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Seema Rani Bedi's avatar

बिल्कुल सही विश्लेषण।

जवाबदेही जरूरी है, लेकिन असली मुद्दा उससे आगे का है। ग्रेजुएट बेरोजगारी के आंकड़े (25 से कम उम्र में लगभग 40% और 25-29 में 20%) और टॉप संस्थानों के बाद क्वालिटी की भारी गिरावट — ये दोनों मिलकर युवाओं की बेचैनी का बड़ा कारण हैं।

डिग्री तो मिल रही है, लेकिन रोजगार और असली स्किल्स का अभाव साफ दिख रहा है।

इसके साथ एक और महत्वपूर्ण बात याद रखने की है। आज़ादी के समय तय हुआ था कि शिक्षा और सेहत सरकार के नियंत्रण में रहेंगी। 1985-90 तक देश के ज्यादातर हिस्सों में स्कूल और कॉलेज सरकारी ही थे। निजी संस्थान बहुत कम थे।

लेकिन धीरे-धीरे शिक्षा, सेहत और बीमा — ये तीन क्षेत्र निजीकरण के लिए चुने गए क्योंकि इनमें लोग पहले पैसा दे देते हैं, बिना ज्यादा सवाल-जवाब के। आज नतीजा यह है कि देश की लगभग 90% शिक्षा, सेहत और बीमा निजी हाथों में चली गई है। सरकारी स्कूल-कॉलेज गिनती के रह गए हैं।

शिक्षा का हाल और भी साफ दिखता है। एक समय हाई स्कूल के अंकों के आधार पर कॉलेज में एडमिशन हो जाता था। अब वह व्यवस्था लगभग बेमानी हो चुकी है। स्कूल की फीस दो, एग्जाम की फीस भरो, ट्यूशन की फीस भरो, प्रवेश परीक्षा की फीस भरो, फिर कॉलेज की लाखों की फीस भरो — और आखिर में रिजल्ट ताएँ-ताएँ फिश। इतना बोझ उठाने के बाद भी बच्चे और उनके परिवार संघर्ष कर रहे हैं।

जब गुणवत्ता वाली सार्वजनिक संस्थाएँ कमजोर पड़ जाती हैं और पूरा बोझ परिवारों पर डाल दिया जाता है, तो दबाव और बढ़ता ही जाता है।

अब सवाल यह है कि शिक्षा की क्वालिटी, किफायती विकल्प और रोजगार पैदा करने वाले सुधारों को कैसे एक साथ आगे बढ़ाया जाए?

Tuṣār Kar's avatar

सीजेपी के नेतृत्व ने कृषि reforms का विरोध किया tha और हालिया विरोध प्रदर्शनों के बीच मुक्त व्यापार समझौतों के खिलाफ किसानों के दिल्ली कूच के आह्वान का समर्थन किया।

(सीजेपी की यह हालिया सफलता कम सीजेपी की अपनी सफलता थी और ज़्यादा सरकार की विफलताओं के प्रति गुस्से, एक मरते हुए प्रतिभाशाली व्यक्ति के प्रति सहानुभूति, और ऐसे मामले को संभालने में सरकार के घोर अहंकार का परिणाम थी - वे बस एक माध्यम थे।)

इसलिए सीजेपी से आर्थिक सुधारों और निजीकरण की उम्मीद करना वैसा ही है जैसे बीजेपी, एआईएमआईएम, आईयूएमएल या एसएडी से फ्रांसीसी शैली की Laicite या सोवियत शैली के State - Atheism को लागू करने की उम्मीद करना।

उनकी मूल विचारधारा अंबेडकरवाद है - जो जातिगत प्रतिनिधित्व की लड़ाई है (यानी सामने से जाति के संस्थानीकरण को बढ़ावा देना और पीछे से उसके उन्मूलन की बात करना) - और इसके साथ हल्का साम्यवाद भी।

ज़्यादा से ज़्यादा वे बुनियादी मुद्दों के लिए लोगों को संगठित करने वाले एक दबाव समूह की भूमिका निभा सकते हैं, जैसे बदहाल स्कूलों के मुद्दे पर। (हालाँकि बड़े नीतिगत और संरचनात्मक सुधारों के बिना इसमें किसी परिवर्तनकारी स्तर का सुधार होना मुश्किल ही है।)

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