भारत में युद्ध की खबर फैलते ही हमारी सबसे पहली प्रतिक्रिया क्या होती है? वह कहाँ दिखती है? यह हमारी सीमाओं पर नहीं दिखती, न ही Twitter पर दिखती है। युद्ध की खबरों पर हमारी सबसे पहली प्रतिक्रिया दिखाई देती है मोहल्ले के किराना दुकान और सुपरमार्केट में!
हाल ही में जब व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में यह खबर फैली कि दुनिया अब बस तीसरे विश्व युद्ध के कगार पर है, तब कई भारतीयों ने अपनी तार्किक बुद्धि का इस्तेमाल भू-राजनीति जैसे विषय को समझने के लिए नहीं किया। उन्होंने अपनी सारी बुद्धि का इस्तेमाल करके बस यही सोचा कि “चलो, पहले राशन भर लेते हैं।” और देखते ही देखते दुकानों से आटा, चावल, तेल, दाल, बिस्कुट और मैगी गायब होने लगे। ऐसा लग रहा था जैसे लोग युद्ध की नहीं, दुनिया खत्म होने की तैयारी कर रहे हैं।
अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है?
आखिर हर बार जब भी कोई संकट आता है या संकट की अफ़वाह भी आती है, तो हम भारतीय तुरंत राशन की तरफ़ क्यों भागते हैं? हमें ऐसा क्यों लगता है कि जैसे हमारी पूरी सभ्यता कल सुबह खत्म होने वाली है?
कुछ हद तक इसका जवाब हमें शायद प्रकृति से मिले। गिलहरी सर्दियों से पहले अपना खाना जमा कर लेती है। चींटियाँ बारिश से पहले अन्न संग्रह करती हैं। इस तरह प्रकृति में कई जीव संग्रह करते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि ऐसा न करने से उनका अस्तित्व मिट सकता है। लेकिन उनमें और हम में एक मूलभूत फ़र्क है। वे तभी संग्रह करते हैं जब उन्हें पता होता है कि मुश्किल वक्त सचमुच आने वाला है। और संग्रह भी उतना ही करते हैं, जितना आवश्यक हो।
हमारा मामला थोड़ा अलग है। हम इसलिए संग्रह नहीं करते क्योंकि हमें पता है कि मुश्किल आ रही है। बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि किसी ने व्हाट्सएप पर लिखा है कि “मुश्किल आ सकती है”। इन दोनों बातों में उतना ही अंतर है जितना वास्तविकता और कल्पना के बीच हो सकता है।
इसे सिर्फ़ एक प्राकृतिक व्यवहार कहकर छोड़ देना आसान होगा और गलत भी। क्योंकि इंसानों के हर व्यवहार के पीछे हमेशा ज्ञान ही नहीं होता, भावनाएँ भी हो सकती हैं। भारत की कई पीढ़ियों ने भुखमरी देखी और उसी में बड़े हुए। हमारे माता-पिता और दादा-दादी को एक-एक पैसा बचाकर घर चलाना पड़ा। उन्होंने गरीबी देखी, महँगाई देखी और वह वक्त भी देखा जब जीवन-आवश्यक वस्तुएँ भी पूरी तरह खत्म हो जाती थी और फिर कब मिलेंगी इसका कोई भरोसा नहीं होता था। इन हालत में जीते हुए, उन्होंने एक स्वाभाविक पाठ सीखा—अगर आज मिल रहा है, तो थोड़ा ज़्यादा ले लो, क्या पता कल मिले न मिले।
समय के साथ हमारे हालात तो बदले, लेकिन हमारी भावनाएँ नहीं बदल पाईं। आज भी हर भारतीय घर में एक छोटा-सा गोदाम होता है, जहाँ अतिरिक्त मात्रा में दाल, तेल, चावल आदि भर के रखे जाते हैं। बाथरूम में डिटर्जेंट, साबुन और शैम्पू का इतना भंडार होता है कि मुश्किल से मुश्किल वक्त भी झेल जाए! मतलब हर चीज़ की तैयारी करके रखना जैसे हमारे DNA में बस गया है।
लेकिन तैयारी घबराहट में कब तब्दील होती है? जब उसमें गलत जानकारी मिला दी जाए।
व्हाट्सएप के इस दौर में अफ़वाहें प्रकाश से भी तेज़ गति से फैलती हैं। कोई एक संदेश भर डाल दे कि “आने वाले दिनों में गैस की कमी होने वाली है”, “बैंक बंद हो सकते हैं”, “राशन कम पड़ सकता है” और कुछ पता चलने से पहले ही चीज़ें खत्म होने लगती हैं। लोग इसलिए नहीं खरीदते क्योंकि उन्हें जानकारी पर पूरा भरोसा होता है, यह सोचकर खरीदते हैं कि अगर जानकारी सही निकली तो हमारा क्या होगा?
यहीं से शुरुआत होती है झुंड-आधारित व्यवहार की। जब आप किसी को पाँच मैगी उठाते हुए देखते हैं, तो आपका दिमाग़ तर्क नहीं करता। वह वितर्क करता है कि “शायद इसको कुछ पता है क्या?” फिर आप भी पाँच उठा लेते हैं। और जब सब इसी तरह वितर्क करते हैं, तब वह सामान भी कम होने लगता है जिसकी असल में कमी नहीं है।
मानसशास्त्र में इसे Self-fulfilling Prophecy कहते हैं। आम भाषा में हम इसे ‘सोच का सच्चाई में बदलना’ कह सकते हैं। यानी हमारा डर ही कमी बना देता है। लेकिन क्या इस व्यवहार के पीछे केवल प्राकृतिक, ऐतिहासिक और मानसिक कारण ही हैं, या कुछ और भी है? जी हाँ, एक और कारण है और वह है—सरकारी संस्थाओं में विश्वास का अभाव।
जब लोगों को सरकारी संस्थाओं पर भरोसा नहीं होता, जब उन्हें भरोसा नहीं होता कि संकट प्रणालियाँ ठीक से काम करेंगी, तब वे उनके भरोसे नहीं रहते। वे सोचते हैं कि सरकार के भरोसे रहने के बजाय बेहतर है कि घर में सामान भर लिया जाए!
इसलिए अगली बार जब किसी अफ़वाह के बाद किराना दुकान खाली होते दिखें। तो उसे सिर्फ़ अतार्किक मानसिकता मत समझ लीजिएगा। समझिएगा कि इसके पीछे कुदरती व्यवहार, ऐतिहासिक यादें, गलत जानकारी और संस्थागत अविश्वास का पूरा पैकेज है।
अगर हम भारतीयों का यह व्यवहार कम करना चाहते हैं, तो हमें इन सभी कारणों पर काम करना होगा।
— आस्था रस्तोगी
आस्था तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के Defence and Foreign Affairs विभाग में प्रोग्राम मैनेजर हैं।
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