अल्बर्ट आइंस्टाइन जितने महान वैज्ञानिक थे, उतने ही महान विचारक भी थे। 1930 के आसपास, जब दुनिया में महामंदी (Great Depression) आई हुई थी, तभी जर्मनी समेत कई देशों में नाज़ीवाद और फ़ासीवाद का उदय हो रहा था (सितंबर 1930 में पहली बार नाज़ी पार्टी का वोट शेयर 2.6% से सीधे 18% से ऊपर चला गया था और उनकी सत्ता में आने की संभावना बढ़ गई थी। आखिरकार 1934 में हिटलर सत्ता में आ गया था)। विश्व की इन परिस्थितियों को देखकर आइंस्टाइन बहुत चिंतित थे, इसलिए इस दौरान उन्होंने एक किताब लिखी। 1934 में जर्मन भाषा में प्रकाशित हुई इस किताब का शीर्षक था—The World As I See It (Mein Weltbild)। इसमें आइंस्टाइन ने जीवन का अर्थ, इंसानियत, राजनीति, सैन्य शासन, नैतिकता, शांति, धर्म आदि विषयों पर अपने विचार साझा किए हैं।
आज जब विश्व डी-ग्लोबलाइज़ेशन की ओर बढ़ रहा है, सालों-साल युद्ध चल रहे हैं और कई देशों में राष्ट्रवाद की भावना फैलती दिखाई दे रही है, तब आइंस्टाइन की यह किताब फिर एक बार अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। इसलिए आइए, इस हफ़्ते पढ़ते हैं इसी किताब का एक मुख्य निबंध—The World As I See It.
दुनिया मेरी नज़र से
हम इंसानों का मामला भी गज़ब का है! हम सब यहाँ बस कुछ ही समय के मुसाफ़िर हैं। यह कोई नहीं जानता कि हम यहाँ क्यों आए हैं, हमारा मकसद क्या है, फिर भी कभी-कभी हमें ऐसा भ्रम होता है कि हमें सब कुछ पता है। लेकिन अगर गहराई में न उतरें और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के नज़रिये से देखें, तो हम पाएँगे कि दरअसल हम दूसरों के लिए ही जीते हैं। सबसे पहले उन लोगों के लिए जिनकी मुस्कुराहट और सलामती पर हमारी अपनी खुशी टिकी है, और फिर उन अनगिनत लोगों के लिए जिन्हें हम निजी तौर पर तो नहीं जानते, लेकिन हमदर्दी के एक धागे से उनसे जुड़े हुए हैं।
मैं हर दिन खुद को सौ बार यह याद दिलाता हूँ कि मेरी अंदरूनी और बाहरी ज़िंदगी उन दूसरे लोगों की मेहनत पर टिकी है, जो या तो अभी ज़िंदा हैं या इस दुनिया से जा चुके हैं। मुझे इस बात का एहसास रहता है कि जितना मुझे दूसरों से मिला है और मिल रहा है, उतना ही मुझे भी समाज को लौटाने के लिए मेहनत करनी चाहिए। मुझे सादगी भरी ज़िंदगी बहुत पसंद है। मेरा मन अक्सर यह सोचकर भारी हो जाता है कि मैं दूसरे इंसानों की मेहनत का कुछ ज़्यादा ही हिस्सा इस्तेमाल कर रहा हूँ। मुझे समाज में ऊँच-नीच और क्लास का फ़र्क न्याय के खिलाफ़ लगता है, क्योंकि आखिर में यह सब ताकत पर टिका होता है। मेरा मानना है कि शारीरिक और मानसिक, दोनों दृष्टि से सादा जीवन, हर किसी के लिए बेहतर है।
अगर दार्शनिक नज़रिये से देखें, तो मैं इंसानी आज़ादी यानी फ्री विल में बिल्कुल यकीन नहीं रखता। हर इंसान न सिर्फ़ बाहरी दबाव में काम करता है, बल्कि अपनी अंदरूनी मजबूरियों या प्रवृत्तियों से भी बंधा होता है। मशहूर दार्शनिक शोपेनहावर (Schopenhauer) की एक बात ने मेरी जवानी से ही मुझे बहुत प्रेरित किया है। उन्होंने कहा था:
“A man can do as he wills, but not will as he wills.”
(इंसान जो चाहता है वह तो पा सकता है, लेकिन वह क्या चाहेगा, यह उसके बस में नहीं है।)
यह विचार ज़िंदगी की मुश्किल घड़ियों में मेरे लिए हमेशा एक तसल्ली और धीरज का स्रोत रहा है। यह एहसास हमें उस भारी-भरकम ज़िम्मेदारी के बोझ से बचाता है जो कभी-कभी इंसान को पंगु बना देती है। इससे हम खुद को और दूसरों को बहुत ज़्यादा गंभीरता से लेने से बच जाते हैं, और जीवन में विनोद (humour) को उसकी सही जगह मिल पाती है।
किसी का अपने अस्तित्व या पूरी सृष्टि के मकसद के बारे में सवाल करना मुझे हमेशा से बेमतलब लगा है।
फिर भी, हर किसी के कुछ न कुछ आदर्श होते हैं जो उसकी कोशिशों और फ़ैसलों की दिशा तय करते हैं। इस मामले में, मैंने आराम और खुशी को कभी अपना आखिरी लक्ष्य नहीं माना। अगर कोई सिर्फ़ इन्हीं के पीछे भागता है तो मैं उसे इंसानी नैतिकता नहीं, बल्कि जानवरों के झुंड वाली मानसिकता कहूँगा। जिन आदर्शों ने मेरी राह रोशन की है और मुझे बार-बार ज़िंदगी का मुस्कुराकर सामना करने की हिम्मत दी है, वे हैं—सत्य, भलाई और खूबसूरती।
अगर मेरे पास ऐसे साथी न होते जिनकी सोच मुझसे मिलती है, या मैं विज्ञान और कला के उन अनसुलझे रहस्यों में न डूबा रहता, जिन्हें शायद हम कभी सुलझा न सकें तो मेरे लिए ज़िंदगी बिल्कुल खाली होती। दुनिया की नज़र में जो बड़ी चीज़ें हैं—संपत्ति, बाहरी सफलता और ऐश-ओ-आराम—वे मुझे हमेशा से ही तुच्छ लगी हैं।
मज़े की बात तो यह है कि एक तरफ़ तो मेरे भीतर सामाजिक न्याय और ज़िम्मेदारी की गहरी भावना है, लेकिन दूसरी तरफ़ मुझे इंसानों और समुदायों के साथ सीधे संपर्क रखने की कोई खास ज़रूरत कभी महसूस नहीं होती। मैं अपनी ही धुन में रहता हूँ। मैंने कभी भी अपने देश, अपने घर, अपने दोस्तों और यहाँ तक कि अपने परिवार को भी अपना पूरा दिल नहीं दिया। इन तमाम रिश्तों के बीच भी मुझमें हमेशा एक किस्म की अलिप्तता बनी रही, अकेलेपन की ज़रूरत मुझे हमेशा महसूस होती रही और उम्र के साथ यह एहसास बढ़ता ही गया। इस तरह जीने से, इंसान को इस बात का गहरा अहसास हो जाता है कि एक-दूसरे को पूरी तरह समझ पाने या हमदर्दी जताने की एक सीमा होती है। हालाँकि, मुझे इस बात का कोई मलाल नहीं है। ऐसा इंसान बेशक दूसरों के साथ घुलने-मिलने वाली वो ज़िंदादिली और बेफिक्री थोड़ी खो देता है। लेकिन बदले में उसे एक बड़ी आज़ादी मिलती है। वह दूसरों की राय, उनकी आदतों और उनके फ़ैसलों के चंगुल से आज़ाद रहता है। वह अपनी ज़िंदगी की बुनियाद दूसरों के अस्थिर कंधों पर नहीं रखता।
राजनीति में मेरा आदर्श लोकतंत्र है। हर इंसान की इज़्ज़त एक व्यक्ति के तौर पर होनी चाहिए और किसी भी शख्स को भगवान नहीं बनाना चाहिए। यह किस्मत का बड़ा मज़ाक ही है कि मुझे अपने साथियों से इतनी ज़्यादा इज़्ज़त और तारीफ़ मिली, जबकि इसमें न तो मेरा कोई कसूर है और न ही कोई खूबी। शायद इसकी वजह यह हो कि लोग उन एक-दो संकल्पनाओं को समझने की कोशिश करते हैं जिन्हें मैंने अपनी सीमित क्षमता और अंतहीन संघर्ष से हासिल किया है।
मैं इस बात को बखूबी समझता हूँ कि किसी भी बड़े या जटिल काम को पूरा करने के लिए एक इंसान का सोचना, निर्देश देना और पूरी ज़िम्मेदारी लेना ज़रूरी है। लेकिन, जिन लोगों पर नेतृत्व किया जा रहा है, उन्हें मजबूर न किया जाए, बल्कि उनके पास अपना लीडर चुनने का पूरा अधिकार होना चाहिए।
मेरी नज़र में डंडे के ज़ोर पर चलने वाली तानाशाही बहुत जल्द भ्रष्ट हो जाती है। ताकत हमेशा ओछे लोगों को अपनी ओर खींचती है। मेरा मानना है कि यह एक अटल नियम है कि बुद्धिमान तानाशाहों के बाद हमेशा घटिया लोग ही गद्दी पर बैठते हैं। यही वजह है कि मैं ऐसी व्यवस्थाओं का हमेशा से विरोधी रहा हूँ, जो आज (उस दौर के) इटली और रूस में पाई जाती हैं।
आज यूरोप में लोकतंत्र की जो बदनामी हो रही है, उसका दोष लोकतांत्रिक विचार को नहीं, बल्कि सरकार की अस्थिरता और बेजान चुनावी तंत्र को दिया जाना चाहिए। मुझे लगता है कि इस मामले में अमेरिका ने सही रास्ता चुना है। उनके पास एक ज़िम्मेदार राष्ट्रपति होता है जिसे पर्याप्त समय के लिए चुना जाता है और उसके पास इतनी ताकत होती है कि वह वाकई जवाबदेह बन सके।
दूसरी तरफ़ मुझे अपनी राजनीतिक व्यवस्था की एक बात बहुत पसंद है और वह है बीमारी या ज़रूरत के समय एक व्यक्ति को मिलने वाली सुरक्षा और सुविधा। मेरे लिए इंसानी ज़िंदगी के इस पूरे तमाशे में सबसे कीमती चीज़ राज्य (State) नहीं, बल्कि नई सोच वाला, संवेदनशील व्यक्ति है। महान और शानदार चीज़ें एक व्यक्ति ही पैदा करता है, जबकि झुंड सोचने और समझने के मामले में हमेशा सुस्त ही रहता है।
यही झुंड वाली मानसिकता जब अपने सबसे घटिया रूप में बाहर आती है, तब वह मिलिट्री सिस्टम बन जाती है, जिससे मैं सख्त नफ़रत करता हूँ। अगर कोई इंसान किसी बैंड की धुन पर ताल से ताल मिलाकर मार्च करने में खुशी महसूस करता है, तो मेरे मन में उसके लिए सिर्फ़ तिरस्कार ही उत्पन्न होता है। मुझे लगता है कि उसे गलती से इतना बड़ा दिमाग दे दिया गया, उसे तो बस एक रीढ़ की हड्डी दे दी जाती तो भी उसका काम चल जाता। सभ्यता के इस नासूर को जितनी जल्दी हो सके खत्म कर देना चाहिए।
हुक्म पर दिखाई गई बहादुरी, बेमतलब की हिंसा और देशभक्ति के नाम पर चलने वाली तमाम बकवास—मुझे इन सब से चिढ़ है! युद्ध मेरे लिए बहुत ही नीच और घृणित चीज़ है। मैं ऐसे घिनौने काम में हिस्सा लेने के बजाय टुकड़ों में कटना पसंद करूँगा। इतना सब होने के बावजूद, इंसानियत के बारे में मेरी राय काफ़ी ऊँची है। मेरा मानना है कि युद्ध का यह भूत कब का गायब हो चुका होता, अगर बड़े-बड़े व्यापारिक और राजनीतिक हितों के लिए स्कूलों और अखबारों के ज़रिये आम जनता के दिमाग में ज़हर न घोला गया होता।
सबसे खूबसूरत अनुभव जो हम कर सकते हैं, वह है रहस्य। यह वह बुनियादी भावना है जो सच्ची कला और सच्चे विज्ञान की नींव है। जो इस एहसास को नहीं जानता, जो अचरज नहीं कर सकता, वह एक बुझी हुई मोमबत्ती की तरह है, यानी जीते-जी मर चुका है। रहस्य का यही अनुभव—भले ही इसमें थोड़ा डर मिला हुआ हो—धर्म के जन्म की वजह बना। एक ऐसी शक्ति के होने का एहसास, जिसे हम कभी भेद नहीं सकते। जिसकी अनंत गहनता और अपार सुंदरता की बस एक अदनी-सी झलक ही हम पा सकते हैं। यही ज्ञान और यही एहसास धर्म का मर्म है। इस और सिर्फ़ इसी अर्थ में, मैं खुद को एक बहुत ही धार्मिक इंसान मानता हूँ।
मैं ऐसे ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता जो अपने ही बनाए इंसानों को इनाम या सजा दे, या जिसकी इच्छाएँ हम इंसानों जैसी ही हों। कोई व्यक्ति शरीर मरने के बाद भी कैसे जीवित रह सकता है? यह बात भी मेरी समझ से तो बाहर है। और न ही मैं इसे समझना चाहता हूँ। ऐसी बातें तो कमज़ोर दिल के लोगों के डर या अहंकार की उपज होती हैं। मैं तो—जीवन के अनंत रहस्य, विश्व की अद्भुत रचना और प्रकृति के महान नियमों—के किसी मामूली हिस्से को समझ सकूँ तो भी मेरे लिए बहुत है।
— अल्बर्ट आइंस्टाइन
यह निबंध और आइंस्टाइन की किताब आप यहाँ पढ़ सकते हैं :The World as I See It.
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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