पेट्रोल और कच्चा तेल (क्रूड ऑइल) आजकल कई कारणों से चर्चा में है। एक तरफ़ अमेरिका भारतीय पेट्रोलियम रिफाइनरीज पर रूसी कच्चे तेल से मुनाफाखोरी करने का आरोप लगा रहा है, तो दूसरी तरफ़ भारत सरकार के इथेनॉल-ब्लेंडिंग प्रोग्राम पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें यह माँग की गई है कि ग्राहकों को इथेनॉल-रहित पेट्रोल चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। फ़िलहाल सभी सरकारी और प्राइवेट पेट्रोल पंपों को E20 पेट्रोल (यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल-युक्त पेट्रोल) बेचना अनिवार्य किया गया है।
कुछ देर के लिए हम अमेरिकी सरकार के आरोपों को भूल जाते हैं। अगर हम इसे डोमेस्टिक पॉलिसी के नज़रिये से देखें तो भारत सरकार ये मानती है कि रूस (और पहले ईरान) जैसे देशों से तेल ख़रीदना भारत के लिए फ़ायदेमंद है। चूँकि पश्चिमी देशों ने इन देशों से दूरी बना रखी है, भारत को इनसे थोड़ा सस्ता तेल मिलता है और भारत की विदेशी मुद्रा बचती है। दूसरी बात, इस साल से पूरे देश में E20 अनिवार्य किए जाने के बाद, देश में पेट्रोल की मांग में लगभग 20% तक की गिरावट आई है।
इन बातों को देखते हुए, देश में पेट्रोल की क़ीमतें कम होनी चाहिए? बराबर न?
लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है।
पेट्रोल की क़ीमतें इसलिए ज़्यादा बनी हुई हैं क्योंकि बेसिक एक्साइज ड्यूटी, सेस और सरचार्ज हमारी सरकारों के लिए कमाई का एक बड़ा ज़रिया बन गए हैं। इनमें से सेस और सरचार्ज का एक और फ़ायदा है। ये टैक्स केंद्र सरकार द्वारा लगाए जाते हैं और इनमें राज्यों को हिस्सा नहीं देना पड़ता। इसलिए सरकार अपनी कमाई के इस ज़रिये को आसानी से छोड़ दें, ये संभव नहीं है। हालाँकि कुछ बड़े चुनावों से पहले पेट्रोल की क़ीमतों में छिटपुट छूट दी जा सकती है।
लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं होती। इथेनॉल गन्ने के मोलासेस से बनता है। इसलिए किसी को भी लगेगा कि ये भारत में आयात होने कच्चे तेल से सस्ता होगा। लेकिन मोलासेस की माँग में बढ़ोतरी के कारण इथेनॉल की क़ीमत रिफाइंड पेट्रोल से भी ज़्यादा हो गई है! इस बारे में मंत्रालय का कहना है:
"इथेनॉल सप्लाई वर्ष (ESY) 2024-25 के लिए 31.07.2025 तक, इथेनॉल की औसत ख़रीद क़ीमत (procurement cost) ₹71.32 प्रति लीटर है, जिसमें ट्रांसपोर्टेशन और GST शामिल हैं। E20 बनाने के लिए, ऑइल मार्केटिंग कंपनियाँ मोटर स्पिरिट (MS) में 20% इथेनॉल मिलाती हैं। मंत्रालय के अनुसार, “'सी-हेवी मोलासेस-बेस्ड इथेनॉल की क़ीमत ESY 2021-22 में ₹46.66 से बढ़कर ESY 2024-25 में ₹57.97 हो गई है और इसी अवधि में मक्का-आधारित इथेनॉल की क़ीमत ₹52.92 से बढ़कर ₹71.86 हो गई है।” पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल की क़ीमत बढ़ने के बावजूद, तेल कंपनियों ने इथेनॉल मिश्रण के नियम का विरोध नहीं किया है क्योंकि इस प्रोग्राम से देश को एनर्जी सिक्योरिटी मिलती है, किसानों की आय बढ़ती है और ये पर्यावरण के लिए भी अच्छा है।” [Rituraj Baruah, Mint]
किसी को लग सकता है कि जैसे-जैसे गन्ने का उत्पादन बढ़ेगा और अतिरिक्त माँग पूरी होगी, वैसे-वैसे इथेनॉल की क़ीमत कम होगी। लेकिन ऐसा सोचने का मतलब है, इसके पीछे की राजनीति को न समझना। गन्ना राजनीतिक दृष्टि से एक संवेदनशील फसल है और उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसीलिए तो सरकार किसानों से गन्ना ख़रीदने की क़ीमत फ़िक्स करती है। इसे Fair and Remunerative Price (FRP) कहते हैं, और यह सालों से लगातार बढ़ ही रही है। इसलिए, हमें ये मानकर चलना चाहिए कि जैसे-जैसे भारत के उर्जा क्षेत्र में इथेनॉल की माँग और अहमियत बढ़ेगी, वैसे-वैसे इसकी क़ीमत बढ़ाना राजनीतिक तौर पर और भी ज़्यादा ज़रूरी हो जाएगा।
इसलिए, ये उम्मीद तो छोड़ ही दीजिए कि इथेनॉल मिलाने से पेट्रोल की कीमतें कम हो जाएँगी।
अब ज़रा इसके दूरगामी परिणामों के बारे में सोचिए। गन्ना एक जलपिपासु फसल है। इथेनॉल की माँग बढ़ने से पानी (सरफेस वाटर और ग्राउंड वाटर दोनों) का इस्तेमाल भी बढ़ेगा और आख़िर में इसी से हमारे वाहनों के लिए तेल बनेगा। तो एक तरह से हम पानी से तेल बना रहे हैं (इससे मुझे 90 के दशक के रामर पिल्लई की याद आ गई, जो पानी में जड़ी-बुटी मिलाकर ‘हर्बल फ्यूल’ बनाने का दावा करता और लोगों को ठगता था)। इसलिए पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से पर्यावरण को फ़ायदा होता है, इस दावे पर ज़रा गहराई से सोचने की ज़रूरत है।
ऐसे में पेट्रोल की रिटेल कीमतें कम होंगी, ये सोचना बेवकूफी होगी। इसके बजाय, सरकार और देश के लिए बेहतर ये होगा कि वह सेस और सरचार्ज को ख़त्म करके ईंधन पर साफ़-साफ़ एक 'कार्बन टैक्स' लगाए। इससे तेल बनाने में इस्तेमाल होने वाले पानी की लागत इसमें जुड़ जाएगी। ये कार्बन टैक्स भारत को यूरोप के ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म’ (CBAM) से होने वाले नुकसान की भरपाई करने में भी कुछ हद तक मदद करेगा।
कार्बन टैक्स से सरकार को अच्छी कमाई होगी, जिसे जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। आख़िरकार, पब्लिक पॉलिसी अक्सर 'दूसरे सबसे अच्छे' विकल्प को चुनने की ही कला है।
चलते-चलते 1: इथेनॉल-मिश्रण और ऑनलाइन 'रियल-मनी गेम्स' पर लगे बैन में एक समानता है। दोनों ही मामलों में, सरकार ने कोई भी रियल इम्पैक्ट स्टडी, कॉस्ट-बेनिफिट एनालिसिस या जानकारी पत्रक सार्वजनिक किए बिना ये बैन लगा दिए हैं।
2025 में एक लोकतंत्र को ये बात शोभा नहीं देती। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने वाला बिल लाया गया, तो उसके साथ इस पर विस्तृत जानकारी देने वाला मेमोरेंडम भी शेयर किया गया। जिसमें सरकार की सोच और अध्ययन का पूरा ब्यौरा था। इससे इस विधेयक को लोगों का समर्थन भी मिल रहा है। हालाँकि, हमें बस कुछ अस्पष्ट कारण, प्रेस नोट और सरकारी आदेश ही मिलते हैं।
चलते-चलते 2: और रही बात 'मुनाफ़ाख़ोरी' की, तो ज़रा न्यूयॉर्क टाइम्स की इस ख़बर पर ग़ौर कीजिए। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार SpaceX की 84% कमाई सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स से आती है, और उसने "2002 में अपनी स्थापना के बाद से बहुत कम या बिल्कुल भी इनकम टैक्स नहीं दिया है," और यह छूट आगे भी लंबे समय तक जारी रहेगी।
इसके अलावा, वो इन पैसों से 'स्पेस' (जो एक तरह का 'ग्लोबल कॉमन्स' है) का भी इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन क्या कोई इसे मुनाफ़ाख़ोरी कह सकता है? अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ढोंग आम बात है, लेकिन इसे करने के लिए जिस चालाकी की ज़रूरत होती है, वह मौजूदा अमेरिकी सरकार में नहीं है।
—प्रणय कोटास्थाने
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
यही लेख आप अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ सकते हैं: Water → Oil
प्रणय कोटास्थाने के अन्य लेख और चर्चाएँ आप पुलियाबाज़ी और Anticipating the Unintended पर पढ़ सकते हैं।
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