हम सभी चलते हैं। पैदल चलना कहीं भी आने-जाने के लिए हमारा एक सबसे बुनियादी तरीक़ा है। शहर, कस्बे और गाँव में कई तरह के सफ़र हम पैदल तय करते हैं, फिर चाहे वह एक पदयात्रा हो या किसी बस, ट्रेन या अगली सवारी तक पहुँचना हो। सड़कों पर सुरक्षित रूप से चल पाना हमारी सेहत और खुशहाली से गहराई से जुड़ा हुआ है।
लेकिन पैदल चलना सिर्फ़ पार्क में टहलने, पहाड़ों पर ट्रेकिंग करने या गांव-कस्बों के नेचुरल प्लेसेस में सैर करने तक सीमित नहीं है। पैदल चलना हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा है। हर दिन हम लोग काम, स्कूल, बाज़ार या बस-ट्रेन पकड़ने जैसे ज़रूरी कामों के लिए मीलों पैदल चलते हैं।
कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुंबई में हर रोज़ 47% सफ़र पैदल किए जाते हैं। इसके अलावा, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने वाले 60% लोग अपने सफ़र कोई न कोई हिस्सा पैदल चलकर तय करते हैं। भारत के अन्य बड़े शहरों में भी रोज़मर्रा की आवाजाही में पैदल सफ़र करने वालों की हिस्सेदारी काफ़ी बड़ी है। उदाहरण के लिए, कोलकाता में 48% सफ़र पैदल होते हैं। अहमदाबाद में यह संख्या 37%, दिल्ली में 35%, बेंगलुरु में 29%, चेन्नई में 28% और पुणे में 22% है। पैदल चलना लगातार उन तरीक़ों में शामिल रहता है जिनका हमारी रोज़मर्रा की आवाजाही में बड़ा हिस्सा है, बावजूद इसके भारत के कई शहर आज भी पैदल चलने वालों के लिए आसान नहीं हैं।
संक्षेप में कहें तो हमारे सभी बड़े शहरों में हर रोज़ लाखों लोग पैदल चलते हैं, लेकिन इन सबकी शारीरिक स्थिति एक जैसी नहीं होतीं। बच्चों, बूढ़ों और विकलांग लोगों को हमारी सड़कों पर चलते वक्त और भी ज़्यादा तकलीफ़ झेलनी पड़ती है। इतनी बुनियादी चीज़ होने के बावजूद, हमारे यहाँ पैदल चलना काफ़ी परेशानी भरा और कभी-कभी ज़ोखिम भरा भी हो सकता है।
यही वजह है कि हमारी सड़कों और फुटपाथों का सुरक्षित होना बहुत ज़रूरी है। फुटपाथ शहर का एक ऐसा सार्वजनिक स्थल है, जहाँ अमीर-गरीब, हर उम्र और सभी तरह के लोग एक साथ चलते हैं। इसलिए उनकी डिज़ाइन और क्वालिटी ऐसी होनी चाहिए, जिससे वहाँ चलना आसान हो।
लेकिन हमारे फुटपाथों की हालत इस उम्मीद के बिल्कुल उलटी है। कहीं फुटपाथ बहुत संकरे हैं, कहीं बीच में ही टूटे हुए हैं, रास्ते में रुकावटें हैं या उनका डिज़ाइन ही ठीक नहीं है। कई जगह लोगों की अलग-अलग ज़रूरतों के हिसाब से ज़रूरी सुविधाएँ भी नहीं हैं। सड़क किनारे बेतरतीब-तरीके से लगने वाली दुकानें, गाड़ियाँ और पार्किंग के नियमों को ठीक से लागू न किया जाना इन परेशानियों को और भी ज़्यादा बढ़ा देता है। शहरों में पैदल चलने की सुविधाएँ बनाते समय पूरी सड़क को एक साथ ध्यान में रखकर उसकी बनावट तय करने की सोच ही अक्सर ग़ायब रहती है।
हमारे शहरों में फुटपाथ से जुड़ी परेशानियाँ काफ़ी ज़्यादा हैं, इसके लिए कोई एक क़दम ऐसा नहीं है, जिससे पैदल चलने की स्थिति में बहुत बड़ा बदलाव आ जाए। हालांकि, तीन चीज़ों पर अगर ख़ास तौर पर ध्यान दिया जाए, और सही तरीके से काम किया जाए, तो पैदल चलने के अनुभव में काफ़ी सुधार हो सकता है: फुटपाथ की स्टैंडर्ड चौड़ाई, उसका लगातार जुड़ा होना और ऐसा डिज़ाइन जो हर किसी के लिए इस्तेमाल करने में आसान हो। अगर कोई शहर इन तीन चीज़ों पर काम कर लें, तो पैदल पैसल चलने वालों की काफ़ी सारी परेशानियाँ हल हो सकती हैं। जबकि इनमें से एक चीज़ की भी कमी पैदल चलने के अनुभव को खराब कर सकती है।
लेकिन यहाँ मैं आप लोगों का ध्यान इस बात पर दुबारा ले जाना चाहूँगा कि भारतीय शहरों की परेशानियाँ सिर्फ़ इन तीन चीज़ों से जुड़ी हुई नही हैं। हालाँकि बिना किसी नियम के सड़क किनारे लगने वाली दुकानें और सड़कों पर बढ़ती गाड़ियों की अघोषित पार्किंग भी परेशानी की एक बड़ी वजह है, मास्टर प्लान के तहत डेवलप होने वाले शहरों में भी ग़लत तरीके से इलाकों को बाँटने (ज़ोनिंग) की वजह से दिक्क़तें पैदा होती हैं, जहाँ कॉर्बुसियर के बेतरतीब डिज़ाइन की वजह से पैदल चलना मुश्किल हो जाता है। इन परेशानियों के हल आसान या सीधे नहीं हैं, लेकिन इन पर तुरंत ध्यान देने की सख़्त ज़रूरत है।
हमारे शहरों को चलाने के अर्बन गवर्नेंस के तरीके में भी कई बड़ी दिक्कतें हैं। ULBs (शहरी स्थानीय निकाय) में कर्मचारियों की कमी है, ज़रूरी तकनीकी जानकारी की कमी है, और काम करने तरीक़ा भी ठीक नहीं है। परेशानियाँ बहुत हैं और उन्हें दूर करने के लिए शहरों में अलग-अलग स्तरों पर लगातार काम करने की ज़रूरत है।
दूसरी और शहर से जुड़े कामों में लोगों की भागीदारी की कमी भी एक बड़ी परेशानी है, चाहे मामला पैदल चलने की सुविधाओं का हो या शहर से जुड़ी किसी और समस्या का। पैदल चलने की सुविधाओं से जुड़ी परिशानियाँ अक्सर पीछे रह जाती हैं, क्योंकि ज़्यादातर लोग, यहाँ तक कि सरकारी अधिकारी भी, यह नहीं जानते कि पैदल चलने की अच्छी सुविधाएँ कैसी होनी चाहिए। फुटपाथ के डिज़ाइन और निर्माण के लिए देश में तय नियम क्या हैं, या उनके शहर के स्थानीय नियम क्या कहते हैं।
बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारे देश में Indian Roads Congress (IRC) नाम की एक संस्था है, जो सड़कों और फुटपाथों के लिए ज़रूरी नियम और मानक तय करती है। IRC के मुताबिक फुटपाथ सड़क से 15 सेमीसे ज़्यादा ऊँचानहीं होना चाहिए और हर जगह, जहाँ से फुटपाथ पर आना जाना आसान हो, व्हीलचेयर के लिए आसान ढलान होनी चाहिए। यह बात भी कम लोग जानते हैं, कि फुटपाथ की कम से कम चौड़ाई इस बात के हिसाब से तय होनी चाहिए, कि वहाँ कितने लोग पैदल चलेंगे, आसपास की जगह का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है, और ऐसी ही दूसरी बातों को भी ध्यान में रखा जाए। आम तौर पर लोगों को इन बातों की जानकारी ही नहीं होती।
ऊपर बताई गई परेशानियों के अलावा, हमारे शहरों में कुछ परिशानियाँ हमारे अपने स्थानीय निकायों के फैसलों की वजह से पैदा होती हैं या और बढ़ जाती हैं। इसका एक उदाहरण है ट्रैफिक आइलैंड (सड़क के बीच की सुरक्षित जगह)। इन जगहों का उद्देश्य व्यस्त सड़क या चौराहा पार करने से पहले पैदल चलने वाले लोगों को, कुछ देर के लिए सुरक्षित जगह देना होता है। लेकिन कई बार वहाँ ऐसी चीज़ें लगा दी जाती हैं, जिससे लोगों के लिए यह जगह इस्तेमाल करना मुश्क़िल हो जाता है।
जब मुंबई में G20 शिखर सम्मेलन की तैयारियाँ चल रही थीं, तब शहर के “सौंदर्यीकरण” के लिए 1,700 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा का बजट रखा गया था। इस बजट का एक हिस्सा ट्रैफ़िक आइलैंड्स पर पेड़-पौधे और हरियाली लगाने में खर्च हुआ। यह जगह इसलिए बनाई जाती है ताकि सड़क पार करने वाले पैदल यात्रियों को रुकने के लिए एक सुरक्षित स्थल मिल सके।
हालाँकि, IRC के नियम कहते हैं कि इन जगहों पर इस तरह पेड़-पौधे नहीं लगाने चाहिए, क्योंकि इनकी वजह से गाड़ियों के चालकों और पैदल चलने वालों, दोनों को एक-दूसरे को देखने में दिक्कत होती है। इससे सुरक्षित खड़े होने की जगह कम हो जाती है और मजबूरन लोगों को बहती ट्रैफ़िक के बीच में ही खड़े होकर सड़क पार करने का इंतज़ार करना पड़ता है। इस लेख को लिखे जाने तक, अकेले बृहन्मुंबई क्षेत्र में ही हमें ऐसे 60 ट्रैफ़िक आइलैंड्स मिले हैं।

बड़े ट्रैफ़िक सिग्नलों पर पैदल चलने वालों को सड़क पार करने के लिए कितना समय मिलना चाहिए, इसका भी एक सिस्टेमिक तरीका IRC बताता है। इसमें लोगों की चलने की अलग-अलग रफ़्तार का ध्यान रखा जाता है ताकि हर उम्र और शारीरिक क्षमता वाले व्यक्ति को सुरक्षित रूप से सड़क पार करने का पूरा समय मिल सके। लेकिन वास्तव में, हम देखते हैं कि पैदल चलने वालों को बहुत कम समय दिया जाता है। कुछ चौराहों पर तो छह लेन की चौड़ी सड़क पार करने के लिए मुश्किल से 8 सेकंड मिलते हैं। पैदल चलने वालों की सुरक्षा को ताक पर रखकर सिर्फ़ गाड़ियों को अहमियत देने से, पैदल चलना खतरनाक हो जाता है। इससे पैदल चलने वालों का हौसला भी कम हो जाता है।
पैदल चलने वालों की इस तरह की अनदेखी का एक असर पब्लिक ट्रांसपोर्ट की ‘लास्ट-माइल कनेक्टिविटी’ (मेट्रो या बस स्टेशन तक पैदल पहुँचने की सुविधा) पर भी पड़ता है। हमारे शहरों में मेट्रो नेटवर्क पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इन सेवाओं का फ़ायदा लोग तभी उठा पाएँगे जब वे आसानी से पैदल चलकर इन स्टेशनों तक पहुँच सकेंगे। IIT बॉम्बे के एक सर्वेक्षण के अनुसार, मुंबई की येलो लाइन मेट्रो का इस्तेमाल करने वाले लगभग 80% लोग पैदल चलकर ही मेट्रो तक आते हैं। अब ज़रा सोचिए, अगर यह रास्ता ही टूटी-फूटी फुटपाथों और ख़तरनाक चौराहों के कारण मुश्किल, असुविधाजनक और असुरक्षित हो जाए, तो क्या होगा?
नतीजा यह होगा कि लोग ऐसी यात्राओं को टालने लगेंगे या जहाँ तक संभव हो, कम करेंगे। अगर हम मेट्रो स्टेशनों के आसपास पैदल चलने के इंतज़ामों पर ध्यान नहीं देंगे, तो इन विशाल सार्वजनिक परियोजनाओं में लगाए गए जनता के पैसों का पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा।
इसलिए, मेट्रो स्टेशनों, बस स्टॉप और रेलवे स्टेशनों तक पहुँचने वाले रास्तों को सुधारना पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर बनाने का ही एक अहम हिस्सा माना जाना चाहिए। इसके लिए एक समग्र दृष्टिकोण (holistic approach) की ज़रूरत है, जिसमें अच्छी फुटपाथ, सुरक्षित क्रॉसिंग, सही सिग्नल टाइमिंग, बेहतर रोशनी और पैदल चलने वालों के पूरे अनुभव का खास खयाल रखा जाना चाहिए।
हालाँकि यह समस्या बहुत बड़ी है और एक बार में इसे देखकर लग सकता है कि इसे सुलझाना हमारे बस से बाहर है, लेकिन नागरिक के तौर पर ऐसी कई चीज़ें हैं जो हम कर सकते हैं।
सबसे पहली चीज़, पहले से मौजूद सरकारी नियमों और मानकों के बारे में जानकारी हासिल करना। फिर जब भी आपके इलाके में सड़कों या फुटपाथ का काम हो, तो आप उन्हीं नियमों का हवाला देकर सही तरीके से काम कराने की माँग कर सकते हैं।
IRC के दिशानिर्देशों जैसे दस्तावेज़, खासकर वे जो पैदल चलने वालों की सुविधाओं और सड़कों के डिज़ाइन से संबंधित हैं, इनमें फुटपाथ की चौड़ाई, ढलान (रैंप), क्रॉसिंग और फुटपाथ के किनारों (kerbs) के सही माप लिखे होते हैं। जब आप अपने स्थानीय नगर निगम या निकाय (ULB) के अधिकारियों से बात करें, तो ये नियम आपके लिए बड़े काम के हथियार साबित हो सकते हैं।
इसकी शुरुआत आप अपने वॉर्ड ऑफ़िस से कर सकते हैं। अपने इलाके में पैदल चलना आसान बनाने के लिए वहाँ के अधिकारियों से बात करें। आप जब उनके पास जाएँ तो एक लिखित अर्जी में अपनी माँग स्पष्ट रूप से लिखकर ले जाएँ। और उस पत्र की एक कॉपी पर वॉर्ड ऑफ़िस का सील (रिसीविंग) ज़रूर लगवा लें। आप चाहें तो उस आवेदन के साथ IRC के नियमों की कॉपी भी जोड़ सकते हैं। इसके लिए किसी बड़े प्रोजेक्ट की ज़रूरत नहीं है। शुरुआत किसी पेड़ के आसपास की ज़मीन को समतल कराने, किसी क्रॉसिंग को लोगों के आने-जाने लायक बनाने या रास्ते से कोई रुकावट हटवाने जैसे छोटे-छोटे कामों से भी हो सकती है।
Walking Project द्वारा हम इस पूरी प्रक्रिया को आसान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हमने भारत और दुनिया भर के नियमों, गाइडलाइन्स, रिपोर्टों और संसाधनों को एक जगह इकट्ठा किया है। आप इन्हें walkingproject.org/resources पर जाकर देख सकते हैं।
इस मुहिम को यह समझने की शुरुआत मानें कि आपकी सड़क कैसी होनी चाहिए और आप अपने स्थानीय निकाय से क्या-क्या माँग कर सकते हैं? पहले ही दिन पूरे शहर को बदलने की कोशिश न करें। अपनी नज़दीकी सड़क से शुरुआत करें। कुछ विचारशील लोगों को साथ लें, अपने आसपास की समस्याओं को समझें, देखें कि नियम क्या कहते हैं और फिर अपनी विशिष्ट माँगों के साथ स्थानीय अधिकारियों से बात करें।
किसी शहर में बड़े बदलाव अक्सर तब शुरू होते हैं जब लोग अपने आसपास की समस्याओं की ज़िम्मेदारी लेना शुरू करते हैं। एक ऐसे इलाक़े की कल्पना कीजिए, जहाँ घर से बाहर निकलते समय आपको एक पल के लिए भी यह सोचने की ज़रूरत न पड़े कि रास्ता पार कैसे होगा।
जहाँ फुटपाथ बेवजह की रुकावटों से आज़ाद हो, जहाँ छाँव हो, जहाँ बच्चे पैदल स्कुल जा सकें, जहाँ बुज़ुर्ग बाज़ार तक आसानी से पहुँच सकें और जहाँ एक व्हीलचेयर इस्तेमाल करने वाला इंसान भी बाकी लोगों की तरह आसानी से आ-जा सके। जहाँ सड़क पार करना कोई जान हथेली पर ले कर चलने का काम न हो, पब्लिक ट्रांसपोर्ट तक आसानी से पैदल पहुँचा जा सके और सड़कें सिर्फ़ गाड़ी चलाने वालों की जागीर न हो, बल्कि उन पर पैदल चलने वालों का भी उतना ही हक हो। क्या हम नहीं चाहते कि एक दिन हमारे शहरों में भी पैदल चलना ऐसा हो?

वॉकिंग प्रोजेक्ट में हम इन परेशानियों पर तीन मुख्य लक्ष्यों के साथ काम करते हैं। पहला है कम्युनिटी वॉक्स, कम्युनिटी टॉक्स और स्टूडेंट ट्रेनिंग वर्कशॉप्स के ज़रिए लोगों को पैदल चलने की सुविधाओं और पैदल चलने वालों के लिए बेहतर सड़कों के बारे में जानकारी देना। दूसरा है सरकारी एजेंसियों के साथ सीधे काम करना, ज़रूरी सुधारों की माँग करना, ऐसे सुझाव देना जिन पर काम किया जा सके और ULB प्रशासन के साथ मिलकर काम करना। तीसरा है लोगों के बीच इस बातचीत को और आगे बढ़ाना, ताकि सिर्फ़ हम ऊपर-ऊपर की बातों तक सीमित न रहकर उन असली वजहों तक जा सके, जिनकी वजह से हमारे शहरों में पैदल चलने में दिक्क़तें आती हैं। आप भी हमारे इन विचारों को अपने स्तर पर किए जाने वाले कामों में शामिल कर एक सकारात्मक बदलाव का हिस्सा बन सकते हैं।
इन परेशानियों को ठीक करना आसान नहीं है और न ही यह जल्दी होने वाला काम है। इसमें धीरे-धीरे और लगातार काम करना होगा और इसे पूरी तरह हकीकत में बदलने में कई दशक लग सकते हैं। लेकिन इससे हमें निराश नहीं होना चाहिए, और न ही इस दिशा में काम करना बंद करना चाहिए।
पेड़ ऐसे लोग भी लगाते हैं, जिन्हें पता होता है कि वे कभी उन पेड़ों की छाँव में नहीं बैठ पाएँगे, और न ही उनके फल खा पाएँगे। फिर भी वे पेड़ लगाते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि उनकी छाँव और फल आने वाली कई पीढ़ियों को खुशियाँ देंगे। हमें भी यही सोचकर आने वाली पीढ़ियों के लिए यह काम करते रहना चाहिए।
— वेदांत म्हात्रे
प्रोग्राम मैनेजर, Walking Project
Walking Project के बारे में अधिक जानकारी आप यहाँ पा सकते हैं: walkingproject.org
पुलियाबाज़ी में शेयर करें अपने विचार
क्या आप भी किसी विषय पर लिखना चाहते हैं? या लिख चुके हैं और उलझन में हैं कि कहाँ प्रकाशित करें? तो पुलियाबाज़ी में आपका स्वागत है! अपना लेख हमें भेजिए। अगर हमारी संपादकीय टीम को आपका लेख पसंद आता है तो हम उसे ज़रूर प्रकाशित करेंगे।
अधिक जानकारी के लिए कृपया नीचे दी गई लिंक पर जाएँ:
SUBMISSION GUIDELINES & STYLE GUIDE
पुलियाबाज़ी मैगज़ीन: तीसरा अंक
पुलियाबाज़ी का तीसरा अंक आ चुका है! इस अंक की थीम है ‘विश्व मंथन में भारत’ (India in the World)। इस अंक में आप भारत के नज़रिए से—टेक्नोलॉजी, अंतरराष्ट्रीय संबंध, परमाणु रणनीति, चीन और भारत के रिश्तों समेत, ऊर्जा नीति, नए दौर के युद्ध, अंतरिक्ष अनुसंधान तक कई विषयों पर लेख पढ़ सकेंगे। साथ ही, राष्ट्रवाद पर गाँधी-टागोर के विचार और समकालीन हिंदी कवियों की सशक्त कविताएँ भी आपको इस मैगज़ीन में मिलेंगी।
तो देर किस बात की? आज ही अपनी कॉपी बुक कीजिए नीचे दी गई लिंक पर:
पुलियाबाज़ी मैगज़ीन । Puliyabaazi Magazine
सात साल और 300 से अधिक एपिसोड के सफर के बाद, 'पुलियाबाज़ी' अब पॉडकास्ट से आगे बढ़कर एक लिखित विचार-पत्रिका के रूप में आपके सामने है। हमारी कोशिश हमेशा से जटिल विषयों और लोकनीति को भारी-भरकम शब्दावली के बजाय सहज, बोलचाल की हिंदी में पेश करने की रही है—ताकि विचार सीधे दिल और दिमाग दोनों को छू सकें। लोकनीति, टेक्नोलॉजी, सामयिकी और साहित्य से जुड़े हिंदी ले…
हमारे कई पाठकों की माँग थी कि पुलियाबाज़ी मैगज़ीन डिजिटल फ़ॉर्मेट में भी उपलब्ध कराई जाए। हमें ख़ुशी है कि हम उनकी यह माँग पूरी कर सके।
नीचे दी गई लिंक (Amazon) से आप पुलियाबाज़ी के तीनों अंक डिजिटल रूप में खरीद सकते हैं। और अगर आपके पास Kindle Unlimited है, तब तो आप ये सभी अंक फ्री में पढ़ सकते हैं!
Those outside India, please check your local Amazon website.
Puliyabaazi Hindi Magazine on Amazon
EP298 हमारे शहरों को चलने लायक कैसे बनाएँ? How to Improve Walkability of Indian Cities? ft. Walking Project
पुलियाबाज़ी में अक्सर इस बात का ज़िक्र हुआ है कि हमारे शहरों में पैदल चलना कितना मुश्किल हो गया है, और हम सब अपने आम जीवन में भी इसको महसूस तो करते ही हैं। इसीलिए, आज हमारे मेहमान हैं Walking Project के कन्वीनर ऋषि अग्गरवाल जी जो इस मुद्दे पर लंबे समय से काम कर रहे है और लोगों एवं नगरपालिका अधिकारीयों में इस विषय पर जागृति बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
ज़मीन अधिग्रहण इतना पेचीदा क्यों? Why Is Land Acquisition So Messy in India?
भारत में जमीन की लेन-देन एक जटिल मामला है। इसमें जमीन का अधिग्रहण तो और भी पेचीदा होता है क्योंकि आम धारणा के विपरीत इसके लिए कोई एक कानून नहीं बल्कि कई कानूनों का जाल है। इस पेचीदा विषय को आसान बनाने के लिए आज पुलियाबाज़ी पर हमारे साथ जुड़ रहे हैं अंकित भाटिया जिन्होंने लंबे समय से इस विषय पर शोध किया है। आज की पुलियाबाज़ी में बात जमीन अधिग्रहण कानून के इ…
जापान सफ़रनामा। Tokyo, Trains, and the Atomic Shadow
इस हफ़्ते पुलियाबाज़ी पर और एक सफ़रनामा। इस बार चलिए करते हैं जापान की सैर। ३.५ करोड़ की आबादी वाला शहर टोक्यो कैसे चलता है? एटॉमिक बम से धराशयी होने वाला शहर हिरोशिमा आज कैसा दीखता है? जापान के अद्यतन पब्लिक ट्रांसपोर्ट से भारत क्या सीख सकता है?









