भारत में एक जागरूक और ज़िम्मेदार नागरिक होना किसी सुपरहीरो होने से कम नहीं है। पिछले दिनों ऐसे ही दो आम सुपरहीरो चर्चा में रहे। इसकी वजह भी ऐसी बातें थीं, जो कानून के शासन वाले देशों में शायद कोई मुद्दा नहीं होतीं।
पहले सुपरहीरो: तर्कवादी बापट
इनमें से पहले हैं पुणे के विद्यानंद बापट। उन्होंने गणेशोत्सव में होने वाले कानफ़ोड़ू ध्वनि प्रदूषण और सड़कों पर पंडाल लगाने से होने वाले ट्रैफ़िक जाम का मुद्दा उठाया। उन्होंने वही किया, जो एक ज़िम्मेदार नागरिक को करना चाहिए। पुणे नगर निगम की बैठक में उन्होंने माँग रखी कि डीजे पर पूरी तरह रोक लगे और पंडालों को ऐसी जगहों पर शिफ्ट किया जाए जहाँ जाम न लगे। लेकिन जिस बैठक में उन्होंने ये मुद्दे उठाए थे, उसमें मौजूद ज़्यादातर लोग गणेश मंडलों के आयोजक थे। दुर्भाग्य से, उनकी सुरक्षा के लिए उन्हें बैठक से बाहर निकाल दिया गया।
कुछ दिनों बाद, एक इंटरव्यू देते वक्त एक अनजान शख्स ने उन्हें थप्पड़ मार दिया। इस हमले के बाद भी बापट जी ने असाधारण संयम दिखाया और उन पर हुए इस हमले के जवाब में एक संस्कृत श्लोक सुनाया:
घटं भिन्द्यात् पटं छिन्द्यात् कुर्यात् रासभरोहणम् ।
येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषो भवेत् ॥
(घड़ा फोड़ दो, कपड़े फाड़ लो या गधे पर सवार हो जाओ, बस किसी भी तरह हे मानव तुम मशहूर हो जाओ!)
लाउडस्पीकर और शोर-शराबे के खिलाफ़ तो पहले भी कई लोगों ने आवाज़ उठाई है, लेकिन विद्यानंद बापट जनता के बीच इतने लोकप्रिय क्यों हुए? दरअसल, उनकी शुद्ध मराठी और सही जगह पर सही संस्कृत सुभाषित के इस्तेमाल ने लोगों को आकर्षित कर लिया। यही हमारी अपनी भाषा की ताकत होती है। अगर वे यही बातें अंग्रेजी में कह रहे होते, तो शायद लोग उनकी ओर इतना ध्यान ही नहीं देते। लेकिन जब कोई इंसान अपनी स्थानीय भाषा में और अपने ही सांस्कृतिक संदर्भों के साथ बात करता है, तो उसे नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होता।
विद्यानंद बापट की भाषा पर पकड़ और स्पष्टता ने उन्हें कहीं ज़्यादा लोगों तक पहुँचाया। हालाँकि कुछ लोगों ने उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश भी की। मीडिया ने ध्वनि प्रदूषण पर बात करने के बजाय, मुद्दे को भटकाने की नीयत से उनसे नास्तिकता जैसे विवादास्पद विषयों पर सवाल पूछने शुरू कर दिए।
अब सवाल यह उठता है कि जब इतने सारे लोग इन गणेश मंडलों से परेशान हैं, तो फिर इन पर नकेल कसने के लिए कुछ किया क्यों नहीं जाता? इसका जवाब छिपा है गणेश मंडलों के राजनीतिक और आर्थिक संबंधों में। ये मंडल सांस्कृतिक संगठन नहीं हैं, बल्कि स्थानीय राजनीति का एक हिस्सा हैं। चुनाव के दौरान राजनीतिक समर्थन के बदले इन्हें स्थानीय नगरसेवक या विधायक का पूरा संरक्षण मिलता है। बड़े-बड़े लाउडस्पीकर और भड़कीले कार्यक्रम, असल में इलाके में अपना रौब जमाने की तरकीब होते हैं। जिसका लाउडस्पीकर ज़्यादा तेज़, वही “इलाके का असली दादा।”
ये मंडल संगठित होते हैं क्योंकि इसमें उनका फ़ायदा है। दूसरी तरफ, शोर-शराबे से परेशान आम नागरिक बिखरे हुए हैं। डीजे और पंडालों का फ़ायदा एक छोटे से संगठित समूह को मिलता है, जबकि इसका नुकसान पूरे इलाके के लोगों को भुगतना पड़ता है। ऐसे में क्या होता है यह आप नीचे दिए गए चित्र में देख सकते हैं: एक छोटा और संगठित समूह लॉबिंग के दम पर अपनी मनमानी करता है, जबकि असंगठित आम जनता परेशान होती रहती है और कुछ भी नहीं बदलता।
बदलाव कैसे आएगा?
ऐसे मामलों में साँठगाँठ की राजनीति (क्लाइंट पॉलिटिक्स) ही चलती है। नेता हमेशा उन्हीं की सुनेंगे जो उनके काम आते हैं। यहाँ ‘काम आने वाले लोग’ ये मंडल हैं, जो चुनाव में नेताओं के लिए ज़मीन पर काम करते हैं। अब, नेताजी को आम जनता को भी थोड़ा शांत रखना होता है ताकि उनका गुस्सा न फूटे। इसलिए ‘सख्त कार्रवाई’ जैसे गोल-मटोल बयान दे दिए जाते हैं, लेकिन ज़मीन पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता। कुल मिलाकर, डीजे ऐसे ही बजते रहते हैं। पुणे में तो गणेशोत्सव के दौरान पाँच दिनों के लिए देर रात 12 बजे तक लाउडस्पीकर बजाने की छूट दे दी गई थी।
यहीं पर हमें विद्यानंद बापट जैसे सुपरहीरो की ज़रूरत महसूस होती है। अगर डीजे पर बैन लग जाए, तो शांति और सुकून का लाभ सभी नागरिकों को होगा और मंडलों के हाथ से अपना दबदबा दिखाने का ज़रिया छिन जाएगा। इसके लिए एक नई और साहसी राजनीतिक पहल की ज़रूरत है, जिसकी झलक हमें बापट की बेबाकी में देखने को मिलती है।
भले ही डीजे पर तुरंत पूरी तरह रोक न लगी हो, फिर भी इस साल ध्वनि प्रदूषण को लेकर लोगों के बीच जागरूकता ज़रूर बढ़ी है और इस पर खुलकर बहस शुरू हुई है। कई स्थानीय संगठन और नागरिक समूह आगे आए और उन्होंने इस शोर के खिलाफ़ कार्रवाई की माँग की। रेडिट पर कुछ लोगों ने तो यह भी बताया कि विद्यानंद बापट द्वारा यह मुद्दा उठाए जाने के बाद उनके इलाके के मंडलों ने खुद ही आवाज़ कम कर दी।
बदलाव रातों-रात नहीं आता, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि बापट ने एक बेहद ज़रूरी बदलाव पर चर्चा शुरू कर दी है।
दूसरी सुपरहीरो: बाइकर सिया
हमारी दूसरी सुपरहीरो हैं गुड़गांव (गुरुग्राम) की बाइकर सिया। गुड़गांव में एक कार चालक ने उनका पीछा किया, उन्हें परेशान किया और फिर जानबूझकर उन्हें टक्कर मार दी। सिया की बाइक पर लगे कैमरे में यह पूरा घटनाक्रम कैद हो गया, जिसमें कार को साफ़ तौर पर उनकी तरफ मुड़कर टक्कर मारते हुए देखा जा सकता है। गनीमत रही कि इस हमले में उनकी जान बच गई। इसके बाद उन्होंने पुलिस से कड़ी कार्रवाई की माँग करते हुए एक वीडियो जारी किया। वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस हरकत में आई। उसने आरोपी कल्याण बैंसला को गिरफ़्तार किया और उस पर ‘हत्या के प्रयास’ का मामला दर्ज किया।
वैसे तो किसी महिला का बाइक चलाना इतनी सामान्य बात होनी चाहिए कि इस पर किसी का ध्यान भी न जाए, लेकिन जब आप गुड़गांव में बाइक चला रही हों, तो यह एक बड़ी घटना बन जाती है। सिया का यह कहना बिल्कुल सही है कि उनके साथ यह सब सिर्फ़ इसलिए हुआ क्योंकि वे एक महिला हैं। जो लोग इस बात से इनकार करते हैं, वे शायद हकीकत से पूरी तरह कटे हुए हैं। भारत में महिलाएँ आए दिन इस तरह की बदसलूकी का सामना करती हैं।
जब मैं गुड़गांव में रहती थी, तो मेरे स्थानीय सहकर्मियों ने मुझे बस एक ही सलाह दी थी: जिन गाड़ियों पर जातिसूचक स्टिकर लगे हों, उनसे दूर रहना। और जैसा कि अंदेशा था, इस मामले में भी जातिगत संगठन आरोपी के समर्थन में उतर आए हैं। उनके लिए यह अपनी ताकत दिखाने का एक और ज़रिया है।
आखिर सिया मेरी नज़र में हीरो क्यों हैं? क्योंकि वे इस देश की नागरिक के तौर पर अपने बराबरी के अधिकारों का दावा कर रही हैं। जब नागरिकों के बीच ताकत का संतुलन इतना बिगड़ा हुआ हो, तो अपने हक़ के लिए अडिगता से खड़े रहना भी एक बहुत बड़ी बहादुरी का काम बन जाता है।
हम सब जानते हैं कि भारत की सड़कें महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं हैं, लेकिन महिलाओं को घरों में बंद रखकर हालात कभी नहीं सुधरेंगे। स्थिति तब सुधरेगी जब ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएँ बाहर निकलेंगी और सार्वजनिक जगहों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराएँगी। सिया ने अपने हक के लिए बड़ी निडरता से आवाज़ उठाई। अब प्रशासन की बारी है कि वह एक सही मिसाल कायम करे, क्योंकि अपराध का खौफ़ सिर्फ़ कागज़ों पर सख्त कानून बनाने से नहीं, बल्कि उनका कड़ाई से पालन कराने से पैदा होता है।
हमें ऐसे सुपरहीरो क्यों चाहिए?
इस देश में जब भी कोई तर्कसंगत बात करने की कोशिश करता है, तो चर्चा को धर्म या जाति का रंग देकर भटका दिया जाता है। मुद्दा क्या है उस पर ध्यान देने के बजाय, हम बात उठाने वाले को ही टारगेट कर देते हैं या पूरे विषय को अलग ही दिशा में मोड़ देते हैं। ध्वनि प्रदूषण, ट्रैफ़िक जाम और लोगों की सेहत से जुड़ा सीधा-सादा मामला धार्मिक आज़ादी का मुद्दा बन जाता है। सड़क सुरक्षा जैसी बुनियादी बात जातिगत स्वाभिमान की लड़ाई में तब्दील हो जाती है। सच तो यह है कि भारत में सही बात के लिए आवाज़ उठाने के अपने ही खतरे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता विद्यानंद बापट हों या फिर बाइकर सिया, ये दोनों ही असली सुपरहीरो हैं, क्योंकि वे वो काम कर रहे हैं जो भारत में करना बिल्कुल आसान नहीं है: एक जागरूक, सक्रिय और बेबाक नागरिक बनना। आज भारत को ऐसे ही कई और सुपरहीरोज़ की सख्त ज़रूरत है।
— ख्याति पाठक
ख्याति भारतीय लोकनीति पर बनी प्रसिद्ध सचित्र किताब ‘We, the Citizens’ की सह-लेखिका और इलस्ट्रेटर हैं। वे पुलियाबाज़ी पॉडकास्ट की सह-संचालिका तथा पुलियाबाज़ी पत्रिका की संपादक भी हैं।
अग्रेज़ी में पूर्व-प्रकाशित: Everyday superheroes and why India needs them to assert civic rights
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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