तीसरे भारत की तस्वीर
Book Review: Understanding Shirish Khare's 'एक देश बारह दुनिया' and 'नदी सिंदूरी'
इस हफ़्ते की टिप्पणी में, हम शेयर कर रहे हैं वंचित समुदायों की कहानियों को आवाज देनेवाले, जाने-माने पत्रकार शिरीष खरे की दो किताबों की समीक्षा। विकास के पथ और प्रयासों की चर्चा करते समय, इस प्रक्रिया में आहत होनेवाले समुदायों के बारे में सोचना भी ज़रूरी है। शिरीष जी की ये किताबें हमें यही सोचने पर मजबूर करती हैं।
तो आइए, समझते हैं तीसरे भारत को शिरीष खरे की नज़रों से।
भारत एक साथ कई समय में जी रहा है। कहीं मेट्रो की रफ़्तार है तो कहीं सरकारी अनाज पाने के लिए घंटों पैदल चलना पड़ता है। कहीं नदियों पर बड़े बाँध बन रहे हैं और कहीं कोई गाँव अपनी सूखती नदी को बचाने में असमर्थ है। कहीं मनोरंजन मोबाइल की स्क्रीन पर सिमट गया है तो कहीं रामलीला आज भी पूरे गाँव को एक साथ ले आती है। इसलिए इस देश को देखने के लिए केवल नक्शा काफ़ी नहीं है। नक्शे में रास्ते दिखाई देते हैं, पर उन रास्तों के किनारे छूटे हुए जीवन नहीं। उन तक पहुँचने के लिए यात्रा करनी पड़ती है। शिरीष खरे की ‘एक देश बारह दुनिया’ और ‘नदी सिंदूरी’ ऐसी ही यात्राओं के जरिए भारत को समझने की कोशिशे हैं। पहली किताब देश के दूर-दराज इलाकों तक जाती है, जबकि दूसरी एक गाँव और उसकी नदी के किनारे ठहरती है।
दरअसल किसी देश को केवल उसकी राजधानी, महानगरों और बड़ी परियोजनाओं से नहीं समझा जा सकता। देश की पहचान उसकी दूरियों में भी छिपी होती है। कहीं ये भौगोलिक दूरियाँ हैं, कहीं सुविधाओं और अवसरों की और कहीं समाज के भीतर बनी ऐसी दूरियाँ, जिन्हें आँकड़े आसानी से नहीं दिखा पाते। शिरीष खरे ने इसी भारत तक पहुँचने के लिए पत्रकारिता को यात्रा का रास्ता बनाया। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के अलग-अलग इलाकों में घूमते हुए उन्होंने मेलघाट के कोरकू परिवारों से लेकर कमाठीपुरा की महिलाओं, घुमंतू समुदायों, गन्ना मजदूरों, पारधियों, विस्थापितों और किसानों तक ऐसी जिंदगियों को दर्ज किया है, जिनसे देश की एक दूसरी तस्वीर सामने आती है।
सबसे पहले वे उन समुदायों की ओर देखते हैं, जिनकी मौजूदगी भारत की आम तस्वीर में अक्सर दिखाई ही नहीं देती। विमुक्त (Denotified), घुमंतू (Nomadic) और अर्ध-घुमंतू (Semi-nomadic) समुदाय इसके बड़े उदाहरण हैं। सरकार ने देश में ऐसे 1,262 समुदायों की पहचान की है, मगर पहचान भर से उनकी जिंदगी नहीं बदली। आज भी अनेक समुदाय भूख, मजदूरी और स्थायी ठिकाने जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इसी फ़र्क को लेखक मेलघाट में देखते हैं। मुंबई से करीब सात सौ किलोमीटर दूर पहाड़ियों के बीच खड़े होकर वे खुद से पूछते हैं, “मैं कौन सी दुनिया में हूँ भाई?” यहाँ दूरी केवल किलोमीटरों की नहीं, जीवन जीने की स्थितियों की है। विदर्भ का मेलघाट कोरकू आदिवासियों का इलाका है, जहाँ बच्चों की मौत लंबे समय से गंभीर सवाल रही है। 1991 से 2008 के बीच यहाँ दस हजार से अधिक बच्चों की मौत का आँकड़ा महाराष्ट्र सरकार ने दर्ज किया था। मौतों को स्वीकार किया गया, पर उन्हें भूख से हुई मौत मानने में व्यवस्था लगातार हिचकती रही।
यात्रा इसके बाद देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पहुँचती है। लेकिन महानगर की चमक के पीछे भी लेखक को छूटे हुए जीवन दिखाई देते हैं। कमाठीपुरा में रहने वाली महिलाओं की दुनिया में प्रवेश करते हुए वे उन सीलन भरी छोटी-छोटी कोठरियों तक जाते हैं, जहाँ घर और काम की जगह लगभग एक हो गई है। अलग-अलग जातियों, धर्मों और इलाकों से आई ये महिलाएँ अपने दुखों के बीच एक-दूसरे का सहारा बनती हैं और ईद, दिवाली तथा क्रिसमस साथ मनाती हैं। एक सेक्सवर्कर का यह कहना कि कमाठीपुरा में दंगे नहीं होते, महानगर के भीतर बने इस छोटे-से समाज को देखने का एक अलग नज़रिया देता है।
तिरमली लोगों की घुमंतू जिंदगी भी इसी यात्रा का एक पड़ाव है। उनके पास स्थायी घर और रोजगार का भरोसा नहीं है। नंदी बैल लेकर पीढ़ियों से एक जगह से दूसरी जगह घूमते हुए उनका जीवन अपनी कला पर टिका रहा, लेकिन बदलते समय के साथ पुराने काम और रास्ते बंद होते गए। बच्चों की पढ़ाई, रोजी-रोटी और स्थायी ठिकाने की मुश्किलें इस जीवन का हिस्सा बन गईं। शिरीष खरे दिखाते हैं कि घुमंतू होना हमेशा पसंद का जीवन नहीं होता, कई बार परिस्थितियाँ आदमी को लगातार चलते रहने के लिए मजबूर करती हैं।
इसके बाद लेखक मराठवाड़ा के आष्टी कस्बे की सैय्यद मदारियों की बस्ती में पहुँचते हैं। कभी इनके करतब मनोरंजन का बड़ा साधन थे, फिर टीवी, सिनेमा और मनोरंजन के नए साधनों ने इनके हुनर की जगह छीन ली। विडंबना यह है कि फिल्मों में स्टंट के लिए इसी कला का इस्तेमाल होता रहा। बस्ती के घरों में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और दूसरे अभिनेताओं के साथ मदारियों की तस्वीरें हैं। सवाल यही है कि जिनके स्टंट ने पर्दे को चमक दी, उनके अपने जीवन में वह चमक क्यों नहीं आई?
कृषि की चमकती अर्थव्यवस्था के पीछे भी ऐसी ही जिंदगी दिखाई देती है। भारत ब्राजील के बाद दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है, पर इस मिठास के पीछे लाखों मौसमी गन्ना मजदूरों की छह-सात महीने की कठिन जिंदगी है। हर साल नवंबर से मई तक दलित, आदिवासी, बंजारा और घुमंतू समुदायों के मजदूर अपने गाँवों से निकलकर दूसरे जिलों के खेतों में पहुँचते हैं। इनके पास अपनी खेती नहीं और गाँव में साल भर काम भी नहीं। किसान के पास कम-से-कम जमीन है, गन्ना मजदूर के पास वह भी नहीं। इन मजदूरों के सपनों में न खोया-खोया चाँद होता है और न मुँह में मिठास घोलने वाली चीनी के दाने।
फिर महादेव बस्ती में पारधी समुदाय की कहानी सामने आती है। यहाँ समस्या केवल आजीविका की नहीं, उस पहचान की भी है, जिसे इतिहास ने कलंक में बदल दिया। कभी शिकार और सुरक्षा के हुनर के लिए पहचाने जाने वाले पारधियों को अंग्रेजों ने ‘अपराधी’ घोषित किया था। कानून खत्म हुआ, मगर उसकी छाया पूरी तरह नहीं गई। जिस समुदाय के पास अपने शौर्य का इतिहास था, उसकी बस्ती आज भी रोशनी से दूर है।
इसके बाद यात्रा नर्मदा तक पहुँचती है। अब बात किसी एक समुदाय या बस्ती की नहीं, उस विकास की हो जाती है जो जमीन, पानी और लोगों के जीवन को बदल रहा है। ‘वे तुम्हारी नदी को मैदान बना देंगे’ में नर्मदा की मुख्यधारा के साथ उसकी सहायक नदियों की हालत भी सामने आती है। नर्मदा की 41 सहायक नदियाँ और करीब एक लाख वर्ग किलोमीटर का जलग्रहण क्षेत्र होने के बावजूद ये छोटी जलधाराएँ खुद संकट में हैं। उनकी साँसें जगह-जगह टूट रही हैं।
नर्मदा घाटी की एक पीढ़ी ने विकास को किसी दूर के नारे की तरह नहीं, अपनी जिंदगी में घटती हुई चीज की तरह देखा है। शिरीष खरे उसके अनुभवों को “रेत, पानी, जंगल, जमीन, घाट, धुआँ, बिजली, कॉरपोरेट, दमन, विस्थापन, वादे, राहत राशि, धोखे, विरोध और हिंसा” जैसे शब्दों में दर्ज करते हैं। इसलिए नर्मदा सिर्फ़ एक नदी नहीं रह जाती। वह इस बड़े सवाल का रूप बन जाती है कि देश आगे बढ़ रहा है, पर इस आगे बढ़ने की कीमत कौन चुका रहा है?
इसके बाद यात्रा राजस्थान के थार तक पहुँचती है। मीरा की धरती पर। लेकिन संत मीरा की स्मृति से पहचाने जाने वाले इस इलाके में राजौ और गीता जैसी औरतों की सुबह अभी दूर है। ‘इनकी सुबह होने में देर है’ में शिरीष खरे बताते हैं कि जाति और पुरुष सत्ता का दबाव किस तरह न्याय की राह रोकते हैं। कानून लागू है, मगर न्याय के रास्ते चलने वाली औरतों के सामने उनका ही समाज रोड़ा बन जाता है।
राजस्थान से यात्रा बस्तर की ओर मुड़ती है। ‘दंडकारण्य यूँ ही लाल नहीं है’ में बस्तर को केवल नक्सली हिंसा, पुलिस कार्रवाई या कानून-व्यवस्था के आँकड़ों से समझने के बजाय शिरीष खरे उन परिस्थितियों तक जाते हैं, जिनमें हिंसा ने जगह बनाई। जंगल, गाँव, उजड़ते घर और वे लोग, जिनके लिए हिंसा किसी समाचार की घटना नहीं, रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है। वे इन्हीं ‘उजाड़-कथाओं’ को सामने लाते हैं, जो बड़ी घटनाओं के शोर में दब जाती हैं। किसी इलाके को उसकी हिंसा से पहचानना आसान है, पर उस हिंसा के पीछे छूटे जीवन को देखना कहीं ज्यादा कठिन।
यात्रा छत्तीसगढ़ के मदकूद्वीप तक पहुँचती है, जहाँ शिवनाथ नदी के बीच से ‘एक देश बारह दुनिया’ की बारहवीं और अंतिम दुनिया किसानों तक आती है। यहाँ लेखक छोटी जोत पर टिके उस किसान को देखते हैं जिसके लिए जमीन गाँव में बने रहने का आखिरी आधार है। दो एकड़ से कम जमीन वाले छोटे किसान सिंचाई के अभाव और बढ़ती लागत के बीच खेती से जीवन चलाने की कोशिश कर रहे हैं। एक दशक में किसानों की संख्या करीब 12% घट गई, जबकि खेतिहर मजदूरों की संख्या 70% बढ़ गई। किसान जमीन से तुरंत बेदखल नहीं होता। पहले उसकी खेती उसके लिए अपर्याप्त होती है और फिर धीरे-धीरे उसका रिश्ता खेत से मजदूरी की ओर खिसकने लगता है।
‘एक देश बारह दुनिया’ में देश के दूर-दराज़ इलाकों की यात्राओं के बाद शिरीष खरे ‘नदी सिंदूरी’ नाम की एक छोटी नदी के किनारे लौटते हैं। मध्य भारत की सिंदूरी आगे चलकर नर्मदा में मिल जाती है और उसके किनारे बसा मदनपुर बाहर से एक सामान्य-सा गाँव दिखाई देता है। लेकिन लेखक की निगाह में यही गाँव असाधारण हो उठता है। यहाँ नदी के साथ बचपन, प्रेम, जाति, लोककला, रिश्ते, पशु, राजनीति, हिंसा और बदलते समय की इतनी कहानियाँ जुड़ी हैं कि मदनपुर केवल एक गाँव की कहानी नहीं रह जाता।
“इतिहास दोहराता है, पर नदियाँ सूख जाएँ तो जीवन खत्म हो जाता है, कुछ भी दोहराने लायक नहीं बचता।” यह पंक्ति किताब की पूरी संवेदना को समझने की कुंजी है। सिंदूरी केवल कहानियों की पृष्ठभूमि नहीं, उन्हें जोड़ने वाली जीवनधारा है। तेरह कहानियों में एक-दूसरे की आवाज़ें और स्मृतियाँ आती-जाती रहती हैं। ‘हम अवधेश का शुक्रिया अदा करते हैं’ में रामलीला के बहाने गाँव का सामूहिक जीवन खुलता है, जहाँ लोग एक-दूसरे की जिंदगी में शामिल रहते हैं।
‘नदी सिंदूरी’ गाँव को किसी सुंदर और निर्दोष दुनिया की तरह पेश नहीं करती। ‘रामदई हमने टीबी नहीं देखी’ में मुग्घा के जरिए जाति की वह दीवार सामने आती है जो बचपन तक का पीछा नहीं छोड़ती। स्कूल में दूसरे बच्चों के साथ खाना न खाने वाला बच्चा बताता है कि गाँव की आत्मीयता के भीतर भी बराबरी नहीं थी। ‘खूंटा की लुगाई भी बह गई’ में एक विधवा स्त्री के दुख की कहानी है। नदी उसके दुख में शामिल हो जाती है।
बसंत जैसा दलित युवक अपनी मिट्टी और स्वाभिमान से जुड़ा है। जब वह सामंती दबंग की हरकत का विरोध करता है तो वही गाँव जाति के दबाव में उसके खिलाफ़ खड़ा हो जाता है। ‘हमने उनकी सई में फाड़ दई’ बताती है कि गाँव की सामूहिकता हमेशा बराबरी की जमीन पर नहीं टिकी होती। ‘सात खून माफ़ है’ का सत्या पंडित भी गाँव की बनी-बनाई धारणाओं को उलट देता है। लोग उसकी अजीबोगरीब बातों को बाल-बुद्धि समझकर हंसते हैं, मगर एक दिन उसके हत्या करके गायब हो जाने पर पूरी छवि टूट जाती है।
इसके उलट ‘ऐसो कोई नहीं बोलो हमसे आज तक’ के यादव मास्साब अपने व्यवहार से गाँव में ऐसा सम्मान हासिल करते हैं, जो किसी पद या संपत्ति से नहीं आता। बच्चों की शिक्षा के लिए समर्पित इस मास्साब का एक बाहरी दबंग द्वारा अपमान और उसके बाद उनकी मृत्यु यह दिखाती है कि देहाती दुनिया में विश्वास, लिहाज और नैतिक प्रतिष्ठा कितनी गहरी भूमिका निभाते हैं।
इसलिए ‘नदी सिंदूरी’ की खासियत केवल यह नहीं कि इसमें गाँव की कहानियाँ हैं। इसकी असली खूबी यह है कि लेखक गाँव को एक साथ कई रूपों में देखते हैं। मदनपुर कोई ‘आदर्श गाँव’ नहीं बनता। वह अपनी अच्छाइयों, कमियों, प्रेम, हिंसा, हास्य और विडंबनाओं के साथ एक पूरा जीवित समाज बन जाता है। और शायद यही वह जगह है जहाँ ‘एक देश बारह दुनिया’ और ‘नदी सिंदूरी’ एक-दूसरे से जुड़ती हैं। पहली किताब लेखक को भारत के उन हिस्सों तक ले जाती है, जो आम नज़र से दूर हैं। दूसरी उसे अपने गाँव के भीतर वापस लाती है। एक में वह दूरियों के जरिए देश को समझता है, दूसरी में निकटता के जरिए। एक में भारत के अनेक भूगोल खुलते हैं, दूसरी में एक गाँव के भीतर छिपी अनेक दुनियाएँ सामने आती हैं। यही दोनों किताबों को साथ पढ़ने का सबसे अर्थपूर्ण अनुभव है।
— धर्मेंद्र कुमार गोंड
धर्मेंद्र कुमार गोंड ड्योनी पोलो महाविद्यालय, ईटानगर, अरुणाचल प्रदेश के हिंदी विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर हैं।
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