ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट यानी विकास या विनाश?
Factual Analysis of the Great Nicobar Project: Claims and Consequences
कुछ ही दिनों पहले राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के खिलाफ़ दायर याचिका खारिज कर दी। एक तरफ़ सरकार इस प्रोजेक्ट को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ़ पर्यावरणवादियों से लेकर पूर्व नौदल अधिकारियों तक कई विशेषज्ञ इसकी व्यवहार्यता पर गहरे सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में 90 हज़ार करोड़ से ज़्यादा लागत वाले इस प्रोजेक्ट पर चर्चा करना आवश्यक है। इसी विषय पर है आज की टिप्पणी डॉ. पंकज सेखसरिया द्वारा।
डॉ. सेखसरिया बीतें कई दशकों से अंडमान-निकोबार द्वीप समूहों पर रिसर्च कर रहे हैं और वहाँ हो रहे पर्यावरणीय उल्लंघनों पर आवाज़ भी उठा रहे हैं। उन्होंने अंडमान-निकोबार द्वीप समूहों पर सात किताबें भी लिखी हैं, जिनमें सबसे हालिया हैं—द ग्रेट निकोबार बिट्रेयल (फ्रंटलाइन, 2024) और आइलैंड ऑन एज - द ग्रेट निकोबार क्राइसिस (वेस्टलैंड, 2025)।
तो आइए समझते हैं कहानी ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की।
विकास का विनाशकारी ब्लूप्रिंट
— डॉ. पंकज सेखसरिया
दूरी के हिसाब से देखें तो शायद भारत का कोई भी हिस्सा, सत्ता के केंद्र, दिल्ली से उतना दूर नहीं होगा जितना अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी छोर—ग्रेट निकोबार है। राजनीतिक ताकत का केंद्र हो, वायु प्रदूषण हो या लोगों की भीड़ (2011 की जनगणना के अनुसार दिल्ली में 1 वर्ग किमी में 11,000 लोग रहते थे, जबकि 910 वर्ग किमी के ग्रेट निकोबार में सिर्फ़ 8,000 लोग)—यह जगह दिल्ली से हर मायने में अलग है।
ज़मीन और समंदर का यह अनूठा संगम एक ऐसा खज़ाना है जिस पर किसी भी देश और उसके नागरिकों को गर्व होना चाहिए। लेकिन आज के भारत में ऐसा नहीं है। यह मामला ‘यह द्वीप मेनलैंड से बहुत दूर है इसलिए इसके बारे में कोई सोचता नहीं’ ऐसा नहीं है। उल्टा, यहाँ तो बेहिसाब महत्वाकांक्षा और असंवेदनशीलता का एक ऐसा जानलेवा मिश्रण दिख रहा है, जिसमें न तो समझदारी है, न ही परवाह। इसी वजह से आज इस द्वीप, यहाँ के आदिवासी समुदायों और यहाँ की अमूल्य जैवविविधता पर ऐसा खतरा मंडरा रहा है जो पहले कभी नहीं था।
92,000 करोड़ रुपये का मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट
साल 2020 के आखिर से घटनाक्रम बहुत तेज़ी से बदल रहा है। भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ग्रेट निकोबार में एक मेगा-प्रोजेक्ट के लिए रास्ता साफ़ कर दिया है। इस प्रोजेक्ट का नाम है ‘Holistic Development of Great Nicobar Island’। इसके कार्यान्वयन की ज़िम्मेदारी पोर्ट ब्लेयर स्थित संस्था Andaman and Nicobar Islands Integrated Development Corporation (ANIIDCO) को दी गई है। 92,000 करोड़ रुपये (शुरुआत में 72,000 करोड़) के इस प्रोजेक्ट में 45,000 करोड़ रुपये का एक ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक बिजली घर और 130 वर्ग किलोमीटर के प्राकृतिक जंगल को काटकर बनाई जाने वाली एक टाउनशिप शामिल है। गौरतलब है कि यह क्षेत्र एक यूनेस्को (UNESCO) बायोस्फीयर रिज़र्व है। इतना ही नहीं यह संविधान द्वारा संरक्षित निकोबारी और शोंपेन जैसे दो आदिवासी समूहों का घर भी है। शोंपेन आदिवासियों को तो ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह’ (PVTG) की श्रेणी में रखा गया है। इस प्रोजेक्ट के ज़रिये अगले 30 सालों में करीब 3,50,000 बाहरी लोगों को यहाँ बसाने की योजना है। अगस्त 2023 में संसद में सरकार द्वारा खुद दी गई जानकारी के अनुसार इसके लिए यहाँ के 9.64 लाख पेड़ काटे जाएँगे। लेकिन, वैज्ञानिक दावों के अनुसार ग्रेट निकोबार जैसे घने जंगलों में पेड़ों की संख्या इतनी ज़्यादा होती है कि उसके मुकाबले सरकार का यह आँकड़ा बहुत छोटा है। असल में कम से कम 30 लाख पेड़ काटे जाएँगे और मुमकिन है कि यह संख्या इससे भी कहीं ज्यादा हो।
गलत पर्यावरणीय मंजूरी
इस पूरे सिलसिले की शुरुआत मार्च 2021 में हुई, जब गुरुग्राम की एक कंसल्टेंट कंपनी AECOM इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने 126 पन्नों की एक प्री-फ़ीज़िबिलिटी रिपोर्ट (PFR) पेश की। इसके बाद हैदराबाद की Vimta Labs को पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट तैयार करने का ठेका दिया गया। दिसंबर 2021 में इस रिपोर्ट का ड्राफ़्ट जारी हुआ, जिसे सरकारी प्रक्रिया का पहला औपचारिक चरण माना गया।
यह वह दौर था जब प्रोजेक्ट की राह में आने वाली हर अड़चन को हटाने के लिए गज़ब की भागदौड़ हो रही थी। उदाहरण के तौर पर, जनवरी 2021 में (प्रोजेक्ट रिपोर्ट आने से भी पहले ही) गलाथिया बे वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी की मान्यता रद्द कर दी गई ताकि वहाँ बंदरगाह (port) बनाया जा सके। हैरानी की बात तो यह है कि यहाँ के समुद्री तट दुनिया के सबसे बड़े समुद्री कछुए, जायंट लेदरबैक के लिए अंडे देने की सबसे अहम जगहों (Nesting Sites) में से होने के पुख्ता सबूत होते हुए भी यह कदम उठाया गया। वैज्ञानिक तथ्यों और कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ी तमाम दूसरी गंभीर चिंताओं को भी पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया। आखिरकार, नवंबर 2022 में पर्यावरण मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी, लेकिन इसके साथ ऐसी शर्तें लगा दीं जिनका न तो कोई मतलब है और न ही जिन्हें अमल में लाया जा सकता है। कुछ ही दिनों पहले राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने भी इस प्रोजेक्ट को ‘रणनीतिक दृष्टी से महत्वपूर्ण’ कहकर मंज़ूरी दे दी और कहा कि इसमें पर्यावरण रक्षा के लिए ज़रूरी उपाय किए गए हैं। ऊपर से यह सलाह भी दी कि राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण रक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है। किसी भी चीज़ को देश की सुरक्षा से जोड़ना उसपर उठनेवाले सवालों को दबाने का रामबाण उपाय है। लेकिन क्या इससे वास्तविकता बदल सकती है?
इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि मंत्रालय ने ANIIDCO की योग्यता और काबिलियत जाँचे बगैर ही उसे यह प्रोजेक्ट सौंप दिया। 1988 में शुरुआत से लेकर अब तक, ANIIDCO का मुख्य काम शराब, दूध और पेट्रोलियम उत्पाद जैसी चीज़ें बेचना या कुछ टूरिस्ट गेस्ट हाउस संभालना रहा है। पिछले तीन सालों में कंपनी का औसत सालाना टर्नओवर करीब 350 करोड़ रुपये और मुनाफ़ा सिर्फ़ 50 करोड़ रुपये रहा है। जिस कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर के छोटे प्रोजेक्ट्स का भी अनुभव नहीं है, वह ग्रेट निकोबार जैसे विशाल और पेचीदा प्रोजेक्ट का कार्यान्वयन कैसे करेगी?
मंजूरी के लिए आवेदन करते समय उनके पास पर्यावरण प्रबंधन की कोई ठोस योजना नहीं थी। उनके यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों की प्रोफ़ाइल से भी साफ़ दिखाई देता है कि कंपनी के पास इस स्तर के काम के लिए न तो कोई विशेषज्ञ हैं और न ही जरूरी संसाधन। लेकिन मंत्रालय के लिए इनमें से कोई भी बात खतरे की घंटी नहीं बनी और उन्होंने आँख मूंदकर यह प्रोजेक्ट ANIIDCO के हवाले कर दिया।

पूरक वनीकरण का ढोंग
पर्यावरण मंत्रालय की एक्सपर्ट अप्रेज़ल कमेटी (EAC) ने इस मामले में भी बिल्कुल दिमाग नहीं लगाया कि ग्रेट निकोबार के जंगल को खत्म करने के बदले कहाँ और कैसे नए जंगल लगाए जाएँगे (Compensatory Afforestation)। ग्रेट निकोबार के 130 वर्ग किलोमीटर के पुराने, घने और सदाबहार जंगल की भरपाई के लिए हरियाणा की अरावली पहाड़ियों में 260 वर्ग किलोमीटर इलाके को जंगल घोषित करने का प्रस्ताव रखा गया है। यह सोचना कि एक उष्णकटिबंधीय सदाबहार जंगल (tropical evergreen forest) की भरपाई किसी बिल्कुल अलग अर्ध-शुष्क (semi-arid) इलाके में पेड़ लगाकर की जा सकती है, प्रकृति के बुनियादी नियमों के प्रति अज्ञान दर्शाता है। ग्रेट निकोबार का जंगल और वहाँ की जैविक संपन्नता को न तो दोबारा बनाया जा सकता है और न ही किसी भी तरह से उसकी भरपाई की जा सकती है।
इससे भी बड़ा मज़ाक तो यह है कि हरियाणा की जिस ज़मीन को इस सौदे के तहत जंगल के तौर पर नोटिफाई किया गया था, उसे हरियाणा के खनन विभाग ने लगभग तुरंत ही स्टोन माइनिंग के लिए पट्टे पर दे दिया। पिछले कई सालों से हरियाणा अपने ही जंगलों को बचाने में बुरी तरह नाकाम रहा है। ‘इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2023’ (ISFR) बताती है कि 2021 से 2023 के बीच महज़ दो सालों में हरियाणा ने 14 वर्ग किमी जंगल खो दिया। वन कार्यक्रमों में भारी निवेश के बावजूद राज्य में जंगलों का घटना जारी है। ग्रेट निकोबार के ऐसे जंगल—जिनका पुनर्निर्माण असंभव है—को नष्ट करके हरियाणा को वनीकरण के नाम पर और पैसा देना, एक तरह से हरियाणा को इनाम देने जैसा होगा। ऐसा करके हम अपनी एक अनमोल विरासत को खुद ही मिटा रहे हैं।
आदिवासी अधिकारों का हनन
इस प्रोजेक्ट से जुड़ा एक और मुद्दा है और वह है आदिवासियों के अधिकारों का गंभीर हनन। इस बारे में उन संस्थाओं ने भी पूरी तरह असंवेदनशीलता दिखाई है, जिन पर आदिवासी हितों की रक्षा की ज़िम्मेदारी है। इसका एक बड़ा उदाहरण अंडमान और निकोबार प्रशासन के जनजाति कल्याण निदेशालय (Directorate of Tribal Welfare) का अगस्त 2021 का वह पत्र है, जिसमें प्रशासन ने आश्वासन तो दिया कि वह आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करेगा, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि “प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए जहाँ कहीं भी छूट (exemptions)” की जरूरत होगी, निदेशालय उसके लिए सक्षम अधिकारी से छूट माँगेगा।
यहाँ अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह (आदिम जनजातियों का संरक्षण) विनियम, 1956 (PATR 1956) का ज़िक्र करना जरूरी है। इसी कानून के तहत 1957 में पूरे ग्रेट निकोबार द्वीप समेत इस पूरे द्वीप समूह के बड़े हिस्से को ट्राइबल रिजर्व घोषित किया गया था। हालाँकि बाद में मेनलैंड से आए कुछ सौ परिवारों को बसाने के लिए ग्रेट निकोबार की थोड़ी जमीन को इस दायरे से बाहर किया गया, लेकिन आज भी इस द्वीप का 90% से अधिक हिस्सा आदिवासियों के लिए आरक्षित है।
यह प्रोजेक्ट न सिर्फ़ इस आरक्षण को खतरे में डालता है, बल्कि वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (Prevention of Atrocities Act) जैसे महत्वपूर्ण कानूनों का भी सीधा उल्लंघन करता है। इससे इन समुदायों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। पहले तो उनकी पुश्तैनी जमीनों और जंगलों को छीनकर उन्हें बेघर किया जाएगा और फिर लाखों बाहरी लोगों को वहाँ बसाकर उनकी संस्कृति और पहचान को हमेशा के लिए मिटा दिया जाएगा।
ग्रेट निकोबार की ट्राइबल काउंसिल ने इस प्रोजेक्ट के लिए अगस्त 2022 में दी गई अपनी शुरुआती सहमति (NOC) को वापस ले लिया है। नवंबर में लिखे एक पत्र में उन्होंने साफ़ कहा है कि सहमति माँगते वक्त उन्हें प्रोजेक्ट के बारे में पूरी और सही जानकारी नहीं दी गई थी। जब आदिवासियों को इस प्रोजेक्ट के असली पैमाने का पता चला और उन्हें समझ आया कि वे अब कभी अपनी उन जमीनों पर नहीं लौट पाएँगे जहाँ से 2004 की सुनामी ने उन्हें उजाड़ दिया था, तो उन्होंने इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह नकार दिया।
लेकिन सरकार इस मामले में एकदम अड़ियल और कानूनी दाँव-पेंच वाला रुख अपना रही है। सरकार का कहना है कि उन्होंने सारी प्रक्रियाओं का पालन किया है और आदिवासियों ने अपनी सहमति दे दी थी (भले ही बाद में उन्होंने उसे वापस क्यों न ले लिया हो)।
हाल ही में वहाँ के समुदायों ने बताया कि उन पर दबाव डाला जा रहा है कि वे कागज़ों पर दस्तखत कर दें और अपनी ज़मीन प्रोजेक्ट के लिए खुशी-खुशी दे दें। लोगों का कहना है कि वे इस बात का कड़ा विरोध करते हैं और अपनी ज़मीन छोड़ना नहीं चाहते।
आर्थिक अव्यवहार्यता
इस पूरे प्रोजेक्ट की आर्थिक व्यवहार्यता (viability) को लेकर भी कई गंभीर सवाल और चिंताएँ खड़ी हो गई हैं। अभी तक यह बिल्कुल साफ़ नहीं है कि इतना बड़ा निवेश कौन करेगा और क्या इस निवेश से मिलने वाला लाभ इन खर्चों की भरपाई कर पाएगा? कई जानकारों ने इस पर गहरा शक जताया है। पूर्व नौसैनिक अधिकारी और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) में मैरीटाइम पॉलिसी के प्रमुख अभिजीत सिंह ने अक्टूबर 2025 में ‘द हिंदू’ में लिखा था:
“सवाल सिर्फ़ यह पोर्ट पर्यावरण और व्यापार के नज़रिये से व्यवहार्य है या नहीं इतना ही नहीं है। सवाल यह भी है कि इसके आर्थिक और रणनीतिक महत्व के जो बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, क्या वे वास्तविकता पर आधारित हैं?”
पत्रकार एम. राजशेखर ने मार्च 2025 में ‘फ्रंटलाइन’ में और भी स्पष्ट शब्दों में कहा है कि “आँकड़े मेल नहीं खा रहे”, क्योंकि हमें नहीं पता कि—इस पोर्ट की कुल लागत क्या होगी? (चार साल से भी कम समय में इसका बजट लगभग 20% बढ़ चुका है), क्या यह अपना कर्ज़ा चुका पाएगा? और क्या यह सिंगापुर और कोलंबो जैसे बड़े बंदरगाहों का मुकाबला कर पाएगा? वे आगाह करते हैं कि अगर ग्रेट निकोबार पोर्ट शुरू होता है और वल्लारपदम और विझिंजम पोर्ट्स के होते हुए भी अपनी क्षमता 64 लाख कंटेनर तक बढ़ाता है तो यह विस्तार ज़रूरत से ज़्यादा होगा, जिससे आर्थिक बोझ और बढ़ जाएगा।
हाल ही में एक और बात सामने आई है जो इस प्रोजेक्ट के भविष्य पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। यह ऐलान किया गया है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के माध्यम से पूरा किया जाएगा और इसके लिए सरकार से आर्थिक मदद (viability gap funding) भी ली जा सकेगी। राजशेखर ने एक साल पहले ही इस खतरे को भांप लिया था। उन्होंने अपने लेख में लिखा था कि
“भारत का पीपीपी सेक्टर ऐसे प्रोजेक्टों के लिए जाना जाता है जो भारी लागत पर बनाए जाते हैं और जिनसे सिर्फ़ उन्हें शुरू करने वाले प्रमोटर्स को फ़ायदा होता है। बाद में वे घाटे में चले जाते हैं। क्या यहाँ भी ऐसा ही कुछ होने वाला है?”
भूकंप का खतरा
इस प्रोजेक्ट का एक और चौंकाने वाला पहलू है, वह यह कि इसमें इस बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया है कि ये द्वीप दुनिया के उन इलाकों में से एक हैं, जहाँ भूकंप का खतरा सबसे ज़्यादा है। यहाँ औसतन हर हफ़्ते एक भूकंप आता है, जो यहाँ रहने वाले लोगों की जान, संपत्ति और किए जाने वाले निवेश के लिए बहुत बड़ा जोखिम है।
दिसंबर 2004 में जिसने दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशिया में विनाशकारी सुनामी लाई, उस भीषण भूकंप का केंद्र (epicentre) इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट साइट से महज 100 समुद्री मील (nautical miles) की दूरी पर था। गौर करने वाली बात यह है कि 26 दिसंबर 2004 के उस भूकंप की वजह से ग्रेट निकोबार का वह तटीय इलाका, जहाँ पोर्ट बनाया जाना है, हमेशा के लिए 15 फीट नीचे धंस गया है। इसका जीता-जागता सबूत इस द्वीप का (और भारत का भी) सबसे दक्षिणी छोर—इंदिरा पॉइंट का लाइटहाउस। 2004 से पहले यह लाइटहाउस समंदर के पानी के स्तर (high tide line) से काफ़ी ऊपर हुआ करता था, लेकिन आज यह चारों तरफ़ से अंडमान सागर के पानी से घिरा हुआ है।
दिसंबर 2024 में Nature Reviews Earth and Environment में छपे एक रिव्यू पेपर ने इन चुनौतियों की गंभीरता पर और पक्की मोहर लगा दी है। इसमें बताया गया है कि “2004 के भूकंप के बाद झटकों (aftershocks) का एक लंबा सिलसिला शुरू हुआ। पहले 10 सालों में Mw ≥ 4.5 वाले 6,000 से ज्यादा भूकंप आए, जिनमें से दो तो Mw 8.6 और Mw 8.4 तीव्रता के थे, जिन्होंने सुमात्रा के सबडक्शन इंटरफ़ेस के ज़्यादातर बचे हुए हिस्से को तोड़ दिया (...) हालाँकि इस प्लेट के पूरे सीमावर्ती क्षेत्र को हमेशा भूकंप और सुनामी के लिए तैयार रहना चाहिए, लेकिन मेंटावाई द्वीपों के बीच बढ़ता साइज़्मिक गैप (seismic gap) इस क्षेत्र में और भी ज्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत दर्शाता है।”
यह चेतावनी बिल्कुल साफ़ और गंभीर है। इतने ठोस वैज्ञानिक सबूतों के बावजूद यहाँ बंदरगाह बनाना और हजारों लोगों को काम करने और रहने के लिए यहाँ लाना, जानबूझकर अनगिनत जिंदगियों और भारी निवेश को खतरे में डालना है। और यही करने के लिए सबसे पहले बलि दी जा रही है ग्रेट निकोबार के जंगलों, वहाँ की अनूठी जैव विविधता और मूल निवासियों की!
यह एक अक्षम्य अपराध होगा। कल को जब तबाही आएगी, तब यह कहना कि हमने चिंता जताई थी, पूरी तरह बेमतलब होगा।
अगर कुछ करने की गुंजाइश है, तो वो अभी है!
—डॉ. पंकज सेखसरिया एक रिसर्चर, लेखक एवं संपादक हैं। उनकी किताब ‘द ग्रेट निकोबार बिट्रेयल’ का हिंदी अनुवाद आप यहाँ निःशुल्क पढ़ सकते हैं: कहानी विश्वासघात की।
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अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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