बेहतर डेटा भीषण गर्मी से निपटने में कैसे मददगार हो सकता है?
What makes this summer particularly intense for India, and how better data collection can help?
—नित्यानंदम योगेश्वरन
2026 की हीटवेव: भारत के नक्शे पर दिख रहे गहरे लाल और नारंगी रंग दिखाते हैं कि गर्मी कितनी बढ़ चुकी है। लेकिन इन रंगों का मतलब क्या है और गर्मी से बचने के लिए इस डेटा का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है?
यूँ तो भारत में हर साल गर्मी पड़ती है, लेकिन इस बार ऐसा क्या अलग है जो यह बर्दाश्त के बाहर हो रही है? इसका सबसे ज़्यादा असर किस पर पड़ रहा है और क्या डेटा की मदद से इस पर उपाय खोजे जा सकते हैं? आइए समझते हैं।

गर्मी का नक्शा (Heat Map) क्या बताता है?
नक्शे में दिखने वाले गहरे लाल और नारंगी रंग का मतलब है कि उस इलाके की ज़मीन और उसके आसपास की हवा बहुत ज़्यादा गर्म हो चुकी हैं। मौसम वैज्ञानिक अक्सर सैटेलाइट और मौसम केंद्रों (weather station) से मिले डेटा को इन्हीं रंगों के ज़रिये दर्शाते हैं, ताकि लोग आसानी से समझ सकें कि गर्मी का प्रकोप कहाँ और कितना फैला हुआ है।
क्या यह गर्मी सामान्य है?
उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के साथ-साथ पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में जो गर्मी पड़ रही है, वह कुछ हद तक तो सालाना मौसमी बदलाव है, पर कुछ हद तक खतरनाक लू (हीटवेव) का नतीजा भी है।
अप्रैल और मई के महीनों में तेज़ धूप, सूखी हवाओं, ज़मीन में नमी की कमी और राजस्थान व पाकिस्तान के आसपास बनने वाले कम दबाव वाले क्षेत्रों की वजह से इन इलाकों में गर्मी बढ़ना आम बात है। इसलिए, मानसून आने से पहले नक्शे पर लाल या नारंगी रंग दिखना भी कोई अचरज की बात नहीं है।
इस बार जो बात डरा रही है, वह है गर्मी का हद से ज़्यादा बढ़ना, लंबे समय तक टिके रहना और बहुत बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लेना।
तापमान लगातार कई दिनों तक असामान्य रूप से ज़्यादा बना हुआ है और रात में भी कोई राहत नहीं मिल रही है। यह एक बहुत ही गंभीर हीटवेव का लक्षण है। इन कारणों से हालात और ज़्यादा बिगाड़ गए हैं:
मानसून से पहले होने वाली बारिश इस बार काफ़ी कम हुई है।
लगातार गर्म और सूखी हवाएँ चल रही हैं।
बहुत बड़े इलाके में ज़मीन की सतह गर्म हो चुकी है।
अनियोजित शहरीकरण और कंक्रीट के जंगलों के कारण शहर भट्टी की तरह तप रहे हैं, जिसे अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट भी कहा जाता है।
जलवायु परिवर्तन का असर
जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) ने इस पूरी स्थिति में आग में घी डालने का काम किया है। भारत के लिए हीटवेव कोई नई बात नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे धरती का जो औसत तापमान बढ़ रहा है, उसकी वजह से लू अब ज़्यादा बार आती है, ज़्यादा दिनों तक टिकती है और पहले से ज़्यादा खतरनाक होती है। यही वजह है कि ऐसी जानलेवा और झुलसा देने वाली गर्मी अब हमारे लिए एक आम बात होती जा रही है।
गर्मी और तापमान के नक्शे कैसे बनते हैं और इन्हें कैसे समझना चाहिए?
सबसे पहली बात, तापमान बताने वाले सभी नक्शे एक ही तरीके से नहीं बनते हैं। मुख्य रूप से इन्हें बनाने के तीन तरीके हैं:
पहला तरीका (मौसम केंद्र): कुछ नक्शे मौसम केंद्रों से मिलने वाले हवा के तापमान पर आधारित होते हैं। अलग-अलग जगहों पर लगे ये स्टेशन तापमान रिकॉर्ड करते हैं और फिर एक अंदाजे (interpolation) के आधार पर पूरे इलाके का नक्शा तैयार किया जाता है। इलाके में जितने ज़्यादा केंद्र होंगे, जानकारी उतनी ही सटीक होगी। यह डेटा सरकारी एजेंसियों, प्राइवेट नेटवर्क या मौसम में दिलचस्पी रखने वाले आम लोगों से मिलता है।
दूसरा तरीका (सैटेलाइट): बड़े इलाकों का तापमान नापने के लिए उपग्रहों में लगे थर्मल सेंसर की मदद ली जाती है। ये सेंसर सीधे ज़मीन की सतह का तापमान (Surface Temperature) नापते हैं। दरअसल, ये देखते हैं कि ज़मीन से कितनी ऊर्जा निकल रही है और फिर इस ऊर्जा का गर्मी से अनुपात निकालकर तापमान बताते हैं।
1980 के दशक की शुरुआत से ही गर्मी में होने वाले बदलावों को समझने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। सन 2000 के बाद, MODIS और Landsat जैसे एडवांस सेंसर आने से, हर दिन पूरी दुनिया का डेटा मिलना और भी आसान हो गया है।
तीसरा तरीका (कंप्यूटर मॉडल): इस तरीके में ‘न्यूमेरिकल वेदर मॉडल्स’ (कंप्यूटर सिमुलेशन) का इस्तेमाल करके हवा के तापमान का हिसाब लगाया जाता है। इन मॉडल्स में बहुत सी चीजों का डेटा एक साथ डाला जाता है: जैसे ज़मीनी स्टेशनों की रिपोर्ट, सैटेलाइट से मिला तापमान डेटा, हवा की नमी, धूप, बादल, बारिश का पैटर्न, मिट्टी की नमी, ज़मीन का इस्तेमाल (खेत, शहर आदि), समंदर का तापमान और उस जगह की भौगोलिक स्थिति।
इन मॉडलों का फ़ायदा यह है कि इनसे हम 4 से 15 दिन पहले ही मौसम की भविष्यवाणी कर सकते हैं। आपने Windy.com जैसी वेबसाइट्स देखी होंगी। ये मुख्य रूप से European Centre for Medium-Range Weather Forecasts (ECMWF) और Global Forecast System (GFS) जैसे दुनिया के सबसे मशहूर मॉडल्स का इस्तेमाल करती हैं।
ECMWF मॉडल 15 दिन तक की सटीक भविष्यवाणी कर सकता है। वहीं, हमारा भारतीय मौसम विभाग (IMD) अपने खुद के Numerical Weather Prediction (NWP) सिस्टम का इस्तेमाल करता है, जिसे भारत के हिसाब से तैयार किए गए GFS पर बनाया गया है। इसके साथ ही, IMD लू की चेतावनी और लंबी भविष्यवाणियों के लिए ECMWF के डेटा की भी मदद लेता है।
तो आगे से जब भी आप कोई ऐसा नक्शा देखें, जिसमें भयंकर गर्मी (लाल/नारंगी रंग) दिखाई गई हो, तो खुद से पहला सवाल पूछें, “यह हवा का तापमान बता रहा है या ज़मीन का?” फिर यह भी देखें कि डेटा कहाँ से आया है। हर तरीके की अपनी अलग कहानी होती है। कुछ नक्शों में किसी खास स्थानीय इलाके की गर्मी का बिल्कुल सटीक असर दिखता है, जिसे एक ग्लोबल मॉडल शायद कभी सही से न पकड़ पाए।
भारत में बढ़ती गर्मी के पीछे असल वजह क्या है, दुनिया भर में बदलता मौसम या हमारे लोकल कारण?
इसका सीधा जवाब है, दोनों।
अगर हम दुनिया के मौसम की बात करें, तो दो मुख्य बातें सामने आती हैं। पहली ‘अल नीनो’ का बनना। प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय (equatorial) इलाके में अल नीनो की स्थिति बन रही है और इसके मई से जुलाई के बीच पूरी तरह से सक्रिय होने की आशंका है।
अल नीनो क्या है? यह मौसम का एक ऐसा चक्र है जिसमें पूर्वी प्रशांत महासागर के पानी का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है और इसका असर उसके ऊपर मौजूद हवाओं और पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। अक्सर अल नीनो के सालों में भारत में ज़्यादा गर्मी पड़ती है और मानसून कमज़ोर रहता है।
हालाँकि यह अभी अपनी शुरुआती स्टेज में है, लेकिन इसके संकेत अभी से दिखने लगे हैं, जैसे भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर से नमी गायब हो रही है और मानसून से पहले की गर्मी लगातार रिकॉर्ड तोड़ रही है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने तो अल नीनो के इसी असर को देखते हुए पहले ही अनुमान लगा दिया है कि 2026 में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम (यानी लॉन्ग-पीरियड एवरेज का सिर्फ 92%) रह सकता है और इसकी सबसे बड़ी वजह अल नीनो ही है।
दूसरा ग्लोबल कारण है, इंसानी गतिविधियों की वजह से होने वाली ग्लोबल वॉर्मिंग लगातार धरती के औसत तापमान को बढ़ा रही है। भारत में साल 1961 से ही लू चलने के दिनों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। अनुमान बताते हैं कि अगर इसी तरह तापमान बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में लू चलने के दिन 12 से 18 दिन और ज़्यादा बढ़ सकते हैं।
अब आते हैं स्थानीय कारणों पर, जो यह तय करते हैं कि हमें यह गर्मी कितनी महसूस होती है। कमज़ोर पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances), लंबे समय तक सूखा रहना और आसमान में बादलों के न होने से गर्मी बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है।
शहरों में घनी आबादी, कंक्रीट की इमारतें, गाड़ियाँ, एसी और फैक्ट्रियों की वजह से अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट बनता है, जो शहरों का तापमान बहुत ज़्यादा बढ़ा देता है। गाँवों और देहाती इलाकों में जंगलों की आग, पराली या लकड़ियाँ जलने और खाली पड़ी बंजर ज़मीन की वजह से सतह का तापमान बढ़ जाता है।
यानी जो गर्मी हम महसूस करते हैं, वह किसी एक वजह से नहीं होती। किसी भी इलाके में कितनी गर्मी है, इसका सबसे सही और सटीक अंदाजा ज़मीनी मौसम केंद्रों से ही मिलता है।
इस भीषण गर्मी का लोगों, उनकी रोज़ी-रोटी और पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है?
गर्मी का असर सिर्फ़ थर्मामीटर के आँकड़ों तक सीमित नहीं रहता। यह इंसानों, जानवरों और पूरे पर्यावरण को प्रभावित करता है, हालाँकि इंसानों पर इसका असर सबसे साफ़ दिखाई देता है।
इसका सबसे पहला और सबसे बुरा असर बाहर धूप में काम करने वाले मजदूरों पर पड़ता है। दिहाड़ी मजदूर, कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने वाले, रेहड़ी-पटरी वाले और डिलीवरी बॉय चाहकर भी धूप से नहीं बच सकते, क्योंकि उनकी रोज़ी-रोटी रोज़ बाहर निकलने से ही चलती है। मजबूरी ऐसी होती है कि वे पैसों के लिए सरकार की ‘गर्मी में बाहर न निकलने’ की सलाह को भी मानने की स्थिति में नहीं होते। इसलिए यह जितनी मौसम मार है, उतनी ही एक सामाजिक मजबूरी भी है।
इसके अलावा, झुग्गी-झोपड़ियों और तंग हालात में रहने वाले लोग इस भीषण गर्मी की सबसे बड़ी मार झेलते हैं, क्योंकि उनके पास न तो एसी- कूलर की सुविधा है, न वेंटिलेशन का इंतज़ाम, न आस-पास हरियाली है और न ही पानी सप्लाई। कमज़ोर तबकों में भी बुजुर्गों और नवजात बच्चों को सबसे ज़्यादा खतरा होता है, क्योंकि उनका शरीर बदलते तापमान के साथ तालमेल बिठाने में उतना सक्षम नहीं होता।
यह गर्मी दिल की बीमारी, सांस की तकलीफ और डायबिटीज़ जैसी पुरानी बीमारियों को और गंभीर बना देती है। हालत बिगड़ने पर शरीर में पानी की भारी कमी (डीहाइड्रेशन), अत्यधिक थकान और हीट स्ट्रोक (लू लगना) जैसी जानलेवा नौबत आ जाती है। हालांकि, गर्मी की वजह से होने वाली मौतों के सटीक आंकड़े अक्सर सामने नहीं आ पाते, क्योंकि यह साबित करना काफी उलझा हुआ होता है कि मौत की सीधी वजह सिर्फ गर्मी ही थी।
अगर पर्यावरण की बात करें, तो बढ़ता तापमान पेड़-पौधों को सुखा रहा है, पानी के स्रोतों को खत्म कर रहा है और जंगली जानवरों व मवेशियों को बेहाल कर रहा है। लंबे समय तक रहने वाली गर्मी और सूखे के कारण जंगलों में आग लगने का खतरा बहुत बढ़ जाता है। ये आग न सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ती है और हरे-भरे जंगलों को खाक कर देती है, बल्कि उस पूरे इलाके के तापमान को भी कई गुना बढ़ा देती है।
इसलिए, अब गर्मी को सिर्फ़ एक मौसमी परेशानी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह सीधे तौर पर करोड़ों लोगों की सेहत, उनके काम करने की क्षमता, शहरों में रहने के हालात और पर्यावरण के संतुलन को तहस-नहस कर रही है।
डेटा और ‘जियोस्पेशियल’ तकनीक गर्मी से बचने में कैसे मदद कर सकती है?
अगर हमारे पास हर इलाके का सटीक डेटा नहीं होगा, तो गर्मी से निपटने की हमारी तैयारियाँ सिर्फ़ कागजी घोड़े बनकर रह जाएँगी और ज़मीन पर उनका कोई खास असर नहीं दिखेगा। सही डेटा और तकनीक हमें कई तरह से मदद कर सकते हैं।
डेटा का सबसे बड़ा काम यह तय करना है कि किसी इलाके में गर्मी ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से है या लोकल कारणों से। इससे हमें यह समझने में मदद मिलती है कि जलवायु परिवर्तन का बढ़ते शहरीकरण, ज़मीन के इस्तेमाल में आए बदलाव और स्थानीय पर्यावरण के साथ क्या कनेक्शन है। आज हम जियोस्पेशियल डेटा (सैटेलाइट और लोकेशन पर आधारित डेटा) की मदद से यह देख सकते हैं कि किन शहरों में अर्बन हीट आइलैंड बन रहे हैं और कहाँ हरियाली तेज़ी से खत्म हो रही है। इससे हम हर जगह के लिए एक ही फॉर्मूला अपनाने के बजाय, उस इलाके की ज़रूरत के हिसाब से सही कदम उठा सकते हैं।
गर्मी का असर हर जगह अलग-अलग होता है। जो तरीका एक शहर में कारगर रहा है, ज़रूरी नहीं कि वह दूसरे शहर में भी असरदार हो। हर जगह का मौसम, आबादी और इंसानी गतिविधियों से पैदा होने वाली गर्मी (फैक्ट्रियाँ, गाड़ियाँ आदि) अलग-अलग होती है। इसलिए भारत को हर इलाके में और ज़्यादा मौसम केंद्र शुरू करने और तापमान नापने वाले सिस्टम को बेहतर करने की सख्त ज़रूरत है।
साथ ही, हमें खास थर्मल पेलोड्स (तापमान मापने वाले उपकरण) और हाई-रिज़ॉल्यूशन वाले सैटेलाइट्स लगाने की भी सख्त ज़रूरत है, जो लगातार ज़मीन के तापमान पर नज़र रख सकें। इससे अत्यधिक गर्म जगहों (हीट हॉटस्पॉट्स) की पहचान करने, जंगलों की आग पर नज़र रखने और किसी खास इलाके की गर्मी के पैटर्न को समझने में बहुत मदद मिलेगी।
इसके अलावा, अलग-अलग जगहों के हिसाब से गर्मी से बचाव के तरीके खोजने के लिए हमें और ज़्यादा रिसर्च करना होगा। साथ ही, हमें शहरों की प्लानिंग बेहतर करके, ऊर्जा का समझदारी से इस्तेमाल करके और पर्यावरण को सुधार कर इंसानों द्वारा पैदा की जा रही गर्मी को कम करना होगा।
कुल मिलाकर, गर्मी से लड़ने के लिए हमें एक ऐसे संतुलित तरीके की जरूरत है जिसमें इसके असर और इसकी वजह दोनों से एक साथ निपटा जाए। और यह तभी मुमकिन होगा, जब हमारी नीतियाँ और प्लानिंग सही डेटा और विज्ञान पर आधारित होंगी।
— नित्यानंदम योगेश्वरन
नित्यानंदम तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में Geospatial Research Programme के प्रोफ़ेसर तथा प्रमुख हैं। वे Takshashila Geospatial Bulletin के मुख्य लेखक भी हैं।
यह लेख अंग्रेज़ी में यहाँ प्रकाशित हुआ है।
We welcome articles/blogs/experiences from our readers and listeners. If you are interested in getting your writing featured on Puliyabaazi, please send us your submissions at puliyabaazi@gmail.com. Check out this article for submission guidelines.





