया जाता है। जब रिएक्टर में ईंधन का एक परमाणु टूटता है, तो उसमें से भारी मात्रा में ऊष्मा और न्यूट्रॉन निकलते हैं। ये न्यूट्रॉन दूसरे परमाणुओं से टकराते हैं, जिससे वे भी टूटते हैं। इस प्रक्रिया में एक चेन रिएक्शन शुरू होती है।
इस रिएक्शन में जब एक विभाजन (fission) से औसतन एक से कम नए विभाजन होते हैं, तब उसे Subcritical अवस्था कहा जाता है; जब एक विभाजन से औसतन एक और विभाजन होता है, तब वह Criticality कहलाती है; और जब एक विभाजन से एक से ज़्यादा नए विभाजन होते हैं, तब उसे Supercriticality की स्थिति कहा जाता है। कल्पक्कम के PFBR ने Criticality अवस्था प्राप्त कर ली है। इसका मतलब है कि इस रिएक्टर में परमाणुओं का विभाजन अब स्वयं-संचालित (self-sustaining) और निरंतर हो रहा है।
यह सचमुच एक अच्छी खबर है, लेकिन इस खुशी के बीच हमें भारतीय परमाणु कार्यक्रम की आज की वास्तविकता को नहीं भूलना चाहिए। इस थ्री-स्टेज प्लान के साथ-साथ, हमें ऐसी रिएक्टर तकनीकों पर भी काम करना होगा, जिनमें सीधे थोरियम का इस्तेमाल हो सके।
इसके अलावा, हमें पहले चरण के मौजूदा रिएक्टर्स पर और ज़्यादा ध्यान देना होगा, परमाणु प्लांट के निर्माण में मॉड्यूलरिटी जैसे आधुनिक तरीके अपनाने होंगे और परमाणु ऊर्जा निर्माण क्षमता बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र को भी साथ लेना होगा। (Modularity यानी रिएक्टर के अलग-अलग हिस्से या पूरा रिएक्टर फैक्ट्री में बनाकर उसे प्लांट साइट पर लाना।)
थ्री-स्टेज का सपना और फास्ट ब्रीडर्स का लंबा इंतजार
जब 1950 के दशक में होमी भाभा ने इस थ्री-स्टेज परमाणु कार्यक्रम का सपना देखा था, तब वे अच्छी तरह जानते थे कि भारत में यूरेनियम बहुत कम है। लेकिन उन्हें यह भी पता था कि हमारे समुद्री तटों की रेत में भारी मात्रा में मिलने वाले थोरियम में अथाह ऊर्जा छिपी है। दिक्कत बस यह है कि थोरियम (Th-232) fertile तो है, लेकिन fissile नहीं। मतलब थोरियम खुद विभाजित होकर ऊर्जा नहीं बना सकता, लेकिन उसे रिएक्टर के अंदर ईंधन-रूप यूरेनियम (U-233) में रूपांतरित किया जा सकता है।
इस मजबूरी को समझते हुए, भाभा ने थोरियम का सही इस्तेमाल करने के लिए तीन चरणों वाला यह कार्यक्रम तैयार किया:
पहला चरण: इसमें प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर्स (PHWRs) का इस्तेमाल होता है, जो प्राकृतिक यूरेनियम से चलते हैं (जिसमें ईंधन-रूप U-235 सिर्फ़ 0.7% होता है)।
दूसरा चरण: पहले चरण से जो बचा हुआ ईंधन (spent fuel) निकलता है, उससे प्लूटोनियम (Pu-239) और डिप्लीटेड यूरेनियम (U-238) मिलता है। इसका इस्तेमाल दूसरे चरण के फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स (FBR) में होता है। यह रिएक्टर जितना ईंधन पीता है, उससे ज्यादा ईंधन पैदा करता है। इस फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के चारों तरफ थोरियम की एक परत (ब्लैंकेट) लगा दी जाती है, जिससे आगे चलकर ईंधन-रूप यूरेनियम (U-233) तैयार होता है।
तीसरा चरण: थोरियम से बना यही यूरेनियम (U-233) और थोरियम (Th-232) मिलकर तीसरे चरण के ब्रीडर रिएक्टर्स का ईंधन बनते हैं और उसे चलाते हैं।
इस थ्री-स्टेज प्लान में इतनी क्षमता है कि यह भारत को दशकों नहीं, बल्कि सदियों तक ऊर्जा दे सकता है।
भारत ने पहले चरण के PHWR रिएक्टर्स में तो महारत हासिल कर ली है, लेकिन दूसरे चरण यानी FBR रिएक्टर्स को शुरू करने में उसे काफ़ी मुश्किलें आईं।
FBR पर 1960 के दशक में काम शुरू हुआ था और इसके डिजाइन में फ्रांस ने हमारी मदद की थी। इसके बाद 1970 के दशक की शुरुआत में एक छोटे फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (FBTR) को बनाने का काम शुरू हुआ। यह रिएक्टर 1980 के दशक में जाकर चालू हुआ। कल्पक्कम में बना यह FBTR एक 40 मेगावाट (MW) का छोटा रिएक्टर है, जिसमें सिस्टम को ठंडा रखने (कूलंट) के लिए सोडियम का इस्तेमाल किया जाता है। हालाँकि, इस छोटे रिएक्टर को चलाने से भारत को सोडियम कूलंट का अनुभव तो मिला, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसे संभालना आसान नहीं रहा है, इसमें कई उतार-चढ़ाव आते रहे हैं।
फिर दूसरे चरण को आगे बढ़ाने के लिए, 2004 में भारतीय परमाणु कार्यक्रम के तहत कल्पक्कम में ही एक बड़ा 500 मेगावाट का PFBR बनाना शुरू किया गया। उम्मीद थी कि यह 2010 तक बनकर तैयार हो जाएगा, लेकिन काम खिंचते-खिंचते 2020 के दशक तक आ गया। आखिरकार, अक्टूबर 2025 में इसमें ईंधन डाला गया और अप्रैल 2026 में यह रिएक्टर पूरी तरह चालू (क्रिटिकल) हो पाया।
परमाणु क्षमता बढ़ाने के लिए कुछ और कदम ज़रूरी
एक अकेले 500 मेगावाट के PFBR रिएक्टर को बनाने में ही 20 साल से ज्यादा का समय लग गया। अगर हम FBTR के इतिहास और दूसरे देशों के अनुभवों को देखें, तो शुरुआती सालों में इस नए PFBR रिएक्टर में कुछ तकनीकी दिक्कतें आ सकती हैं। इसकी वजह यह है कि इसमें इस्तेमाल होने वाला सोडियम कूलंट बहुत खतरनाक होता है—जैसे ही यह हवा या पानी के संपर्क में आता है, इसमें बहुत तेज़ी से गर्मी पैदा होती है और आग लग जाती है (इसे exothermic reaction कहते हैं)।
मान लीजिए हमने सोडियम को ठीक से संभाल लिया और यह रिएक्टर कामयाब भी रहा, तो भी हमें ऐसे कई सारे FBR तैयार करने पड़ेंगे, जिसमें दशकों लग जाएँगे। इससे तीसरे चरण में थोरियम का इस्तेमाल करने में बहुत देरी हो जाएगी।
आज हमारे देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता सिर्फ़ 9 GW के आसपास है, जबकि हमारा लक्ष्य 2047 तक इस क्षमता को 100 GW तक बढ़ाना है। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए भारत को अपने तय थ्री-स्टेज प्लान के साथ-साथ सीधे थोरियम इस्तेमाल करने वाली तकनीकों पर भी काम करना होगा। इसका मतलब है कि हमें अलग-अलग डिजाइन वाले टेस्ट रिएक्टर्स बनाने होंगे, जैसे कि:
मोल्टन सॉल्ट रिएक्टर (Molten Salt Reactor)
एक्सीलरेटर ड्रिवेन सिस्टम (Accelerator Driven System)
हाई टेम्परेचर गैस कूल्ड रिएक्टर (High Temperature Gas Cooled Reactor)
भारत ने पहले चरण के PHWR रिएक्टर्स में निपुणता प्राप्त कर ली है और अब हमारे पास 700 मेगावाट के रिएक्टर्स बनाने और चलाने की क्षमता है। अच्छी बात यह है कि ‘शांति एक्ट 2025’ की वजह से अब इस क्षेत्र में सरकारी कंपनियों का एकाधिकार खत्म हो चुका है। इसलिए भारत सरकार को अब प्राइवेट सेक्टर के साथ मिलकर PHWR रिएक्टर्स की संख्या बढ़ाने पर ज़ोर देना चाहिए।
चाहे मॉड्यूलर रिएक्टर्स हों (जैसे भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर - BSMR), कंपनियों के अपने खुद के लिए बनाए गए प्लांट (Captive Nuclear Plants) हों, या फिर बड़े 700 मेगावाट से ज्यादा के रिएक्टर्स—देश में परमाणु ऊर्जा बढ़ाने के लिए PHWR आज की तारीख में सबसे नज़दीकी रास्ता हैं।
— लौकेंद्र शर्मा
लौकेंद्र तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के हाई-टेक जियोपॉलिटिक्स प्रोग्राम में स्टाफ रिसर्च एनालिस्ट हैं। आप उनकी प्रोफाइल और रिसर्च यहाँ देख सकते हैं: lokendrasharma.com
यह लेख अंग्रेज़ी (मनीकंट्रोल) में यहाँ प्रकाशित हुआ है: Kalpakkam’s fast breeder reactor alone will not lead to nuclear rejuvenation
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
हम सब अक्सर कहते और सुनते आए हैं कि देश में कानून का राज होना चाहिए। लेकिन यह कानून का राज होता क्या है? क्या देश में लागू कायदे-कानून के अनुसार व्यवहार इतनी ही इसकी व्याख्या है या इसमें कुछ सुक्ष्मताएँ भी हैं? क्या कानून के शासन का संबंध सिर्फ़ नागरिकों के दैनंदिन जीवन से है, या इसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था तक पर पड़ता है? यदि हाँ, तो कहाँ, कैसे और क्यों?
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