31 अगस्त को इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने ‘सेमीकॉन 2.0’ की अधिसूचना के ज़रिए भारत के सेमीकंडक्टर इंसेंटिव ढाँचे में कई बड़े बदलाव किए। इसमें चार बातें सबसे खास हैं।
पहली बात, पहली बार चिप डिज़ाइन को महज़ औपचारिकता की तरह देखने के बजाय इस योजना के बिल्कुल केंद्र में रखा गया है। भारत में मौजूद डिज़ाइन टैलेंट को देखते हुए यह बहुत ही समझदारी भरा कदम है। दूसरी बात, अब इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ डिज़ाइन का काम भी खुद संभालेगा। अब तक डिज़ाइन का जिम्मा सरकार की कंप्यूटिंग रिसर्च संस्था C-DAC के पास था। तीसरी बात, रिसर्च और टैलेंट के विकास के लिए अब अलग से बजट और आर्थिक मदद तय की गई है। चौथी बात, मैन्युफैक्चरिंग की अलग-अलग श्रेणियों के लिए सरकार की तरफ़ से मिलने वाली शुरुआती पूँजीगत मदद (Capex) 30 से 40% तक सीमित की गई है, जो पहले सेमीकॉन 1.0 के तहत सभी के लिए समान रूप से 50% थी।
साल 2021 में आया ‘सेमीकॉन 1.0’ चार अलग-अलग योजनाओं के रूप में जारी हुआ था: डिज़ाइन-लिंक्ड इंसेंटिव, कंपाउंड सेमीकंडक्टर व पैकेजिंग स्कीम, डिस्प्ले-फैब स्कीम और सिलिकॉन-फैब स्कीम। वहीं सेमीकॉन 2.0 में इस पूरी वैल्यू चेन को 6 स्तंभों (pillars) और 10 श्रेणियों वाली एक ही साझा योजना में लाया गया है। इसमें डिज़ाइन, मटेरियल, फैब्रिकेशन, पैकेजिंग, रिसर्च और टैलेंट सब शामिल हैं।
सेमीकॉन 1.0 के तहत डिज़ाइन-लिंक्ड इंसेंटिव भरपाई (reimbursement) मॉडल पर काम करता था। चिप डिज़ाइन करने वाली कंपनियाँ पहले खर्च करती थीं और फिर खर्च की आधी रकम (अधिकतम ₹15 करोड़) का दावा करती थीं। साथ ही, वे कुल बिक्री पर डिप्लॉयमेंट इंसेंटिव माँग सकती थीं। यह तरीका आसान तो था, लेकिन इस इंडस्ट्री की ज़रूरतों से मेल नहीं खाता था, क्योंकि यहाँ किसी प्रोडक्ट को बाज़ार तक पहुँचने में ही 5 साल तक का समय लग सकता है। नतीजा यह हुआ कि 100 कंपनियों का लक्ष्य होने के बावजूद सिर्फ़ 24 कंपनियों को ही यह मदद मिल सकी।
सेमीकॉन 2.0 ने इस व्यवस्था को हाइब्रिड कैपिटल स्टैक से बदल दिया है। इसमें ₹15 करोड़ तक की सीड फंडिंग (शुरुआती पूँजी) दी जाएगी। इसके आगे, जब कोई स्टार्टअप प्राइवेट वेंचर कैपिटल से फंडिंग जुटा लेगा, तो सरकार इक्विटी को-इन्वेस्टमेंट या रॉयल्टी फाइनेंसिंग के माध्यम से मदद करेगी। आसान शब्दों में कहें तो, सिर्फ़ भरपाई पर निर्भर रहने के बजाय अब स्टार्टअप्स के पास ग्रांट, इक्विटी और रॉयल्टी जैसे कई विकल्प मौजूद होंगे। यह मॉडल उस इंडस्ट्री के लिए सचमुच बेहतर है जहाँ किसी प्रोडक्ट को मार्केट तक आने में ही 5 साल लग जाते हैं। इसके अलावा, नई योजना में विदेशी हिस्सेदारी पर लगी सीमा को हटा दिया गया है। इसकी जगह अब बस यह शर्त रखी गई है कि कंपनी का मालिकाना हक और कंट्रोल भारतीय नागरिकों या ओवरसीज सिटीजन्स ऑफ इंडिया (OCI) के हाथों में ही रहना चाहिए। साथ ही, अब भारतीय स्टार्टअप्स ग्लोबल कंपनियों, R&D संस्थानों और यूनिवर्सिटीज़ के साथ मिलकर (कंसोर्टियम बनाकर) भी प्रोजेक्ट्स के लिए बोली लगा सकते हैं।
विदेशी हिस्सेदारी की तय सीमा हटाना भी एक स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन यहाँ ‘प्रतिशत’ के बजाय ‘कंट्रोल’ का जो नियम लाया गया है, उससे अनिश्चितता बनी रहती है। अब कोई भी पात्र स्टार्टअप निवेशकों से विदेशी पैसा जुटा सकेगा, परंतु यह निवेश उतना ही होगा, जिससे कंपनी का कंट्रोल भारतीय नागरिकों या OCI के पास रहे। यह विदेशी पूँजी आकर्षित करने और सरकारी पैसे को विदेशी-नियंत्रित कंपनी में जाने से रोकने का एक उपाय तो है, लेकिन इसे एक बड़ा सुधार नहीं कहा जा सकता। आदर्श स्थिति तो यह होती कि भारत में रजिस्टर्ड किसी भी कंपनी को यह मदद मिलती, चाहे उसका मालिक कोई भी हो। क्योंकि महत्त्वपूर्ण बात यह है कि डिज़ाइन क्षमता किसके पास है, न कि कंपनी की इक्विटी किसके पास है।
इक्विटी मॉडल से जुड़ी दूसरी समस्या तब सामने आएगी जब स्टार्टअप्स असफल होने लगेंगे, और वे होंगे ही। वेंचर कैपिटल में ज़्यादातर दाँव खाली जाते हैं और कुछ बड़ी सफलताएँ बाकी सभी नुकसानों की भरपाई कर देती हैं। लेकिन सरकारी सिस्टम में जनता के पैसे के नुकसान को गड़बड़ी या लापरवाही के रूप में देखा जाता है। इस डर के माहौल में जब अफ़सर वैल्यूएशन या नुकसान तय करेंगे, तो वे अत्यधिक सावधानी बरतेंगे और यह बात डीप-टेक इन्वेस्टिंग की ज़रूरतों के बिल्कुल उलट है। इसका एक समाधान ANRF की RDI योजना में पहले ही इस्तेमाल किया गया है। सरकार इक्विटी रखती है, लेकिन कंपनी के फैसलों में उसका कोई दखल नहीं होता। सारी शर्तें तय करने का काम प्राइवेट निवेशकों पर छोड़ दिया जाता है। ISM भी ऐसा ही कुछ करेगा या नहीं, यह गाइडलाइंस आने के बाद ही साफ़ हो पाएगा।
डिफेंस और टेलीकॉम जैसे संवेदनशील इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए चिप्स बनाने पर अलग से इंसेंटिव की व्यवस्था है। C-DAC बोली (competitive bidding) के ज़रिए कंपनियों का चुनाव करेगा और इससे तैयार होने वाली बौद्धिक संपदा (IP) पर C-DAC का भी सह-स्वामित्व (co-ownership) होगा। C-DAC के साथ बौद्धिक संपदा साझा करने का मकसद देश की संपत्ति को विदेशी हाथों में जाने से बचाना और निर्यात प्रतिबंधों का मुकाबला करना है। लेकिन ग्लोबल वेंचर कैपिटलिस्ट सिर्फ़ उन्हीं कंपनियों में पैसा लगाते हैं जहाँ बौद्धिक संपदा पर किसी बाहरी का दावा न हो। ऐसे में सरकार का सह-स्वामी होना प्राइवेट निवेशकों के लिए फंडिंग करने के रास्ते बंद कर देता है। इसलिए व्यावहारिक रूप से देखें तो यह श्रेणी केवल डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स और सरकारी सहायता प्राप्त समूहों तक ही सीमित रह जाएगी। इसके अलावा, जब C-DAC ही बोलियाँ आयोजित करेगा और चुने गए प्रोजेक्ट्स में खुद सह-स्वामी बनेगा, तो हितों के टकराव (conflict of interest) का मुद्दा भी बना रहेगा।
पिलर 2 चिप बनाने वाली फैक्ट्रियों (फैब) में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और उपकरणों के लिए है। यह एक नया बदलाव है। इसके द्वारा सरकार ने इस बात को स्वीकार किया है कि चिप मैन्युफैक्चरिंग में काम आने वाली सामग्री को अलग से वित्तीय मदद की ज़रूरत है। इसके तहत 30% की शुरुआती मदद दी जा रही है। साथ ही, वित्त वर्ष 2029 से घरेलू स्तर पर कच्चा माल खरीदने पर 2 से 10% तक का प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) भी मिलेगा। इससे उस बेहद शुद्ध और उच्च स्तर की सप्लाई चेन को फंडिंग मिलेगी, जिसकी कमी चिप फैक्ट्रियों को पहले खलती थी।
पिलर 3 चिप फैक्ट्रियों को मिलने वाली मदद को आगे बढ़ाता है, लेकिन इसमें मिलने वाली रकम थोड़ी कम कर दी गई है। धोलेरा के TATA-PSMC प्रोजेक्ट जैसे भविष्य के सिलिकॉन वेफर फैब्स को अब पहले के 50% के बजाय 40% की शुरुआती सरकारी मदद मिलेगी। वहीं कंपाउंड-सेमीकंडक्टर, फोटोनिक्स और डिस्प्ले फैब्स के लिए इसे घटाकर 35% कर दिया गया है।
पिलर 4 यानी पैकेजिंग और भी दिलचस्प है। इसमें एडवांस 2.5D और 3D पैकेजिंग के लिए 35% की शुरुआती मदद दी जा रही है, जबकि पुराने या पारंपरिक तरीकों (legacy work) के लिए यह मदद 25% है। यह भारत की मौजूदा ताकत के भी अनुकूल है, क्योंकि सेमीकॉन 1.0 के तहत ही असेंबली और टेस्टिंग के 9 प्लांट्स को मंज़ूरी मिल चुकी है। इसके अलावा, चिप्स से बेहतर परफॉर्मेंस निकालने के लिए पैकेजिंग के क्षेत्र में अब रिसर्च पर भी बहुत तेज़ी से काम हो रहा है।
लेकिन सबसे अहम दो पिलर हैं रिसर्च और टैलेंट। ऐतिहासिक रूप से भारत की सरकारी प्रयोगशालाओं (पब्लिक लैब्स) को महँगे उपकरण खरीदने के लिए बजट तो मिल जाता था, लेकिन उन्हें चलाने के लिए कोई ऑपरेटिंग बजट नहीं मिलता था। सेमीकॉन 2.0 इन दोनों के लिए 75% तक की फंडिंग दे रहा है। इसमें ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और राष्ट्रीय चिप लैब्स को चालू रखने के खर्चे शामिल हैं, साथ ही एडवांस प्रोसेस, सिलिकॉन फोटोनिक्स और चिपलेट टेक्नोलॉजीज में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के लिए वित्तीय मदद भी दी जा रही है। यह एक बुनियादी कमी थी, जिसे इस योजना ने दूर किया है।
कुल मिलाकर, यह योजना सेमीकॉन 1.0 के मुकाबले एक बड़ा सुधार है। यह दिखाता है कि सरकार इस क्षेत्र में भारत की मौजूदगी बढ़ाने के लिए पूरी तरह गंभीर है। हालाँकि, सबसे बड़ा जोखिम प्रशासनिक बोझ का है। ISM को अब पूरी वैल्यू चेन, 10 अलग-अलग श्रेणियों, इक्विटी मैनेजमेंट, रॉयल्टी ट्रैकिंग और निवेश से जुड़े फैसलों को अकेले संभालना है। यह योजना कितनी सफल होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि मंत्रालय और ISM इस जटिल मिशन को संभालने के लिए अपनी क्षमताओं को कितनी तेज़ी से बढ़ाते हैं।
ताज़ा कलम: All Things Policy पॉडकास्ट में सेमीकंडक्टर फ्यूचर ऐक्सेलेरेटर लैब (SFAL) के सुनील जी. आचार्य और मैंने इस बात पर चर्चा की कि निवेशक, उद्यमी और चिप डिज़ाइन इंजीनियर सेमीकॉन 2.0 को कैसे देखते हैं। इसमें इस पॉलिसी के चिप डिज़ाइन पिलर का गहराई से विश्लेषण किया गया है और हमारे मेहमान इस क्षेत्र के अनुभवी निवेशक और उद्यमी हैं। तो ज़रूर सुनें!
— प्रणय कोटस्थाने
अग्रेज़ी लेख: Semicon 2.0 is Here
अनुवाद: परीक्षित सूर्यवंशी
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