कुछ महीनों पहले यूपी के नोएडा में औद्योगिक मज़दूरों का बड़ा विरोध-प्रदर्शन हुआ। इस दौरान, वहाँ के कामकाज और जनजीवन दोनों ठप हो गए। यूपी सरकार ने हड़ताल कर रहे मज़दूरों की मुख्य माँग मान ली और न्यूनतम मज़दूरी में थोड़ी बढ़ोतरी कर दी। स्वाभाविक तौर पर, बाकी खबरों की तरह यह मामला भी धीरे-धीरे मीडिया की सुर्खियों से गायब हो गया। लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग ऐसी हर घटना की तरह, यह घटना भी हमें गहराई से सोचने और सही दिशा चुनने का एक मौका देती है। सवाल यह है, क्या इस बार हम कुछ सीखेंगे?
माना कि हालिया सालों में भारत ने स्मार्टफोन असेंबली और सेमीकंडक्टर जैसे कुछ क्षेत्रों में अच्छी प्रगति की है, लेकिन अभी भी भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर दुनिया का वैसा ध्यान नहीं खींच पाया, जैसा कभी चीन ने खींचा था। ताज़ा लेबर फोर्स सर्वे (2025) के मुताबिक, देश के कुल श्रम बल का सिर्फ़ 12% हिस्सा ही मैन्युफैक्चरिंग में कार्यरत है (यह नंबर कंस्ट्रक्शन के बराबर है, लेकिन कृषि के 43% से काफ़ी कम है)। और पिछले कई सालों से यह आँकड़ा लगभग इतना ही है। साल 2001 के आसपास, जब चीन की प्रति व्यक्ति GDP (GDP per capita) आज के भारत जितनी थी, तब मैन्युफैक्चरिंग में उनकी हिस्सेदारी भी हमसे कुछ खास ज़्यादा नहीं थी (लगभग 15%)। लेकिन इसके बाद के 15 सालों में चीन के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जबरदस्त क्रांति आई और यह आँकड़ा बढ़कर लगभग 30% तक पहुँच गया।
मैन्युफैक्चरिंग में पिछड़ने के बावजूद, IT-BPO, बैंकिंग, इंश्योरेंस और रियल एस्टेट जैसी सेवाओं के दम पर भारत की GDP में ठीक-ठाक वृद्धि होती रही। हालाँकि इस वृद्धि का लाभ खासकर डिग्री-धारक युवाओं को मिला (और उनमें भी सबको नहीं)। हमारी वर्कफोर्स का लगभग 80% हिस्सा उच्च शिक्षित नहीं है, इसलिए उनके लिए यह वृद्धि पर्याप्त रोज़गार पैदा नहीं कर पाई।
जिन देशों ने अपना आर्थिक ढाँचा सफलतापूर्वक बदला है (स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन), उनका अनुभव बताता है कि मैन्युफैक्चरिंग के विस्तार से एक आम वर्कर के लिए बेहतर नौकरियाँ पैदा होती हैं। इससे दूसरे सेक्टरों की वस्तुओं और सेवाओं की माँग बढ़ती है तथा उन्हें नई तकनीकों का फ़ायदा भी मिलता है। इसके अलावा, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बनी चीज़ें सिर्फ़ देश के भीतर ही नहीं बिकतीं, उनका निर्यात भी हो सकता है। इसलिए यह स्थानीय माँग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया भर में बढ़ सकता है। ज़्यादातर सर्विस इंडस्ट्रीज में ये गुण नहीं होते।
वापस नोएडा आते हैं। यहाँ और पूरे NCR इंडस्ट्रियल बेल्ट में स्थित कई कारखाने ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा हैं। ये अक्सर मल्टीनेशनल ब्रांड्स के लिए उत्पादन करते हैं और छोटे एवं मध्यम उद्योगों से माल खरीदते हैं। ये कंपनियाँ बेहद प्रतिस्पर्धी वातावरण में काम करती हैं, जहाँ अपने ग्राहकों (बड़ी कंपनियों) से मोलभाव करने की इनकी क्षमता बहुत कम होती है। ऊपर से खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी रेगुलेटरी चंगुल के चलते इनकी लागत भी बढ़ जाती है। ऐसे में बाज़ार में टिके रहने के लिए इन कंपनियों को सबसे आसान रास्ता यही दिखता है कि वे मज़दूरों की मज़दूरी काट लें या उसे न बढ़ाएँ। चूँकि भारत में सरप्लस मज़दूर उपलब्ध हैं (जो पर्याप्त नौकरियाँ न बना पाने की हमारी पुरानी नाकामियों का नतीजा है), इसलिए इस पूरी सप्लाई चेन की सबसे पहली गाज सबसे कमज़ोर कड़ी यानी मज़दूरों पर ही गिरती है।
ऐसा नहीं है कि ये समस्याएँ सिर्फ़ भारत में ही हैं। लेकिन पूर्वी एशियाई देशों की तरह हम तानाशाही के ज़रिए मज़दूरों को कंट्रोल नहीं कर सकते। हम एक लोकतांत्रिक देश हैं और लोकतंत्र का मतलब सिर्फ़ समय-समय पर चुनाव कराना नहीं होता। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी यह उतना ही ज़रूरी है, फिर चाहे वह आज़ादी का अधिकार हो (जिसमें विरोध-प्रदर्शन का अधिकार भी शामिल है) या फिर बातचीत के ज़रिए मतभेदों को सुलझाना हो। हमें एक ऐसा समाधान चाहिए जो हमारी विशिष्ट परिस्थितियों के अनुकूल हो। उद्योगपतियों ने यूपी सरकार की यह कहकर आलोचना की कि उसने मज़दूरों की माँगें इतनी जल्दी मान लीं। लेकिन दूसरे नज़रिए से देखें तो यहाँ भी लोकतंत्र ही काम कर रहा था। यूपी में चुनाव ज़्यादा दूर नहीं हैं। जब चुनाव आएँगे तब आज के यही बेबस मज़दूर कल के ताकतवर वोटर बन जाएँगे। चुनाव के समय सरकारें कमज़ोर वर्ग को लुभाने के लिए जो भी कदम उठाती हैं (जैसे कैश ट्रांसफर), उन सभी में से मज़दूरों को उनकी वाजिब मज़दूरी देना सबसे कम आलोचना-पात्र कदम है।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस मज़दूरी पर यह पूरा महाभारत हुआ, वह है सिर्फ़ 10,000 से 15,000 रुपये महीना! किसी भी पैमाने पर यह मज़दूरी बेहद कम है। उन दिनों रोज़ी-रोटी की जद्दोजहद के बीच LPG सप्लाई में आई दिक्कतों ने इन मज़दूरों की ज़िंदगी को मानो रोक दिया था। ये ऐसे लोग नहीं हैं जो किसी छोटी सी बात के लिए अपनी नौकरी और कमाई को दाँव पर लगाकर सड़क पर उतर आएँगे। ये ऐसा कदम तभी उठाते हैं जब इनके पास जीने का और कोई रास्ता ही नहीं बचता।
तो फिर आगे का रास्ता क्या हो? डी-ग्लोबलाइज़ेशन, जलवायु परिवर्तन और AI की अनिश्चितताओं के बावजूद, अगर भारत को अपनी आज़ादी के 100 साल पूरे होने तक मध्यम-आय (middle-income) वाले देशों में शामिल होना है, तो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और ग्लोबल वैल्यू चेन को अहमियत देनी ही होगी। हमें यह समझना होगा कि प्रतिस्पर्धा में बढ़त सिर्फ़ सस्ते मज़दूरों के दम पर नहीं बनाई जा सकती। यह बनती और टिकती है—भरोसेमंद सार्वजनिक सुविधाओं (जैसे किफ़ायती स्वास्थ्य सेवा, परिवहन और मकान), सुचारू बुनियादी ढाँचे (‘वर्ल्ड क्लास’ नहीं, काम करने वाले) और कारोबार के लिए अनुकूल माहौल से।
ये चीज़ें कंपनियों की उत्पादकता बढ़ाती हैं, जिससे वे इसका फ़ायदा बेहतर मज़दूरी के रूप में अपने मज़दूरों के साथ भी बाँट पाती हैं। बदले में, इससे मज़दूरों की कार्यकुशलता भी बढ़ती है और बाज़ार में औद्योगिक वस्तुओं की माँग भी। हर सफल देश की कहानी के पीछे ऐसी ही एक सद्चक्र (virtuous cycle) काम करती है।
बेशक, केंद्र और कई राज्य सरकारें इस दिशा में कदम उठा भी रही हैं। लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है और इस रास्ते में कोई शॉर्टकट नहीं है। सुविधाओं और मानव विकास में निवेश करने के साथ-साथ, हमें एक नई सोच की भी ज़रूरत है, एक ऐसी सोच की जो लोकतंत्र और विकास को एक-दूसरे का विरोधी न माने। आखिरकार, एक मज़दूर और एक वोटर भी एक ही इंसान होता है।
— अमित बसोले
अमित बसोले अर्थशास्त्र और न्यूरोसाइंस के डॉक्टरेट तथा अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं।
आप उनके अन्य लेख यहाँ पढ़ सकते हैं: amitbasole.substack.com
अंग्रेज़ी में पूर्व-प्रकाशित: Times of India, April 18, 2026
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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