किसी भी देश में विकास परियोजनाओं के लिए ज़मीन चाहिए होती है। चाहे सड़कें, मेट्रो, घर और अस्पताल बनाने हों या नया औद्योगिक शहर बसाना हो, ज़मीन के बगैर कुछ भी नहीं हो सकता। जब सरकार के पास इतनी ज़मीन नहीं होती, तब उसे निजी ज़मीन लेनी पड़ती है। निजी ज़मीन लेने के लिए अलग-अलग देश अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। भारत में इसके लिए अक्सर ज़बरन अधिग्रहण (compulsory acquisition) का तरीका अपनाया जाता है, क्योंकि भारत में ज़मीन की समस्या को हमेशा से संपत्ति के अधिकार (property rights) की समस्या के रूप में देखा गया है। लेकिन इस समस्या के और भी कई पहलू हैं। इस लेख में हम इन्हीं पहलुओं और उनके उपायों पर चर्चा करेंगे।
ज़बरन अधिग्रहण से पैदा होने वाली समस्याएँ
भारत में सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए ज़मीन की शुरुआती खरीदार हमेशा से सरकार रही है। साल 2013 में आए नए भूमि-अधिग्रहण कानून, ‘Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013’ ने इस प्रक्रिया को और महँगा और जटिल बना दिया है। लेकिन यह समस्या सिर्फ़ इस कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक गंभीर है।
पहली समस्या सरकारी खर्च से जुड़ी है। सरकार को कई बार किसी परियोजना का निर्माण शुरू होने से पहले ही ज़मीन पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। अगर उसके पास पर्याप्त पैसा न हो, तो परियोजना शुरू होने में देरी हो सकती है। दूसरी समस्या समय और अनिश्चितता की है। मुआवज़े पर विवाद, कानूनी मुकदमे, अनुमति मिलने में देरी या ज़मीन का कब्ज़ा अलग-अलग चरणों में मिलना निर्माण को धीमा कर सकता है। देरी के दौरान लागत बढ़ती रहती है और सुविधाओं का लाभ लोगों तक देर से पहुँचता है।
इसके अलावा, शहरों में ज़मीन और सेवाओं की ज़िम्मेदारी कई बार अलग-अलग सरकारी विभागों या संस्थाओं के पास होती है। कहीं DDA (दिल्ली), MMRDA (मुंबई) या AUDA (अहमदाबाद) जैसे विकास प्राधिकरण ज़मीन जुटाते हैं, इमारतें बनाने की अनुमति देते हैं और शुल्क वसूलते हैं, जबकि सड़क, पानी, नालियों और कचरा प्रबंधन की ज़िम्मेदारी नगर निगमों को निभानी पड़ती है। जब कमाई किसी एक की होती है, पर सेवाएँ देने का खर्च दूसरे को उठाना पड़ता है, तो व्यवस्था बिगड़ सकती है। शहरों के किनारे बसे गाँवों में भी यही समस्या दिखती है। वहाँ शहरी विकास शुरू हो जाता है, लेकिन योजना बनाने और पैसा जुटाने के अधिकार ग्रामीण संस्थाओं के पास नहीं होते।
इसलिए ज़मीन के विकास को पब्लिक फाइनेंस यानी सरकार की कमाई और खर्च से जोड़कर देखना ज़रूरी है। सरकार को ज़मीन पर कितना अधिकार चाहिए? परियोजना के लिए पैसा कहाँ से आएगा? अगर सरकारी परियोजना के कारण आसपास की ज़मीन की कीमत बढ़ती है, तो क्या सरकार उसमें से कुछ हिस्सा ले सकती है? और अगर ऐसा पैसा मिले, तो वह किस विभाग के पास जाना चाहिए? इन सवालों के जवाब ऐसी नीति से मिल सकता है, जो ज़मीन जुटाने, योजना बनाने और स्थानीय सेवाएँ देने की प्रक्रिया को एक साथ देखती है।
ज़मीन जुटाने के अन्य तरीकों का उपयोग
ज़बरन अधिग्रहण पूरी तरह ख़त्म नहीं किया जा सकता। लेकिन इसका उपयोग केवल तभी करना चाहिए जब वह परियोजना बेहद ज़रूरी सार्वजनिक काम के लिए हो और जहाँ ज़मीन का एक ही जगह होना और तुरंत मिलना आवश्यक हो। हर शहरी विकास परियोजना में ज़बरन अधिग्रहण को पहला विकल्प नहीं बनाना चाहिए। सरकार को सहमति से खरीद (negotiated purchase), लैंड पूलिंग (land pooling), पुनर्गठन (readjustment), किराए पर लेना (leasing) आदि तरीकों का मिलाजुला उपयोग करना चाहिए। लैंड पूलिंग में कई मालिक अपनी ज़मीन योजना के लिए देते हैं। उस ज़मीन का कुछ हिस्सा सड़क, पार्क या दूसरी सुविधाओं के लिए रखा जाता है और मालिकों को बुनियादी सुविधाओं से लैस छोटी या नई जगहें वापस मिलती हैं। विकास के बाद उनकी ज़मीन की कीमत बढ़ जाती है और वे उस लाभ में हिस्सेदार बने रह सकते हैं।
ज़मीन जुटाने का सही तरीका चुनते समय परियोजना के पूरे जीवनकाल का विचार करना चाहिए। मुआवज़ा, पुनर्वास, कानूनी खर्च, प्रशासनिक काम, देरी और भविष्य की ज़िम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए ज़मीन की कुल लागत निकालनी चाहिए। ज़रूरी नहीं कि जो तरीका पहली नज़र में सस्ता लगे, वह लंबे समय में भी सस्ता या न्यायपूर्ण साबित हो।
भूमि सुधार के बुनियादी सिद्धांत
जब सरकार कहीं इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करती है, तो आसपास की ज़मीनों की कीमत बढ़ जाती है। इसी तरह, जब सरकार किसी इलाके में अधिक मंज़िलें बनाने की अनुमति देती है (FSI), तब भी ज़मीन की कीमत बढ़ सकती है। यह बढ़ोतरी केवल ज़मीन मालिक की मेहनत से नहीं, बल्कि सार्वजनिक निवेश और सरकारी फैसलों से भी हो सकती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि ज़मीन की कीमत बढ़ते ही सरकार उस पर दावा कर दे। निजी संपत्ति के मालिकाना हक का सम्मान होना चाहिए। लेकिन जहाँ ज़मीन की कीमत में बढ़ोतरी सरकारी निवेश और फ़ैसलों से होती है, वहाँ सरकार को हक है कि वह उस बढ़ोतरी का एक उचित हिस्सा शुल्क या दूसरे तरीकों से वापस ले। इन पैसों का उपयोग उसी इलाके में सड़कें, पानी आदि सुविधाएँ देने या उनके रखरखाव में किया जा सकता है। इस तरह सरकारी निवेश के खर्च की कुछ भरपाई भी हो सकती है।
इसे ध्यान में रखते हुए, एक अच्छी भूमि सुधार नीति के चार मुख्य सिद्धांत माने जा सकते हैं:
बिना ज़बरदस्ती के लागत कम करना: सरकार और ज़मीन मालिक दोनों के लिए ज़मीन जुटाने की लागत कम से कम होनी चाहिए। भारत के कई राज्यों और शहरों में शहरी विकास के लिए पहले से ही इस तरह के तरीकों का इस्तेमाल हो रहा है। गुजरात में ‘गुजरात टाउन प्लानिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट एक्ट, 1976’ के तहत टाउन-प्लानिंग योजनाएँ (हाल ही में महाराष्ट्र में भी लागू की गई हैं) और अमरावती, दिल्ली, चेन्नई तथा गुवाहाटी में लैंड-पूलिंग की योजनाएँ इसके अच्छे उदाहरण हैं।
पूर्ण मालिकाना हक का आग्रह छोड़ना: सरकार को हर काम के लिए ज़मीन को पूरी तरह से अपने नाम कराने की ज़रूरत नहीं होती। पूर्ण मालिकाना हक केवल सुरक्षा या रणनीतिक महत्व जैसी परियोजनाओं के लिए ही लिया जाना चाहिए। जहाँ पूर्ण मालिकाना हक की ज़रूरत नहीं है, वहाँ भूमि अधिग्रहण के अन्य रास्ते अपनाए जा सकते हैं।
ज़मीन मालिकों की हिस्सेदारी बनाए रखना: ज़मीन लेने के बजाय मालिकों को विकसित ज़मीन में ही हिस्सेदार बनाना चाहिए। इससे लोगों का विरोध कम होता है और सरकार को शुरुआत में भारी मुआवजा नहीं देना पड़ता। टाउन प्लानिंग, लैंड पूलिंग और लीज़िंग के ज़रिए ऐसा किया जा सकता है, जैसे ज़मीन के बदले विकसित प्लॉट देना, मालिकाना हक बनाए रखना, समय-समय पर भुगतान देना आदि।
किस्तों में कमाई: सरकार को भूमि अधिग्रहण पर एक बार में बड़ा खर्च करने के बजाय, ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे उसे लंबे समय तक नियमित कमाई होती रहे। सरकारी परियोजनाओं के कारण विकसित भूमि पर उचित शुल्क लगाकर सरकार ऐसी कमाई कर सकती है।
भूमि सुधार के लिए सात सुझाव
इन सिद्धांतों के आधार पर भारत की भूमि सुधार नीति में सुधार के लिए सात सुझाव दिए जा सकते हैं। इन सभी सुझावों को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ लागू किया जाना चाहिए।
ज़बरन अधिग्रहण अंतिम विकल्प
ज़बरन भूमि अधिग्रहण का इस्तेमाल केवल अति-आवश्यक बुनियादी ढाँचों के लिए और अंतिम विकल्प के रूप में ही किया जाना चाहिए। अन्य सभी कामों के लिए पहले अन्य विकल्पों की लागत और लाभ की तुलना होनी चाहिए। जहाँ संभव हो, वहाँ अन्य सस्ते और बेहतर विकल्पों का उपयोग किया जाना चाहिए।
शुरुआती सरकारी खर्च कम करने के लिए कानूनी ढाँचा
सरकार को ऐसा कानूनी ढाँचा बनाना चाहिए जिससे लैंड पूलिंग और टाउन-प्लानिंग जैसी योजनाओं को बढ़ावा मिले। इसमें कई छोटे-छोटे ज़मीन मालिक अपनी ज़मीन सरकार को सौंपते हैं। सरकार उस पर सड़क, पार्क और बुनियादी ढाँचा बनाकर ज़मीन का एक हिस्सा (विकसित प्लॉट के रूप में) वापस मालिकों को लौटा देती है। इससे सरकार को ज़मीन खरीदने के लिए नकद पैसा नहीं देना पड़ता और मालिकों को भी विकसित ज़मीन का बड़ा फायदा मिलता है।
लंबी अवधि की किरायेदारी
कई बार सरकार को कोई ज़मीन चाहिए होती है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। ऐसे में ज़मीन को लंबी अवधि के लिए किराए पर लिया जा सकता है। इससे सरकार का शुरुआती खर्च बचता है और ज़मीन मालिक को हर साल एक निश्चित आय मिलती रहती है। मगर किरायेदारी हर स्थिति में सस्ती नहीं होती। सरकार को कुल किराए और ज़मीन खरीदने की लागत की तुलना करनी चाहिए और फिर निर्णय लेना चाहिए।
सार्वजनिक संपत्तियों के रख-रखाव के लिए निजी भागीदारी
पार्क, गार्डन जैसे सार्वजनिक स्थलों का रखरखाव सरकारी खजाने पर बोझ नहीं बनना चाहिए। सरकार इनका मालिकाना हक अपने पास रखते हुए, निजी संस्थाओं को इनके एक छोटे हिस्से पर व्यावसायिक गतिविधियाँ (जैसे कैफ़े या दुकान) चलाने की अनुमति दे सकती है। बदले में वह पूरे पार्क का रख-रखाव करेगी। अमेरिका के ऑस्टिन शहर की नीतियाँ इसका बेहतरीन उदाहरण हैं।
खर्च और कमाई में तालमेल के लिए लोकल एरिया प्लान
जब सरकार किसी इलाके में सड़क या मेट्रो जैसी सुविधाएँ लाती है, तो वहाँ की ज़मीन की कीमत बढ़ जाती है। सरकार को FSI फ़ीस, सुधार शुल्क (betterment charge) आदि के रूप में इस बढ़ी हुई कीमत का एक हिस्सा वसूलना चाहिए और इस कमाई का इस्तेमाल उसी इलाके में नई सड़कें, जल आपूर्ति आदि सुविधाएँ देने के लिए करना चाहिए। लोकल एरिया प्लान इन खर्चों और कमाई में तालमेल बिठाने में मदद करता है।
योजना, सेवा और कमाई करने वाली संस्थाओं में तालमेल
जिस संस्था के पास सेवा देने की ज़िम्मेदारी है, कमाई का हिस्सा भी उसी को मिलना चाहिए। भारत के कई शहरों में DDA या MMRDA जैसी संस्थाएँ ज़मीन बेचकर या शुल्क लेकर कमाई करती हैं, लेकिन सड़क और पानी देने का काम नगर निगम को करना पड़ता है। नियम यह होना चाहिए कि “पैसा उसी को मिलेगा, जो काम करेगा”। ऐसा करने के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं। या तो खर्च और कमाई दोनों एक ही विभाग करे, या फिर कमाई का एक तय हिस्सा तुरंत नगर निगम को हस्तांतरित कर दिया जाए ताकि वह लोगों को सुविधाएँ दे सके।
ग्रामीण निकायों को भी योजना और शुल्क वसूलने के अधिकार
अक्सर शहरों के आसपास के इलाकों में शहर बनने की प्रक्रिया बिना किसी योजना के शुरू हो जाती है। जब तक वे आधिकारिक रूप से शहर घोषित होते हैं, तब तक वहाँ बुनियादी ढाँचा बनाना बहुत महंगा हो जाता है। इसलिए, पंचायतों और ग्रामीण स्थानीय निकायों को भी शुरुआत में ही लेआउट प्लान बनाने, विकास शुल्क वसूलने और सड़कें आरक्षित करने का कानूनी अधिकार दिया जाना चाहिए।
बात का निचोड़
भारत को ऐसी भूमि नीतियों की आवश्यकता नहीं है जो ज़मीन के मालिक से उसका सब कुछ छीन लें या जो केवल ज़बरन अधिग्रहण पर निर्भर हों। ज़मीन जुटाने, शहर की योजना बनाने, बुनियादी ढाँचे के निर्माण और नगर निगम के बजट को अलग-अलग देखने के बजाय एक ही कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि सरकार इन सात सुधारों को लागू करती है, तो विकास कार्यों की लागत में भारी कमी आएगी, अदालती झंझट खत्म होंगे और आम जनता व सरकार दोनों के लिए एक टिकाऊ और न्यायसंगत व्यवस्था का निर्माण होगा।
— अनिरुद्ध बर्मन
अनिरुद्ध XKDR Forum में रिसर्च लीड हैं। आप उनके अन्य रिसर्च पेपर और लेख यहाँ पढ़ सकते हैं: The Leap Blog: Anirudh Burman
यह पूरा लेख अंग्रेज़ी में आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Using Land for Economic Development
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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