हमारे दिमाग तक पहुँच चुके प्लास्टिक प्रदूषण से कैसे बचें?
How to remove the plastics polluting our body?
—अनिर्बाण महापात्र
हम में से ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि प्लास्टिक प्रदूषण हमारे आस-पास या बाहर की चीज़ है।
नाली में फंसी थैली, नदी में तैरती बोतल, समंदर में पड़ा जाल, या फिर किसी मछली के पेट में मिले प्लास्टिक के टुकड़े।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि अब प्लास्टिक इंसानों के शरीर के अंदर भी मिलने लगा है? हमारे खून में, फेफड़ों में, प्लेसेंटा में, धमनियों में और यहाँ तक कि दिमाग के तंतुओं में भी। हालाँकि इस पर अभी बहुत रिसर्च होना बाकी है और इंटरनेट पर कई बातें बढ़ा-चढ़ाकर भी बताई जाती हैं, लेकिन इस सच को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
मेरा यह लेख इसी बारे में है कि प्लास्टिक हमारे शरीर के अंदर क्या कर रहा है, किन बातों के बारे में हमें अभी भी जानकारी नहीं है और कैसे ऑस्ट्रेलिया में हुई एक नई स्टडी हमें छोटी ही सही, पर उम्मीद की एक किरण दिखाती है।
दिसंबर 2024 की बात है। न्यू मेक्सिको यूनिवर्सिटी की न्यूरोपैथोलॉजिस्ट एलेन बियरर दिमाग के तंतुओं की जाँच कर रही थीं, तभी उन्हें कुछ “अजीब सी भूरी और गाँठ जैसी चीज़ें” दिखाई दीं। वे न खून की नसें थीं, न क्लॉट थे, न ही दिमाग में पाया जाने वाला आम कचरा था। वह था प्लास्टिक।
बाद में नेचर मेडिसिन नाम के जर्नल में छपी एक स्टडी में, मौत के बाद इंसान के दिमाग से लिए गए तंतुओं में माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक को मापा गया। लीवर या किडनी के मुकाबले दिमाग में इनकी मात्रा कहीं ज़्यादा थी। और जिन लोगों को डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) थी, उनके सैंपल्स में तो प्लास्टिक और भी ज़्यादा मिला।
इसका मतलब यह नहीं है कि शरीर में मौजूद हर प्लास्टिक का कण बीमारी पैदा कर रहा है। साइंस भी अभी ऐसा कोई दावा नहीं करती। लेकिन इसका यह मतलब ज़रूर है कि हमारी यह पुरानी तसल्ली अब झूठी साबित हो रही है कि प्लास्टिक शरीर में से मल-मूत्र के रास्ते बाहर निकल जाता है।
प्लास्टिक मुख्य रूप से दो रास्तों से हम तक पहुँचता है: हमारा खाना और हमारी साँसे। हमारे खाने और पानी में तो प्लास्टिक है ही, लेकिन यह हवा में भी घुला हुआ है। इसके कण सिंथेटिक कपड़ों, फर्नीचर, घर की धूल, घर बनाने के सामान, धुएँ और गाड़ियों के टायरों से आ सकते हैं। हर बार जब टायर सड़क पर घिसते हैं, तो उनके बारीक टुकड़े हवा में उड़ते हैं। हर बार जब सिंथेटिक कपड़े रगड़े जाते हैं, धुलते हैं, सूखते हैं या पुराने होते हैं, तो वे अपने बारीक रेशे छोड़ते हैं।
सच कहूँ तो, हम एक प्लास्टिक की दुनिया में ही जी रहे हैं।
हम खाना खाते हैं और हमारा शरीर उस खाने को पचाता है। कार्बोहाइड्रेट्स, फैट्स और प्रोटीन टूटकर छोटे मॉलिक्यूल बन जाते हैं, जिन्हें शरीर आसानी से सोख लेता है, इस्तेमाल कर सकता है, जमा कर सकता है या बाहर निकाल सकता है।
लेकिन प्लास्टिक के साथ ऐसा नहीं होता। यह टूटकर बस छोटे-से-छोटे टुकड़ों में बँटता जाता है। इसके सबसे छोटे कण (नैनोप्लास्टिक) शरीर की बायोलॉजिकल रुकावटों को पार कर सकते हैं, हमारे सेल्स (कोशिकाओं) में घुस सकते हैं, टिशूज़ में फँस सकते हैं, और अपने साथ कई तरह के केमिकल्स और प्रदूषक तत्व ले जा सकते हैं। वैज्ञानिक अभी भी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि प्लास्टिक के कणों का कौन सा आकार ज़्यादा खतरनाक है, कितनी मात्रा नुकसानदेह है और अलग-अलग तरह के कण शरीर में कितने समय तक टिकते हैं।
शायद यही वजह है कि 2024 में ‘न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में छपी एक स्टडी ने बहुत से लोगों को परेशान कर दिया। रिसर्चर्स ने उन मरीजों की जाँच की जिनकी कैरोटिड धमनियों (दिमाग तक खून पहुँचाने वाली नसें) से प्लाक निकालने के लिए सर्जरी की गई थी।
जब उन्होंने इस प्लाक की जाँच की, तो कई सैंपल्स में माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक मिले। लगभग तीन साल तक इन मरीजों पर नज़र रखने के बाद पता चला कि जिन मरीजों के प्लाक में प्लास्टिक के कण थे, उनमें हार्ट अटैक, स्ट्रोक या मौत का खतरा उन लोगों की तुलना में बहुत ज़्यादा था, जिनके प्लाक में प्लास्टिक नहीं था।
हालाँकि, यह नतीजा इस बात का पक्का सबूत नहीं है कि हार्ट अटैक या स्ट्रोक प्लास्टिक की वजह से ही आए। जिनके प्लाक में प्लास्टिक मिला, शायद उनकी बाकी चीज़ें दूसरों से अलग हों। इसके अलावा, लैब्स और अस्पतालों में भी आजकल हर जगह प्लास्टिक है, तो मुमकिन है कि जाँच के दौरान ही कुछ प्लास्टिक उसमें मिल गया हो। दिमाग वाली रिसर्च को भी इसी सावधानी से देखने की ज़रूरत है। हो सकता है कि एक बीमार दिमाग में कचरा साफ़ करने की क्षमता कम हो गई हो, इसलिए वहाँ प्लास्टिक ज़्यादा जमा हो गया। या हो सकता है कि प्लास्टिक ही बीमारी बढ़ा रहा हो। दोनों ही बातें कुछ हद तक सच हो सकती हैं। फ़िलहाल हम पुख्ता तौर पर कुछ नहीं जानते।
लेकिन हाल ही में जो सबसे काम की जानकारी सामने आई है, वह इस बारे में है कि क्या हम अपने शरीर में जाने वाले प्लास्टिक को कम कर सकते हैं?
यह जानकारी ‘प्लास्टिक एक्सपोज़र रिडक्शन ट्रांसफ़ॉर्म्स हेल्थ’ (PERTH) ट्रायल से मिली है। इसे वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने किया था और यह हाल ही में नेचर मेडिसिन में पब्लिश हुई है।
इस स्टडी में प्लास्टिक से जुड़े केमिकल्स, खासकर थैलेट्स (phthalates) और बिस्फेनोल्स (bisphenols) को मापा गया था। ये वो केमिकल्स हैं जो खाने की पैकिंग, प्रोसेसिंग मशीनों, रसोई के बर्तनों और पर्सनल केयर के प्रोडक्ट्स से निकलकर हमारे शरीर में जाते हैं।
आसान शब्दों में कहें तो माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक ठोस प्लास्टिक कचरा हैं, जबकि थैलेट्स और बिस्फेनोल्स उनकी केमिकल वाली परछाई है।
इस ट्रायल में सबसे पहले यह पक्का किया गया कि शरीर में सचमुच प्लास्टिक जा रहा है या नहीं। 211 स्वस्थ और प्रौढ़ व्यक्तियों की जाँच में हर एक के यूरिन में प्लास्टिक से जुड़े कई केमिकल्स पाए गए। इनकी वजह कोई अजनबी नहीं बल्कि हमारी रोज़मर्रा की चीज़ें थीं: पैक्ड और प्रोसेस्ड फ़ूड, डिब्बाबंद चीज़ें और ड्रिंक्स, प्लास्टिक के उपकरण और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स।
फिर शुरू हुआ बचाव का काम।
रिसर्चर्स ने 60 लोगों के साथ पूरे सात दिन तक प्लास्टिक के संपर्क को कम करने की कोशिश की। यह कोई “बाज़ार से प्लास्टिक रहित चीज़ें खरीदें” जैसी आम सलाह नहीं थी। टीम ने 100 से ज़्यादा किसानों और फूड कंपनियों के साथ मिलकर काम किया ताकि ‘खेत से लेकर प्लेट तक’ पूरी फ़ूड चेन में प्लास्टिक का इस्तेमाल कम किया जा सके।
कुछ लोगों ने कम से कम प्लास्टिक के संपर्क वाला खाना खाया, स्टील और लकड़ी के बर्तनों का इस्तेमाल किया और कम प्लास्टिक वाले पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स इस्तेमाल किए।
और खुशी की बात यह है कि यह तरकीब काम कर गई।
एक हफ्ते बाद ही, उनके यूरिन में केमिकल्स का स्तर तेज़ी से नीचे आ गया। इस कड़े बचाव के कारण थैलेट्स में 40% से ज़्यादा की गिरावट आई और कंट्रोल ग्रुप के मुकाबले बिस्फेनोल्स लगभग आधा रह गया। जिन लोगों को लो-प्लास्टिक खाना दिया गया था, उनके शरीर में BPA (बिस्फेनॉल ए) का स्तर भी कम हो गया।
इससे यह बात साफ़ होती है कि प्लास्टिक से जुड़े कुछ केमिकल्स हमारे शरीर में रोज़ जाते हैं। अगर हम बाहरी इस्तेमाल कम कर दें, तो शरीर के अंदर भी इनका स्तर कम हो सकता है।
हालाँकि, यह ट्रायल इस बात की गारंटी नहीं देता कि महज़ एक हफ्ता कम प्लास्टिक इस्तेमाल करने से सेहत सुधर जाएगी। न ही यह साबित करता है कि जो प्लास्टिक हमारे टिशूज़ में पहले से जमा हो चुका है, उसे बाहर निकाला जा सकता है। और हाँ, हर केमिकल ने उम्मीद के मुताबिक प्रतिक्रिया भी नहीं दी। DEHP नाम के केमिकल में कोई कमी नहीं आई, जिसका मतलब है कि या तो यह केमिकल हमारे शरीर में किसी ऐसे रास्ते से आ रहा है जिसके बारे में हम नहीं जानते, या फिर हमारा शरीर कुछ प्लास्टिक केमिकल्स को बहुत पेचीदा तरीके से प्रोसेस करता है।
दरअसल, यह स्टडी दिखाती है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम कितना प्लास्टिक निगल रहे हैं, इसे मापा जा सकता है। हम इसमें से कुछ को बदल भी सकते हैं। लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि प्लास्टिक अब हमारे खाना उगाने, पैक करने, लाने-ले जाने, स्टोर करने, गर्म करने और खाने के तरीके में गहराई से बस चुका है।
प्लास्टिक हर जगह है क्योंकि यह सस्ता है, हल्का है, इस्तेमाल में आसान है और कई बार बहुत काम की चीज़ साबित होता है। दूध, स्नैक्स, मसाले, तेल, सब्ज़ियाँ, दवाइयाँ, बच्चों का लंच, स्ट्रीट फूड और पानी की बोतलें—सब प्लास्टिक में पैक होकर आते हैं। यह सैशे, टिफिन बॉक्स, डिस्पोज़ेबल कप, सिंथेटिक कपड़ों, खिलौनों, त्योहार की सजावट और घर के सामानों के रूप में हमारी ज़िंदगी में घुसा हुआ है।
कई जगहों पर प्लास्टिक कोई लाइफस्टाइल चॉइस नहीं रह गया है, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की बुनियादी ज़रूरत बन चुका है।
इसलिए, सिर्फ़ इच्छाशक्ति के दम पर कोई एक इंसान इतनी बड़ी वैश्विक समस्या को अकेले नहीं सुलझा सकता। अगर खेती-बाड़ी से लेकर प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, रिटेल, किचन, कपड़ों, ट्रांसपोर्ट और कचरे तक हर जगह प्लास्टिक व्याप्त है, तो सिर्फ़ आम आदमी अपनी चॉइस बदलकर इसका हल नहीं निकाल सकता।
फिर भी, हम अपने स्तर पर कुछ समझदारी भरे कदम तो उठा ही सकते हैं।
कभी भी प्लास्टिक के बर्तनों में खाना गर्म न करें। पुराने और खरोंच लगे प्लास्टिक के डिब्बों का इस्तेमाल बंद कर दें। जहाँ तक हो सके, गर्म खाने और पीने की चीज़ों के लिए काँच या स्टील के बर्तनों का इस्तेमाल करें। और जब भी मुमकिन हो, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक की बोतलों और पैकेजिंग से बचें।
ये छोटी-छोटी बातें काफ़ी फर्क ला सकती हैं। ये हमें एक उम्मीद देती हैं और हमें एहसास दिलाती हैं कि हम पूरी तरह से लाचार नहीं हैं। ये कदम छोटे ज़रूर हैं, लेकिन बेकार बिल्कुल नहीं हैं।
—अनिर्बाण महापात्र
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
अनिर्बाण एक वैज्ञानिक हैं। वे एक लोकप्रिय वैज्ञानिक लेखक भी हैं और प्रमुख अखबारों तथा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर पब्लिक हेल्थ और महामारी से लेकर क्लाइमेट चेंज और टेक्नोलॉजी जैसे कई विषयों पर नियमित रूप से लिखते हैं।
यह लेख अंग्रेज़ी में आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Removing the plastics polluting your body
अनिर्बाण के अन्य लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Gyandemic
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