साल 2013 में मैंने सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी जॉइन किया था। वहाँ मैं आजीविका से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहा था और रेहड़ी-पटरी वालों या पथ विक्रेताओं (street vendors) को कानून के तहत कुछ सुरक्षा दिलाने की कोशिश कर रहा था। इसके अगले ही साल, ‘Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act, 2014’ लागू हुआ।
कानून आने के बावजूद विक्रेताओं को हटाया जा रहा था। जिन सर्वेक्षणों के ज़रिए उन्हें बेदखली से बचाया जाना था, वे हो ही नहीं रहे थे। हमारी समझ के मुताबिक, हमारा काम यह सुनिश्चित करना था कि सरकार कागजों पर किए गए अपने वादों को ज़मीन पर उतारे। हम यही मानकर चल रहे थे कि इसका एकमात्र हल औपचारिककरण (formalisation) है, यानी विक्रेताओं का रजिस्ट्रेशन हो, उन्हें लाइसेंस मिले, उनकी गिनती हो और फिर कानून खुद-ब-खुद उन्हें सुरक्षा दे देगा, क्योंकि कानून में ऐसा ही लिखा था। हमने इस सोच पर कभी गहराई से सवाल नहीं उठाया। हमारे दिमाग में कानून का वादा और उसका नतीजा, दोनों एक ही चीज़ थे।
मुझे लगता है कि हम में से ज़्यादातर लोग, ज़्यादातर बार, बुनियादी सिद्धांतों को ध्यान में रखकर नहीं सोचते। हमारे सामने जो कुछ होता है, हम उसी के आधार पर सोचने लगते हैं। कानून हमारे सामने था और उसका तर्क एकदम स्पष्ट था: विक्रेताओं को परेशान किया जाता है, इसलिए उन्हें सुरक्षा चाहिए, सुरक्षा का मतलब है कि उन्हें हटाया नहीं जा सकता, लेकिन वे तब तक सुरक्षा का दावा नहीं कर सकते जब तक सर्वेक्षण में उनकी गिनती न हो जाए, गिनती होने के बाद उन्हें एक सर्टिफिकेट मिलेगा और सर्टिफिकेट मिलने के बाद उन्हें हटाना गैरकानूनी हो जाएगा।
अगर आप इसी कड़ी के अनुसार सोचें, तो सिर्फ़ एक ही सवाल बचता है कि क्या सरकार अपना काम ठीक से कर रही है? शुरुआती कुछ सालों तक, मैं भी बस यही सवाल पूछ रहा था।
हम चाहते थे कि सबसे पहले कानून लागू हो
सरकार अपना काम नहीं कर रही थी। कानून के मुताबिक जिन शहरों में सर्वे होने चाहिए थे, वे हो नहीं रहे थे। इस कानून में ऐसा कोई पुख्ता तरीका नहीं था जो नगर निगमों को सर्वे कराने के लिए मजबूर कर सके, न तो कोई सख्त समय-सीमा थी और न ही काम न करने पर किसी कार्रवाई का प्रावधान।
जहाँ सर्वे हुए भी, वे अक्सर बहुत जल्दबाजी में किए गए। या यूँ कहें कि सिर्फ़ खानापूर्ति कर दी गई और सैकड़ों विक्रेताओं को गिनती में शामिल ही नहीं किया गया। जो लोग छूट गए, प्रशासन की दृष्टि में उनका कोई अस्तित्व ही नहीं रहा। सर्वे के अलावा इस कानून में बाकी कई व्यवस्थाएँ भी थीं: एक योजना, कुछ नियम, एक वेंडिंग प्लान और इन सबकी मंज़ूरी के लिए एक टाउन वेंडिंग कमेटी। वह भी देश के हर छोटे-बड़े शहर और कस्बे में। हर एक नया काम उस कमज़ोर और कम कर्मचारियों वाले नगर निगम के लिए एक मौका था, अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह फेरने का।
सर्वेक्षण न होने के पीछे छिपी असली और गहरी समस्या को समझने में मुझे ज़रूरत से ज़्यादा वक्त लग गया। समस्या यह थी कि जिस प्रशासन के पास किसी भी चीज़ को लागू करने की क्षमता बेहद सीमित थी, उसी के हाथ में एक ऐसा कानून थमा दिया गया था जो यह मानकर चलता था कि सरकार के पास सब कुछ लागू करने की अपार क्षमता है—सर्वे कराना, योजना बनाना, नियम बनाना, वेंडिंग प्लान तैयार करना, कमेटी गठित करना और सर्टिफिकेट बाँटना। एक सरल कानून शायद उतनी बार विफल न होता, ठीक वैसे ही जैसे एक छोटी रस्सी में उलझकर गिरने की आशंका कम होती है। इस कानून की रस्सी बहुत लंबी थी।
एक नहीं, तीन सवाल
बेहतर कार्यान्वयन की वकालत करते-करते, मुझे इस पूरी समस्या के पीछे छिपा सवाल परेशान करने लगा। अब तक हम यही पूछ रहे थे कि क्या इस कानून को लागू किया जा रहा है? लेकिन हमने कभी गंभीरता से यह सवाल नहीं पूछा था कि क्या यह कानून वाकई लागू किए जाने के लायक भी है?
यह सवाल तीन अलग-अलग हिस्सों में बँटता है और मैं अब तक इन्हें अलग करके नहीं देख पा रहा था।
पहला: जिस कानून में इतने सारे काम हों और अधिकांश नगर निगमों के पास काम करने की क्षमता इतनी कम हो, तो क्या उस कानून को व्यावहारिक रूप से लागू किया भी जा सकता है?
दूसरा: अगर इसे हूबहू वैसा ही लागू कर दिया जाए जैसा लिखा गया है, तो क्या इससे रेहड़ी-पटरी वालों को वाकई सुरक्षा मिलेगी, या फिर यह सिर्फ़ कागज़ी सुरक्षा होगी?
तीसरा: इस कानून के नतीज़े चाहे कुछ भी हों, लेकिन क्या इसके ऐसे कुछ दुष्प्रभाव भी हैं जिनकी कल्पना इसे बनाने वालों ने कभी की ही नहीं थी?
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने मुझे क्या सिखाया
साल 2015 के आसपास मैंने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) (किसी भी व्यापार, व्यवसाय या आजीविका को चुनने का अधिकार) पर पीएचडी में दाखिला लिया। उस दौरान मैंने पथ बिक्री से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों को पढ़ने में काफ़ी समय बिताया। इनमें ‘सोदन सिंह बनाम नई दिल्ली नगर पालिका समिति’ का मामला भी शामिल था। यह वही ऐतिहासिक मामला था, जिसने फुटपाथ पर सामान बेचने के रेहड़ी-पटरी वालों के अधिकार को व्यापार के संवैधानिक अधिकार से जोड़ा था।
इस फैसले के पन्नों में रेहड़ी-पटरी वालों और सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल करने वाले अन्य निजी लोगों के बीच एक तुलना छिपी हुई थी। पूरे फैसले के मुकाबले इस एक तुलना पर मैं कहीं ज़्यादा देर तक सोचता रहा।
हम—रेहड़ी-पटरी वालों के वकील, शहर के प्लानर्स और आम निवासी—इस सवाल पर ही दिमाग लड़ाते रहते हैं कि कोई अपनी निजी आजीविका के लिए सार्वजनिक ज़मीन पर कब्ज़ा कैसे कर सकता है, मानो रेहड़ी-पटरी वाले ही ऐसा करने वाले इकलौते लोग हों। जबकि ऐसा नहीं है। सार्वजनिक जगह पर खड़ी की गई कार यही करती है और सड़क पर निकलने वाली बारात भी। बैंड-बाजे के साथ जो शादी का जुलूस घंटों तक सड़क जाम कर देता है, उससे कोई यह नहीं पूछता कि इसके पास लाइसेंस है या नहीं। किसी मकान मालिक के गमले, जो बरामदे से बाहर निकलकर फुटपाथ तक फैल जाते हैं, वे भी सार्वजनिक ज़मीन घेरते हैं। किसी के गेट के बाहर फुटपाथ पर ही बना सुरक्षा गार्ड का केबिन भी यही काम करता है। लेकिन इनमें से किसी भी चीज़ की उतनी बारीक जाँच-पड़ताल या सख्त रवैया देखने को नहीं मिलता, जितना कि रेहड़ी-पटरी वालों के मामले में दिखता है।
इनमें से ज़्यादातर तुलनाएँ किसी न किसी वजह से कमज़ोर साबित हुईं, जैसे बारात कभी-कभार आने वाली चीज़ है और गार्ड का केबिन या गमले आकार में छोटे होते हैं। कार पार्किंग की तुलना थोड़ी ज़्यादा सटीक थी, क्योंकि तब तक भारत के कई शहरों में वह व्यवस्था काम कर रही थी: मीटर वाली, तय समयवाली, टिकट वाली और कभी-कभी तो उसे चलाने वाले नगर निगम के लिए मुनाफ़े वाले भी।
इसलिए मैंने दोनों मॉडलों की तुलना करना शुरू किया, और यह तुलना काफ़ी काम की साबित हुई, इसलिए नहीं कि इससे यह पता चला कि पार्किंग और पथ बिक्री एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, बल्कि इसलिए कि यह तुलना जहाँ फेल हुई, उसने असली तस्वीर दिखाई।
पार्किंग आमतौर पर सीमित समय के लिए होती है, जबकि किसी विक्रेता का किसी जगह पर दावा लगातार और लगभग हमेशा के लिए होता है। कार रजिस्टर्ड होती है और उसके मालिक का पता आसानी से लगाया जा सकता है। वहीं ठेला ऐसे किसी व्यक्ति से जुड़ा नहीं होता जिसे सरकार आसानी से ढूँढ सके।
रेहड़ी-पटरी की वजह से वहाँ लाइनें लगती हैं, सामान रखने की जगह चाहिए होती है, कचरा होता है और हर ग्राहक के पाँच मिनट रुकने से वहाँ काफ़ी भीड़ जमा हो जाती है। पार्किंग में ऐसा नहीं होता।
इनमें से किसी भी बात ने मरे पहले निरीक्षण को गलत साबित नहीं किया, बल्कि उसे और स्पष्टता दी: शहरों ने सार्वजनिक ज़मीन के एक निजी इस्तेमाल के इर्द-गिर्द नैतिक जामा पहना हुआ एक जटिल तंत्र खड़ा कर दिया था। और दूसरी तरफ़ वैसी ही कई अन्य चीज़ों को सामान्य मानकर उन्हें भारी छूट दे रखी थी। माना कि दोनों चीज़ों के लिए अलग-अलग नियमों की ज़रूरत है, लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि इनमें से एक को परमिट और कमेटियों के जंजाल में उलझा दिया जाए और बाकी सब पूरी तरह बचे रहें।
वह अधिकार जो कानून ने कभी नहीं दिया
दूसरा सवाल—क्या यह कानून वाकई रेहड़ी-पटरी वालों को सुरक्षा देता है? यह विचार अदालती फैसलों से नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत से उपजा था।
साल 2019 में हमने गौतम नगर के पास कुछ ऐसे विक्रेताओं के मामलों पर काम किया, जिन पर साफ-सफाई के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में नगर निगम ने भारी-भरकम जुर्माना (चालान) लगा दिया था। जब मैंने उनसे बात की, तो एक बात ने मुझे चौंका दिया।
उनमें से एक विक्रेता को वह जगह न तो विरासत में मिली थी और न ही उसने सुबह जल्दी पहुँचकर उस पर कब्ज़ा जमाया था, उसने वह जगह पहले कब्जेदार से दो लाख रुपये देकर खरीदी थी।
कानून की नज़र में रेहड़ी-पटरी की जगह कोई संपत्ति नहीं है। लेकिन कानून की दुनिया से बाहर भी एक दुनिया है और वहाँ वह पहले से एक संपत्ति बन चुकी है।
यह सब किस हद तक फैला हुआ है यह जानने के लिए मैंने पश्चिम दिल्ली में हफ़्ता बाजार चलाने वाले एक व्यक्ति से बात की। ये ऐसे साप्ताहिक बाजार होते हैं जहाँ विक्रेता हफ़्ते में एक बार, तीन या चार घंटे के लिए अपनी दुकान लगाते है और बाकी पूरे दिन वह फुटपाथ ऐसा खाली रहता है जैसे वहाँ कभी कोई बाजार लगा ही न हो। न कोई स्टाल, न कोई निशान, जहाँ एक दिन पहले सब्जी का ठेला लगा हुआ था ठीक उसी जगह पर दूसरे दिन एक कार खड़ी होती है।
मैंने उससे पूछा कि ऐसी एक जगह की कीमत क्या होगी। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और मुझे कोई रिसर्चर समझने के बजाय एक विक्रेता समझकर कहा कि चिंता मत करो, तुम्हारा काम हो जाएगा, कीमत होगी पचहत्तर हजार रुपये!
पचहत्तर हजार रुपये, हफ़्ते में चार घंटे सार्वजनिक फुटपाथ पर दुकान लगाने के हक के बदले में, वह भी हमेशा के लिए। उस सौदे में शामिल किसी भी व्यक्ति ने स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट नहीं पढ़ा था, न ही किसी को उसे पढ़ने की ज़रूरत थी। बाज़ार ने उस अधिकार की कीमत पहले ही तय कर ली थी और उसका खुलेआम लेन-देन भी हो रहा था, जबकि यह कानून यह जिद करता है कि ऐसे किसी अधिकार का अस्तित्व ही नहीं है।
यही पैटर्न ज़्यादा पक्की दुकानों के मामले में भी नज़र आया। कानून यह उम्मीद करता है कि हर शाम एक तय समय से पहले सारा सामान सड़क से हटा लिया जाएगा। यानी यह कानून पथ बिक्री को फुटपाथ का एक ऐसा इस्तेमाल मानता है जो दिन में तो हो सकता है, पर रात को नहीं।
लेकिन हमने जिन स्थायी विक्रेताओं से बात की, उनमें से कई लोग रात में अपना सामान हटाते ही नहीं थे। वह सामान वहीं तिरपाल के नीचे, उसी जगह पर रखा रहता था, क्योंकि उनकी नज़रों में वह जगह उनकी अपनी थी। फिर चाहे कानून इसे माने या न माने। हमने आखिरकार जो रिसर्च पेपर प्रकाशित किया, उसका सार यही था। वह किसी बहस से ज़्यादा एक तस्वीर की तरह था। एक तरफ़ यह था कि कानून क्या कहता है और दूसरी तरफ़ यह कि लोग वास्तव में क्या कर रहे हैं। और ये दोनों तस्वीरें एक जैसी तो बिल्कुल नहीं थीं।
कानून की सोच से कहीं ज़्यादा अमीर
कानूनी कल्पना और वास्तविकता के बीच की यह खाई जितनी दिखती है, उससे कहीं गहरी है। इस पूरे कानून का ढाँचा इस बुनियादी सोच पर टिका है कि रेहड़ी-पटरी वाला अनिवार्य रूप से गरीब होता है। यानी वह एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसके पास आजीविका कमाने का और कोई ज़रिया नहीं है, इसलिए उसे सुरक्षा की ज़रूरत है। लगभग 2020 में, एक सरकारी योजना आई, जो इसी सोच पर आधारित थी: पीएम स्वनिधि योजना।
इस योजना के तहत रेहड़ी-पटरी वालों को महामारी से उबरने में मदद के लिए दस हजार रुपये का बिना गारंटी का कर्ज़ दिया गया। नगर निगम के कर्मचारियों और बैंक अधिकारियों ने विक्रेताओं को इस योजना से जोड़ने के लिए पूरी ताकत लगा दी। मैं इस बारे में कोई आम दावा नहीं करूँगा। हो सकता है देश में कहीं कुछ रेहड़ी-पटरी वालों को सचमुच दस हजार रुपये की ज़रूरत रही हो और मेरे पास पूरे देश का डेटा भी नहीं है।
लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि दक्षिण दिल्ली के जिन विक्रेताओं से हमने बात की, उनमें से कई लोगों को इसकी बिल्कुल ज़रूरत नहीं थी। उनमें से कुछ लोग तो अच्छा-खासा कारोबार चला रहे थे। हर एक के पास कई जगह दुकानें थीं, उन्होंने 8,000 से 20,000 रुपये महीने की तनख्वाह पर कर्मचारी रखे हुए थे और उनकी मासिक कमाई 70,000 रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक थी। ऐसे विक्रेताओं के लिए दस हज़ार रुपये का कर्ज़ कोई मायने नहीं रखता था, फिर भी उन्होंने इसे ले लिया क्योंकि यह पैसों के लिए था ही नहीं।
केंद्र सरकार की किसी योजना में नाम दर्ज होना अपने आप में सरकारी मान्यता प्राप्त करने का एक ज़रिया होता है। इससे यह साबित होता है कि सरकार की नज़र में आप एक आधिकारिक रेहड़ी-पटरी वाले हैं। यह ठीक वही चीज़ है जो यह कानून, अपनी तमाम योजनाओं, कमेटियों और नियमों के बावजूद, अब भी किसी को आसानी से नहीं दे पा रहा है। मैंने जहाँ यह सब देखा, वहाँ गरीबों के लिए बनाई गई एक योजना उन लोगों के लिए सबसे ज़्यादा अहम साबित हुई जो बिल्कुल भी गरीब नहीं थे। ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि यह योजना फेल हो गई, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि शुरुआत से ‘एक रेहड़ी-पटरी वाला कौन होता है?’ इस बारे में इस कानून की सोच अत्यंत संकुचित रही थी।
जब आप इन दोनों कमियों को देख लेते हैं, तो इस कानून के बाकी फैसले भी कुछ अलग ही नज़र आने लगते हैं।
पहला: सर्टिफिकेट्स की संख्या को किसी वार्ड की आबादी के एक तय हिस्से तक सीमित कर देना। दरअसल, इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि बस की कतार या स्कूल के गेट के लिए जगह छोड़ने के बाद, फुटपाथ के किसी हिस्से पर कितनी गाड़ियाँ या ठेले लग सकते हैं। ऐसे में एक आँकड़े को बदलकर दूसरा आँकड़ा रख देने से समस्या हल नहीं होती, बस रूप बदल लेती है।
दूसरा: यह कानून, जैसे किसी मास्टर प्लान में लैंडफिल या बिजली घर के लिए अलग प्लॉट होते हैं, उसी तरह पथ विक्रेताओं के लिए अलग “वेंडिंग ज़ोन” की कल्पना करता है। इससे यह साबित होता है कि इसकी पूरी भौगोलिक समझ ही उलटी है। विक्रेता वहाँ जमा होते हैं जहाँ लोगों की आवाजाही और भीड़ पहले से है, जैसे मेट्रो के गेट पर या किसी बाज़ार के द्वार पर, न कि उस जगह पर जहाँ किसी ऑफिस ने कोई लाइन खींच दी हो और यह उम्मीद कर रहा हो कि ग्राहक खुद-ब-खुद वहाँ चले आएँगे।
गोवा, 2021
तीसरा: यह एक सवाल है। इस कानून से वास्तव में ऐसा क्या होता है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी? इसका जवाब मैंने किसी रिसर्च से नहीं, बल्कि एक हॉल के अंदर के माहौल को देखकर पाया।
मुझे गोवा में एक स्ट्रीट वेंडर यूनियन की छमाही बैठक को संबोधित करने के लिए बुलाया गया था (जी हाँ, गोवा में!)। वह हॉल रेहड़ी-पटरी वालों से खचाखच भरा हुआ था। हालाँकि, उन्हें संबोधित करने वाले लोग ज़्यादातर रेहड़ी-पटरी वाले नहीं थे। उस मंच पर बैठे राष्ट्रीय और राज्य स्तर के नेताओं का रेहड़ी-पटरी से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था, वे ज़्यादातर वामपंथी दलों से जुड़े लोग थे, दूसरे आंदोलनों में भी सक्रिय रह चुके थे और उन्हें पथ विक्रेताओं की पैरवी में एक नया मुद्दा और अपना वोट बैंक मिल गया था।
मेरे पहले एक वामपंथ की ओर झुकाव वाले अर्थशास्त्री ने भाषण दिया, और उन्होंने नीतिगत बातचीत करने के बजाय किसी राजनीतिक रैली की तर्ज पर ज़्यादातर समय वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार की आलोचना की। दूसरे वक्ताओं ने भी मौलिक अधिकारों पर बहुत लंबे-चौड़े भाषण दिए। लेकिन इस बात पर बहुत कम चर्चा हुई कि दुनिया भर में आखिर इस मामले में कौन-सी व्यवस्थाएँ काम कर रही हैं। दरअसल, वे ऐसे राजनीतिक महत्वाकांक्षी लोग थे जो असली विक्रेताओं को यह सिखा रहे थे कि उन्हें अपनी लड़ाई कैसे लड़नी चाहिए और इस प्रक्रिया में वे एक ऐसे आंदोलन का नेतृत्व ले रहे थे जिससे उनका अपना कभी कोई वास्ता ही नहीं रहा था।
उस कमरे में मुझे जो बात समझ आई, वह यह थी कि टाउन वेंडिंग कमेटी उन लोगों के लिए बहुत काम की बन चुकी थीं जिनका रेहड़ी-पटरी से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था।
किसी भी राजनीतिक करियर को आगे बढ़ने के लिए एक मतदाता वर्ग (constituency) और उससे संबंधित एक सुलगते हुए मुद्दे की ज़रूरत होती है। इसके लिए कोई अच्छी तरह से काम करने वाली व्यवस्था के मुकाबले एक ऐसा मसला कहीं ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है जो हमेशा अनसुलझा रहे और जिससे भावनाएँ जुड़ी हों।
उस कमरे में किसी ने भी एक पल के लिए भी पथ बिक्री व्यवस्था की तुलना कार पार्किंग से करने का सुझाव नहीं दिया, जबकि कार पार्किंग की व्यवस्था (बिना किसी टाउन वेंडिंग कमेटी के) दुनिया की ज़्यादातर जगहों पर ठीक-ठाक काम कर रही है।
वह तुलना सिर्फ़ उस कमरे से गायब नहीं थी, बल्कि वहाँ मौजूद लोगों के स्वार्थ के खिलाफ़ थी। बाज़ार विरोधी और व्यवसायीकरण विरोधी भाषा ही इस मुद्दे को उतना राजनीतिक रूप से उपयोगी बनाए रखती है, जितनी इसकी फ़िलहाल ज़रूरत है। अगर कोई काम करने वाला, बोरिंग सा और अच्छा समाधान सामने आ गया, तो इन नेताओं की दुकान ही बंद हो जाएगी।
कानून की तीन बड़ी भूलें
अत्यधिक योजना बनाने की बीमारी (Constructivism)
यह कानून ‘ओवर-डिज़ाइनिंग’ करता है, यानी हर चीज़ को हद से ज़्यादा योजनाबद्ध करने की कोशिश करता है। एक योजना, कुछ नियम, एक वेंडिंग प्लान, वार्ड की आबादी के 2.5% की सीमा, वेंडिंग ज़ोन, नो-वेंडिंग ज़ोन, वेंडिंग चार्टर और वेंडिंग सर्टिफिकेट। ऐसा लगता है जैसे भारत में कहीं भी रेहड़ी-पटरी वालों से निपटने का एकमात्र सही तरीका यही है कि कागजों पर ज़्यादा से ज़्यादा नियम बनाए जाएँ।
हाँ, इसे बनाने वालों की इसलिए तारीफ ज़रूर करनी होगी कि उन्होंने यह सारा डिज़ाइन खुद दिल्ली में बैठकर तय करने के बजाय राज्य और स्थानीय सरकारों पर छोड़ दिया। लेकिन इसके पीछे की सोच फिर भी वही है कि: देश भर में रेहड़ी-पटरी के लिए किसी न किसी योजना और नियमन की जरूरत है।
जबकि भारत के अधिकांश कस्बों और कई शहरों में इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। देश की ज़्यादातर जगहें इतनी भीड़भाड़ वाली नहीं हैं कि एक विक्रेता की दुकान की जगह के लिए लड़ाई करनी पड़े। वहाँ स्वयंभू व्यवस्था (spontaneous order)—यानी विक्रेता, दुकानदारों और स्थानीय नागरिकों का आपस में तालमेल—बिना किसी सर्वेक्षण, सर्टिफिकेट या कमेटी के ही सब कुछ अच्छे से संभाल लेती है। जो सरकार अपनी सीमित प्रशासनिक ताक़त को ऐसी व्यवस्था को ठीक करने में खर्च करती है, जो पहले से ठीक चल रही है, उसके पास उन असली समस्याओं के लिए ताकत कम पड़ जाती है जिन्हें वाकई सुलझाने की ज़रूरत है।
यह मान लेना कि हर रेहड़ी-पटरी वाला गरीब ही होता है
दूसरी गलती यह मान लेना है कि रेहड़ी-पटरी वाला गरीब ही होता है। वे गरीब हो सकते हैं, आखिरकार भारत में बहुत से लोग गरीब हैं, चाहे वे पथ विक्रेता हों या न हों। इसलिए सिर्फ़ विक्रेता होना कोई गरीबी का सर्टिफिकेट नहीं हो सकता। ज़्यादा दिलचस्प बात यह देखना है कि वे कहाँ गरीब नहीं हैं और वे वहाँ तक कैसे पहुँचे हैं।
हम जिन विक्रेताओं से मिले, उनमें से बहुत से ऐसे नहीं थे जो किसी तरह अपना गुजारा चलाने के लिए संघर्ष कर रहे हों। वे सचमुच उद्यमी थे। और भी सटीक शब्द इस्तेमाल करना हो तो आप उन्हें ‘नैनो-एंट्रेप्रेन्योर’ कह सकते हैं, लेकिन हैं वे उद्यमी ही।
उनमें से कुछ लोग एक से ज़्यादा जगहों पर दुकानें चला रहे थे। कुछ ने परिवार के अलावा अन्य लोगों को काम पर रखा हुआ था, जिन्हें वे महीने के आठ, दस या पंद्रह हज़ार रुपये वेतन दे रहे थे।
मैंने खुद पश्चिम दिल्ली के एक रेहड़ी-पटरी वाले को अपनी पुरानी Wagon R कार बेची थी, जिसे वह अब सुबह सूरज निकलने से पहले मंडी जाकर सब्जियाँ लाने के लिए इस्तेमाल करता है। और वह अकेला ऐसा विक्रेता नहीं है जिसे मैंने ठेला खींचने के बजाय कार से थोक सामान लाते हुए देखा हो।
बेशक यह बात हर किसी पर लागू नहीं होती। बहुत से रेहड़ी-पटरी वाले वाकई जैसे-तैसे अपना गुज़ारा कर रहे हैं। लेकिन यह कानून ‘अकेले ठेले पर सामान बेचने वाले गरीब इंसान’ की जिस तस्वीर को आधार मानकर चलता है, वह पूरी तस्वीर नहीं है। जिन जगहों पर सबसे ज़्यादा विवाद और सबसे ज़्यादा कमाई होती है, उनके बारे में तो यह तस्वीर सच्चाई के आस-पास भी नहीं पहुँचती।
इसकी एक खास वजह है: जिन जगहों पर सार्वजनिक ज़मीन सीमित है और उस पर कब्ज़े को लेकर खींचतान चलती है—यानी ठीक वही जगहें जिन पर यह कानून अपना सबसे ज़्यादा ध्यान देता है—वहाँ के विक्रेता शायद उन विक्रेताओं के मुकाबले कहीं ज़्यादा कमा रहे होते हैं, जिनकी जगह के लिए कोई नहीं लड़ रहा। कोई भी ऐसी जगह के लिए लड़ाई नहीं करता जिसकी कीमत मामूली हो।
जिस विक्रेता ने गौतम नगर के पास अपनी जगह दो लाख रुपये में खरीदी थी, या जिसकी हफ़्ते में चार घंटे लगने वाली दुकान की कीमत पचहत्तर हज़ार रुपये थी, वे विक्रेता उस गरीबी की तस्वीर में फिट नहीं बैठते, जिसे ध्यान में रखकर यह कानून बनाया गया है। जबकि सच्चाई यह है कि यह कानून अपना सबसे ज़्यादा समय इसी तरह के विक्रेताओं पर खर्च करता है।
और जहाँ ये विक्रेता गरीब हैं, वहाँ भी यह बात अक्सर वहीं खत्म नहीं हो जाती। मेरा अपना परिवार विभाजन के बाद शरणार्थी बनकर दिल्ली आया था। मेरी दादी और उनके पाँच बेटे, 1947 में बंटवारे के बाद पश्चिमी पंजाब से लगभग सब कुछ गँवाकर भारत आए थे। शुरुआती सालों में मेरे पिताजी के सबसे बड़े भाई साइकिल पर मीटर के हिसाब से कपड़ा बेचा करते थे, बाद में परिवार ने सब्जियाँ बेचना शुरू किया। वक्त के साथ, उन्होंने अपनी दुकानें खोलीं।
मैंने यही कहानी कई और परिवारों से भी सुनी है। वे लोग जिन्होंने कभी सड़क पर छोले-भटूरे बेचे और आगे चलकर खुद की दुकान के मालिक बने। सड़क किनारे के वे ठेले जो कभी तिरपाल और रस्सियों के कच्चे ढाँचे हुआ करते थे, आज आलीशान रेस्तराँ बन चुके हैं।
ऐसे लोगों के लिए रेहड़ी-पटरी कभी उनकी आखिरी मंजिल नहीं थी। यह तो सिर्फ़ ऊपर चढ़ने की एक सीढ़ी थी। एक ऐसा कानून जो हर विक्रेता को किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में देखता है जिसे हमेशा सुरक्षा की ज़रूरत है, वह उन विक्रेताओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देता है जिनके लिए यह काम उस गरीबी से बाहर निकलने का रास्ता भर है।
सुरक्षा का उलटा ढाँचा
तीसरी भूल सुरक्षा और उसके रुख को लेकर है। रेहड़ी-पटरी वालों को सुरक्षा की ज़रूरत वाकई होती है, उन पुलिस वालों से और नगर निगम के अधिकारियों से जो आँखें मूँदने के एवज में हफ़्ता या महीना (रिश्वत) वसूलते हैं। इस कानून में ऐसी वसूली के खिलाफ़ कोई सख्त प्रावधान नहीं है। विक्रेता से रिश्वत वसूलने वाले अधिकारी पर कोई जुर्माना नहीं है, बल्कि जुर्माना केवल उस विक्रेता पर लगाया जाता है जो उस सर्टिफिकेट की शर्तों का उल्लंघन करता है, जिसे पाने के लिए ही उससे रिश्वत वसूली गई थी। यानी, उत्पीड़न से लोगों की सुरक्षा के लिए बनाया गया कानून, उत्पीड़न करने वालों पर कोई भी कार्रवाई करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।
इन तीनों ही भूलों की जड़ में एक ही ऐसी बड़ी अनदेखी है, जिस पर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री Hernando de Soto ने अपनी पूरी किताब — ‘The Mystery of Capital: Why Capitalism Triumphs in the West and Fails Everywhere Else (2000)’ लिख डाली थी। कानून उस प्रॉपर्टी सिस्टम को देख ही नहीं पाता जो ज़मीन पर पहले से ही मौजूद है। वहाँ एक खुला बाज़ार है। यह बाज़ार रेहड़ी-पटरी की जगहों की कीमत तय करता है, उनका लेन-देन करता है और उन्हें एक ऐसी संपत्ति के रूप में देखता है, जिसकी कीमत किसी फुटपाथ पर दो लाख रुपये है तो किसी पर पचहत्तर हज़ार रुपये।
इस कानून को ऐसे लिखा गया मानो यह सब कुछ हो ही न रहा हो। मानो इस खेल में एकमात्र संपत्ति वह सर्टिफिकेट हो जिसे सरकार बाँटती है, न कि वह जगह जिसे लोग पहले से खरीदते और बेचते आ रहे हैं। इसके लिए उन्हें किसी की अनुमति की ज़रूरत नहीं पड़ती।
बारह साल बाद
मैं उस नीति-निर्माण प्रक्रिया के बारे में सोचता हूँ जिससे ऐसे कानून बनते हैं। शायद ही कोई दूसरा मुद्दा इतना स्थानीय हो, जिसमें इतनी स्थानीय चीज़ें आती हैं, जैसे कौन सा फुटपाथ, कौन सा विक्रेता और शाम का कौन सा वक्त। लेकिन इस पूरे कानून को संसद द्वारा पूरे देश के लिए बना दिया गया। एक ऐसे देश के लिए जिसके एक शहर का एक मोहल्ला दूसरे से ज़रा भी मेल नहीं खाता।
यह फ़र्क ही इसे बनाने वालों को यह समझाने के लिए काफ़ी होना चाहिए था कि इसके सही तरीके से लागू होने की संभावना कितनी है। और यह कोई अंग्रेज़ों के ज़माने का कानून तो है नहीं, जिसे लोग हटाना भूल गए हों, या नेहरूवादी योजना का कोई ऐसा अवशेष जिसे हम उस दौर की मजबूरी मानकर खारिज कर सकें। यह बमुश्किल बारह साल पुराना है, जिसे आज के ज़माने के लोगों ने तैयार किया है और जो बाहर निकलकर खुद सब कुछ अपनी आँखों से देख सकते थे।
एक कानून के लिए बारह साल का समय इतना भी लंबा नहीं है कि वह—उस ज़मीनी हकीकत से जिस पर वह लागू होता है या उस देश से जिसकी सेवा के लिए वह बनाया गया है—इतनी दूर बना रहे।
(व्यक्तिगत गोपनीयता बनाए रखने के लिए कुछ नाम और पहचान से जुड़ी जानकारियों को या तो हटा दिया गया है या बदल दिया गया है।)
— प्रशांत नारंग
प्रशांत नारंग एक विधिज्ञ और नीति विश्लेषक हैं। वे Trustbridge Rule of Law Foundation में डेप्युटी डायरेक्टर - रिसर्च ऐंड प्रोग्राम्स पद पर कार्यरत हैं।
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
यह लेख अंग्रेज़ी में आप यहाँ पढ़ सकते हैं: The Order of the Street
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पुलियाबाज़ी का चौथा अंक जल्द ही आ रहा है और इस अंक की थीम है Vibrant Cities यानी जानदार शहर। इस अंक में आपको दुनिया भर के शहरों के अनूठे किस्से-कहानियों, शहरी नीतियों और अन्य दिलचस्प विषयों पर बेहतरीन लेख पढ़ने को मिलेंगे।
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पुलियाबाज़ी मैगज़ीन । Puliyabaazi Magazine
सात साल और 300 से अधिक एपिसोड के सफर के बाद, 'पुलियाबाज़ी' अब पॉडकास्ट से आगे बढ़कर एक लिखित विचार-पत्रिका के रूप में आपके सामने है। हमारी कोशिश हमेशा से जटिल विषयों और लोकनीति को भारी-भरकम शब्दावली के बजाय सहज, बोलचाल की हिंदी में पेश करने की रही है—ताकि विचार सीधे दिल और दिमाग दोनों को छू सकें। लोकनीति, टेक्नोलॉजी, सामयिकी और साहित्य से जुड़े हिंदी ले…
*ऑफर सीमित समय तक।
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न्याय पाने का निजी रास्ता। All About Arbitration. ft. Prashant Narang
न्याय व्यवस्था लोकनीति का एक ऐसा पहलु है जिसके लिए हम सभी पूरी तरह से सरकारी तंत्र पर निर्भर हैं। भला इसमें मार्केट कैसे हो सकता है? वैसे मोटे तौर पर ये बात सही है लेकिन कुछ प्रकार के झगड़े सरकारी न्याय तंत्र के बाहर भी सुलझाए जाते हैं। इसे कहते हैं आर्बिट्रेशन याने कि मध्यस्थता। इसी विषय को विस्तार से समझेंगे ट्रस्टब्रिज से जुड़े लीगल एक्सपर्ट प्रशांत ना…
Why is land so costly in India? ज़मीन के दाम की ज़मीनी हकीकत
भारत में ज़मीन के दाम इतने ज़्यादा क्यों हैं? ये सवाल तो हम सभी के मन में उठता है और अक्सर हमें ये जवाब भी सुनने को मिलता है कि हमारी भारी जनसँख्या की वजह से भारत में ज़मीन की कमी है और इस लिए दाम भी ज़्यादा है। लेकिन आज के हमारे मेहमान इस मुद्दे को एक अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। आज हमारे साथ पुलियाबाज़ी पर जुड़ रहे हैं प्रोफ़ेसर गुरबचन सिंह जिन्होंने भारत में…
विकसित भारत के लिए टॉप10 उपाय। 10-Point Road Map for a Developed India
इस हफ़्ते आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं। इस ख़ास मौके पर हम ने सोचा कि क्यों न थोड़ा सा सोचें कि हमारे भविष्य का भारत कैसा होना चाहिए। अगर हम भारत को एक विकसित देश के रूप में देखना चाहते हैं, तो फिर उसकी परिकल्पना क्या होगी और हम वहाँ तक कैसे पहुँचेंगे। कौन से वो दस अत्यंत ज़रूरी पॉलिसी उपाय हैं, जो हमें आज करने पड़ेंगे ताकि हम एक विकसित देश बनने…








