हाल ही में OpenAI द्वारा घोषणा की गई कि अब ChatGPT में विज्ञापन दिखाए जाएँगे। क्या ये विज्ञापन वैसे ही होंगे जैसे हम आमतौर पर वेबसाइट्स पर देखते हैं या उनसे बिल्कुल अलग? AI के इस युग में विज्ञापन का भविष्य कैसा होगा, और उसका यूज़र्स पर, यानी हम सब पर, क्या असर पड़ेगा? जानते हैं आज की टिप्पणी में हमारे अतिथि लेखक निखिल पाहवा से।
निखिल पाहवा एक पत्रकार, डिजिटल अधिकार कार्यकर्ता और डिजिटल न्यूज़ पोर्टल MediaNama के संस्थापक हैं।
Nikhil Pahwa writes Reasoned, a newsletter on how AI is changing our world
AI की दुनिया में एडवर्टाइज़िंग का भविष्य
— निखिल पाहवा
अगर सर्च की जगह AI ले लेगा, तो एडवर्टाइज़िंग कहाँ जाएगी?
करीब पाँच महीने पहले मैंने अपनी नोटबुक में यह लाइन लिखी थी। गूगल के ‘AI Overview/AI Mode’ और Perplexity जैसे टूल्स की वजह से वेबसाइटों पर आने वाला ट्रैफिक कम हो रहा है। लोग अब एक के बाद एक SEO ऑप्टिमाइज़्ड पेजेस पढ़ने के बजाय ऐसे टूल्स पर सीधे जवाब पाना बेहतर समझते हैं। ज़्यादातर लोग अब AI प्लेटफ़ॉर्म पर ही रहते हैं और किसी लिंक पर क्लिक करके बाहर कम ही जाते हैं।
इससे पब्लिशर्स, यानी कंटेंट होस्ट करने वाले प्लेटफ़ॉर्म या वेबसाइट्स, पर जाने वाले व्यूअर्स की संख्या कम हो रही है, नतीजतन इन पब्लिशर्स को मिलने वाले एडवर्टाइज़ यानी विज्ञापन भी कम हो रहे हैं और एडवर्टाइज़र्स द्वारा विज्ञापन पर होने वाला खर्च भी कम हो रहा है। पहले विज्ञापन पर खर्च होने वाला यह सारा पैसा अब कहीं न कहीं तो जाएगा ही। पर कहाँ? यूट्यूब? इंस्टाग्राम? या X? लेकिन विज्ञापन करने के लिए एक प्लेटफ़ॉर्म से दूसरे प्लेटफ़ॉर्म पर शिफ्ट होना इतना आसान नहीं होता।
अब यूज़र को अपना ज़वाब पाने के लिए सर्च के बाद फिर किसी वेबसाइट पर जाने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि उसकी ज़रूरत उसी एक प्लेटफ़ॉर्म पर पूरी हो रही है जिसके पास सारे जवाब हैं।
गूगल पहले ही यह साबित कर चुका है कि AI जवाबों के अंदर विज्ञापन (Ads) दिखाना कारगर है। साल 2025 की अपनी अर्निंग कॉल्स (Q1 और Q3) में Alphabet (गूगल की पेरेंट कंपनी) ने बताया कि AI Overview के ऊपर, नीचे और यहाँ तक कि जवाबों के बीच में लगाए गए विज्ञापनों से भी लगभग उतनी ही कमाई हो रही है जितनी पारंपरिक सर्च से होती थी, भले ही अब इसे अरबों लोग इस्तेमाल कर रहे हों। दूसरे शब्दों में कहें तो, AI के जवाब विज्ञापनों को खत्म नहीं कर रहे, बल्कि सिर्फ़ उनकी जगह बदल रहे हैं।
ChatGPT ने भी अपने प्लेटफ़ॉर्म पर विज्ञापन शुरू करने का ऐलान कर दिया है। यह उन यूज़र्स के लिए होगा जो फ्री या $8 प्रति महीने वाला ‘Go plan’ इस्तेमाल कर रहे हैं (भारतीय यूज़र्स के लिए फ़िलहाल यह प्लान एक साल तक मुफ़्त है)।
इसलिए, यह समझना ज़रूरी है कि ChatGPT पर विज्ञापन बाकी प्लेटफ़ॉर्मों से अलग कैसे होंगे और क्यों।
विज्ञापन व्यवहार आधारित होते हैं, प्लेटफ़ॉर्म आधारित नहीं
विज्ञापन पर उसी का राज होता है, जिसका फ़ैसले की घड़ी पर नियंत्रण होता है।
विज्ञापन कैसे बनते हैं, यह तीन चीज़ों से तय होता है: विज्ञापन देने वाले का हेतु (intent), विज्ञापन देखने वाले का व्यवहार (behaviour) और प्लेटफ़ॉर्म किन चीज़ों की अनुमति देता है। इन तीनों स्टेकहोल्डर के तालमेल से विज्ञापन दिखाई देते हैं (ताकि एडवर्टाइज़र का हेतु भी साध्य हो जाए, प्लेटफ़ॉर्म का लुक भी खराब न हो और यूज़र को भी वह असंबद्ध न लगे)। यही वजह है कि सर्च पर दिखने वाले विज्ञापन इंस्टाग्राम और यूट्यूब के विज्ञापनों से अलग होते हैं।
एडवर्टाइज़िंग की दुनिया में एक पुरानी कहावत है:
“मुझे पता है कि विज्ञापन पर खर्च होने वाले मेरे 50% पैसे बर्बाद हो रहे हैं। दिक्कत बस इतनी है कि वह 50% कौन से हैं, यह मुझे नहीं पता।”
विज्ञापन के मूल्यांकन (measurement) का मकसद बर्बादी कम करना होता है और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म इसमें सबसे माहिर हैं। इसका मतलब है—पूरा पैसा वसूल होना चाहिए।
ChatGPT और गूगल सर्च में एक बात समान है—दोनों ही यूज़र का हेतु भांप लेते हैं। जब आप गूगल पर बैंगनी मोज़े सर्च करते हैं तो उसे समझ आ जाता है कि आपकी ज़रूरत क्या है। फिर वह ऐसे एडवर्टाइज़र को ढूँढता है जो आपकी ज़रूरत पूरी कर सके और उसे सर्च रिज़ल्ट्स में सबसे ऊपर दिखा देता है। इस तरह जो विज्ञापन (Sponsored) देता है, वह ज़्यादा यूज़र्स को दिखाई देता है। इससे उसका उत्पादन/सेवा बिकने की संभावना भी बढ़ जाती है।
गूगल को भले ही पता हो कि आप क्या चाहते हैं, पर वह यह नहीं जानता कि आप कौन हैं। बहुत से लोग गूगल का इस्तेमाल बिना साइन-इन किए, इनकॉग्निटो या अनॉनिमस मोड में करते हैं।
यहाँ यूज़र की ज़रूरत और प्लेटफ़ॉर्म की समझ के बीच एक फ़ासला होता है। उदाहरण के लिए, अगर कोई ‘अडल्ट डायपर’ सर्च करता है, तो गूगल को यह नहीं पता होता कि कोई बुजुर्ग अपने लिए खरीद रहा है या कोई जवान व्यक्ति अपने किसी बुजुर्ग रिश्तेदार के लिए। उम्र या पसंद-नापसंद की जानकारी के बिना, एडवर्टाइज़र को एक औसत यूज़र को ध्यान में रखते हुए विज्ञापन दिखाना पड़ता है। इसीलिए गूगल चाहता है कि आप सर्च करते समय लॉग-इन रहें। फिर भी, गूगल मुख्य रूप से आपकी उस पल की ज़रूरत के हिसाब से ही रिज़ल्ट दिखाता है।
दूसरी तरफ़, फेसबुक यह बेहतर जानता है कि हम कौन हैं। फेसबुक और इंस्टाग्राम के कनेक्टेड डेटा की वजह से उसे हमारी पसंद-नापसंद और समयानुसार हमारी आदतों का पता होता है। वह लोगों की प्रोफाइल और उनके व्यवहार को समझने में माहिर है, जैसे कि हमारी पसंद और व्यवहार से वह यह तक समझ सकता है कि हम किस राजनीतिक विचारधारा (जैसे रिपब्लिकन या डेमोक्रेट) की तरफ़ झुकाव रखते हैं (याद कीजिए: कैंब्रिज एनालिटिका घोटाला)। उसे पता होता है कि हम किस पोस्ट पर कितने सेकंड रुके और किसे बिना देखे आगे बढ़ गए। अरबों लोगों के इस पैटर्न को समझकर वह जान जाता है कि किसे कौन सा विज्ञापन दिखाना है और आपकी उन ज़रूरतों को भी पहचान लेता है जिनका शायद आपको खुद भी अंदाज़ा न हो।
हालाँकि, फेसबुक यह तो पहचान सकता है कि किसे टार्गेट करना है, पर वह हेतु पहचानने में उतना सक्षम नहीं है। उसे यह नहीं पता होता कि उस पल में उस इंसान को क्या चाहिए। फेसबुक के पास हमेशा हेतु की कमी रही है, वैसे ही जैसे गूगल के पास यूज़र की मनोवैज्ञानिक जानकारी (psychographic information) की। इसलिए दोनों सिस्टम में पैसों की थोड़ी बर्बादी होती है, क्योंकि आमतौर पर किसी भी एक प्लेटफ़ॉर्म के पास ये दोनों चीज़ें एक साथ नहीं होतीं।
इसलिए यहाँ एक ऐसी कमी रह जाती है जिसे न तो गूगल और न ही Meta (फेसबुक की पेरेंट कंपनी) पूरी तरह भर पा रहे हैं। ChatGPT और Gemini इसलिए खास हैं क्योंकि उनके पास यूज़र के हेतु (intent) की बहुत गहरी समझ है—उन्हें सिर्फ़ यह नहीं पता कि आप क्या खरीदना चाहते हैं, बल्कि उन्हें यह भी पता है कि ऐप के अंदर आप क्या सोच रहे हैं।
बातचीत के ज़रिये उनके पास आपकी मनोवैज्ञानिक (आपकी सोच, पसंद आदि) डेटा आ जाता है, और अगर इसमें आपकी डेमोग्राफिक जानकारी (जैसे उम्र, शहर आदि) भी जोड़ दी जाए, तो यह विज्ञापन दिखाने का एक बहुत ही ताकतवर इंजन बन सकता है।
ChatGPT बातचीत है, ब्राउज़िंग नहीं
ChatGPT के लिए विज्ञापन वैसे ही नहीं बनाए जा सकते जैसे मेटा या गूगल सर्च के लिए बनते हैं। यहाँ का अनुभव बिल्कुल अलग होना चाहिए क्योंकि यहाँ यूज़र का व्यवहार और प्लेटफ़ॉर्म का काम एकदम अलग हैं।
ChatGPT पर आप स्क्रॉल या सर्च नहीं करते, बल्कि बातचीत करते हैं। यह बातचीत इतनी गहरी होती है कि लोग यहाँ बहुत खुलकर और निजी तौर पर अपनी बातें रखते हैं। उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे वे अपने किसी राज़दार से बात कर रहे हों।
इसमें सबसे पेचीदा बात यह है कि बातचीत के दौरान लोग विज्ञापन की दखलअंदाज़ी पसंद नहीं करते। इस माहौल में यूज़र अपनी निजी बातें साझा करता है। अभी तक उन्हें पता तो था कि उसे ‘देखा’ (memory में संचित किया) जा रहा है, लेकिन उन्हें कभी यह महसूस नहीं होता था। यह मनोरंजन की जगह नहीं है और न ही यह ‘AI Overview’ जैसा है जहाँ आप बस एक पल के लिए कुछ ढूँढने आते हैं। यह बहुत ही गहरा संबंध (engagement) है।
यही वजह है कि ChatGPT पर विज्ञापन दूसरी जगहों से कहीं ज़्यादा दखल देने वाले लग सकते हैं और इससे आने वाले समय में यूज़र का व्यवहार बदल सकता है। ChatGPT को इस चुनौती का समाधान निकालना होगा।
विज्ञापनों से होने वाली बेचैनी को ChatGPT कैसे संभाल रहा है?
शुरुआत में ही ChatGPT ने डेवलपर्स को ChatGPT ऐप्स के अंदर विज्ञापन लगाने से रोक दिया था। इससे साफ़ होता है कि वह खुद विज्ञापन की दुनिया में उतरने की योजना बना रहा है। वह अपने पूरे इकोसिस्टम पर अपना हक चाहता है, ताकि वह खुद ही यह तय कर सके कि चैट विंडो के अंदर विज्ञापन कैसे और कब दिखाए जाएँगे।
यह ज़रूरी भी है क्योंकि वह यूज़र के अनुभव को खराब नहीं करना चाहता। OpenAI का कहना है:
“AI अब उस मोड़ पर है जहाँ हर किसी के पास एक ‘पर्सनल सुपर-असिस्टेंट’ हो सकता है, जो उन्हें कुछ भी सीखने और करने में मदद करेगा। यह सुविधा किसे मिलेगी, यह तय करेगा कि AI सबको बराबर मौके देगा या पुरानी असमानताओं को और बढ़ाएगा। आने वाले हफ्तों में, हम अमेरिका में ‘फ्री’ और ‘Go’ प्लान वाले यूज़र्स के लिए विज्ञापनों की टेस्टिंग शुरू कर रहे हैं, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग बिना किसी पाबंदी के या बिना पैसे दिए हमारे टूल्स का लाभ ले सकें।”
“विज्ञापनों पर साफ़ तौर पर लेबल लगा होगा और वे मुख्य जवाबों से अलग दिखाई देंगे।”
ये दोनों ही बातें सिर्फ़ नियम-कानूनों के हिसाब से अपनी सही छवि बनाने के लिए कही गई हैं (regulatory positioning)।
यूज़र्स को होने वाली बेचैनी के बावजूद ChatGPT में विज्ञापन आ रहे हैं, क्योंकि कंपनी को अब कमाई के तरीके खोजने हैं। उनके पास काफ़ी यूज़र्स हैं, अपनी ऐप्स हैं और चैट विंडो पर पूरा कंट्रोल भी है, ऐसे में विज्ञापनों की शुरुआत होना एक स्वाभाविक कदम था।
यहाँ पेड इनवोकेशन (यानी पैसे लेकर विज्ञापन दिखाना) शुरू करने से पहले ऐप स्टोर लाना ज़रूरी था। साथ ही, ChatGPT के इस दावे में न फँसें कि वे दुनिया को एक बेहतर जगह (Make the World a Better Place) बनाना चाहते हैं। यह दावा उतना ही खोखला है जितना फेसबुक का ‘Free Basics’ (गरीबों को मुफ़्त इंटरनेट देने का दावा) या गूगल का ‘Do No Evil’ (बुराई न करना) वाला स्लोगन।
फिर उन्होंने यूज़र्स के इस डर को कम करने की कोशिश की है कि उन पर नज़र रखी जा रही है:
“लोग निजी और ज़रूरी कामों के लिए ChatGPT पर भरोसा करते हैं, इसलिए विज्ञापन लाते समय उस भरोसे को बचाए रखना हमारे लिए सबसे ज़रूरी है।”
“आपको यह भरोसा होना चाहिए कि ChatGPT के जवाब सिर्फ़ काम की जानकारी पर आधारित हैं, न कि विज्ञापनों के दबाव में दिए गए हैं।”
“आपको पता होना चाहिए कि आपका डेटा और बातचीत सुरक्षित हैं और इसे कभी भी एडवर्टाइज़र्स को बेचा नहीं जाएगा।”
“आप यह जान पाएँगे कि आपको कोई विज्ञापन क्यों दिख रहा है, आप उसे हटा सकेंगे और हमें बता भी सकेंगे।”
“आप जब चाहें पर्सनलाइज़ेशन बंद कर सकते हैं और विज्ञापनों के लिए इस्तेमाल होने वाले डेटा को डिलीट कर सकते हैं।”
बड़े प्लेटफ़ॉर्म अच्छी तरह जानते हैं कि डेटा ही उनका असली सुरक्षा कवच है। एडवर्टाइज़र्स के साथ डेटा शेयर न करने का मतलब यह है कि उन तक पहुँचने का इकलौता ज़रिया खुद ChatGPT ही रहेगा।
यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। प्रोग्रामेटिक एडवर्टाइजिंग ने इसी ताकत को खत्म करने की कोशिश की थी, ताकि कंट्रोल प्लेटफ़ॉर्म के बजाय एडवर्टाइजर्स के पास आ जाए।
हालाँकि, यूज़र्स को अपने साथ जोड़े रखने के लिए प्लेटफ़ॉर्म्स को उन्हें थोड़ा कंट्रोल देना ही पड़ेगा, या कम से कम ऐसा एहसास दिलाना पड़ेगा कि कंट्रोल यूज़र के हाथ में है। ChatGPT यही कर रहा है: वह आपको खुद चुनने (opt-in) के बजाय, विज्ञापन से हटने (opt-out) का विकल्प दे रहा है और आपसे वादा कर रहा है कि वह हर विज्ञापन की वजह बताएगा।
ChatGPT में विज्ञापन (Ads) कैसे दिखेंगे?
इस मामले में ChatGPT कुछ चीजें बहुत सोच-समझकर कर रहा है। विज्ञापन दिखाने के लिए उसके पास कई विकल्प थे:
बातचीत के बीच में ही विज्ञापन दिखाना (mid-stream)
स्क्रीन के दाईं ओर चिपका हुआ विज्ञापन (right panel) यानी जब ChatGPT जवाब दे रहा हो, तो साइड में एक विज्ञापन लगातार दिखता रहे।
पूरी स्क्रीन को ढँकने वाला विज्ञापन (Interstitial), मतलब स्क्रीन पर अचानक विज्ञापन आ जाए और उसे हटाने के लिए ‘X’ पर क्लिक करना पड़े।
जवाब शुरू होने से पहले, सबसे ऊपर विज्ञापन दिखाना।
जब AI अपनी बात पूरी कर ले, तब नीचे विज्ञापन दिखाना।
ChatGPT ने आखिरी (और सबसे बेहतर) विकल्प चुना है:
“शुरुआत में, हम जवाबों के एकदम नीचे विज्ञापनों की टेस्टिंग करने की योजना बना रहे हैं। ये विज्ञापन आपकी मौजूदा बातचीत से जुड़े किसी उत्पादन या सेवा के बारे में होंगे।”
यह तरीका बिल्कुल सही है क्योंकि यह काम की जानकारी और विज्ञापन को अलग रखता है, जिससे यूज़र का अनुभव खराब नहीं होता।
ChatGPT विज्ञापन सिर्फ़ दिखाता नहीं है
ChatGPT की असली ताकत विज्ञापन को Invoke करने (बुलाने) में है।
अगर एडवर्टाइजिंग की भाषा में कहें, तो टार्गेटिंग अब आप कौन हैं या आप क्या चाहते हैं, इससे ज़्यादा इस समय आपकी समस्या क्या है, इस पर ध्यान देगी। इसका मतलब यह है कि ChatGPT सिर्फ़ यह तय नहीं करेगा कि कौन सा विज्ञापन दिखाना है, बल्कि वह यह भी तय करेगा कि कब विज्ञापन नहीं दिखाना है।
विज्ञापन कैसे तय होंगे? जैसा कि Sam Altman ने कहा था कि विज्ञापन उपयोगी होने चाहिए। यूज़र की बातचीत से ChatGPT को उसका हेतु समझ में आता है और इसी आधार पर वह विज्ञापन दिखता है।
लेकिन यह प्लेटफ़ॉर्म सिर्फ़ विज्ञापन दिखाने तक सीमित नहीं रहेगा, यह ब्रांड्स के साथ आपकी सीधी बातचीत भी शुरू करवा सकता है। एक बार विज्ञापन सामने आया, तो ChatGPT उसे एक बातचीत में बदल सकता है:
“बातचीत वाले इंटरफेस लोगों को सिर्फ़ पुराने मेसेजेस और लिंक्स से आगे बढ़ने का मौका देते हैं। उदाहरण के लिए, जल्द ही आप विज्ञापन देखकर सीधे वे सवाल पूछ सकेंगे जो आपको खरीदारी का फ़ैसला लेने में मदद करें।”
यह बात सीधे तौर पर META के बिजनेस को टक्कर देती दिख रही है। ब्रांड्स के साथ चैट करना ‘WhatsApp for Business’ का एक बड़ा हिस्सा है, और मुझे कोई हैरानी नहीं होगी अगर मेटा AI के जरिए वॉट्सऐप पर भी ऐसी ही AI चैट्स (सिर्फ़ लेन-देन नहीं, बल्कि बातचीत) शुरू हो जाएँ।
ब्रांड्स के साथ सीधे बात करना चैट ऐप्स के लिए कमाई का एक बहुत ही ज़बरदस्त मौका है।
विज्ञापन सिर्फ़ काम तक सीमित क्यों नहीं रह सकते
FMCG ब्रांड्स (जैसे साबुन, टूथपेस्ट आदि), जो दुनिया के सबसे बड़े एडवर्टाइजर्स हैं, आप उनसे यूँ ही बातचीत शुरू नहीं करते। अगर आप अपनी ट्रिप के लिए सामान की लिस्ट बना रहे हैं, तो आप उसी चैट विंडो में कोलगेट से टूथपेस्ट पर चर्चा नहीं करेंगे।
जैसा कि मैंने ChatGPT ऐप्स के मामले में अपने पहले लेख में कहा था, समस्या यह है कि,
“जब ChatGPT में ऐप्स सिर्फ़ काम करने के लिए हैं, तो सवाल यह उठता है कि: कौन सा ऐप कब दिखेगा यह कौन तय करता है?”
“जब तक यूज़र खुद किसी खास ऐप के लिए न कहे, तब तक ChatGPT के अंदर उस ऐप पर पूरा कंट्रोल ChatGPT का ही होता है।”
“सीधे शब्दों में कहें तो, ChatGPT खुद ही सिलेक्टर है, वही अंपायर है, वही मैदान है, वही पिच की स्थिति है और शायद भविष्य में सामने वाली टीम भी वही होगा।”
काम (Jobs-to-be-done) की एडवरटाइज़िग सिर्फ़ वहीं काम आती है जहाँ कोई काम किया जा सके, जैसे कि ट्रेवल, फिनटेक, पेमेंट या सॉफ्टवेयर (SaaS) के मामले में। लेकिन ये ऐप्स भी अपने खुद के प्लेटफ़ॉर्म के मुकाबले यहाँ बहुत सीमित लगेंगे। इससे एडवरटाइज़िग की परिभाषा ही बदल जाएगी और एडवर्टाइज़र्स को उसी ढाँचे में रहना पड़ेगा जो ChatGPT उन पर थोपेगा। यह न केवल ChatGPT की कमाई को सीमित करेगा, बल्कि यूज़र के लिए इसकी उपयोगिता को भी कम कर देगा।
यही वजह है कि इसके लिए एक अलग फॉर्मेट की ज़रूरत है। उम्मीद के मुताबिक, ChatGPT अब अपनी “उपयोगिता” वाली छवि से बाहर निकलकर कुछ नया कर रहा है। OpenAI का कहना है:
“सबसे अच्छे विज्ञापन वे होते हैं जो काम के हों, मनोरंजक हों और लोगों को नए प्रोडक्ट्स ढूँढने में मदद करें।”
“AI की ताकत को देखते हुए, हम आने वाले समय में ऐसे नए अनुभव बनाना चाहते हैं जो लोगों को किसी भी अन्य विज्ञापनों की तुलना में ज़्यादा मददगार और उनसे संबंधित लगें।”
यह तो तय था कि ChatGPT सिर्फ़ काम के विज्ञापनों तक सीमित नहीं रहेगा, क्योंकि विज्ञापन में बहुत पैसा है।
FMCG विज्ञापनों की कीमत और उन्हें दिखाने का तरीका शायद विज्ञापन दिखाने के अवसर (estimated invocation opportunity) और स्पर्धा (Competition) के आधार पर तय होगा। यह Google Adwords और Facebook की तरह ही एक मार्केट-आधारित और काफ़ी हद तक अपारदर्शक व्यवस्था होगी।
ब्रांड्स शायद हर बार विज्ञापन दिखने (pay per invocation) के हिसाब से पैसे देंगे और बातचीत शुरू करने के लिए शायद उन्हें अतिरिक्त प्रीमियम चुकाना पड़ेगा।
OpenAI की एडवरटाइज़िग पहेली का लापता हिस्सा
एक ऐसा सिस्टम जो आपके हेतु (intent), प्रोफ़ाइल (demographics), मानसिकता (psychographics) और आपकी सुप्त ज़रूरतों को भांप ले—वह शायद दुनिया का सबसे ताकतवर एडवरटाइज़िग इंजन बन सकता है।
मेटा के प्लेटफ़ॉर्म्स (फेसबुक, इन्स्टा और व्हाट्सएप) और कुछ हद तक गूगल की तरह, ChatGPT हमारे रिश्तों के जाल से जुड़ा हुआ नहीं है। उसे यह नहीं पता कि हम किन लोगों से नाता रखते हैं, हम किस पर भरोसा करते हैं, कौन हमें प्रभावित करता है या हम किन समुदायों से ताल्लुक रखते हैं। वह हमारे हेतु और बातचीत को अकेले में देखता है, दूसरे लोगों के संदर्भ में नहीं।
ChatGPT के अंदर एडवरटाइज़िग के लिए कोई सोशल ग्राफ़ नहीं है।
यह फ़र्क विज्ञापन की दुनिया के लिए उम्मीद से कहीं ज़्यादा मायने रखता है। सोशल ग्राफ़ का मतलब सिर्फ़ आपकी पहचान नहीं, बल्कि वे संकेत हैं जो आपके आसपास के माहौल से मिलते हैं। मेटा का असली फायदा सिर्फ़ यह नहीं है कि वह आपकी पसंद जानता है, वह यह भी जानता है कि आपके आस-पास के लोग क्या पसंद कर रहे हैं, राय कैसे फैलती है और ग्रुप में लोगों का व्यवहार कैसे बदलता है।
मेटा पर विज्ञापन इसलिए काम करते हैं क्योंकि वह सोशल प्रूफ़ और नेटवर्क के असर का लाभ उठाता है। ChatGPT के मुकाबले मेटा की स्थिति कहीं ज़्यादा मज़बूत है, क्योंकि मेटा सोशल ग्राफ़ के साथ-साथ मैसेजिंग और कॉमर्स (व्यापार) को भी जोड़ता है। Manus (Meta का AI एजेंट) उस एडवरटाइज़िग इंफ्रास्ट्रक्चर के ऑटोमेशन को संभव बनाता है
ChatGPT एक हद तक आपके व्यवहार को आपकी प्रोफाइल से जोड़ सकता है, लेकिन उसके पास लोगों के बीच के वे रिश्ते नहीं हैं जो ज़रूरी संकेत देते हैं। ग्रुप चैट्स के ज़रिए लोगों को जोड़ने की उनकी कोशिश फ़िलहाल काफ़ी कमज़ोर लगती है और ऐसा नहीं लगता कि यह उनका मुख्य दाँव है।
हो सकता है कि भविष्य में कभी ChatGPT अपना सोशल ग्राफ़ बनाने की कोशिश करे, लेकिन मुझे लगता है कि फ़िलहाल उसका पहला निशाना गूगल का हेतु आधारित बाज़ार है।
सिर्फ़ कामयाबी काफ़ी नहीं
बात यह है कि विज्ञापन का सिर्फ़ कामयाब होना काफ़ी नहीं होता, वह कामयाब क्यों हुआ यह समझना भी ज़रूरी होता है।
हमने देखा है कि जब विज्ञापन के पीछे की वजहें साफ़ नहीं होतीं, तो कितनी घबराहट फैलती है। जब एपल और गूगल ने थर्ड पार्टी कुकीज़ हटाने का फ़ैसला किया, तो एडवर्टाइज़र्स परेशान हो गए, क्योंकि उन्हें लगा कि अब वे सटीक विज्ञापन नहीं लगा पाएँगे। बिना सटीक जानकारी के स्टार्टअप्स को यह कभी पता नहीं चल पाएगा कि उनके विज्ञापन के पैसों का “कौन सा 50%” बर्बाद हो रहा है।
चैट के अंदर विज्ञापनों को कुकीज़ वाली समस्या तो नहीं झेलनी पड़ेगी, लेकिन ChatGPT के साथ उन्हें कुछ और मुश्किलों का सामना करना होगा, जैसे:
कम विज्ञापन दिखना, और
फ़ैसलों में अपारदर्शिता
एड एजेंसियाँ विज्ञापन देने वालों के प्रति जवाबदेह होती हैं। वे सवाल पूछेंगी कि उनका विज्ञापन क्यों नहीं दिख रहा, या कम क्यों दिख रहा है। यहाँ तक कि अगर कंपनी के CEO या ब्रांड मैनेजर को अपनी कंपनी के बजाय किसी कॉम्पिटिटर का विज्ञापन दिख गया, तो भी वे जवाब माँगेगे। एडवरटाइज़िग सिस्टम को केवल यह तय नहीं करना होगा कि विज्ञापन कब दिखाना है, बल्कि उन्हें इसका सबूत भी देना होगा कि विज्ञापन दिखाया जा रहा है। उन्हें उन लोगों को जवाब देना होगा जिन्होंने उन पर अपना पैसा लगाया है।
वे यह कैसे साबित करेंगे कि किसी यूज़र ने ब्रांड के साथ बातचीत की, और क्या बात की? क्या यूज़र की वह बातचीत ब्रांड को दिखाई जाएगी? हर नया बिज़नेस फ़ीचर अपने साथ एडवर्टाइज़र के प्रति एक नई जवाबदेही लेकर आएगा।
प्लेटफ़ॉर्म पहले अपनी पकड़ बनाते हैं
जब कोई प्लेटफ़ॉर्म विज्ञापन शुरू करता है, तो एडवर्टाइज़र्स के पास अपने पैसों की ताकत होती है।
हालाँकि, सभी प्लेटफ़ॉर्म इसी सोच पर बनते हैं कि एडवर्टाइज़र्स को बिखरा दिया जाए और फिर उन सभी को अपने प्लेटफ़ॉर्म पर आने के लिए मजबूर किया जाए, ताकि किसी भी एक कंपनी के पास मोल-भाव करने की ज़्यादा ताकत न रहे। इसी तरह प्लेटफ़ॉर्म एडवर्टाइज़र्स के पैसों की ताकत का जवाब अपनी खुद की ताकत से देते हैं।
ऑनलाइन एडवरटाइज़िग का एक पुराना पर अहम उदाहरण देखिए: फेसबुक ने पहले ब्रांड्स को अपने पेज बनाने के लिए उकसाया। कंपनियों ने फेसबुक पर अपनी पहचान बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए।
फिर एक दिन फेसबुक ने अचानक पासा पलट दिया। उसने पेजों की पहुँच (Reach) खत्म कर दी। नतीजा यह हुआ कि अब ब्रांड्स को उन लोगों तक पहुँचने के लिए भी पैसे देने पड़ते हैं जिन्होंने उन्हें पहले से सब्सक्राइब कर रखा है।
Alphabet ने अपनी हालिया अर्निंग कॉल में जो कहा वह एक गौर करने वाली बात है। कहते हैं:
“हम फ़िलहाल ऑर्गेनिक अनुभव (बिना विज्ञापन वाले ज़वाब) पर ध्यान देंगे... लेकिन समय के साथ, हम वहाँ बेहतरीन कमर्शियल अनुभव भी लाएँगे और हमें लगता है कि लोग इसे वैसे ही अपना लेंगे जैसे वे हमेशा करते आए हैं।”
तो सवाल यह नहीं है कि क्या ChatGPT भी ऐसा ही पासा पलटने वाला काम करेगा: यह तो तय है और एक तरह से शुरू भी हो चुका है।
जो बात मुझे समझ में नहीं आ रही, वह यह है कि OpenAI यह इतनी जल्दी क्यों कर रहा है? अभी तो ChatGPT का ऐप स्टोर लॉन्च ही हुआ था कि उन्होंने विज्ञापन भी शुरू कर दिए। अब एडवर्टाइज़र्स के तौर पर ऐप्स और बिज़नेस को पहले से ही पता है कि आगे चलकर उनके साथ क्या होने वाला है—इससे पहले कि वे इस प्लेटफ़ॉर्म पर पूरी तरह निर्भर हों।
— निखिल पाहवा
यह लेख पहले यहाँ अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुआ है: When advertising comes to ChatGPT
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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