राहगीर-बूझ: कैसे सोचें? | How to Think
The art of interdisciplinarity without embracing bullshit
—फहद हसीन
जब आप किसी इंसान को गौर से देखते हैं, उसकी जगह खुद को रखकर सोचते हैं, तो एक गहरी विनम्रता जागती है। जॉन कोनिग की किताब Dictionary of Obscure Sorrows में इस एहसास को एक खूबसूरत नाम दिया गया है: Sonder। मैं इसे राहगीर-बूझ कहना चाहूँगा। यह उस एहसास को कहते हैं जब आप ये महसूस करते हैं की सड़क पर गुज़रने वाला हर अनजान व्यक्ति अपनी कहानी का हीरो है। वह एक ऐसी ज़िंदगी जी रहा है जो उतनी ही उलझी और अहम है जितनी आपकी।
यही बात ज्ञान और विचारों पर भी लागू होती है। दूर से देखो तो हर विषय आसान लगता है। चिकित्सा और स्वास्थ्य बस जाँच और दवाईयाँ हैं, नीतियाँ बस क़ानून और योजनाएँ हैं, और सॉफ्टवेर बस कोडिंग है। लेकिन इनमें से हर एक क्षेत्र में एक पूरी दुनिया छुपी होती है। इनमें ऐसा अनबोला ज्ञान (tacit knowledge), वाद-विवाद, अजीबोग़रीब अपवाद और दुविधाएँ होती हैं, जिनके बारे में कोई बाहरी इंसान सोच भी नहीं सकता।
मैं इसे बौद्धिक राहगीर-बूझ कहता हूँ: यानी यह समझ कि दूसरे विषय भी उतने ही गहरे और उलझे हुए हैं जितना हमरा अपना। वो नर्स, वो सिविल इंजीनियर, वो गेम डिज़ाइनर, सब अपनी-अपनी दुनिया में ऐसी मुश्किलों से जूझ रहे हैं जिनकी बाहर वालों को कल्पना भी नहीं है।
इसका रिश्ता Dunning-Kruger effect से है, लेकिन उलटी दिशा में। आसान भाषा में कहें तो Dunning-Kruger effect यानी ऐसी प्रवृत्ति है, जिसके कारण किसी क्षेत्र में कम जानने वाला इंसान भी अपने आप को उस क्षेत्र का बड़ा ज्ञानी समझने लगता है। जैसे कोई कॉलेज का छात्र एक-दो छोटे कोर्स करके किसी क्षेत्र के विद्वान को “बेवकूफ़” कहने लगता है। बौद्धिक राहगीर-बूझ तब होती है जब आपको एहसास होता है कि आप बाक़ी सबको कम आँक रहे थे। एक बार यह नज़र आ जाए, तो फिर अनदेखा करना मुश्किल है। अच्छी चौतरफ़ा (interdisciplinary) सोच के लिए यह समझ बेहद ज़रूरी है।

ये समझ कर हमें अपने आप में “मैं भी कर लेता” की अकड़ की जगह “पता नहीं मुझसे क्या छूट रहा है” की जिज्ञासा लानी चाहिए। अगर आपको लगता है कि आपने भौतिक शास्त्र में कोई बड़ी “खामी” ढूँढ ली है जो सारे वैज्ञानिकों और मौजूदा सिद्धांतों से छूट गई है, तो संभावना है कि आपसे कुछ छूट रहा है। हाँ, मुमकिन है कि आपने कोई बुनियादी खोज कर ली हो। अगर ऐसा है, तो अपनी खोज को तथ्यों के साथ ठीक से पेश करें ताकि दुनिया स्वतंत्र रूप से उसकी जाँच कर सके।
बकवास-छलनी
बौद्धिक राहगीर-बूझ का मतलब यह नहीं कि हम सबकी सभी बातों को सही मान लें। हर ज्ञान सम्मान का हक़दार नहीं होता। कई जगह ग़लत प्रोत्साहन (incentives) भरे पड़े हैं, बनावटी पेचीदगी है, या ऐसी शब्दावली है जो बाहरी लोगो को दूर रखने के लिए जानबूझकर बनाई गई है। बकवास को बकवास कहना भी ज़रूरी है। बौद्धिक विनम्रता की असली कला यह है की हम शुरुआत सम्मान से करें यह मानते हुए कि कुछ सीखने को है। और फिर चीज़ों को ईमानदारी से लेकिन सख़्ती से परखें।
गंभीर दावों की जाँच के लिए उन्हें एक बकवास-छलनी से गुज़ारना ज़रूरी है।अंग्रेज़ी में कुछ लोगों ने इसे ‘Baloney Detection Kit’ का नाम दिया है । नीचे एक वीडियो दिया गया है, जो Carl Sagan की किताब Demon-Haunted World के एक अध्याय “The Fine Art of Baloney Detection” से प्रेरित ऐसी ही एक प्रक्रिया समझाता है। मेरी सलाह है कि उस अध्याय पर आधारित यह लेख भी ज़रूर पढ़ें।
जब आप किसी दावे की जाँच कर रहे हों तो माइकल शर्मर की व्याख्या की कुछ बातों पर ख़ास ध्यान दे सकते हैं:
हमारा दिमाग़ पैटर्न ढूँढने के लिए बना है। ये हमारे लिए काफ़ी कारगर है, लेकिन कभी-कभी हम वहाँ भी पैटर्न देख लेते हैं जहाँ कोई है ही नहीं। आज-कल आर्टिसिफ़ियल इंटेलिजेंस की मनघडंत बातों (hallucinations) की काफ़ी चर्चा हो रही है। लेकिन हम अक्सर भूल जाते हैं की असली और सबसे पुराने Hallucinator तो हम इंसान हैं।
स्रोत कितना भरोसेमंद है? मौजूदा विज्ञान में कमियाँ या अनसुलझे अपवाद हो सकते हैं। लेकिन क्या ये लोग जो नया दावा कर रहे हैं वो अपने एजेंडे के हिसाब से चुनिंदा डेटा तो नहीं उठा रहे (जैसे क्लाइमेट चेंज को नकारने वाले)?
क्या दावे जाँचे जा सकते हैं? क्या इन्हें सिद्धांत रुप से दोहराया या गलत साबित किया जा सकता है?(अंग्रेज़ी में इसे replicability और falsifiability कहते हैं) कार्ल सेगन की “मेरे गराज में ड्रैगन“ वाली मिसाल इसका अच्छा उदाहरण है।
क्या किसी ने इन दावों को ग़लत साबित करने की कोशिश की है? लोग अक्सर कहते हैं कि उन्हें कुछ ऐसा पता है जो विज्ञान समझा नहीं पाया (जैसे होम्योपैथी, ज्योतिषि वग़ैरह के समर्थक)। क्या आपने यह भी जाँचा कि इसे ग़लत साबित करने की कोशिश हुई है या नहीं? अक्सर ऐसा पहले ही हो चुका होता है।
सबूतों का रुझान किधर है? माना आपने मौजूदा वैज्ञानिक समझ या सिद्धांत में कोई कमी या अनसुलझा अपवाद ढूँढ लिया है। आपके पास एक वैकल्पिक कल्पना (hypothesis) है जो उस कमी को पूरा करती है। लेकिन क्या आपकी कल्पना उन सभी बातों को भी समझाती है, जिनका स्पष्टीकरण मौजूदा सिद्धांत से मिल जाता है? अल्बर्ट आइंस्टीन के विशिष्ट सापेक्षता सिद्धांत (Special Theory of Relativity) ने तेज़ रफ़्तार पर न्यूटन की यांत्रिकी (mechanics) को ठीक किया, और सामान्य सापेक्षता सिद्धांत (General Theory of Relativity) ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण की जगह Spacetime Curvature लाया। लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आइंस्टीन का सापेक्षता सिद्धांत न्यूटन वाले नतीजे भी देता रहा।
मौजूदा समझ को चुनौती देने वाले सब एक जैसे नहीं होते। UFO के दीवाने कुछ शौक़िया लोग और Search for Extraterrestrial Intelligence (SETI) के वैज्ञानिकों में फ़र्क है। दोनों को एलियंस में दिलचस्पी है, लेकिन SETI वैज्ञानिक सबूत ढूँढने की कोशिश करती है, जो की निष्पक्ष रूप से जाँचे और ग़लत साबित किए जा सकते हैं। जबकि UFO के शौक़िया लोगों की बुनियाद ज़्यादातर पंथ जैसी आस्था और क़िस्सों पर टिकी है।
दिमाग़ इतना खुला रखें कि नए विचार आ सकें, लेकिन इतना भी नहीं कि भेजा बाहर गिर जाए!
व्यावहारिक तरीक़ा
इसका मतलब यह नहीं कि हम दिनभर बैठकर हर दावे की जाँच-पड़ताल करें। जिन मुद्दों की आपको सच में परवाह है, उनमें वक़्त लगाएँ । वर्तमान विवाद और सबूतों को समझें । बाक़ी चीज़ों के लिए ज़्यादातर मुख्यधारा की आम सहमति पर भरोसा किया जा सकता है। जब मैं हवाई जहाज़ में बैठता हूँ, तो बिना उसकी तकनीकियों को खुद जाँचे यह मान लेता हूँ कि ज़िम्मेदार लोगों को अपना काम आता है।
लेकिन मुख्यधारा की आम सहमति पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करने की भी आवश्यकता नहीं है, वरना वो एक आदतन रवैया बन जाता है (पॉल ग्राहम इसे ‘Aggresively Conventional’ कहते हैं)। जब कोई अलग नज़रिया सामने आए तो बस हमें “मुझे नहीं पता” या, अगर दिलचस्प लगे तो, “मैं इसके बारे में पढ़ूँगा” बोलने में झिझकना नहीं चाहिए। शायद स्ट्रिंग थ्योरी सही है। मेरे पास न इतना ज्ञान है न इतनी दिलचस्पी कि इस पर कोई राय रखूँ।
ब्रैंडोलिनी का नियम, जिसे “बकवास विषमता सिद्धांत” कह सकते हैं ये समझाता है कि “बकवास पैदा करने में जितनी ऊर्जा लगती है, उसे काटने में उससे कई गुना ज़्यादा लगती है।” जिन मुद्दों की हमें समझ और परवाह नहीं, उन पर बहस करके हमें अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करनी चाहिए।
बिना जाँच किए पक्की राय बना लेना एक भ्रम पैदा करता है जिसे हम “समझ की ख़ुशफ़हमी” कह सकते हैं (अंग्रेज़ी में इसे Illusion of Explanatory Depth कहा जाता है)। यह एक ऐसा भ्रम है जो हमें यक़ीन दिलाता है कि हम किसी विषय को उससे कहीं बेहतर समझते हैं जितना वाक़ई समझते हैं। इसे और बढ़ाता है “आसानी का जाल” या Easiness Effect। जब कोई बात समझने में आसान लगती है, तो हम उस पर ज़्यादा भरोसा कर बैठते हैं बस इसलिए कि वो “लगती अच्छी है”। पॉप साइंस की किताबें और वीडियोज में ऐसा अक्सर होता है। यूट्यूब की कुछ वीडियोज देखना और दो-चार रिसर्च पेपर्स का सिर्फ़ सार पढ़ लेना गहरा रिसर्च नहीं होता।
ध्यान रहे कि यह सब सलाह तथ्यात्मक दावों के लिए है। मूल्यों और पसंद के मामलों पर यह लागू नहीं होती। आपकी पसंद अलग हो सकती है। आपके नैतिक उसूल हो सकते हैं। झूठ बोलना बुरा है या दूध में कोला मिलाना एक अच्छा विचार है, इसका कोई वैज्ञानिक फ़ैसला नहीं हो सकता।
आपके कुछ अजीब विश्वास या मामूली अंधविश्वासी टोटके—जैसे “लकी रुमाल”—हो सकते हैं। आप ब्राह्मण के बारे में कुछ अटकलें भी लगा सकते हैं, जिनका विज्ञान ने अभी तक पक्का जवाब नहीं दिया है। मुझे नहीं पता कि मैं वाक़ई में शारीरिक रूप में मौजूद हूँ, या बस एक पात्र में रखा हुआ दिमाग़ हूँ? हमारी हक़ीक़त शायद किसी बड़ी चेतना का सपना हो। या शायद हम एक सिमुलेशन में जी रहे हों।
ये विश्वास और विचार-प्रयोग पुलियाबाज़ी तक, जब तक आप इन्हें इसी रूप में देखते हैं, तब तक ठीक हैं। हो सकता है एक दिन आपका अनुमान सच साबित हो। शायद आप ही उसके पीछे की ताक़त हों! लेकिन तब तक, ये विश्वास हैं, अटकलें हैं, आस्था का मामला है, धर्म की तरह। इनमें से कुछ का ज़वाब शायद कभी नहीं मिल सकता, क्योंकि वो ऐसे ही गढ़े गए हैं। लेकिन अगर आप इन्हें तथ्यों के साथ मिला देंगे, तो आपका ही नुक़सान होगा।
कुछ सुझाव:
अगर आप इस विषय में और जानना चाहें तो नीचे दिए गए कुछ सुझाव देख सकते हैं:
Science is Dope: इस चैनल पर कई वीडियो हैं जो भारतीय संदर्भ में अंधविश्वास और pseudo-science का पर्दाफाश करते हैं।
Bad Science: Ben Goldacre की यह किताब भी बढ़िया है।
Pseudoscience - A Very Short Introduction by Michael D. Gordin
अपनी किताब The Demon-Haunted World और विज्ञान पर कार्ल सेगन के विचार
विज्ञान को सिर्फ़ जिसे गलत साबित किया जा सके वह (Falsifiability) कहना शायद उसकी बहुत ही आसान व्याख्या होगी। मुमकिन है कि मैंने उसका अतिसरलीकरण (Oversimplification) कर दिया हो। असल में यह थोड़ा पेचीदा मामला है। अगर आप इसका दूसरा पहलू देखना चाहते हैं, तो Kuhn (1962) के विचार ज़रूर पढ़ें।
अगर इत्तिफ़ाक या संयोग देखकर आप हैरान हो जाते हैं, तो ‘The Law of Truly Large Numbers‘ पढ़ें। जब भी मेरे साथ कुछ अजीब होता है, तो मैं खुद को याद दिलाता हूँ कि एक दिन में 86,400 सेकंड होते हैं। वो संयोग सिर्फ़ एक सेकंड का था, बाकी के 86,399 सेकंड तो एकदम साधारण ही बीते थे। अब इसी बात को हफ़्ते, महीने या साल के हिसाब से सोच कर देखिए।
अगर आप Simulation Hypothesis, Brain in a Vat या Dream in a Greater Consciousness जैसे ख्यालों में खोए रहते हैं, तो आपको फ़िलॉसफी को गंभीरता से पढ़ना चाहिए। वहाँ आपको सही जवाब तो नहीं मिलेंगे (क्योंकि वे होते ही नहीं), लेकिन इन सवालों को समझने के लिए बेहतर नज़रिया ज़रूर मिल जाएगा। आप Epistemology 101 से शुरुआत कर सकते हैं।
—फहद हसीन
फहद IDinsight के साथ राज्य की क्षमता बढ़ाने पर काम करते हैं। हाल ही में उन्हें केरल में आर्थिक नीति सुधारों पर एक सीरीज़ लिखने के लिए Emergent Ventures की ग्रांट भी मिली है। वे लोकनीति, राजनीति और सामाजिक विषयों पर नियमित रूप से लिखते हैं। आप उनके लेख यहाँ पढ़ सकते हैं: First Draft
First published in English here: Intellectual Sonder
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