21वीं सदी के भारत में क्यों हैं 19वीं सदी के कानून?
—अर्जुन कृष्णन, भुवना आनंद और प्रांजल चंद्र
काम के घंटों (working hours) का फैक्ट्रियों की कमाई और मज़दूरों की ज़िंदगी पर सीधा असर पड़ता है। रिसर्च बताता है कि अगर काम के घंटों में लचीलापन हो, तो काम ज़्यादा बेहतर तरीके से होता है। इससे मालिकों को तब ज़्यादा काम करवाने की सुविधा मिलती है जब माँग ज़्यादा हो और मज़दूरों को भी ज़्यादा पैसे कमाने का मौका मिलता है। जब बाज़ार में माँग बढ़ती है, तो अपनी मर्ज़ी से ओवरटाइम करके वर्कर्स अपनी कमाई बढ़ा सकते हैं (Hart & Ma, 2008)। आधुनिक बाज़ार में टिके रहने और तरक्की के लिए काम के घंटों में ज़रूरत के हिसाब से बदलाव करना बहुत ज़रूरी होता है (Daniel Vazquez-Bustelo & Lucia Avella, 2006; Wickens, 1974)।
लेकिन भारत के नियम मज़दूरों और मालिकों को इस तरह काम के घंटों में बदलाव करने की कोई आज़ादी नहीं देते। भारत में हर हफ़्ते के लिए काम के 48 घंटों की एक सख्त सीमा तय की गई है। जब माँग अचानक बढ़ती है, तो कंपनियाँ इन घंटों को बढ़ा नहीं सकतीं। उनके पास सिर्फ़ एक ही रास्ता बचता है— ओवरटाइम का। और ओवरटाइम के लिए भारत में कंपनियों को दोगुनी दर से पैसा देना पड़ता है, जो पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा है।
हम हमारी वेबसाइट prosperiti.org.in पर जल्द ही एक स्टेट ऑफ़ रेगुलेशन रिपोर्ट प्रकाशित करने वाले हैं। उसमें आप देख पाएँगे कि कैसे भारतीय फैक्ट्रियाँ न तो रफ़्तार में और न ही खर्च के मामले में दुनिया का मुकाबला कर पा रही हैं। यही वजह है कि वैश्विक बाज़ार में भारत एक भरोसेमंद सप्लायर नहीं बन पा रहा है।
यह लेख इस पूरी स्थिति को आर्थिक इतिहास के नज़रिये से देखता है और यह समझाने की कोशिश करता है कि भारत इस स्थिति में कैसे फँसा। यह दिखाता है कि भारत और ब्रिटेन में काम के घंटों के नियम कैसे बदले। दरअसल, ब्रिटेन के व्यापारियों ने अपने फ़ायदे के लिए और ब्रिटिश राज ने शांति बनाए रखने के लिए भारत में काम के घंटों पर पहली बार पाबंदी लगाई थी। अंत में, हम इतिहास से सीखेंगे कि आज भारत के पास क्या विकल्प हैं ताकि वह मैन्युफैक्चरिंग में दुनिया का पॉवर हाउस बन सके।
फैक्ट्री के नियमों की शुरुआत कैसे हुई?
भारत में काम के घंटों पर लगाम लगाने की बात सबसे पहले ब्रिटेन के कॉटन और जूट व्यापारियों ने उठाई थी। उन्हें भारतीय कंपनियों से कड़ी टक्कर मिल रही थी और वे डर गए थे। 1800 के दशक के आखिर में, ब्रिटेन मैनचेस्टर (इंग्लैंड) और डंडी (स्कॉटलैंड) के व्यापारियों ने ब्रिटिश संसद में भारत के खिलाफ़ आवाज़ उठानी शुरू कर दी। उनका कहना था कि भारतीय मिलें बिना किसी पाबंदी के लगातार चलती हैं, जिससे उन्हें गलत तरीके से फ़ायदा मिल रहा है (Das, 1923; Tomlinson, 2015)। 1851 में पहली लोकल मिल खुलने के बाद से भारत में कपड़ा और जूट की फैक्ट्रियाँ बहुत तेज़ी से बढ़ रही थीं। 1870 के दशक के अंत तक, बॉम्बे और कलकत्ता में कम से कम 80 फैक्ट्रियाँ थीं, जहाँ रोज़ाना 60,000 से ज़्यादा मज़दूर काम करते थे (Das, 1923; Kydd, 1920)।
भारतीय मिलों को इस स्पर्धा में बढ़त हासिल थी। जहाँ ब्रिटेन में बच्चों और महिलाओं को दिन में 12 घंटे से ज़्यादा काम करने की अनुमति नहीं थी, भारत में ऐसी कोई पाबंदी लागू नहीं थी1। मैनचेस्टर चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के कहने पर और भारतीय राष्ट्रवादियों के विरोध के बावजूद, अंग्रेज़ सरकार ने भारत में काम के घंटों पर पहली पाबंदी लगाई, 1881 में बच्चों के लिए और 1891 में महिलाओं के लिए (Das, 1923; Gilbert, 1982)। ब्रिटेन के इसी स्वार्थ की वजह से 1911 में भारतीय कपड़ा फैक्ट्रियों में प्रौढ़ पुरुषों के लिए भी काम के घंटों की सीमा तय कर दी गई। जबकि ब्रिटेन में इस तरह का कानून अगले 60 साल बाद आया (Das, 1923)।
उसी अंग्रेज़ सरकार ने 1921 में भारत को अंतरराष्ट्रीय मानकों से बाँध दिया और भारत अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का एक संस्थापक सदस्य बन गया। जब पहला विश्व युद्ध खत्म हुआ और वर्साय की संधि (Treaty of Versailles) पर दस्तखत हुए, तभी ILO की स्थापना भी हुई थी। गिडनी (Gidney, 2023) बताते हैं कि यहाँ भारत का प्रतिनिधित्व “चुने हुए भारतीय अधिकारियों द्वारा नहीं, बल्कि ब्रिटिश नौकरशाहों की अगुवाई में भारतीय ‘वफादारों’ के एक समूह ने किया था”। वे यह भी दिखाते हैं कि ILO की कल्पना दो इरादों से की गई थी। जिनमें से एक तो वैश्विक श्रम मानकों को आधुनिक बनाना था, लेकिन दूसरा, “विदेशों में खराब हालातों में तैयार किए गए सामान की डंपिंग (सस्ते में बेचना) को रोकना” भी था2।
ब्रिटिश सरकार ने इस नए अंतरराष्ट्रीय श्रम नियमों को बनाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया जिसकी वजह कुछ ऐसी थी:
“आर्थिक नज़रिये से देखें, तो इस मुहिम को बढ़ावा देना ब्रिटेन के लिए फ़ायदेमंद था क्योंकि वह रोज़गार की शर्तों को लागू करने में सबसे आगे था। एक बार जब मुक्त स्पर्धा शुरू हो जाती, तो ब्रिटेन के जो उद्योग विदेशी बाज़ारों पर निर्भर थे, उनमें मज़दूरी के दर या काम की स्थिति को सुधारना बहुत मुश्किल हो जाता। इतना ही नहीं वहाँ पर तब तक जैसे थे स्थिति बनाए रखना भी मुश्किल होता, जब तक कि सभी स्पर्धक देशों में वैसे ही नियम लागू न किए जाएँ।” (Alcock, 1971)।
ILO के सदस्य के तौर पर, भारत के लिए नियमों का पालन करना और ILO के ‘आवर्स ऑफ़ वर्क कन्वेंशन’, 1919 (C001) को अपनी विधायिका के सामने रखना ज़रूरी था। अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारी के दबाव में, भारत ने इस कन्वेंशन को मंज़ूरी दे दी और 1922 में प्रतिदिन 11 घंटे और प्रति सप्ताह 60 घंटे की सीमा तय कर दी, जो स्त्री-पुरुष सभी मज़दूरों पर लागू थी। गौर करने वाली बात यह है कि खुद ब्रिटेन ने कभी इस ILO वर्किंग आवर्स कन्वेंशन पर दस्तखत नहीं किए। इसके बजाय, उसने अपनी आर्थिक ज़रूरतों के हिसाब से कानून बनाने की अपनी आज़ादी बरकरार रखी।
अगले बीस सालों में, अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाई गई कई कमिटियाँ भारत में धीरे-धीरे काम के घंटे कम करती रहीं, जिसकी वजह से हम आज की स्थिति तक पहुँचे। काम के घंटों में पहली कटौती 1920 के दशक के आखिर में हुए औद्योगिक संघर्ष के कारण की गई3। 1928 में वाइसरॉय के उद्योग और श्रम विभाग के एक नोट में “चरमपंथी और कम्युनिस्ट तत्वों” के बारे में चिंता जताई गई थी। उसमें कहा गया था कि मज़दूरों से जुड़े और सख्त कानून बनाना ही “कम्युनिज़्म का सबसे अच्छा तोड़” है (Panesar et al., 2017)।
इसके बाद, 1929 में आए व्हिटली कमीशन ने काम के घंटों को और घटाकर 10 घंटे प्रतिदिन और 54 घंटे प्रति सप्ताह करने का सुझाव दिया, जिसे 1934 में अपना लिया गया। अगली कटौती एक दशक बाद लेबर इन्वेस्टिगेशन कमिटी की ओर से आई, जो त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलन (Tripartite Labour Conference) की उपज थी। (यह सम्मेलन भी खुद व्हिटली कमीशन की ही देन था)। कमेटी ने जो चार कारण दिए थे, उनमें से दो का तर्क यह था कि काम के घंटों को घटाकर हफ़्ते में 48 घंटे करने से रोज़गार बढ़ेगा (International Labour Organisation, 1949)। आज़ादी के तुरंत बाद, भारत ने इन सिफारिशों को लागू कर दिया।
1948 में, देश ने हफ़्ते में 48 घंटे की सीमा इस विश्वास के साथ लागू की कि इन नए नियमों से कपड़ा उद्योगों में उत्पादन बढ़ेगा और दूसरे विश्व युद्ध के बाद के दौर में यह नौकरियाँ पैदा करने का एक ज़रिया भी बनेगा (International Labour Organisation, 1949)। हाल ही में आज़ाद हुए देश के तौर पर भारत को अपना विकास करना ज़रूरी था और इसलिए उसे अपने हिसाब से नियम बनाने की छूट भी मिली हुई थी। लेकिन जैसा कि खुद ILO ने भी कहा, काम के घंटों में की गई ये कटौतियाँ उन छूटों से “काफ़ी आगे” थीं4 (मतलब भारत को इतनी कटौती करने की ज़रूरत नहीं थी)। पूरी बहस में कहीं भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया कि इन नियमों को थोपने की आर्थिक कीमत कितनी बड़ी होगी।
तीन बड़े विरोधाभास और एक सबक
हम अक्सर कहते हैं कि भारत के कानून अंग्रेज़ों के ज़माने के हैं। लेकिन भारत और ब्रिटेन में काम के घंटों के नियमों का इतिहास एक दिलचस्प विरोधाभास दर्शाता है। हमारे पूर्व शासकों द्वारा इस कानून को स्वीकार न करना दर्शाता है कि पसंद और परिस्थितियाँ कितनी अजीब हो सकती हैं। दोनों देशों की उस समय की चर्चाओं को देखकर समझ आता है कि आर्थिक सोच और आज़ादी को लेकर दोनों का नज़रिया कितना अलग था। दोनों देशों की विधायिकाओं में हुई चर्चा काम के घंटों के नियमों का विकास दिखाती हैं।
पहला बड़ा फ़र्क यह था कि ब्रिटेन ने प्रौढ़ पुरुषों को फैक्ट्री कानूनों से बाहर रखा क्योंकि वहाँ के सांसद इसे एक आर्थिक मुद्दा मानते थे। जब ब्रिटेन ने 1833 का फैक्ट्री एक्ट पेश किया, तो उन्हें डर था कि अगर पुरुषों के काम के घंटों पर लगाम लगाई गई तो इससे फैक्ट्रियों के मुनाफ़े पर बुरा असर पड़ेगा, इसलिए इसे टाला जाना चाहिए (Davies & Rodgers, 2023)।
इसके उलट भारतीय सांसदों ने काम के घंटों को हमेशा सेहत और सुरक्षा के चश्मे से देखा और आर्थिक पहलू को नज़रअंदाज़ कर दिया। लेबर इन्वेस्टिगेशन कमेटी ने 1946 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ‘हफ़्ते में 48 घंटे काम करने से उन भारतीय मज़दूरों को तुरंत राहत मिलेगी, जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बहुत ज़्यादा दबाव में काम किया है’ (International Labour Organisation, 1949)। सालों से भारत के इसी नज़रिये ने—उत्पादक की लचीले ढंग से उत्पादन करने की और मज़दूर की ज़्यादा पैसे कमाने की—क्षमताओं को बहुत नुकसान पहुँचाया है। इसी लचीलेपन की कमी के कारण भारतीय फैक्ट्रियाँ माँग बढ़ने पर भी उत्पादन नहीं बढ़ा पातीं।
दूसरा फ़र्क यह है कि ब्रिटेन के नियमों ने तब भी और आज भी, मज़दूर की अपनी स्वतंत्रता पर ज़ोर दिया। वहाँ मज़दूरों और मालिकों को आपस में तालमेल बिठाने की छूट दी गई। जब 1833 में ब्रिटेन ने फैक्ट्री एक्ट बनाया, तो आपसी बातचीत की आज़ादी एक बड़ा मुद्दा थी। तब ऐसा माना जा रहा था कि यह कानून थोपने से प्रौढ़ मज़दूरों की अपने भले के लिए समझौता करने की ताकत कम हो जाएगी (Davies & Rodgers, 2023)। यहाँ तक कि ब्रिटेन की यूनियनों ने भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रौढ़ पुरुषों पर कोई सीमा लगाने का विरोध किया और कार्यस्थल पर आपसी समझौतों को अहमियत दी (Wolcott, 2008)। दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटेन में काम के घंटों की सीमा तय होने के बाद भी, मज़दूरों को इससे बाहर रहने (opt out) की आज़ादी दी गई। हाल के आँकड़े दिखाते हैं कि ब्रिटेन की 32% कंपनियों में कम से कम एक कर्मचारी ने इन मर्यादाओं से बाहर रहने का विकल्प चुना है और 15% कंपनियों में तो सभी कर्मचारियों ने इस मर्यादा को मानने से मना कर दिया है ताकि वे अपनी मर्ज़ी से काम कर सकें (Department for Business, Innovation & Skills, UK, 2014)।
इसके उलट भारतीय मज़दूर 48-घंटे की मर्यादा से बाहर रहने (opt out) का विकल्प नहीं चुन सकते। भारतीय सांसदों के लिए, कानूनी तौर पर काम के घंटों की सीमा तय करना हड़तालों की वजह से होने वाले बड़े नुकसान से बचने का एक रास्ता था। भारत में 1922 में प्रौढ़ पुरुषों के लिए कानून आने से पहले ही, फैक्ट्री मालिकों ने खुद ही काम के घंटे कम कर दिए थे। मद्रास की बकिंघम और कर्नाटक मिल्स ने 1919–20 में 10-घंटे का कार्यदिवस लागू कर दिया था, क्योंकि मज़दूरों की लगातार हड़तालों से भारत के कई हिस्सों में औद्योगिक काम-काज ठप हो गया था। धारीवाल, नागपुर और अन्य जगहों की फैक्ट्रियों में भी यही चलन बन गया था (Das, 1923)। आज, IR Code 2020 के तहत, रोज़गार की शर्तों को मज़दूर प्रतिनिधियों के साथ मिलकर तय करना पड़ता है, जिसमें शिफ्ट का समय भी शामिल है। वर्कर्स चाहकर भी इस समझौते से बाहर नहीं रह सकते।
तीसरा बड़ा फ़र्क यह है कि ब्रिटेन ने सख्त अंतरराष्ट्रीय मानकों से ज़्यादा अपनी संप्रभुता को प्राथमिकता दी। 1925 में हाउस ऑफ़ कॉमन्स में अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (ILC) पर हुई बहस के दौरान ब्रिटेन के गृह सचिव ने साफ़ कहा था कि “हमें ब्रिटिश वाणिज्य और व्यापार के हितों को सबसे ऊपर रखना होगा”। ब्रिटेन ने प्रौढ़ पुरुष मज़दूरों के लिए काम के घंटों की मर्यादा 1998 में लागू की और वह भी यूरोपीय संघ के दबाव में5। आज, भले ही ब्रिटेन के कानून ILO के वर्किंग आवर्स कन्वेंशन की नकल लगते हों, लेकिन उसने कभी भी औपचारिक रूप से इस कन्वेंशन को मंज़ूरी नहीं दी है। ब्रिटेन के पास आज भी अपना फ़ैसला बदलने का विकल्प मौजूद है और उसे किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा न तो सज़ा दी जा सकती है और न ही बंधक बनाया जा सकता है।
इसके उलट ब्रिटिश राज में भारत द्वारा वर्किंग आवर कन्वेंशन को दी गई मंज़ूरी के कारण हम आज भी काम के घंटों में ढील नहीं दे पाते। शुरुआत में दी गई इस मंज़ूरी ने हमें एक औद्योगिक शक्ति बनने से पहले ही कानूनी ज़ंजीरों में जकड़ दिया। दरअसल, आज जो 47 देश काम के घंटों के मामले में ILO कन्वेंशन को मानते हैं, उनमें से सिर्फ़ भारत, पाकिस्तान, म्यांमार और न्यूज़ीलैंड ने ही आज़ादी से पहले इसे मंज़ूरी दी थी। इनमें से न्यूज़ीलैंड ने 9 जून, 1989 को आधिकारिक तौर पर इस कन्वेंशन को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि:
“...यह अब न्यूज़ीलैंड में काम करने के तरीकों के हिसाब से सही नहीं है और इसे काम के घंटों में ज़्यादा लचीलापन लाने के रास्ते में एक रुकावट माना जाता है।”
अंतरराष्ट्रीयवाद की चाहत ने भारत को एक कठोर और अटूट वादे की ज़ंजीर में बाँध दिया है।
बात का निचोड़
भारत ने ब्रिटेन के 60 साल बाद काम के घंटों का नियमन करना शुरू किया, लेकिन उन्हें ब्रिटेन से 60 साल पहले ही कानून के तौर पर पत्थर की लकीर बना दिया। ब्रिटेन ने मज़दूरों की आज़ादी को अहमियत दी। उन्होंने हमसे 20 साल पहले ही बच्चों और महिलाओं के लिए सुरक्षा-मर्यादाएँ लागू की, लेकिन हमने इन्हें हर किसी के लिए अनिवार्य कर दिया। उन्होंने काम के समय को एक आर्थिक मुद्दे की तरह देखा, हमने इसे सभी का कल्याणकारी हक मान लिया। उन्होंने व्यक्तिगत बातचीत और कार्यस्थल के समझौतों पर भरोसा किया, हमने कानून की सख्त सीमाएँ तय कर दीं। उन्होंने मज़दूरों को इन नियमों से बाहर रहने (opt-out) की छूट दी, हमने ज़िद की कि इसमें कोई अपवाद नहीं होगा। उन्होंने इस पर बहस की कि कौन से अंतरराष्ट्रीय नियम उनके लिए सही हैं और सिर्फ़ बाहरी दबाव में ही मर्यादाएँ अपनाईं, हमने वैश्विक मानकों को स्वीकार कर लिया और उन्हें अपने ऊपर पाबंदियों के रूप में हमेशा के लिए लागू कर लिया।
काम के घंटों को हमारे सामने ऐसे पेश किया गया मानो वे हमारे संरक्षण के लिए हो, जबकि हकीकत में वे संरक्षणवादी (protectionist) थे। ये पाबंदियाँ हम पर थोपी गई थीं, लेकिन हमने भी इन्हें जारी रखा। इतना ही नहीं, इन्हें और ज़्यादा सख्त बनाया।
ब्रिटिश संरक्षणवाद से उपजे इन सख्त और समान नियमों को पकड़े रहना भारत की आर्थिक रफ़्तार को रोकता है। गुलामी के दौर के ये नियम रोज़गार, लचीलापन और दुनिया से स्पर्धा करने की हमारी क्षमता—तीनों को कम करते हैं। विरासत में मिली इस सख्ती को खत्म करना अब सिर्फ़ एक ऐतिहासिक गलती को ठीक करना ही नहीं, बल्कि समय की माँग और एक ज़रूरी आर्थिक सुधार भी है।
— अर्जुन कृष्णन, भुवना आनंद और प्रांजल चंद्र Prosperiti रिसर्चर्स हैं। लेखक कानूनी इतिहास को समझने और तर्कों पर चर्चा करने में मदद के लिए अभिषेक सिंह के आभारी हैं।
यह लेख अंग्रेज़ी में यहाँ प्रकाशित हुआ है: Colonial Clocks
Prosperiti के काम के बारे में अधिक जानकारी पाने के लिए आप उनकी वेबसाइट देख सकते हैं: prosperiti.org.in
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
फुटनोट्स
ब्रिटेन में काम के घंटों की पाबंदियाँ 1819 में शुरू हुईं, जब 9 से 16 साल के बच्चों के लिए दिन में 12 घंटे काम की सीमा तय की गई थी। 1844 में, ब्रिटेन ने इन पाबंदियों को महिलाओं तक बढ़ा दिया और उनके लिए भी दिन में 12 घंटे की सीमा तय कर दी।
उदाहरण के लिए, ILO की गवर्निंग बॉडी के गठन के खिलाफ़ भारत का विरोध किसी आज़ाद देश के प्रतिनिधिमंडल का फ़ैसला नहीं था, बल्कि एक ब्रिटिश कॉलोनी के तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य के लिए गवर्निंग बॉडी में एक और सीट सुरक्षित करने की कोशिश थी (Gidney, 2023)।
पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बीच के समय में, बॉम्बे प्रेसीडेंसी में हड़तालों की वजह से हर साल औसतन 23 दिन का नुकसान होता था, जबकि इंग्लैंड और अमेरिका में यह नुकसान तीन दिनों से भी कम था (Wolcott, 2008)।
1919 के वॉशिंगटन अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (International Labour Conference) में, भारतीय प्रतिनिधियों ने Treaty of Versailles के आर्टिकल 405(3) के तहत एक छूट हासिल कर ली थी, जिससे भारत को हफ़्ते में 60 घंटे काम की अनुमति मिली थी। यह छूट यह मानकर दी गई थी कि भारत जैसे देशों में “औद्योगिक संगठनों का विकास अभी पूरा नहीं हुआ है,” जिससे वहाँ के “औद्योगिक हालात काफ़ी अलग” हैं, और इसलिए श्रम कानून संबंधित सिफारिशें तैयार करते समय इन पर विशेष ध्यान देना ज़रूरी है। ILO ने अपने 1949 के ‘इंटरनेशनल लेबर रिव्यू’ में नोट किया कि “...भारत की फैक्ट्रियों में काम के घंटों को लेकर जो मौजूदा चलन है, वह अंतरराष्ट्रीय श्रम कन्वेंशन नंबर 1 (काम के घंटों से संबंधित) में भारत के लिए तय किए गए विशेष प्रावधानों से कहीं आगे है।”
यूरोपीय संघ की स्थापना के बाद, ब्रिटेन के लिए 1993 के ‘EU वर्किंग टाइम डायरेक्टिव’ को अपनाना अनिवार्य हो गया। ब्रिटिश सरकार ने शुरू में इस निर्देश को यूरोपीय कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि काम के घंटे एक घरेलू मुद्दा है, जिसे मालिकों, ट्रेड यूनियनों और कर्मचारियों को आपस में बातचीत करके तय करना चाहिए। ब्रिटेन का यह नज़रिया यूरोपीय संघ के भीतर खुद को स्पर्धा में आगे रखने की इच्छा से प्रेरित था (Blair et al., 2001)। हालाँकि, यूरोपीय कोर्ट ऑफ़ जस्टिस ने 12 नवंबर 1996 को इस चुनौती को खारिज कर दिया, जिससे ब्रिटेन को मज़बूरी में ये नियम लागू करने पड़े।
References
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Das, R. K. (1923). Factory legislation in India. Walter De Gruyter & Co.
Davies, A., & Rodgers, L. (2023). Towards a More Effective Health and Safety Regime for UK Workplaces Post COVID-19. Industrial Law Journal, 52(3), 665–695.
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