सरकारी कंट्रोल ने कैसे छीना भारतीय ग्राहकों का कानूनी हक़?
How Govt control has weakened Indian consumers by taking away their right to sue
—भार्गवी ज़वेरी-शाह
साल 2025 जाते-जाते भारतीय सेवा क्षेत्र में कंज्यूमर राइट्स (उपभोक्ता अधिकारों) के उल्लंघन की कई घटनाएँ हुईं। कुछ सुर्खियों में आईं, तो कुछ यूँ ही भुला दी गईं।
दिसंबर की शुरुआत में, इंडिगो ने अपनी ऑपरेशनल गड़बड़ियों और पायलटों की कमी की वजह से कई उड़ानें रद्द या रिशेड्यूल कीं। उधर अर्थव्यवस्था के एक अलग कोने में, शेयर बाज़ार में, अवधूत साठे ट्रेडिंग एकेडमी पर आरोप लगे कि उन्होंने शेयर बाज़ार की ट्रेनिंग के नाम पर छात्रों को जमकर गुमराह किया। एक और मामला, जो उतना चर्चा में नहीं रहा, क्रेडिट स्कोर से जुड़ा था। एक व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा क्योंकि Credit Information Bureau (India) Limited (CIBIL) ने कोर्ट के पुराने आदेशों के बावजूद उनका गलत क्रेडिट स्कोर ठीक करने से मना कर दिया था।
इन तीनों ही मामलों में, सरकार की किसी न किसी संस्था ने हस्तक्षेप किया ताकि असहाय भारतीय कंज्यूमर को बचाया जा सके! पहले मामले में, Director General of Civil Aviation (DGCA) ने एक ओवरसाइट कमेटी बनाई और इंडिगो के दफ़्तर में अपने लोग बिठा दिए ताकि कामकाज पर नज़र रखी जा सके। दूसरे मामले में, SEBI ने कड़ा रुख अपनाते हुए अवधूत एकेडमी को काम रोकने का आदेश दिया और जाँच पूरी होने तक उनके 500 करोड़ रुपये से ज़्यादा ज़ब्त (impound) कर लिए। और तीसरे मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने दो बैंकों से जवाब माँगा है कि भाई, कंज्यूमर का क्रेडिट स्कोर गलत क्यों है? यह केस अभी चल रहा है।
लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि सरकार की इन तमाम कोशिशों के बावजूद, उन आम लोगों को कोई ठोस राहत या मुआवज़ा नहीं मिला, जिनका असली नुकसान हुआ था। यह एक बड़े मुद्दे की तरफ़ इशारा करता है: हमारे कानूनों ने आम भारतीय कंज्यूमर्स को इतना कमज़ोर बना दिया है कि वह खुद सर्विस प्रवाइडर पर केस करके अपने लिए न्याय नहीं पा सकता। उसकी खुदमुख्तारी छीन ली गई है।
जब व्यक्ति और समूहों को अपनी कानूनी लड़ाई लड़ने देने के बजाय सरकार खुद हस्तक्षेप करने लगती है, तब यह बात सुनने में तो बड़ी अच्छी लगती है कि चलो, सरकार ही गरीबों का मसीहा बनकर खड़ी हो गई है। लेकिन असल में यह चलन कंज्यूमर्स की आवाज़, उनकी पसंद और उनके न्याय पाने के रास्ते बंद करके उनके अधिकारों को खोखला कर देता है।
सरकार द्वारा कंज्यूमर राइट्स की लड़ाई में क्या बुराई है?
जब सरकार कंज्यूमर राइट्स को अपने हाथ में ले लेती है, तब कई समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं।
सबसे पहली बात, इससे सरकार के हाथ में इतनी ताकत आ जाती है कि वह किसी भी कारोबार की आज़ादी और अधिकारों का आसानी से हनन कर सकती है।
दूसरी बात, बड़े और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली बिज़नेस सरकारी तंत्र को ही अपने कब्ज़े में कर लेते हैं। ऐसे में वे अगर कंज्यूमर राइट्स का उल्लंघन करते भी हैं, तो भी सरकार अक्सर आँखें मूंद लेती है।
तीसरी बात, सरकार के पास न तो इतना बजट होता है और न ही इतनी क्षमता कि वह सभी बड़ी कंपनियों पर लगाम कस सके। नतीजा? सरकारी एजेंसियों को चुनना पड़ता है कि वे किस पर कार्रवाई करेंगी। इसमें अक्सर वे छोटे कंज्यूमर पीछे छूट जाते हैं जिनका नुकसान कम होता है, क्योंकि यह व्यवस्था उन्हें प्राथमिकता नहीं देती।
चौथी बात, सरकार जो जुर्माना वसूलती है, वह शायद ही कंज्यूमर को मिलता है। उदाहरण के लिए, SEBI ने अवधूत साठे के मामले में पैसे तो ज़ब्त कर लिए, लेकिन क्या वह उन छात्रों को मिलेंगे जिन्हें गुमराह किया गया था? या इंडिगो के दफ़्तर में अफसरों को बिठाने से क्या उन यात्रियों को मुवावजा मिल जाएगा, जिनकी उड़ानें रद्द हुई थीं? शायद नहीं।
निजी लड़ाई की ताकत
दुनिया के जिन देशों में कंज्यूमर राइट्स मज़बूत हैं, वहाँ उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ा हथियार उपलब्ध होता है और वह है—Class Action Suit, इसे हम मोटे तौर पर सामूहिक मुक़दमा कह सकते हैं।
क्लास एक्शन यानी ऐसी कानूनी कार्रवाई जिसमें एक या कुछ लोग मिलकर उन सभी की तरफ़ से मुकदमा लड़ सकते हैं, जिनके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। इसमें छोटे-छोटे दावों को मिलाकर सामूहिक समाधान के लिए एक बड़ी कानूनी लड़ाई खड़ी की जाती है। इतिहास गवाह है कि इसी तरीके ने बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छुड़ा दिए हैं, जैसे कि,
Enron और Satyam जैसे घोटालों में निवेशकों को पैसा वापस मिला, Volkswagen ने जब अपनी कारों के डीज़ल एमिशन के आँकड़ों में हेराफेरी की, तो खरीददारों ने सामूहिक लड़ाई लड़कर बड़ा हर्जाना लिया और अमेरिका में तंबाकू कंपनियों से वहाँ की नगरपालिकाओं ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के खर्च की भरपाई करवाई।
सरकारी दखल के मुकाबले क्लास एक्शन जैसे तरीकों से कंज्यूमर का खुद केस लड़ना (Private Enforcement) कई मायनों में असरदार होता है।
सबसे पहले, यहाँ कंज्यूमर के पास अपनी पसंद का समाधान चुनने का अधिकार होता है। क्लास एक्शन का मकसद होता है पीड़ित की भरपाई करना। इसमें कंपनी को उतना ही हर्जाना चुकाना पड़ता है, जितना उसने नुकसान पहुँचाया है। दूसरी तरफ, सरकार का रवैया बेअंदाज़ होता है, कभी बहुत कड़ा तो कभी बेहद मुलायम।
दूसरा, क्लास एक्शन जैसे उपायों से पूरी कानूनी लड़ाई का बोझ सरकार पर नहीं पड़ता, बल्कि इसका खर्च और मेहनत कई लोगों में बँट जाते हैं।
तीसरा, जब कोई कंपनी देखती है कि बहुत सारे ग्राहक एक साथ कोर्ट पहुँच गए हैं, तो उसकी साख पर बन आती है। ऐसे में कंपनी खुद चाहती है कि वह ग्राहकों से माफ़ी माँगकर, हर्जाना देकर या किसी और तरह सीधा समझौता कर ले ताकि बात और न बिगड़े।
चौथा, ऐसे मामलों को दबाना कंपनियों के लिए मुश्किल होता है। अगर कोई कंपनी कुछ लोगों को मना भी ले, तो भी उसे इसका ब्यौरा सार्वजनिक करना पड़ता है और ऐसा करने पर भी पूरा केस खत्म नहीं होता।
भारत में क्लास एक्शन को कारगर कैसे बनाएँ?
ऐसा नहीं है कि क्लास एक्शन के लिए भारत में कानून नहीं है। हमारे यहाँ सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) है। कंपनियों के माइनॉरटी शेयरधारकों और ग्राहकों जैसे समूह भी विशिष्ट कानूनों के तहत एक क्लास के तौर पर मुकदमा कर सकते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 तो ग्राहकों और ग्राहक संगठनों को ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में सामूहिक मुकदमा दायर करने की अनुमति भी देता है।
अगर भारत में क्लास एक्शन मौजूद है, तो फिर भी उसका प्रभावी रूप से इस्तेमाल क्यों नहीं होता? इसके तीन बड़े कारण हैं:
पहला कारण, भारत में सामूहिक या प्रतिनिधिक मुकदमों की दिशा और फ़ैसले काफ़ी अनिश्चित रहे हैं। भारत सरकार ने 2015 में नेस्ले (मैगी नुडल्स) के खिलाफ एक सामूहिक उपभोक्ता मुकदमा दायर किया था। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और आखिरकार 2024 में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इसे खारिज कर दिया। भारत में जिन सामूहिक मुकदमों में पीड़ितों के साथ समझौता हुआ, उनमें भी 4 से 10 साल तक का समय लगा। सालों-साल की देरी के कारण कंज्यूमर ऐसे मुकदमों से कतराते हैं और कंपनियों को भी उनसे समझौता करने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती।
दूसरा कारण, भारत में क्लास एक्शन को कामयाब बनाने वाले दो बुनियादी चीज़ों की कमी है:
पहली कमी है उस ताकत की है जो पीड़ित ग्राहकों को एक साथ ला सके, जिसे अमेरिका में ‘Plaintiffs’ Lawyer’ कहा जाता है। कंज्यूमर अक्सर अलग-अलग बैकग्राउंड से आते हैं और बिखरे हुए होते हैं, जिन्हें पहचानना और संगठित करना मुश्किल होता है। अमेरिका में ऐसे वकील होते हैं जो यह काम बखूबी करते हैं। वहाँ अक्सर उनका का मज़ाक भी उड़ाया जाता है और उन्हें ‘एम्बुलेंस चेसर’ (एम्बुलेंस का पीछा करनेवाला) कहा जाता है क्योंकि वे मुक़दमा करने के लिए पीड़ितों के पीछे भागते हैं। लेकिन हकीकत में वे बिखरे हुए ग्राहकों को एकजुट करने का एक बड़ा काम करते हैं। इसके बदले वे ग्राहकों को मिलनेवाले हर्जाने का एक विशिष्ट हिस्सा फ़ीस के तौर पर लेते हैं। लेकिन भारत में वकील हर्जाने का हिस्सा फ़ीस के तौर पर नहीं ले सकते।
दूसरी कमी है लिटिगेशन फंडिंग की, जिसे भारत में अच्छा नहीं माना जाता। जैसा कि नाम से पता चलता है, लिटिगेशन फंडिंग न केवल मुकदमे का खर्च उठाती है, बल्कि पीड़ित ग्राहकों के दावों को डिस्काउंट पर खरीदकर उन्हें तुरंत पैसा भी देती है और मुक़दमे को अंजाम तक पहुँचाती है। इन दो बड़े फायदों की कमी की वजह से किसी भी प्रोफेशनल को पीड़ित ग्राहक को एकजुट करने, सबूत जुटाने और मुकदमा लड़ने की कोई ठोस प्रेरणा नहीं मिलती।
तीसरा कारण यह है कि जिन क्षेत्रों में क्लास एक्शन सबसे ज़्यादा कारगर हो सकते हैं, जैसे कि फाइनेंशियल मार्केट, वहाँ अपराधियों पर कार्रवाई का एकाधिकार सरकार ने अपने पास रखा है।
उदाहरण के तौर पर, अगर शेयर बाज़ार में किसी निवेशक के साथ धोखाधड़ी होती है, तो उसे अपनी शिकायत के लिए पूरी तरह SEBI पर ही निर्भर रहना पड़ता है। क्योंकि SEBI एक्ट के तहत कोई भी सिविल कोर्ट ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं कर सकता, जो SEBI के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। हालाँकि उपभोक्ता मंच पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है, फिर भी इस क्षेत्र में रेगुलेटर का वर्चस्व इतना ज़्यादा है कि लोग रेगुलेटर के बिना न्याय की कल्पना भी नहीं कर सकते।
चाहे वे इंडिगो के यात्री हों, ठगे गए निवेशक हों, या वह व्यक्ति जो पाँच साल से गलत क्रेडिट स्कोर का बोझ झेल रहा है, सच्चे ग्राहक संरक्षण के लिए हमें सरकारी दखल से ज़्यादा कंज्यूमर राइट्स को बल देना होगा। जब तक निजी कानूनी लड़ाई के रास्ते मज़बूत नहीं होंगे, तब तक उपभोक्ता संरक्षण महज़ सरकारी कमेटियों के उन वादों तक सिमट कर रह जाएगा, जिनसे कोई ठोस राहत नहीं मिलती।
अगर भारत वाकई कंज्यूमर्स की भलाई चाहता है, तो उसे कंज्यूमर्स को—जहाँ मुमकिन हो, वहाँ अकेले और जहाँ ज़रूरी हो, वहाँ सामूहिक रूप से—अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए सशक्त करना होगा। कंज्यूमर्स के लिए क्लास एक्शन को संभव बनाना इस दिशा में एक सही कदम होगा।
—भार्गवी ज़वेरी-शाह
भार्गवी ज़वेरी-शाह The Professeer की सह-संस्थापक तथा CEO हैं। The Professeer एक litigation analytics engine है, जो भारतीय अदालतों से जुड़े डेटा का विश्लेषण करके प्रभावी कानूनी रणनीति बनाने में सहायता करता है। भार्गवी के लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं: https://theprofesseer.com/#media
This article was originally published in The Print: Govt control has weakened Indian consumers by taking away their right to sue
अनुवाद—परीक्षित सूर्यवंशी
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