— सौरभ चंद्र
अमेरिका आने के बाद मेरी दोस्ती कई नई चीज़ों से हुई है। कैलिफ़ोर्निया की धूप, कॉस्टको की ट्रॉली, बच्चों के स्कूल के ईमेल, और सबसे बढ़कर—पेचकस।
हिंदुस्तान में पेचकस से हमारा रिश्ता थोड़ा दूर का रहा है। घर में पेचकस होता ज़रूर है, पर वह आमतौर पर उस डिब्बे में पड़ा रहता है जिसमें पुरानी चाबियाँ, ख़राब चार्जर, किसी अज्ञात मशीन का नट-बोल्ट, और एक अधूरी उम्मीद रखी होती है कि “कभी काम आएगा।” फर्नीचर बनवाना हो तो कारपेंटर आएगा। परदा लगाना हो तो मिस्त्री आएगा। बेड खुलवाना हो तो “लड़के” आएँगे। हमारा काम बस चाय पूछना और बीच-बीच में कहना: “भैया, थोड़ा मज़बूत रखना।”
अमेरिका में मामला उल्टा है। यहाँ फर्नीचर खरीदने का मतलब है—एक सपाट डिब्बा घर लाओ, उसे खोलो, और अपने भीतर छिपे हुए मैकेनिकल इंजीनियर को जगाओ। डिब्बे में लकड़ी के टुकड़े होंगे, पन्नी में बंद स्क्रू होंगे, कुछ अजीब-सी धातु की चीज़ें होंगी, और एक निर्देश-पुस्तिका होगी जिसमें इंसान नहीं, बस चित्र होंगे।
पहली बार मैंने सोचा, यह कैसा मज़ाक है। पैसे मैंने दिए, सामान मैंने ढोया, और अब बनाऊँ भी मैं? पर जैसे-जैसे स्क्रू अपनी जगह बैठते गए, मुझे लगा कि यह मज़ाक नहीं, कमाल है। यह सिर्फ़ फर्नीचर नहीं था। यह डिज़ाइन, उत्पादन, लॉजिस्टिक्स और श्रम-बाज़ार की एक छोटी-सी क्लास थी।
तैयार कुर्सी अपने साथ हवा भी ले आती है—जगह घेरती है, टूटती है, महँगी पड़ती है। वही कुर्सी सपाट डिब्बे में आए तो ट्रक, गोदाम, दुकान और ग्राहक की कार—सबकी क्षमता बढ़ जाती है। यानी डिज़ाइन ने ट्रांसपोर्ट, वेयरहाउसिंग और रिटेल—तीनों की समस्या हल कर दी।
असल कमाल यह है कि फर्नीचर की मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली को अलग कर दिया गया है। हमारे यहाँ कारपेंटर अक्सर घर पर ही मैन्युफैक्चरिंग कर रहा होता है—नाप यहीं, कटाई यहीं, घिसाई यहीं, फिटिंग यहीं। यानी आपका ड्रॉइंग रूम अस्थायी वर्कशॉप बन जाता है। इसके उलट flat-pack मॉडल में हर पुर्ज़ा मशीनें बनाती हैं: सही नाप, सही छेद, सही किनारा, सही फिनिश। फ़ैक्टरी में scale है, precision है, quality control है। घर पर सिर्फ़ असेंबली बचती है। इसलिए चीज़ अच्छी भी बनती है और सस्ती भी। महँगा हुनर वहाँ लगता है जहाँ उससे सबसे ज़्यादा उत्पादकता निकले; साइट पर केवल उतना काम आता है जितना सचमुच साइट पर होना चाहिए। इंजीनियरिंग की भाषा में इसे Design for Assembly कहेंगे। पर असल में यह Design for Society भी है। हर काम के लिए विशेषज्ञ नहीं चाहिए।
हमारे यहाँ अक्सर सस्ता माल मतलब घटिया माल माना जाता है। यहाँ कई बार सस्ता माल इसलिए सस्ता है क्योंकि व्यवस्था ने उसे सस्ता होने दिया है—स्टैंडर्ड पार्ट्स, सही छेद, साफ़ निर्देश, चुस्त सप्लाई चेन। हिंदुस्तान में श्रम सस्ता है, इसलिए हम बहुत-सी समस्याएँ श्रम से हल कर लेते हैं: आदमी बुला लो, चार लोग उठा लेंगे, जुगाड़ से फिट हो जाएगा। यह सुविधाजनक है, पर डिज़ाइन सुधारने का दबाव कम कर देता है।
अमेरिका में श्रम महँगा है, इसलिए डिज़ाइन को मेहनत करनी पड़ती है। सिस्टम को सोचना पड़ता है। अगर हर घर में मिस्त्री भेजना महँगा है, तो उत्पाद ऐसा बनाओ कि ग्राहक खुद जोड़ ले। अगर रिटेल स्पेस महँगा है, तो पैकिंग सपाट करो। अगर ट्रकिंग महँगी है, तो वॉल्यूम घटाओ। अगर ग्राहक सेवा महँगी है, तो मैनुअल ऐसा बनाओ कि फ़ोन करने की नौबत ही न आए।
अब सवाल यह है कि हिंदुस्तान को क्या करना चाहिए? क्या हम सबको पेचकस पकड़ा दें? नहीं। बात पेचकस की नहीं, सोच की है।
हमारे देश में उत्पादन की चर्चा अक्सर बड़ी-बड़ी बातों में होती है—मैन्युफैक्चरिंग शेयर, पीएलआई, एक्सपोर्ट, चीन-प्लस-वन, सेमीकंडक्टर। ये सब ज़रूरी हैं। पर समृद्धि की असली परीक्षा छोटी चीज़ों में है। क्या हमारी अलमारी बिना गाली दिए जुड़ती है? क्या बच्चों की स्टडी टेबल का स्क्रू तीसरे दिन ढीला नहीं पड़ता? क्या निर्देश-पुस्तिका पढ़कर सामान्य आदमी काम कर सकता है? क्या दुकानदार, डिलीवरी वाला, ग्राहक, और निर्माता—सबका समय बचता है?
पब्लिक पॉलिसी की भाषा में इसे Productivity कहेंगे। आम भाषा में कहें तो—कम झंझट में अच्छा काम। यहीं से तरक़्क़ी फूटती है; यहीं अमीरी जन्म लेती है।
पर हिंदुस्तान के लिए इसका मतलब यह नहीं कि हम हर कारपेंटर की छुट्टी कर दें और सबको पेचकस पकड़ा दें। हमारी अपनी ताक़त है। हमारे पास हुनरमंद और अभी भी अपेक्षाकृत सस्ता श्रम है। सवाल यह है कि उस श्रम को कहाँ लगाएँ। अगर मशीनें कारखाने में हर पुर्ज़ा सही नाप और अच्छी फ़िनिश के साथ बना दें, और साइट पर कारपेंटर सिर्फ़ मुश्किल असेंबली, फ़ाइनल फिटिंग और ग्राहक की ज़रूरत के हिसाब से छोटे बदलाव करे, तो शायद हमारा मॉडल अमेरिका से भी बेहतर हो सकता है। वहाँ ग्राहक अकेला पेचकस लेकर बैठा है; यहाँ मशीन की सटीकता और कारीगर का कौशल—दोनों साथ काम कर सकते हैं।
हो सकता है किसी दिन कोई अमरीकी हिंदुस्तान आए, किसी छोटे शहर में सुंदर, सस्ता, मशीन-कटा, कारपेंटर-फिट फर्नीचर देखे, और वापस जाकर लेख लिखे—“हथौड़ा मेरा दोस्त।” तब तक मैं यहाँ पेचकस से दोस्ती निभा रहा हूँ।
— सौरभ चंद्र
सौरभ पुलियाबाज़ी के सह-संस्थापक तथा Ati Robotics के संस्थापक-CEO हैं।
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बहुत सही लिखा अपना हाथ जगन्नाथ सब काम अपने आप करना इसलिए फादर्स डे पर अमेरिकन बच्चे अपने पिता को टूल बॉक्स गिफ्ट करते हैं अपना बाथ रूम साफ़ करो हमाम टब साफ़ करो कपड़ों को लांड्री में डालो निकालो सुकने डालो फिर प्रेस करो आदि . अकेले रहने वाले बुजुर्ग फिर थक जाते है एंड भारत को याद करते हैं . अमेरिका में पैसा है पर आराम नहीं ?