India has a rich history of over 5000 years. Replete with stories of valour and courage, this history is also full of myths. While history teaches us valuable lessons, some baseless myths continue to weaken our collective spirit. It happens because we Indians often blindly believe what is told to us, without verifying the facts for ourselves. In today’s Tippani, Saurabh busts one such popular and equally misleading myth among Indians.

भारत में लगभग हर कोई ये बात रट चुका है कि—अंग्रेजों ने भारत पर 200 साल राज किया। रॉबर्ट क्लाइव ने प्लासी की लड़ाई 1757 में जीती और हमने आख़िरकार 1947 में उनसे आज़ादी पाई। मतलब पूरे 190 साल की गुलामी। तो इसमें गलत क्या है?
गलत यह है कि 1757 में रॉबर्ट क्लाइव ने सिर्फ़ बंगाल जीता था, जो भारत का एक (बड़ा) प्रांत/राज्य था, पूरा भारत नहीं। सन 1805 में भारत में ब्रिटिश राज कैसा दिखता था यह आप ऊपर दिए गए नक़्शे में देख सकते हैं।
अब इतिहास की कुछ और तारीखें भी देखते हैं: मैसूर को अंग्रेजों ने 1799 में हराया, मराठा साम्राज्य 1818 में पराजित हुआ और सिख साम्राज्य पूरी तरह धराशायी हुआ 1849 में। कुछ छोटे राज्य होंगे जो इसके बाद भी लड़ते रहे होंगे, लेकिन उस समय ये तीन भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी शक्तियाँ थीं।
इसलिए ये कहना ज़्यादा सही होगा कि अंग्रेजों को पूरे भारत को जीतने में लगभग 100 साल लगे और फिर अगले 100 साल तक उन्होंने यहाँ राज किया। असल में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दमन के बाद ही अंग्रेजों का राज पूरी तरह स्थापित हुआ और औपचारिक रूप से सत्ता ब्रिटिश साम्राज्य के पास चली गई। इससे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का भारतीय उपमहाद्वीप में एक बड़ा साम्राज्य ज़रूर था, लेकिन पूरे भारत पर उसका राज नहीं था।

तो फिर ये “200 साल की गुलामी” वाली बात इतनी प्रचलित क्यों हैं?
क्योंकि इतिहास की कहानियाँ अक़्सर वर्तमान की राजनीतिक ज़रूरतों के हिसाब से गढ़ी जाती हैं। “200 साल तक विदेशी गुलामी” वाला नैरेटिव, आधुनिक राष्ट्रवाद को खड़ा करने के लिए तैयार किया गया था। जैसा कि बेनेडिक्ट एंडरसन ने लिखा है, “शर्म राष्ट्रवाद की एक अहम बुनियाद है।”
अगर हम ये कहते कि अंग्रेजों ने भारत पर सिर्फ़ 90 साल तक राज किया, तो क्या इससे भारतीयों में स्थानीय पहचान से ऊपर उठकर एक आधुनिक भारतीय राष्ट्र बनाने की भावना जन्म लेती? शायद नहीं।
इस मिथक को सिर्फ़ अंग्रेज चुनौती दे सकते थे। लेकिन वे भी ऐसा क्यों करते? “हमने 200 साल तक भारत पर राज किया”, ऐसा कहना तो उनके लिए तो गर्व की बात है। फिर वो भाला इसका विरोध क्यों करेंगे। वो तो इसे अपने “रेज़्यूमे” में शान से जोड़ते हैं। सवाल ये है कि हम इसका विरोध करने के बजाय आँखें मूंदकर इसे स्वीकार क्यों करते हैं?
ऐसा ही एक और नैरेटिव चल पड़ा है—“1200 वर्षों की गुलामी”, जिसे हमारे प्रधानमंत्री भी कई बार दोहरा चुके हैं। अब जब आप समझ गए हैं कि इस तरह की कहानियाँ कैसे काम करती हैं, तो बताइए इस कहानी का हेतु क्या है? जी हाँ, इसे भी एक तरह से हिंदू राष्ट्रवाद गढ़ने की कोशिश माना जा सकता है, क्योंकि इसमें भी एक समुदाय में शर्म की भावना फैलाई गई है। कश्मीरी अलगाववादी भी कुछ ऐसा ही करते हैं। वो कश्मीर में 1586 से (जब अकबर ने कश्मीर पर आक्रमण किया था) आज तक विदेशी हुकूमत का दौर बताकर कश्मीरी राष्ट्रवाद पैदा करने की कोशिश करते हैं।
अब सवाल ये उठता है कि ऐसी कहानियाँ, जो तर्क और तथ्य से मेल नहीं खातीं (जैसे कि “1200 साल की गुलामी” वाली बात में 150 साल के शक्तिशाली मराठा और 400 साल के विजयनगर साम्राज्य को भुला दिया गया है), वो टिकती कैसे हैं?
इसका जवाब शायद यही है कि इन कहानियों को गढ़ने वाली राजनीतिक इच्छाशक्ति बहुत मज़बूत होती है। जबकि इन्हें चुनौती देने वाली ताक़त इतनी मज़बूत नहीं होती। वैसे भी ज़्यादातर लोग सोचने के मामले में आलसी होते हैं (जैसा कि डैनियल काहनेमन दिखा ही चुके हैं) और जब कोई बात बार-बार, ज़ोर से कही जाती है, तो लोग उसे सच मान लेते हैं।
काश हमारा राष्ट्रवाद ऐसी किसी गढ़ी हुई शर्म पर आधारित न होकर एक साझा, गर्व करने लायक भविष्य की भावना पर आधारित होता। इतिहास को एक खोज की तरह देखा जाना चाहिए, जहाँ तथ्यों से कहानियाँ बनें, और जब नए तथ्य मिलें तो हम भी अपनी कहानी बदलने को तैयार हों। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और संविधान एक आधुनिक राष्ट्र की प्रेरणा के लिए काफ़ी हैं। अब हमें आज की समस्याएँ सुलझाकर सुनहरे भविष्य के लिए साथ मिलकर काम करना चाहिए।
इसलिए ज़्यादा समझदारी इसी में होगी कि हम कहें कि—हमारा वक़्त अब शुरू हुआ है और हम अगले 200 साल की ओर देखकर काम करेंगे।
- सौरभ चंद्र
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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