कोक्रोच जनता पार्टी (CJP) को पूरे देश से, खासकर युवाओं से, जो अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हुआ वो हम सभी ने देखा। ज़ाहिर है देश में शिक्षा और रोज़गार के खस्ता हालात से युवा काफ़ी परेशान हैं और CJP को उनका समर्थन इसी हताशा का प्रतीक है। जब राजनीतिक भागीदारी के बाकी रास्ते बंद हो जाते हैं, तो आखिरकार राजनीति सड़कों पर उतर आती है और ऐसे आंदोलन होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि आंदोलन के आगे क्या? हमारी समस्याएँ सुलझाने के लिए हमें और क्या-क्या करना होगा? आज की टिप्पणी में इसी पर अपने विचार पेश कर रहे हैं अमृता और चिराग।
हालिया सरकार सिर्फ़ एक ही तरह की राजनीतिक भागीदारी को असली मानती है और वह है वोटों की भागीदारी। मीडिया सरकार की सांस्कृतिक उपलब्धियों का जश्न मना रही है और भारत को “विश्वगुरु” बता रही है। अब तक इस सरकार को खराब नीतियों की कीमत बहुत कम चुकानी पड़ी है और इसलिए आम भारतीयों की असली तकलीफ़ें कम नहीं हो रही हैं। हाल फ़िलहाल तक सोशल मीडिया पर भी सत्ता पक्ष का ही वर्चस्व था, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने इस किले में सुरंग लगा दी और सोशल मीडिया को जनता के लिए वापस जीत लिया।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा राजनीतिक जवाबदेही की एक जीत है और लोकतंत्र में जवाबदेही ज़रूरी है, लेकिन सिर्फ़ जवाबदेही काफ़ी नहीं है। हमें ज़रूरत है गहरे नीतिगत (policy) सुधारों की, जिसके लिए हमें बुनियादी समस्याओं को समझना होगा।
जंतर-मंतर और देश के अन्य हिस्सों में हुए हालिया प्रदर्शनों के पीछे दो मुख्य समस्याएँ थीं। आगे हम उन्हीं दो समस्याओं और उनके समाधान पर चर्चा करेंगे:
समस्या #1: एग्ज़ाम और एडमिशन को लेकर जो घबराहट है, वो असल में बेरोज़गारी के संकट से पैदा होती है। लोगों को नौकरी चाहिए, सिर्फ़़ डिग्री नहीं और भारत की अर्थव्यवस्था पर्याप्त नौकरियाँ नहीं दे पा रही है। हर साल लाखों ग्रेजुएट एक सुस्त इकॉनमी से टकरा रहे हैं।
समस्या #2: डिग्री देने वाले संस्थान तो बहुत हैं, लेकिन टॉप संस्थानों के बाद क्वालिटी में एकदम खाई है। मुट्ठी भर टॉप यूनिवर्सिटीज़ में जगह बनाना ही आगे बढ़ने का लगभग इकलौता रास्ता बन गया है।
समाधान: पेपर लीक जैसे मामलों पर हमें सरकार से जवाबदेही माँगनी चाहिए, लेकिन असली, लंबे समय का हल है आर्थिक आज़ादी (economic freedom)। इससे अच्छी यूनिवर्सिटीज़ और अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियों की संख्या खुद-ब-खुद बढ़ेगी।
ग्रेजुएट बेरोज़गारी
अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक हालिया स्टडी में भारत में रोज़गार की स्थिति का विश्लेषण किया गया है। जो ग्रेजुएट बेरोज़गार हैं (यानी सक्रिय रूप से नौकरी ढूँढ रहे हैं, पर मिली नहीं रही है), उनकी संख्या कुछ इस तरह है:
25 साल से कम उम्र वालों में 40%
25-29 साल की उम्र वालों में 20%
30 से ऊपर वालों में यह आंकड़ा घटकर 10% से भी कम रह जाता है
यह पैटर्न बताता है कि लोग एक अच्छी नौकरी का इंतज़ार कर रहे हैं।
25-29 साल की उम्र वर्ग में 20% बेरोज़गारी का मतलब 60 लाख से ज़्यादा पढ़े-लिखे भारतीय बिना नौकरी के बैठे हैं। यह स्थिति बहुत ही चिंताजनक है।
कॉलेज के बाद के साल ज़िंदगी के सबसे रचनात्मक, ऊर्जा से भरे और स्वतंत्र होते हैं, और इन्हें बेकार गंवाना व्यक्ति और देश की अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए एक बड़ा नुकसान है। अगर डिग्री से नौकरी नहीं मिलती, तो कॉलेज सिर्फ़़ बेरोज़गारी को कुछ साल टालने का एक महँगा तरीका बनकर रह जाता है। कॉलेज को “युवाओं का पालनाघर” नहीं बनना चाहिए।
बढ़ती ग्रेजुएट बेरोज़गारी का मतलब है ग्रेजुएट्स के बीच बढ़ती स्पर्धा और इसका नतीजा है सैलरी का जम जाना। डेटा भी यही बताता है: 2011 के बाद से महँगाई का हिसाब लगाने पर असल सैलरी (real wages) घटी ही है। यह आँकड़ा भी उसी अज़ीम प्रेमजी रिपोर्ट से है:
किसी को लगेगा कि भई, बेरोज़गार ग्रेजुएट्स की संख्या इतनी ज़्यादा है तो कंपनियों के लिए तो यह अच्छी बात है। वे इनमें से अच्छे-से-अच्छे उम्मीदवारों को चुन सकती हैं। लेकिन कंपनियाँ शिकायत कर रही हैं कि उन्हें अच्छे उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं। ManpowerGroup के एक सर्वे के मुताबिक, 82% भारतीय कंपनियों को क्वालिटी उम्मीदवार न मिलने की वजह से पदों को भरने में दिक्कत हुई। इस मामले में भारत दुनिया में 5वें नंबर पर है। आख़िर हो क्या रहा है?
यूनिवर्सिटी की गुणवत्ता
हमारा उच्च शिक्षा तंत्र एक ऐसी छलनी है जो हाई स्कूल के टॉप छात्रों को ढूँढ़कर तराशती है। इससे हमें सुंदर पिचाई और सत्या नडेला जैसे लोग मिलते हैं, लेकिन आम छात्र की अनदेखी होती है और इसका खामियाज़ा हमारी अर्थव्यवस्था भुगतती है।
भारत में युवाओं पर मुट्ठीभर अच्छे कॉलेजों में दाखिला पाने का जबरदस्त दबाव होता है। हम अपने बचपन के आख़िरी कुछ साल घर के अंदर बंद होकर, बस उस एक एग्ज़ाम की तैयारी में गुज़ार देते हैं, जो हमारी पूरी किस्मत तय करता है। हर साल कई छात्र इस दबाव तले टूट जाते हैं और अपनी जान दे देते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले पाँच सालों में NEET के तनाव से जुड़ी 93 आत्महत्याएँ दर्ज हुई हैं। सबसे डरावनी बात यह है कि भारत में छात्रों की आत्महत्या अब कोई अपवाद नहीं रह गई है। इसके पीछे की सच्चाई हर भारतीय जानता है। अच्छी शिक्षा और रोज़गार देने वाली यूनिवर्सिटीज़ बहुत गिनी-चुनी हैं। देश के सर्वोच्च संस्थानों और बाकी सबके बीच एक बहुत बड़ी खाई है।
यह हाल मेडिकल शिक्षा में सबसे साफ़ दिखता है। सीटों की कुल संख्या ही बेहद कम है। भारत में करीब 14 लाख रजिस्टर्ड डॉक्टर हैं। यानी हर 1000 लोगों पर 1 डॉक्टर से भी कम। OECD देशों में यह आंकड़ा हर 1000 लोगों पर 3.9 डॉक्टर है। प्रधानमंत्री के “विकसित भारत” विज़न का लक्ष्य है 2047 तक भारत को एक विकसित देश बनाना। देश में फ़िलहाल कुल 1.2 लाख MBBS सीटें हैं। अगर हमें 2047 तक OECD जितने डॉक्टरों के स्तर पर पहुँचना है, तो हमें क्वालिटी से समझौता किए बिना मेडिकल सीटों की संख्या लगभग तीन गुना करनी होगी। ज़रा सोचिए, एक तरफ़ हमें डॉक्टरों की इतनी सख़्त ज़रूरत है और दूसरी तरफ़ ऐसे छात्र हैं जो मेडिसिन पढ़ना चाहते थे, लेकिन मौका न मिलने पर अपनी जान दे रहे हैं।
20 साल में सीटें तीन गुना कैसे की जा सकती हैं? यह काम किसी अकेले शिक्षा मंत्री के बस का नहीं है, फिर चाहे वो कितना ही होनहार और नेकनीयत क्यों न हो। भारत की राज्य क्षमता (state capacity) पहले ही कम है, इसलिए इसे बहुत सोच-समझकर इस्तेमाल करना चाहिए। अगर हम सिर्फ़़ सरकारी मेडिकल शिक्षा के दम पर OECD के स्तर तक पहुँचने की कोशिश करेंगे, तो यह कोशिश कभी कामयाब नहीं होगी।
सरकार रास्ते का रोड़ा न बने
भ्रष्टाचार, पेपर लीक और आत्महत्याओं की जड़ में जो एग्ज़ाम का प्रेशर है, उसे कम करने का एकमात्र टिकाऊ तरीका है—एक अकेले एग्ज़ाम की अहमियत को घटाना। इसके लिए हमें अच्छी उच्च शिक्षा संस्थाओं और अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियों की संख्या बढ़ानी होगी। और इन दोनों के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट है सरकार का दमघोटू रेगुलेशन।
UGC के 2003 के नियमों के मुताबिक, कोई भी प्राइवेट यूनिवर्सिटी खोलने के लिए राज्य विधानसभा या संसद का एक कानून (Act) ज़रूरी है। राज्य दर राज्य शर्तें अलग-अलग हैं। उत्तर प्रदेश में तो शहरी इलाके में 20 एकड़ और ग्रामीण इलाके में 50 एकड़ लगातार (contiguous) ज़मीन, 5 करोड़ रुपये की शुरुआती पूँजी और 24,000 वर्ग मीटर बिल्ट-अप एरिया चाहिए। इस हिसाब से तो हार्वर्ड और MIT जैसी यूनिवर्सिटीज़ भारत में शुरू ही नहीं हो पातीं। आज भी इनके पास इतना बड़ा लगातार ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि ये शहर के अलग-अलग हिस्सों में फैली हुई हैं। हार्वर्ड के अलग-अलग कैंपस के बीच से तो एक नदी तक गुज़रती है। MIT की शुरुआत 1865 में बोस्टन की एक किराए की इमारत से हुई थी, और उसकी पहली अपनी बिल्डिंग तब भी बन ही रही थी।
यही UGC के नियम यह भी कहते हैं कि यूनिवर्सिटीज़ अपने शेयरधारकों के लिए मुनाफ़ा नहीं कमा सकतीं। तो हमारे पास बस दो ही रास्ते बचते हैं: या तो सरकार यूनिवर्सिटी खोले, या कोई निजी व्यक्ति इसे “राष्ट्र-सेवा” समझकर खोले। सरकार के पास संसाधनों की कमी है, तो हमारे छात्रों का भविष्य कुछ गिने-चुने भले लोगों की नेकनीयत पर टिका रह जाता है। लेकिन नेकनीयत “स्केल” नहीं करती। जो चीज़ स्केल करती है, वो है लोगों की वो चाहत, जिसमें वे एक बढ़िया सेवा देकर मुनाफ़ा कमाना चाहते हैं। ऐसी सेवा जिसके लिए परिवार पैसे देने को तैयार हों।
पर क्या प्राइवेटाइज़ेशन से शिक्षा महँगी नहीं हो जाएगी और ग़रीब इससे बाहर नहीं हो जाएँगे? दरअसल, एक मुक्त बाज़ार प्रतिस्पर्धा बढ़ाता है और स्पर्धा बढ़ने से कीमतें घटती हैं। आज प्राइवेट शिक्षा इसलिए महँगी है क्योंकि यूनिवर्सिटीज़ कम हैं और एडमिशन की इच्छा वाले ज़्यादा। तो क्या डीरेगुलेशन से शिक्षा की क्वालिटी गिर जाएगी? कार्तिक मुरलीधरन की एक स्टडी में प्राइवेट और सरकारी प्राइमरी स्कूलों की तुलना की गई और पाया गया कि प्राइवेट स्कूलों के आउटकम बराबर या बेहतर हैं और खर्च भी काफ़ी कम है। प्राइवेट स्कूल में प्रति छात्र औसत खर्च, सरकारी स्कूल के मुकाबले सिर्फ़़ एक-तिहाई है। इस विषय पर कार्तिक का पेपर या लेख भी आप पढ़ सकते हैं।
मुश्किल यह है कि सभी बड़ी प्रवेश परीक्षाएँ केंद्र सरकार ही संचालित करती है। NEET देश की हर MBBS सीट के लिए अनिवार्य प्रवेश परीक्षा है। मान लीजिए कोई अपनी जमापूँजी लगाकर और तमाम नियमों की बाधाएँ पार करके एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज खोल भी ले, तो भी वो अपने छात्र खुद नहीं चुन सकता। उसे छात्रों की भर्ती NEET के ज़रिए ही करनी होगी। प्रणय कोटस्थाने तो कहते हैं कि भारत को प्रवेश परीक्षाएँ लेने और राष्ट्रीय शिक्षा नीतियाँ बनाने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ज़रूरत ही नहीं है, डिसेंट्रलाइजेशन और डीरेगुलेशन ही इसका समाधान है।
यूनिवर्सिटीज़ की तरह ही, कारोबार भी भारी रेगुलेशन, सख़्त श्रम कानूनों और पूँजी पर लगी बंदिशों के बोझ तले दबे हैं, जो उन्हें बढ़ने और नौकरियाँ देने से रोकते हैं। भारत की 99% से ज़्यादा औद्योगिक कंपनियाँ MSME हैं। इनके लिए एक बड़ी कंपनी बन पाना लगभग नामुमकिन है।
अर्थशास्त्री श्रुति राजगोपालन और कादंबरी शाह अपने एक पेपर में बताते हैं कि MSMEs को किस तरह के अनुपालन (compliance) की भरमार झेलनी पड़ती है। वे लिखती हैं:
भारत के व्यापार-नियमन ढाँचे में कुल मिलाकर केंद्र और राज्य स्तर पर 1,536 कानून, 69,233 अनुपालन शर्तें (compliance requirements) और 6,632 फाइलिंग्स शामिल हैं। इसे ही मनीष सभरवाल भारत का “रेगुलेटरी कोलेस्ट्रॉल” कहते हैं।
वे एक अजीबोग़रीब नियम की मिसाल भी देती हैं:
फ़ैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948... निर्माण से जुड़े प्रतिष्ठानों को “मुलायम” और “सोखने वाला” टॉयलेट पेपर रखना अनिवार्य बनाता है, और यह भी तय करता है कि शौचालय व मूत्रालय की फ़र्श और दीवारें, 90 सेंटीमीटर की ऊँचाई तक चमकदार टाइलों या ऐसी ही सामग्री से बनी होनी चाहिए (धारा 19)।
नई कंपनियों को इतना रेगुलेटरी नाच नचाकर (और बचने के लिए रिश्वत देने पर मजबूर करके), हम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। जबकि उन्हें बढ़ने देने से ही वो नौकरियाँ पैदा हो सकती हैं, जिनकी हमारे युवाओं को सख़्त ज़रूरत है।
बात का निचोड़
भारत की कई समस्याएँ, जिनमें उच्च शिक्षा में गड़बड़ी और बेरोज़गारी भी शामिल हैं, तभी कम हो सकती हैं जब हम लोगों को आपस में एक-दूसरे की सहमति से आर्थिक लेन-देन करने की आज़ादी देंगे। बशर्ते इससे किसी तीसरे को नुकसान न पहुँचे। अगर आप नीतिगत सुधारों को और गहराई से समझना चाहते हैं तो आपको विजय केलकर और अजय शाह की किताब In Service of the Republic ज़रूर पढ़नी चाहिए। अगर आपके पास वक्त कम है, तो आप ग्राफ़िक नॉवेल We, The Citizens भी पढ़ सकते हैं। यह भी उतना ही दिलचस्प है, जितने CJP के रील्स।
कॉकरोच जनता पार्टी ने युवाओं में एक ऐसी राजनीतिक हलचल पैदा की है जो पहले कभी नहीं देखी गई। युवाओं को अच्छे शासन की माँग करते देखकर उम्मीद बंधती है कि भारत में लोकतंत्र फिर से जिंदा हो सकता है। आइए, इस बीज को विकास-केंद्रित नीतियों के जल से सींचें, ताकि भारत रहने लायक एक बेहतर जगह बन सके।
— अमृता सिंग और चिराग गुप्ता
अमृता न्यूरोसाइंटिस्ट हैं और चिराग AI रिसर्चर हैं। अमृता और चिराग दोनों ही विज्ञान, लोकनीति और अर्थशास्त्र में दिलचस्पी रखते हैं तथा इन विषयों पर नियमित रूप से लिखते हैं।
मूल अंग्रेज़ी लेख: What next for the CJP movement?
अमृता और चिराग के अन्य लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं:
अमृता: Learning To Be Happy | चिराग: New Frames
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