कुछ महीने पहले, जब फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप का खुमार अपने चरम पर था, तब बेंगलुरु के रेस्टोरेंट मालिकों ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री से एक गुज़ारिश की। वे चाहते थे कि सरकार उनके बंद होने का समय बढ़ाकर रात 2:30 बजे तक कर दे, ताकि वे वर्ल्ड कप के मैचों की लाइव स्क्रीनिंग कर सकें। जिस किसी ने भारत के नियम-कानूनों (Regulatory System) के चंगुल को करीब से नहीं देखा है, उसे यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है। अगर इन रेस्टोरेंटों के पास देर रात तक खुले रहने के लिए ज़रूरी संसाधन हैं और ग्राहक भी, तो फिर उन्हें सरकार से इजाज़त क्यों माँगनी पड़ रही है?
दुख की बात यह है कि भारत के शहरों में नाइटलाइफ़ पर बहुत ज़्यादा पाबंदियाँ हैं। इस पर पुलिस की कड़ी नज़र रहती है और नियम भी बेहद सख्त हैं। मेरे हिसाब से, यह स्थिति भारतीय शहरों की बड़ी और बुनियादी समस्याओं को बखूबी बयां करती है।
भारतीय शहरों में नाइटलाइफ़
भारत में नाइटलाइफ़ को हमेशा शक की निगाह से देखा जाता रहा है। आखिरकार, हमारे यहाँ रात को अक्सर शराबखोरी, अपराध और उल्टे-सीधे कामों से जो जोड़ा जाता है। एक समाज के तौर पर, हम रात में घर से बाहर निकलने वाले इंसान को भी संदेह से देखते हैं कि ‘ज़रूर यह कोई गलत काम करने ही निकला होगा।’ इसी शक और झिझक ने आगे चलकर सरकारी नीतियों का रूप ले लिया। भारत में लगभग हर जगह, राज्य सरकारों के ‘शॉप्स एंड इस्टैब्लिशमेंट एक्ट’ ने दुकानों, रेस्टोरेंटों और कारोबारों के खुलने और बंद होने का एक सख्त समय तय कर रखा है। इस तय समय के बाद काम जारी रखने के लिए पुलिस की NOC और विशेष लाइसेंस लेने पड़ते हैं।
इन नियमों के पीछे अक्सर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की दलील दी जाती है। पहली नज़र में यह तर्क सही भी लगता है। हम मान लेते हैं कि देर रात तक खुले रहने वाले ठिकानों पर शराबखोरी, मारपीट और अपराध होते ही हैं, फिर चाहे यह मान्यता सही हो या गलत। दूसरी तरफ़, सरकार के पास इतनी राज्य क्षमता (State Capacity) नहीं है कि वह रात को पर्याप्त पुलिस बल तैनात कर सके। इन्हीं वजहों से महाराष्ट्र के गृह विभाग और पुलिस प्रशासन ने एक लंबे समय तक मुंबई में दुकानों और होटलों को 24 घंटे खुले रखने की मंज़ूरी का विरोध किया था।
इन चिंताओं पर गहराई से विचार करने की ज़रूरत है। यहाँ मैं मशहूर शहर विशेषज्ञ जेन जैकब्स के विचारों और उनके ‘Eyes on the Street’ के आइडिया पर बात करना चाहूँगा। 1961 में आई अपनी मशहूर किताब ‘The Death and Life of Great American Cities’ में जैकब्स कहती हैं कि सड़कों पर ज़्यादा लोगों और कारोबारों का होना एक अनौपचारिक सुरक्षा व्यवस्था बनाता है। ये अनौपचारिक निगाहें (आइज़ ऑन द स्ट्रीट) कड़े पुलिस पहरे के मुकाबले शहर को कहीं ज़्यादा सुरक्षित रखती हैं। हम अपने अनुभवों से भी यह बात जानते हैं। रात के समय हम अंधेरे और सुनसान रास्तों के बजाय चहल-पहल और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं, फिर भले ही उन सुनसान रास्तों पर पुलिस नियमित रूप से गश्त ही क्यों न लगाती हो।
जब लोग किसी आम जगह पर खुलकर घुलते-मिलते हैं, तब यह ‘आइज़ ऑन द स्ट्रीट’ की व्यवस्था अपने आप बनती है। शहर ऐसी ही जगहें मुहैया कराते हैं और फिर उन्हें विचारों के आदान-प्रदान के केंद्रों में बदल देते हैं। यहाँ लोग आपस में विचार-विमर्श करते हैं और समस्याओं के हल तलाशते हैं। आख़िर शहर का मक़सद यही तो है! शहर एक ऐसी ज़िंदादिल और आज़ाद जगह होना चाहिए जहाँ लोग एक-दूसरे से कभी भी मिल सकें, बातें कर सकें, साथ मिलकर सोच सकें और कुछ नया गढ़ सकें। इस पूरे माहौल में आज़ादी बहुत अहम है और ठीक यहीं पर हमारी नियम-कानून व्यवस्था रोड़ा बनकर खड़ी रहती है।
नियमों का अनंत जाल
नाइटलाइफ़ की ही तरह ऐसे और भी कई मामले हैं जहाँ नियमों का जंजाल भारतीय शहरों को उनकी असली क्षमता हासिल करने से रोकता है। उदाहरण के लिए ‘फ्लोर स्पेस इंडेक्स’ (FSI) के नियमों को देखिए। FSI यह तय करता है कि आप ज़मीन के किसी टुकड़े पर कितना निर्माण कर सकते हैं। भारत के ज़्यादातर शहरों में FSI बहुत कम है, इसलिए हमारे शहरों में ज़्यादा ऊँची इमारतें नहीं बन पातीं। नतीजतन, शहरों के पास बढ़ने का इकलौता रास्ता यही बचता है कि वे दूर-दराज़ के इलाकों में फैलते जाएँ। इससे लोगों के आने-जाने का वक्त बढ़ जाता है और घनी आबादी के फ़ायदे भी नहीं मिलते। पर्यावरण के लिहाज़ से देखें, तो यह विस्तार हमें झीलों और जंगलों पर अतिक्रमण करने के लिए मजबूर करता है। यह मंज़र हम आज अपने शहरों में आए दिन देख रहे हैं।
इसी तरह के नियम लोगों के स्वाभाविक आपसी मेल-जोल में भी खलल डालते हैं। उदाहरण के लिए, रेहड़ी-पटरी वालों को ही ले लीजिए। जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को साफ़, चौड़े और ढंग के फुटपाथ सुनिश्चित करने का निर्देश दिया, तो बेंगलुरु जैसे शहरों ने सबसे पहला काम रेहड़ी-पटरी वालों को बेदखल करने का किया। इस तरह के मनमाने कदम लोगों के व्यापार करने के मौलिक अधिकार को तो छीनते ही हैं, साथ ही आम ग्राहकों के लिए सस्ती चीज़ों का मिलना भी बंद कर देते हैं।
ज़्यादातर शहरों में ज़मीन के इस्तेमाल और ज़ोनिंग (zoning) को लेकर भी बहुत सख्त नियम हैं। ज़मीन को आवासीय (residential), औद्योगिक (industrial) और व्यावसायिक (commercial) जैसी श्रेणियों में बाँट दिया गया है। इन क्षेत्रों में सिर्फ़ उन्हीं से जुड़ी गतिविधियों की इजाज़त होती है। लेकिन एक जानदार शहर बनाने के लिए सभी तरह की गतिविधियों का एक साथ होना ज़रूरी है। नहीं तो औद्योगिक इलाके रात में एकदम सुनसान हो जाएँगे और आवासीय इलाकों में दिन के समय कोई हलचल नहीं होगी। दरअसल, जेन जैकब्स ने भी मिक्स्ड-यूज़ यानी मिली-जुली शहरी बसावट की ज़ोरदार वकालत की थी, जहाँ एक ही इलाके में रहने, काम करने और व्यापार करने की जगहें एक साथ मौजूद हों।
इन सबके अलावा, भारतीय नियमों का यह चंगुल न केवल आर्थिक संभावनाओं पर ब्रेक लगाता है, बल्कि शहरों की उस पहचान को भी कमज़ोर करता है जिससे लोग अपनापन महसूस कर सकें। ‘सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च’ द्वारा केरल में पलायन (migration) पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि केरल की 78% छात्राओं ने अपना शहर छोड़कर जाना सिर्फ़ इसलिए चुना क्योंकि वे एक ऐसे समाज में रहना चाहती थीं जो सबको साथ लेकर चले, एक बेहतर जीवनशैली दे और सामाजिक रूढ़ियों के जंजाल से आज़ाद हो। हमारे नियम-कानूनों के इस जाल ने हमारे शहरों को अपने ही निवासियों के लिए ऐसी आज़ाद जगह बनने से रोक दिया है।
शहर जहाँ रहना लोग पसंद करें
मशहूर अर्बन डिज़ाइनर यान गेल (Jan Gehl) कहते हैं कि एक अच्छा शहर किसी बेहतरीन पार्टी की तरह होता है, जहाँ लोग इसलिए देर तक रुकते हैं “क्योंकि वहाँ उन्हें मज़ा आ रहा होता है।” असल में, शहर होते ही हैं लोगों के लिए। शहरों को अपने नागरिकों की ज़रूरतों, उनकी पसंद और उनके सपनों को पूरा करना चाहिए, ताकि वे अपनी आर्थिक और सामाजिक ज़िंदगी खुलकर जी सकें। जब लोग अपनी ज़िंदगी को पूरी तरह से जीने की कोशिश करते हैं, तो इसी से पूरे देश की आर्थिक तरक्की होती है और नई तकनीकें जन्म लेती हैं।
हमें अपने शहरों को ऐसी जगह बनाने की ज़रूरत है जहाँ लोग खुशी से रह सकें। हालाँकि ज़िम्मेदार शहर प्रशासन, बढ़िया इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतर सार्वजनिक सुविधाएँ बहुत ज़रूरी हैं, लेकिन किसी शहर को असली जिंदादिली वहाँ के लोगों को मिलने वाली आज़ादी से मिलती है। इसका मतलब यह नहीं है कि शहरों में कोई नियम-कायदे ही न हों, लेकिन नियम ऐसे भी नहीं होने चाहिए जो लोगों की गतिविधियों पर पहले से ही रोक लगा दें। उदाहरण के लिए, आधी रात के बाद सभी दुकानों को जबरन बंद कराने के बजाय इस बात के दिशानिर्देश दिए जा सकते हैं कि उन्हें कैसे चलाया जाए, कर्मचारियों की सुरक्षा के क्या इंतज़ाम हों और शोर की सीमा कितनी हो।
इसकी शुरुआत करने का एक अच्छा तरीका यह होगा कि लोगों की आज़ादी पर रोक लगाने वाले नियमों की एक लिस्ट बनाई जाए और उन्हें तीन हिस्सों में बाँटा जाए—पहले ऐसे नियम जिन्हें पूरी तरह खत्म करना है, दूसरे जिनमें सुधार करना है और तीसरे जिन्हें बनाए रखना है। इस पूरे काम पर नज़र रखने और यह देखने के लिए कि क्या वाकई गैर-ज़रूरी बंदिशें हटाई जा रही हैं, एक स्वतंत्र आयोग बनाया जा सकता है। ब्रिटेन में साल 2011 में ऐसा ही एक प्रयास किया गया था, जो काफ़ी हद तक सफल भी रहा था।
हमें ऐसे शहरों की ज़रूरत है जो अपने लोगों पर ज़रूरत से ज़्यादा पहरा लगाने या नियंत्रण करने के बजाय उन पर भरोसा करें। उम्मीद है कि जब 2030 का फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप शुरू होगा, तब भारत के किसी भी रेस्टोरेंट को देर रात तक मैच दिखाने के लिए सरकार से इजाज़त नहीं लेनी पड़ेगी।
— आनंद एस उन्नी
आनंद केरल स्थित Nayaneethi Policy Collective के सह-संस्थापक हैं। यह एक थिंक-डू टैंक के रूप में कार्यरत संस्था है, जो पब्लिक पॉलिसी रिसर्च और सामाजिक क्षेत्र में कंसल्टेंसी का काम करती है।
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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