भारत दूध निर्यात क्यों नहीं करता? । How Can India Become a Milk Exporter?
The Challenges and Measures to Make India's Dairy Sector Export-Oriented
—अभेद मनोचा
हालिया व्यापार समझौतों की चर्चा में एक मुद्दा अक्सर सामने आता रहा है और वह है भारत का डेयरी सेक्टर। अमरीका समेत कई देशों का आक्षेप है कि भारत अपना डेयरी सेक्टर आयात के लिए खुला नहीं करता। दरअसल, भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है, फिर भी क्या वजह है कि वह एक मज़बूत निर्यातक नहीं बन पा रहा है? इसी विषय को गहराई से समझते हैं इस हफ़्ते के हमारे अतिथि लेखक अभेद मनोचा से।
अभेद एक कंसल्टेंट हैं जो ग्लोबल फार्मास्युटिकल और बायोटेक कंपनियों को उनकी रणनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए डेटा-आधारित समाधान प्रदान करते हैं। उन्होंने अशोका यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की है और वे तक्षशिला इंस्टिट्यूटशन के भी छात्र रह चुके हैं।
पिछले महीने भारत ने इस साल का अपना तीसरा बड़ा व्यापार समझौता, भारत-न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौता पूरा किया। इससे पहले भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) और भारत–ओमान व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA) भी हो चुके हैं। मौजूदा सरकार इस साल व्यापार समझौतों के लिए ज़ोरदार कोशिशें कर रही है। कुछ लोग तो मज़ाक में इसका श्रेय अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को भी दे रहे हैं कि उन्होंने ही भारत को आर्थिक सुधारों के लिए प्रेरित किया!
खैर, असली दिलचस्प बात तो वह है जो न्यूज़ीलैंड के साथ व्यापार समझौते के तुरंत बाद हुई। न्यूज़ीलैंड के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यह एक बुरा व्यापार समझौता है, क्योंकि न्यूज़ीलैंड ने भारत को बहुत ज़्यादा रियायतें दे दीं और बदले में ज़्यादा कुछ मिला नहीं। उनका खास आक्षेप यह था कि भारत ने अपने डेयरी क्षेत्र को न्यूज़ीलैंड के लिए खुला नहीं किया।
हालाँकि यह थोड़ा अटपटा मामला है। आखिर भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। अगर किसी को दूध के आयात से डर नहीं लगना चाहिए तो वह भारत होना चाहिए, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। यहीं से शुरू होती है भारतीय डेयरी सेक्टर की दिलचस्प कहानी।

भारत दूध उत्पादन में अव्वल होने पर भी दुनिया के 10 शीर्ष दूध निर्यातकों में भी शामिल नहीं है। हर साल करीब 7 अरब डॉलर का डेयरी निर्यात करने वाला न्यूज़ीलैंड, इस क्षेत्र में दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है। वहीं भारत लगभग 0.4 अरब डॉलर के निर्यात पर अटका हुआ है।

तो सवाल उठता है कि इतना दूध बनाने के बावजूद भारत दूध निर्यात क्यों नहीं कर पाता?
दूध पीता है इंडिया
पहला कारण स्वाभाविक है। भारत के अंदर ही दूध की माँग ही इतनी ज़्यादा है कि निर्यात के लिए कुछ बचता ही नहीं। न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कुछ हिस्सों में डेयरी उत्पादन मुख्य रूप से निर्यात के लिए व्यापारिक तौर पर किया जाता है। जबकि भारत में यह हमारे आहार का मुख्य हिस्सा है। इसलिए हम जितना दूध उत्पादन करते हैं, लगभग पूरा का पूरा गटक जाते हैं। लेकिन बात सिर्फ़ ज़्यादा उत्पादन की होती, तो भी भारत थोड़ा दूध तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेच ही सकता था। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। इसका मतलब है कि यह समस्या कहीं ज़्यादा पेचीदा और गंभीर है।
डेयरी है डेली इन्कम का ज़रिया
भारत के करीब 90% दूध उत्पादक छोटे किसान हैं। इनमें से ज़्यादातर के पास पाँच या उससे कम जानवर होते हैं। बहुत से किसानों के पास खेती होती है, पर उनकी रोज़ की आमदनी का ज़रिया दूध ही होता है। फसल खराब भी हो जाए तो भी दूध से कुछ न कुछ आमदनी मिलती रहती है और घर चल जाता है। इसलिए भारत में दूध उत्पादन मुनाफ़ा कमाने का नहीं, बल्कि जीविका बचाने का साधन है।
इस इकोसिस्टम में, भारत के लाखों किसानों से बहुत छोटी-छोटी मात्रा में दूध इकट्ठा किया जाता है, वह भी सुदूर और बिखरे हुए इलाकों से। नतीजतन, हमें दूध को ठंडा रखने के लिए मशीनों का इंतज़ाम करना पड़ता है और दूर के गाँवों से दूध लाने-ले जाने में ख़र्च भी बहुत ज़्यादा हो जाता है। यह सारा काम बहुत मशक्कत भरा होता है। इसी समस्या को सुलझाने के लिए हमारे यहाँ कोऑपरेटिव यानी सहकारी दूध संघों का जन्म हुआ है।
कोऑपरेटिव कैसे काम करते हैं?
भारत के लगभग हर राज्य में सहकारी दूध संघ है। गुजरात में अमूल, पंजाब में वेरका, कर्नाटक में नंदिनी, तमिलनाडु में आविन और महाराष्ट्र में महानंद। इन सभी का अपने-अपने राज्यों में दूध की खरीद और बिक्री में वर्चस्व है। औपचारिक तौर पर तो ये सरकारी संस्थाएँ नहीं हैं। राज्य सहकारी कानूनों के तहत पंजीकृत इन संस्थाओं पर दूध उत्पादक किसानों का अधिकार है। वे इन कोऑपरेटिव के सदस्य और मालिक हैं। इसलिए इनका मुनाफ़ा भी किसानों को ही जाना चाहिए, न कि सरकार को।
लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। बहुत से कोऑपरेटिव सरकार की छत्रछाया में काम करते हैं। दूध के दाम, कारोबार बढ़ाने की योजनाएँ और यहाँ तक कि ब्रांडिंग में भी बहुत ज़्यादा राजनीतिक दखलअंदाज़ी होती है। इससे इन संस्थाओं का स्वरूप कुछ ऐसा हो गया है, जो न पूरी तरह बाज़ार-आधारित है, और न ही पूरी तरह सरकारी। इसलिए ये कोऑपरेटिव खुले बाज़ार की माँग के अनुसार कीमतों में उतार-चढ़ाव और स्पर्धा नहीं कर सकते।
आइए एक उदाहरण देखते हैं अमूल का। अमूल सिर्फ़ भारत ही नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा कोऑपरेटिव है। लेकिन यह भी दूध उत्पादन नहीं करता, सिर्फ़ इकट्ठा करता है। इसने एक ऐसी व्यवस्था बनाई है जो लाखों किसानों से रोज़ थोड़ा-थोड़ा दूध लेती है, उसकी गुणवत्ता जाँचती है और एक तय दाम पर सारा दूध खरीदने की गारंटी देती है। इस व्यवस्था के ज़रिये अमूल ने कई समस्याओं को एक साथ हल किया है। अमूल की वजह से लाखों छोटे किसानों को आमदनी मिली, उनकी स्थानीय बिचौलियों पर निर्भरता घटी, मौसमी अतिरिक्त दूध को मक्खन और दूध पाउडर जैसे टिकाऊ उत्पादों में बदलने से नुकसान कम हुआ और मुनाफ़ा बाहरी निवेशकों की बजाय सीधे किसानों को मिलने लगा। लेकिन यहाँ भी राजनीति ने पीछा नहीं छोड़ा। कैसे?
भारत में दूध आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act) के तहत एक जीवन आवश्यक वस्तु मानी जाती है। इसका मतलब, सरकार को इसके उत्पादन, खरीद, कीमत और वितरण में हस्तक्षेप करने का अधिकार है। सरकार अक्सर इस अधिकार का इस्तेमाल कोऑपरेटिव के माध्यम से बाज़ार में दूध की क़ीमत पर लगाम लगाने के लिए करती है। अगर इस क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप न होता, तो जब माँग बढ़ती और आपूर्ति कम हो जाती तब दूध की कीमतें अपने आप बढ़ जातीं। कीमतें बढ़ने पर आपूर्ति बढ़ जाती तो कीमतें फिर कम हो जातीं। लेकिन असल में ऐसा होता नहीं है क्योंकि दूध के मामले में चुनावी गणित बीच में आ जाता है। चुनाव से पहले दूध की कीमत बढ़ाना सरकार को महँगा पड़ सकता है, इसलिए वह ऐसा होने नहीं देती। नतीजा यह होता है कि कीमतें जमीं रहती हैं, दूध उत्पादक कम कीमत देखकर उत्पादन कम कर देते हैं और इससे दूध की कमी हो जाती है। अमीर ग्राहक तो ज़्यादा दाम देकर दूध ख़रीद लेते हैं, पर गरीब परिवारों को दूध मिलना ही बंद हो जाता है।
हमें शायद आज यह समस्या इतनी बड़ी नहीं लगती क्योंकि हमें पर्याप्त दूध मिल जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस व्यवस्था में सब कुछ ठीक है। कोऑपरेटिव में कीमतें तय होने से किसान अपने बढ़ते खर्च के हिसाब से दाम तय नहीं कर पाते। दूध उपभोक्ताओं को यह समस्या भले ही न दिखाई दे, पर दूध उत्पादक को तो यह हर रोज़ महसूस होती है।
सहकारी संघ और स्पर्धा
एक और बड़ी समस्या यह है कि हमारे कोऑपरेटिव आपस में स्पर्धा नहीं करते। इन्हें एक-दूसरे से स्पर्धा करने से कोई कानून नहीं रोकता, फिर भी ज़्यादातर संघ अपने राज्यों की सीमा के भीतर की काम करते हैं। जब स्पर्धा नहीं होती, तो सुधार का दबाव भी नहीं होता। यहाँ स्थिरता को नवाज़ा जाता है, जबकि कोई भी बदलाव राजनीतिक रूप से जोखिम भरा माना जाता है।
इसका नतीजा यह हुआ है कि हमारी ये संस्थाएँ बहुत सारा दूध इकट्ठा करने और कीमतों के उतार-चढ़ाव को काबू में रखने में तो उस्ताद हो गई हैं, लेकिन उत्पादन बढ़ाने, नई तकनीक लाने या लागत कम करने के मामले में सुस्त पड़ गई हैं। यह एक दुष्चक्र है जिसमें जोखिम कम है पर विकास की संभावना भी न के बराबर है। इस तरह हमारे कोऑपरेटिव संघ छोटे किसानों को थोड़ी-बहुत आमदनी तो दे पाते हैं, लेकिन उत्पादन में बड़े पैमाने पर अकुशलता के कारण वैश्विक स्तर पर स्पर्धा नहीं कर पाते।
अमूल ने 2023 में कर्नाटक में प्रवेश करने की कोशिश की और इसे कड़ा राजनीतिक विरोध झेलना पड़ा। आखिरकार उसे 2025 में वहाँ प्रवेश मिला। नंदिनी ने 2024 में दिल्ली में प्रवेश किया। दोनों अभी सीमित दायरे में काम कर रहे हैं। यह सीमित स्पर्धा भी उत्पादन में कुशलता और इनोवेशन लाने में काफ़ी फ़ायदेमंद साबित हो सकती है।
इस क्षेत्र में हैटसन, हेरिटेज और कंट्री डिलाइट जैसी निजी कंपनियों के प्रवेश को कुछ लोग भारतीय डेयरी क्षेत्र में बड़े बदलाव का संकेत मानते हैं। लेकिन ये कंपनियाँ भी उसी पुराने तरीके से काम करती हैं। वही दूर-दूर बिखरे किसान, वही जानवरों की बीमारियाँ और वही कीमतों की समस्याएँ। इनका इनोवेशन खासकर ब्रांडिंग, वितरण और ग्राहक से संवाद तक ही सीमित है। यहाँ भी दूध उत्पादन की बुनियादी समस्या वैसी की वैसी ही है।
उदाहरण के लिए, कंट्री डिलाइट कंपनी शहरी ग्राहकों को टारगेट करती है, जो दूध की गुणवत्ता और शुद्धता (traceability) के लिए ज़्यादा कीमत चुकाने को तैयार होते हैं। ये वितरण और मार्केटिंग के इनोवेशन हैं, कोई ढाँचागत बदलाव नहीं। इसी तरह हैटसन भी एक मज़बूत ब्रांड के तौर पर उभरा है लेकिन उसे भी कोऑपरेटिव डेयरी के वर्चस्व और सरकारी नियमन का सामना करना पड़ता है। इन कंपनियों ने कुछ हद तक इनोवेशन किया है, हाई-प्रोटीन दूध और पनीर जैसे नए उत्पाद बाज़ार में लाए हैं। अमूल और मदर डेयरी ने भी अब ऐसे उत्पाद बनाना शुरू कर दिया है। ऐसे इनोवेशन इस क्षेत्र के विकास के लिए ज़रूरी भी हैं। ऐसी स्पर्धा समय के साथ दूध को बाज़ार में अपनी असली कीमत दिला सकती है।
कोऑपरेटिव को निर्यातक्षम कैसे बनाएँ?
भारत में निजी डेयरी कंपनियाँ अभी शुरुआती दौर में हैं। विदेशी कंपनियों से स्पर्धा न होने के कारण पूरे क्षेत्र में बदलाव की प्रेरणा भी न के बराबर है। लेकिन अगर कोऑपरेटिव अपनी भूमिका बदले, तो इस क्षेत्र में Overton Window* थोड़ी शिफ्ट हो सकती है।
जैसा कि हमने पहले देखा, कोऑपरेटिव किसानों से दूध खरीदते और उसे इकट्ठा करते हैं। इस तरीके से अन्न और आय की सुरक्षा तो मिलती है, लेकिन इससे निर्यात में बाधा डालने वाली अड़चनें दूर नहीं होतीं। भारत के इस क्षेत्र को निर्यातक्षम बनाने के लिए इन कोऑपरेटिव को उत्पादन में साझेदार बनना होगा।
भारत की समस्या पशुओं की कमी नहीं है, बल्कि प्रति पशु कम दुग्ध उत्पादन है। इन कोऑपरेटिव का किसानों से कई सालों का रिश्ता है, जिसके बल पर वे उन्हें बदलाव के लिए प्रेरित कर सकते हैं। वे किसानों को सिर्फ़ ज़्यादा जानवर के बजाय, ज़्यादा दूध देने वाले कम जानवर रखने, उनके लिए बेहतर चारा और बेहतर प्रबंधन करने को प्रोत्साहन दे सकते हैं।
सिर्फ़ दूध में फैट की मात्रा के बजाय, दूध के उत्पादन में बढ़ोतरी के आधार पर ज़्यादा पैसे दिए जाएँ। यह थोड़ा मुश्किल है क्योंकि इसमें कम उत्पादन वालों को बाहर करना पड़ सकता है। पर अगर कोऑपरेटिव किसानों को ज़्यादा दूध देने वाली नस्लें दिलाने में मदद करें, तो यह समस्या भी सुलझाई जा सकती है।
अभी कोऑपरेटिव लाखों किसानों से दूध लेते हैं और उसे एक साथ मिला देते हैं। भारत में तो यह सब चल जाता है क्योंकि यहाँ नियम थोड़े ढीले हैं, लेकिन जब निर्यात की बात आती है, तो यह सिस्टम विफल हो जाता है। अमीर देशों में गुणवत्ता के मामले में कोई समझौता नहीं किया जाता और वहाँ कीमतें स्पर्धा के आधार पर तय होती हैं। निर्यात के लिए हमें एक्सपोर्ट-ग्रेड दूध को अलग करना होगा, सभी नियमों का कड़ाई से पालन करवाना होगा और ऐसी पारदर्शक सप्लाई चेन बनानी होगी जिसमें किसान के खेत से लेकर बाज़ार तक दूध का पूरा सफ़र बिल्कुल साफ़ दिखाई दे।
जानवरों की बीमारियाँ निर्यात के रास्ते में एक और रूकावट है। अमीर देशों में बीमार जानवर का दूध बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाता। भारत में अक्सर पशुओं में बीमारियां फैल जाती हैं (हाल में 2022 में) और दूध में कीटनाशकों या एंटीबायोटिक्स के अंश भी मिलते हैं। जब तक हम खेतों तक सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित नहीं करेंगे, तब तक दुनिया के बाज़ार हमारे लिए बंद ही रहेंगे।
अंत में बात आती है खर्चे की। आज के कोऑपरेटिव लागत कम करने के लिए नहीं बनाए गए हैं। निर्यात के लिए हमें अलग प्रोसेसिंग लाइन, किसानों के साथ लंबे दौर के कॉन्ट्रैक्ट और बड़े पैमाने पर चारा प्रबंधन की ज़रूरत है। यह कोई बहुत ही तकनीकी काम नहीं है, हमें बस इसे कॉर्पोरेट तरीके से करना पड़ेगा।
पूरे देश को एक साथ निर्यातक्षम बनाने के बजाय, कोऑपरेटिव कुछ खास इलाकों या क्लस्टर पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। वहाँ सख्त नियम लागू करें, जानवरों का वैक्सीनेशन कराएँ और बेहतर मॉनिटरिंग करें। हमने फलों के उत्पादन और निर्यात के मामले में यही चीज़ें कामयाबी से अमल में लाई हैं। इसलिए इन्हें डेयरी सेक्टर में कर पाना कोई असंभव काम नहीं है। बस दिक्कत यह है कि हमारी राजनीति किसानों के बीच भेद करने से हिचकिचाती है।
असल में, हमारी कई समस्याओं की तरह यह भी एक राजनीतिक समस्या है। अगर निर्यात बढ़ाना है, तो कोऑपरेटिव पर सरकारी पकड़ ढीली करनी होगी और बाज़ार के संकेतों को खुलकर काम करने देना होगा। जब तक यह नहीं होता, कोऑपरेटिव स्पर्धा के बजाय सिर्फ़ रोज़ी-रोटी बचाने पर ही ध्यान देते रहेंगे।
किसान उत्पादक कंपनियाँ (FPO)
एक और बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या निजी कंपनियाँ दूध निर्यात कर सकती हैं? इसका जवाब हमें ‘सह्याद्री फार्म्स’ जैसे उदाहरणों में मिलता है। यह एक किसान उत्पादक कंपनी (FPO) है। कोऑपरेटिव के बजाय, एक निजी कंपनी के रूप में संगठित होने से, ये किसान राजनीतिक हस्तक्षेप से बच गए हैं। इन्हें कीमत में स्थिरता और आवश्यक वस्तु आपूर्ति जैसी कवायदें नहीं करनी पड़तीं। निजी कंपनी की तरह काम करने से यहाँ अधिक अनुशासन भी है। यहाँ सरकार अप्रत्यक्ष मालिक नहीं, बल्कि एक समर्थक (enabler) है। इसलिए यहाँ कीमत, खरीद और गुणवत्ता से जुड़े फैसले बाज़ार आधारित होते हैं।
स्थापना से ही सह्याद्री ने अपनी नज़र निर्यात पर रखी। इसने किसानों को छोटे-छोटे क्लस्टर में बाँटा। गुणवत्ता के मानकों को सख्ती से लागू किया, बीमारियों के मामले में कोई समझौता नहीं किया और बाज़ार के संकेतों को सीधे किसानों तक पहुँचाया। ख़राब गुणवत्ता वाले उत्पादों को स्वीकार करने के बजाय सीधे बाहर कर दिया।
यह मॉडल जोखिम खत्म करने की गारंटी तो नहीं देता, लेकिन यह साबित करता है कि अगर हमारी संस्थागत रचना सही हो, तो भारतीय किसान भी वैश्विक मानकों पर खरे उतर सकते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्पर्धा कर सकते हैं।
—अभेद मनोचा
मूल अंग्रेज़ी लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Why India doesn’t export Milk?
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