अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक हिंदुस्तानी नज़रिया कैसे बनाया जाए?
How to develop an Indian perspective on international issues?
यह लेख पुलियाबाज़ी मैगज़ीन के जुलाई-अक्तूबर, 2026 अंक से लिया गया है। ‘विश्व मंथन में भारत’ थीम पर आधारित इस मैगज़ीन में आप ऐसे ही कई अन्य रोचक और ज्ञानवर्धक लेख पढ़ सकते हैं। यह मैगज़ीन अब प्रिंट और डिजिटल दोनों फॉर्मेट में भी उपलब्ध है। मैगज़ीन के बारे में अधिक जानकारी इसी लेख के अंत में दी गई है।
पिछली कुछ सदियों में पश्चिमी देशों ने दुनिया को अपने स्वरूप में ढाला है। पश्चिमी फ्रेमवर्क की पकड़ ने हमारी सोच और नज़रिए को प्रभावित किया है। पर आज दुनिया तेजी से बदल रही है। पश्चिमी देशों की शक्ति, उनका सामर्थ्य कम हो रहा है। उनकी सोच और विचारधारा का प्रभाव घट रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ग़ैर-पश्चिमी (Non-western) देशों का सामर्थ्य बढ़ रहा है। पहले एक ही सोच प्रबल थी। अब अनेकों विचारधाराओं का बाज़ार लग रहा है। चीन की दुकान सबसे बड़ी है। इसमें कोई शक नहीं। पर रूस, पश्चिम एशिया, यूरेशिया, अफ़्रीका, लैटिन अमेरिका और पूर्व एशिया में भी उभरते देशों से नए विचार और नई महत्वाकांक्षाएँ निकल कर आ रही हैं।
कहानी इतने पर ख़त्म नहीं होती। यूरोप और अमेरिका के संबंध कमज़ोर हो रहे हैं। और यूरोप के सामने चुनौती है अपनी एक अलग नीति बनाने की। ऐसे में हमारे पास एक अलग हिंदुस्तानी नज़रिया होना आवश्यक है, इसमें दो राय नहीं हैं। लेकिन इसे बनाया कैसे जाए? इसको लेकर कई विचार और तरीके हो सकते हैं। मतांतर भी हो सकते हैं।
पर चलिए हम समझने की कोशिश करते हैं कि हमारे नज़रिए की रूपरेखा क्या होगी? नज़रिए की बुनियाद दो सवालों पर टिकी होती है: पहला, अंतरराष्ट्रीय जगत में जो हो रहा है वह क्यों हो रहा है? और दूसरा, क्या होना चाहिए?
इसे दो उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं।
हम सभी जानते हैं कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है। लेकिन यह क्यों चल रहा है? और आगे इसमें क्या होना चाहिए? इन सवालों के जवाब ही आपका नज़रिया तय करेंगे। अमेरिका-इज़राइल बनाम ईरान युद्ध के संदर्भ में भी हमारा नज़रिया इन्हीं दोनों सवालों के जवाब पर टिका है। तो नज़रिए का मतलब हुआ विकल्पों के बीच चयन करने और किसी मुद्दे पर अपनी राय बनाने की क्षमता। और हम इस क्षमता को विकसित कर सकते हैं। अपने राष्ट्रहित की समझ बनाकर।
सभी देश अंतरराष्ट्रीय जगत में अपने हितों को साधने में सतत प्रयासरत रहते हैं। एक धारणा है कि राष्ट्रहित यानी सैन्य, आर्थिक और तकनीकी बल की वृद्धि। यह सच है कि बल के बिना कुछ नहीं हो सकता, पर बल मात्र से भी सब कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। अमेरिका के पास बल की कमी नहीं रही है। पर वियतनाम और अफ़गानिस्तान में संसाधन और बल के बावजूद जीत नहीं मिली। इराक में भारी विध्वंस हुआ। और शायद ईरान में भी ऐसा ही हो।
यानी सबसे ज़्यादा ताकतवर होना और राष्ट्रहित में सफल होना, दो अलग-अलग बातें हैं। राष्ट्रहित को अलग तरह से देखा और समझा जाना चाहिए। जो चीज़ हमें सुरक्षित, सम्पन्न और विकसित बनाने में सहायक हो और जो दुनिया में हमारा सम्मान और हमारी स्वीकृति बढ़ाए वह हमारे राष्ट्रहित में है। ग़ौर कीजिए कि सुरक्षा, विकास और संपन्नता घरेलू (domestic) उद्देश्य हैं, तथा सम्मान (Respect) और स्वीकृति (Acceptance) ये बाह्य (International) उद्देश्य हैं।
बाकी सारे उद्देश्य तो समझ में आते हैं पर ‘स्वीकृति’? जी, अंतरराष्ट्रीय जगत में आपकी पहल, आपके सुझाव और आपके विज़न की स्वीकृति ही आपके नेतृत्व की महत्वाकांक्षा को सार्थक बनाती है। आपको याद होगा कि हमारी समकालीन विदेश नीति का एक उद्देश्य भारत को ‘Leading Power’ बनाना है। भारत Leading Power बिना अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति के नहीं बन सकता। इस स्वीकृति के लिए ही हम ‘ग्लोबल साउथ’ के देशों की आशाओं, विचारों, और ज़रूरतों की ओर ख़ास ध्यान देते हैं। ‘वॉइस ऑफ़ द ग्लोबल साउथ’ नामक भारतीय विदेश नीति की पहल इसी अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति को बनाने-बढ़ाने का हिस्सा है।
इसका मतलब यह हुआ कि राष्ट्रहित को साधने के लिए अपने देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय जगत के हितों के बारे में भी सोचना ज़रूरी है। इसी बात को दूसरी तरह से कहें तो राष्ट्रवाद और अंतरराष्ट्रवाद (Nationalism and Internationalism) के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं है। यह बात भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों का प्रमुख हिस्सा है और आज़ादी से चली आ रही है। ‘सर्वजन हिताय’ या ‘मेक इन इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड’ जैसे विचार इसके सूचक हैं।
तो अपने दृष्टिकोण से अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को समझने का अर्थ हुआ उनके हमारे राष्ट्रहित पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना। और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय जगत की तीन बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है।
पहली है बैलेंस ऑफ़ पावर यानी International System में शक्ति का संतुलन। कौन से देश कितने शक्तिशाली हैं, और उनके बीच आपसी संबंध कैसे हैं, ये दोनों तथ्य हमारी विदेश नीति के प्रभाव को बहुत हद तक निर्धारित करते हैं। अगर चीन और अमेरिका दो सबसे ताकतवर देश हैं तो इंटरनेशनल सिस्टम द्विध्रुवीय यानी बाइपोलर है। दोनों से हमें अपने रिश्ते अच्छे बनाकर चलना है, और ऐसे में अगर उनके रिश्ते तल्ख़ होते हैं तो हमारा Strategic Space कम हो जाता है। और Strategic Space का कम होना यानी हमारे विकल्पों का कम होना।
दूसरी बात है दुनिया की प्रमुख विचारधाराओं का परिदृश्य (Landscape)। शीत युद्ध के बाद उदारवाद का बड़ा और व्यापक प्रभाव था। भारतीय नेताओं ने इसको समझा, आत्मसात किया और आर्थिक उदारवाद की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया। साथ ही, अपनी जनतांत्रिक व्यवस्था के उदारवादी आयामों को आगे रखते हुए पश्चिमी देशों से संबंध सुधारे। डॉ. मनमोहन सिंह ने हिंदुस्तान को एक लिबरल डेमोक्रेसी की पहचान से जोड़ा। अमेरिका और यूरोप से रिश्ते गहन हुए, और इससे अंतरराष्ट्रीय संबंधों में हमारी स्थिति मज़बूत हुई।
पिछले कुछ वक़्त से उदारवादी सोच ढलान पर है और भिन्न-भिन्न किस्म के राष्ट्रवाद और लोकलुभावनवाद (Populism) जैसी विचारधाराएँ उफ़ान पर हैं। इनका असर हमारे यहाँ भी दिखता है, पर ज़्यादा ज़रूरी सवाल यह है कि इन विचारधाराओं से निकली हुई नीतियाँ हमारे हित में हैं या नहीं? राष्ट्रवाद और लोकलुभावनवाद भूमंडलीकरण की ख़िलाफ़त करते हैं। उनको समझने से हमें भूमंडलीकरण पर अपना एक विशिष्ट नज़रिया बनाने में मदद मिलती है।
तीसरी बात है दुनिया के बहुतायत समाजों और लोगों की सामूहिक मनोदशा या कलेक्टिव साइकोलॉजी। इसे जर्मन भाषा में Zeitgeist यानी Spirit of the Age भी कहते हैं। शीत युद्ध के बाद लोग आशावादी थे कि शांति, संपन्नता और विकास का रास्ता साफ़ हो गया है और उदारवाद की गाड़ी से इन पड़ावों तक पहुँचा जा सकता है। पर आज की वैश्विक मनःस्थिति इसके विपरीत है। कई समाजों में लोग या तो निराश हैं या फिर भविष्य की अनिश्चितता से बेचैन हैं। लगभग सारे ही लोकतांत्रिक देश इस तरह की मानसिकता से प्रभावित हैं और पश्चिमी जगत को तो इस मानसिकता ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया है। इतने बड़े स्तर पर फैली मनोदशा का असर अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर पड़ता ही है। अब जब तक हमारा ध्यान वैश्विक Zeitgeist की तरफ़ नहीं जाएगा तब तक दुनिया की हमारी समझ अधूरी तो रहेगी ही, भ्रामक भी हो सकती है।
शक्ति, विचारधारा और मनःस्थिति का एक त्रिकोणीय लेंस बनाइए तो दुनिया का एक स्वरूप निकलकर आएगा। यह हमारा अपना नज़रिया बनाने का आधा काम करेगा। और आधा काम करेंगे हमारे अपने मूल्य (Values), इतिहास-बोध (Historical Consciousness) और भू-राजनीतिक स्थिति (Geopolitical Location)।
मूल्यों की बात करें तो यहाँ वे मूल्य मायने रखते हैं जिन्हें हम अंतरराष्ट्रीय संबंधों के स्तंभ के रूप में देखना चाहते हैं। इन मूल्यों का भारतीय संविधान की धारा 51 में तो उल्लेख है ही। इनका महत्व हमने अपनी जनतांत्रिक व्यवस्था को सफ़लतापूर्वक चलाने के दौरान भी महसूस किया है। इस व्यवस्था को आप लिबरल डेमोक्रेसी कहें या न कहें। हकीकत यह है कि विविधता और एकता दोनों का बैलेंस बनाकर चलना, विविधता से उत्पन्न होते मतभेदों को शांति से हल करना, वैचारिक न्यूनतमवाद (Ideological Minimalism) और सेक्युलरिज़्म, ये सारे मूल्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं। हम यह नहीं चाहते कि कोई एक धर्म या विचारधारा दुनिया पर राज करे। मतभेदों का सामंजस्य अगर हम घर में लोकतांत्रिक तरीके से करते हैं तो बाहर भी हमारी कूटनीति वही होगी। हम अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का सुधार पसंद करते हैं न कि उसका संहार। और अंतरराष्ट्रीय प्रणाली के जो मूल स्तंभ हैं, जिन्हें Westphalian System भी कहा जाता है, उन्हें हमने पंचशील सिद्धांतों में तब्दील किया है।
इतिहास-बोध ज़रूरी है आधुनिक विचार जगत में भारत के योगदान को जानने और समझने के लिए। एक आम भ्रांति है कि उदारवाद एक पश्चिमी विचार है। सच्चाई यह है कि राजा राममोहन राय से लेकर अब तक उदारवाद की भारतीय व्याख्या होती चली आ रही है। भारतीय उदारवाद भारतीय जनमानस से निकलता है और दुनिया में लिबरल डेमोक्रेसी के एक अनूठे मॉडल को प्रस्तुत करता है। आज हम मानवाधिकारों को पश्चिमी सोच और षड्यंत्र का हिस्सा मानते हैं, जबकि हकीकत यह है कि 1948 के यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स को तैयार करने में भारत की, ख़ास कर हंसा मेहता की, प्रमुख भूमिका थी। हमें यह तो पता है कि पश्चिमी उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के कटु अनुभव हमारी ग्लोबल साउथ के साथ एकात्मकता (Solidarity) के भाव का स्रोत हैं, पर हमें अब शायद यह याद नहीं रहता कि ‘छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी’ वाली सोच, जो हमने आज़ादी के साथ अपनाई थी, उसने पश्चिमी देशों के प्रति हमारी नीति में कटुता नहीं आने दी। इसका फ़ायदा हमें पिछले कुछ दशकों में पश्चिम जगत से सुधरते रिश्तों के रूप में मिला है।
और अंत में बात आती है हिंदुस्तान की भू-राजनीतिक स्थिति की। हमारा भौगोलिक विस्तार और हमारी जनसंख्या का महत्व ज़रूर है, पर उससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है हमारी भू-राजनीतिक स्थिति। और इसके दो भाग हैं।
पहला तो हमारे पड़ोसी कौन हैं और कैसे हैं? पड़ोसियों से न तो हम भाग सकते हैं, न उन्हें हम भगा सकते हैं। देशों का अंत सदियों तक नहीं होता, यानी हम अपने पड़ोसी नहीं बदल सकते, और ना ही हम अपने देश को कहीं और ले जा सकते हैं। दक्षिण एशिया हमारा क्षेत्र और हमारा भू-राजनीतिक स्थान है। हमारे और पड़ोसी मुल्कों के परस्पर रिश्तों से पड़ोस यानी Neighbourhood के पैटर्न बनते हैं। इन पैटर्न्स का हमपर दुष्प्रभाव न पड़े इसलिए चाहे किसी से रिश्ते अच्छे हों या खराब उनसे कूटनीति के द्वार खुले होने चाहिए। पाकिस्तान से रिश्ते तल्ख़ हैं, बात नहीं होती। लेकिन अगर पाकिस्तान से बात करने का ज़रिया भी ख़त्म कर दिया तो वह पड़ोसी देशों को हमारे ख़िलाफ़ उकसा कर हमारी मुश्किलें बढ़ाएगा। बल्कि ऐसा ही कुछ हुआ भी है।
भू-राजनीतिक स्थिति का दूसरा भाग है दुनिया की महाशक्तियों से आपकी भौगोलिक दूरी। अमेरिका के पड़ोस में किसी महाशक्ति के नहीं होने से उसे सुरक्षा का डर कभी नहीं रहा। इसने उसके घरेलू विकास को अभूतपूर्व बल दिया और उसके अंतरराष्ट्रीय नज़रिए पर एक आशावादी छाप छोड़ी। अमरीकी सरकारों को काफ़ी वक़्त से यह लगता आया है कि दुनिया में सैन्य बल और पैसों से मूलभूत बदलाव आसानी से लाए जा सकते हैं। यूरोप और रूस पड़ोसी हैं और दोनों महाशक्तियाँ भी हैं। इस वज़ह से यूरोप में रूस का डर (Russophobia) और रूस में यूरोप को लेकर असहजता बनी रही है। चीन भारत का पड़ोसी है और यह हमारी भू-राजनीतिक स्थिति का सबसे बड़ा घटक है। पेचीदगी तब और बढ़ जाती है जब हम पाकिस्तान और चीन के सामरिक रिश्तों को मज़बूत पाते हैं। उनके रिश्ते, और उनका अन्य पड़ोसी देशों पर पड़ता प्रभाव, हमारी अंतरराष्ट्रीय सोच को प्रभावित करते हैं। और अगर नहीं करते तो करना चाहिए।
नज़र मिलती है पर नज़रिया बनाया जाता है। और जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर हमारे घरों तक हर रोज़ पहुँच रहा है वैसे-वैसे हमारा नागरिक कर्तव्य बनता जा रहा है कि हम अपने विवेक का इस्तेमाल कर दुनिया पर अपनी समझ बनाएँ और भारतीय विदेश नीति की ख़ुद समीक्षा करें, ताकि उसे सुदृढ़ और कारगर बनाया जा सके।
ऊपर कही दो बातों को दोहराना आवश्यक जान पड़ता है। पहली, समझ का मतलब है कि कोई घटना क्यों हो रही है और उस घटना-क्षेत्र में क्या होना चाहिए? इन सवालों के जवाब देने की क्षमता। दूसरी, राष्ट्रहित को साधने का अर्थ संसाधनों को अर्जित करने तक सीमित नहीं रहता। संसाधन हितों की पूर्ति के माध्यम होते हैं। जिस तरह समाज में कुछ लोगों के अमीर होने या हथियारों की भरमार होने से वह समाज संपन्न या सुरक्षित नहीं हो जाता, उसी तरह देश की GDP या सैन्य बल अपने आप में बहुत मायने नहीं रखते। उनसे सुरक्षा और संपन्नता मिले, यह ज़रूरी नहीं। नागरिक होने के नाते इस फ़र्क़ को समझना ज़रूरी है।
और अंत में एक और बात। अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समझने के लिए थोड़ी मेहनत करनी होगी। क्योंकि इस क्षेत्र में जटिलता बढ़ गई है। एक तरफ़ हैं बैलेंस ऑफ़ पावर, सामाजिक मानसिकता और विचारधाराओं का उतार-चढ़ाव। और दूसरी तरफ़, अपनी भू-राजनीतिक स्थिति, अपने मूल्य और अपना कच्चा-पक्का इतिहास-बोध। इन सभी घटकों के मूल रूप को समझना यानी इतिहास और इतिहासबोध के, या पड़ोस और पड़ोसी के बीच के फ़र्क़ को समझना। जटिलता (Complexity) और पेचीदगी (Complication) का फ़र्क़ करना, सूर्योदय और सूर्यास्त के आसमानों के बीच फ़र्क़ करने जैसा है। दोनों दिखते एक जैसे हैं, पर होते नहीं। ऐसे में चयन-कुशलता (perceptiveness) अनिवार्य हो जाती है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति चेस का खेल कम और मैट्रिक्स की दुविधाओं जैसी ज़्यादा हो गई है। इसके सवाल सरल और रास्ते सीधे नहीं रह गए हैं। ऐसे में राज-नेताओं का लोकलुभावन जुमलों से संतुष्ट होना, विश्वगुरू जैसे शब्दों से आत्ममुग्ध होकर अपनी ही पीठ थपथपाना, अपने नागरिक कर्तव्यों से विमुख होने जैसा है।
— अतुल मिश्रा
अतुल शिव नादर विश्वविद्यालय, दिल्ली-एनसीआर में अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग में असोसिएट प्रोफ़ेसर और विभाग प्रमुख हैं। वे ‘The Sovereign Lives of India and Pakistan’ के लेखक हैं और देश के प्रमुख अखबारों में भी नियमित रूप से लिखते हैं।
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