सैन्य शक्ति में शॉर्टकट नहीं
Will asymmetric power replace traditional platforms in modern warfare?
— युसूफ उंझावाला
युद्ध हर दिन नहीं लड़े जाते, लेकिन शांति हर दिन बनाए रखनी पड़ती है। भारत जैसी भौगोलिक स्थिति और महत्वाकांक्षा वाले विशाल देश के लिए यह एक बुनियादी सच है।
एक शक्तिशाली देश की पहचान सिर्फ़ इससे नहीं होती कि वह युद्ध कैसे लड़ता है, बल्कि इससे भी होती है कि वह युद्ध होने से कैसे रोकता है। यह तभी संभव होता है, जब वह देश अपनी मौजूदगी, अपनी साख और युद्ध से पहले ही दुश्मन के विकल्पों को सीमित करने की क्षमता रखता हो। इसलिए, सैन्य शक्ति का उपयोग सिर्फ़ युद्ध में नहीं, शांति बरकरार रखने में भी होता है।
आजकल भविष्य के युद्धों पर होने वाली ज़्यादातर चर्चाओं में इसी मुद्दे को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। हाल के वर्षों में यह दावा अक्सर सुनाई देता है कि आत्मघाती ड्रोन और सटीक मिसाइलों ने युद्ध का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। लोग मानने लगे हैं कि महँगे सैन्य प्लेटफ़ॉर्म (लड़ाकू विमान, एअरक्राफ्ट कैरियर) अब बेकार हो गए हैं और भविष्य की लड़ाइयाँ सस्ते और यूज एंड थ्रो (expendable) हथियारों से जीती जाएँगी। यूक्रेन का युद्ध, ईरान के मिसाइल हमले और अजरबैजान-आर्मेनिया का संघर्ष—इनको अक्सर इसी बात के सबूत के तौर पर पेश किया जाता है।
यह दलील सुनने में तो बड़ी अच्छी लगती है, लेकिन यह उतनी ही भ्रामक और खतरनाक है।
युद्ध कभी भी सस्ते सिस्टम से नहीं जीते जाते। जीत उसकी होती है जो ज़मीन पर अपना कब्ज़ा जमाये रख सकता है, बिगड़ते हालात में वर्चस्व बनाए रखता है और दुश्मन के मुकाबले ज़्यादा समय तक लड़ाई में टिक पाता है। इनमें से किसी भी क्षमता का कोई विकल्प नहीं है।
हाल के युद्ध यह नहीं दर्शाते कि पारंपरिक सैन्य शक्ति का दौर खत्म हो गया है। वे यह दिखाते हैं कि जब पारंपरिक सैन्य शक्ति नहीं होती, कम होती है या उसमें तालमेल नहीं होता, तब क्या होता है। आर्मेनिया इसलिए नहीं हारा क्योंकि अब टैंक बेकार हो गए हैं, वह इसलिए हारा क्योंकि उसके पास समय पर दुश्मन को देखने, अपना बचाव करने और जवाब देने की क्षमता नहीं थी। वहीं, यूक्रेन रूस के खिलाफ़ सिर्फ़ ड्रोन के दम पर नहीं टिका है, उसके पीछे भारी तोपखाने, मजबूत रसद (logistics), खुफ़िया जानकारी और बड़े देशों की औद्योगिक ताकत है। रही बात ईरान की, तो उसकी मिसाइलें और ड्रोन कुछ हद तक ज़रूर काम आए, लेकिन वे उसकी सेना और नेतृत्व के भारी नुकसान को नहीं रोक पाए। इससे आज भी सस्ते हथियारों के मुकाबले पारंपरिक सैन्य शक्ति की श्रेष्ठता स्पष्ट होती है।
सस्ते हथियार दुश्मन को नुकसान पहुँचा सकते हैं, युद्ध का परिणाम तय नहीं कर सकते। वे ज़मीन पर कब्ज़ा बरकरार नहीं रख सकते, बिगड़ते हालात को काबू नहीं कर सकते और न ही मनचाहे राजनीतिक नतीजे दिला सकते हैं। ये तमाम काम आज भी निश्चित रूप से पारंपरिक सैन्य शक्ति के दम पर ही किए जाते हैं। साथ ही, कोई भी दो युद्ध एक जैसे नहीं होते। हर युद्ध के अपने अलग राजनीतिक उद्देश्य होते हैं।
भारत के लिए इन बुनियादी बातों को नज़रअंदाज़ करना एक बड़ी रणनीतिक भूल साबित हो सकती है।
दो मोर्चे, दो युद्ध
भारत के सामने दो मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं और दोनों के साथ युद्ध का स्वरूप बिल्कुल अलग-अलग है।
पाकिस्तान के मामले में परमाणु का साया हमेशा बना रहता है, इसलिए कोशिश यह होती है कि संघर्ष सीमित हो। यहाँ लक्ष्य होता है दुश्मन को नपी-तुली सज़ा (calibrated punishment) देना—जैसे सीमा पार आतंकवाद का करारा जवाब देना, ताकि भविष्य में वह ऐसी हिमाकत न करे। लेकिन यह भी इस तरह करना होता है कि संघर्ष बढ़कर एक बेकाबू युद्ध में परिवर्तित न हो जाए। दूसरी ओर पाकिस्तान का बर्ताव इस बात से तय होता है कि उसे अपने अस्तित्व पर कितना खतरा महसूस हो रहा है। अगर उसे लगा कि उसका अस्तित्व खतरे में है, तो वह युद्ध को तेज़ी से भड़का सकता है, फिर चाहे दोनों देशों की सैन्य शक्ति में कितना भी फ़र्क क्यों न हो।
इसलिए, इस युद्ध में भारत का मकसद सिर्फ़ नुकसान पहुँचाना नहीं होता, बल्कि अपनी ताकत दिखाते हुए आत्म-संयम बरतना भी होता है।
चीन के साथ मामला पूरी तरह अलग है। यहाँ मुख्य उद्देश्य दुश्मन को अपनी सीमा में घुसने से रोकना है। हिमालय में होने वाला हर संघर्ष सहनशक्ति की परीक्षा होता है। दुनिया के सबसे मुश्किल इलाकों में से एक, इस क्षेत्र में रसद, सैनिकों और सामग्री की ज़बरदस्त ज़रूरत होती है। इस युद्ध में भारत के लिए जीत का मतलब है अपनी सीमाओं की रक्षा करना, लेकिन इसके लिए भी भरपूर तैयारी चाहिए।
पहाड़ों में लड़ाई बहुत महँगी पड़ती है। इतनी ऊँचाई पर लंबे समय तक सेनाओं को तैनात रखने के लिए बुनियादी ढाँचे, रिज़र्व फ़ोर्स और अटूट हौसले की ज़रूरत होती है, जिसे रातों-रात पैदा नहीं किया जा सकता। रोबोटिक्स और ऑटोनॉमस सिस्टम के क्षेत्र में चीन की तरक्की इस युद्ध का स्वरूप और भी बदल सकती है। इसलिए भारत को न केवल उनका मुकाबला करने की, बल्कि वैसे सिस्टम बनाने की क्षमता भी हासिल करनी होगी।
ये ऐसे युद्ध नहीं हैं जिन्हें सिर्फ़ ड्रोन और मिसाइलों के दम पर रोका या लड़ा जा सके।
हाल के युद्धों से मिलने वाला सबक
यूक्रेन में रूस का अनुभव साबित करता है। विशाल सैन्य क्षमता होने के बावजूद, रूस युद्ध के शुरुआती चरणों में हवाई बढ़त (Air Superiority) हासिल करने में नाकाम रहा। एक बेहद अहम मोड़ पर उसकी रसद व्यवस्था लड़खड़ा गई, जिससे उसकी सेना की रफ़्तार धीमी पड़ गई। परिणामतः जिस अभियान को रूस बहुत जल्द खत्म करना चाहता था, वह अब एक लंबे और थकाऊ युद्ध में बदल चुका है।
पारंपरिक सैन्य शक्ति की कमी की वजह से रूस को युद्ध के बीच अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा। उसे ईरान के ड्रोन और उत्तर कोरियाई सैनिकों जैसे बाहरी सहारे लेने पड़े। साथ ही उसे अपने सैनिकों और हथियारों का भारी नुकसान उठाना पड़ा। यह सस्ते सिस्टम की जीत का सबूत नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि जब किसी देश के पास पारंपरिक सैन्य बढ़त नहीं होती या वह उसका सही इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो क्या होता है।
ईरान का उदाहरण गैर-पारंपरिक शक्ति (Asymmetric power) की सीमाओं को उजागर करता है। मिसाइलों और ड्रोन में निवेश करके ईरान ने अपने पड़ोसियों की सुरक्षा के लिए मुश्किलें तो पैदा कीं और नुकसान भी पहुँचाया, लेकिन अमेरिका और इज़राइल ने यह दिखा दिया कि वे लंबी दूरी से हमला करने, दुश्मन के बड़े ठिकानों को तबाह करने और युद्ध के मैदान को अपनी मर्ज़ी से चलाने की ताकत रखते हैं—ऐसी ताकत जिसका मुकाबला ये सस्ते ड्रोन और मिसाइलें नहीं कर सकतीं।
फिर भी, और इस बारीकी का उल्लेख करना भी ज़रूरी है कि ईरान के ये गैर-पारंपरिक हथियार एकदम बेकार भी साबित नहीं हुए हैं। इन्हीं हथियारों के दम पर उसने दुश्मन को बातचीत करने के लिए मजबूर किया, स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ जैसे अहम समुद्री रास्ते को बंद किया और आर्थिक नुकसान भी पहुँचाया। उसने इस संघर्ष को इतना महँगा बना दिया है कि अमेरिका भी इसे और ज़्यादा बढ़ाने से पहले सोचने पर बाध्य हो गया।
ईरान का मामला एक साथ दोनों ही तर्क साबित करता है—यह दिखता है कि पारंपरिक श्रेष्ठता क्या कर सकती है और गैर-पारंपरिक हथियार भी दबाव बना सकते हैं। भारत के लिए इसका मतलब है: हमें वैसी स्थिति से बचने के लिए पारंपरिक श्रेष्ठता चाहिए, जैसी ईरान झेल रहा है। और हमें गैर-पारंपरिक क्षमता भी चाहिए ताकि अगर कोई दुश्मन भारत के खिलाफ़ वैसी कार्रवाई करने की सोचे जैसी अमेरिका ने ईरान के खिलाफ़ की है, तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़े।
भारत के लिए सबक साफ़ है: असंतुलन, फिर चाहे वह पारंपरिक सैन्य क्षमता के साथ हो या उसके बिना, कमज़ोरी को जन्म देता है।
बड़े सैन्य प्लेटफ़ॉर्म आज भी क्यों ज़रूरी हैं?
यह दावा कि ड्रोन और मिसाइलें लड़ाकू विमानों, पनडुब्बियों या एयरक्राफ्ट कैरियर की जगह ले लेंगे, सैन्य शक्ति की बुनियादी समझ की कमी दर्शाता है। सैन्य प्लेटफ़ॉर्म सिर्फ़ तबाही के औजार नहीं होते, वे आपकी मौजूदगी और साख का ज़रिया भी होते हैं।
एयरक्राफ्ट कैरियर के महत्व को अक्सर हम नज़रंदाज़ कर देते हैं और सोचते हैं कि युद्ध के समय दुश्मन उन्हें आसानी से निशाना बना सकता है। लेकिन यह उनकी असली भूमिका को नज़रअंदाज़ करना है। भारत के लिए वे हिंद महासागर और उसके आगे एक मज़बूत और गतिमान हवाई शक्ति प्रदान करते हैं। वे हमारे इरादों को जताते हैं, हमारे सहयोगियों को भरोसा दिलाते हैं, और हमें ऐसे विकल्प देते हैं जो ज़मीन पर मौजूद सिस्टम कभी नहीं दे सकते। उनकी अहमियत जितनी युद्ध लड़ने में है, उतनी ही उसे रोकने में भी है।
लड़ाकू विमान आज भी हवाई नियंत्रण की बुनियाद हैं। उनके बिना हर ऑपरेशन असुरक्षित और महँगा हो जाता है। ड्रोन हवाई ताकत को बढ़ा ज़रूर सकते हैं, लेकिन वे विमानों की जगह नहीं ले सकते। इसी तरह, समुद्र के भीतर पनडुब्बियाँ दुश्मन के मन में जो डर और अनिश्चितता पैदा करती हैं, वैसा असर किसी और चीज़ से पैदा करना मुश्किल है।
ड्रोन और मिसाइलें आज बेहद ज़रूरी हैं, वे सेना की ताकत को कई गुना बढ़ाते हैं, पर वे उसका विकल्प नहीं हो सकते।

वास्तविक कमी: औद्योगिक क्षमता और टिकाव
आधुनिक युद्ध जितने मैदान पर लड़े जाते हैं, उतने ही फैक्ट्रियों में भी लड़े जाते हैं।
युद्ध के दौरान गोला-बारूद, हथियार और पुर्जों की खपत इतनी तेज़ी से होती है कि शांति के समय में इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। ऐसे में, जीत उसी की होती है जो दुश्मन के मुकाबले तेज़ी से अपने हथियारों की भरपाई कर सके।
भारत अभी तक इसके लिए तैयार नहीं है।
हमारे युद्ध भंडार (War Reserves) कम समय के तीव्र संघर्षों के हिसाब से बने हैं। हमारे रक्षा उद्योगों में प्रगति तो हुई है, लेकिन उनमें अभी इतनी क्षमता नहीं है कि युद्ध छिड़ने पर वे रातों-रात उत्पादन बढ़ा सकें। हथियारों की खरीद में होने वाली सालों, और कभी-कभी दशकों, की देरी महज़ सुस्ती नहीं है, यह एक बड़ी रणनीतिक कमज़ोरी है।
भारत शायद छोटे युद्ध पसंद करे, लेकिन युद्ध कब तक चलेगा, यह हमारे हाथ में नहीं है। अगर संघर्ष लंबा चलता है, तो हार-जीत का फैसला इस बात से होगा कि हमारे पास उत्पादन, मरम्मत और हथियारों की भरपाई की कितनी क्षमता है। गोला-बारूद का पर्याप्त भंडार ही सैन्य शक्ति का असली आधार होता है।
रक्षा के लिए आक्रमण की क्षमता ज़रूरी
हमारा मकसद बचाव है, पर इसका मतलब यह नहीं कि हमला करने की क्षमता ज़रूरी नहीं है।
क्षेत्रीय संघर्षों में, सही समय सही स्थान पर दुश्मन की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की ताकत हमारी स्थिति को मज़बूत करती है। इससे हम अपने नुकसान की भरपाई कर सकते हैं, दुश्मन पर दबाव डाल सकते हैं और बातचीत की दिशा तय कर सकते हैं। जो सेना सिर्फ़ जवाबी हमला कर सकती है, वह अपने विकल्प खुद ही कम कर लेती है।
भारत के लिए यह बात दोनों मोर्चों पर लागू होती है। रणनीतिक नतीजे हासिल करने के लिए कभी-कभी नपे-तुले हमले ज़रूरी होते हैं। इसके लिए खुफ़िया जानकारी, रसद और मारक क्षमता का सटीक तालमेल चाहिए होता है। यह सब तैयारी से ही संभव है, जुगाड़ से नहीं।
भविष्य और भी पेचीदा होगा
नई तकनीकें युद्ध के तौर-तरीकों को तो बदल देंगी, लेकिन इससे चुनौतियाँ कम नहीं होंगी।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) फ़ैसलों की रफ़्तार बढ़ाएगा और सेना में बेहतर तालमेल लाएगा। ऑटोनॉमस सिस्टम निगरानी, रसद और युद्ध सहायता में बड़ी भूमिका निभाएँगे। हिमालय जैसे मुश्किल इलाकों में रोबोटिक सिस्टम सेना की पहुँच को उन जगहों तक ले जा सकते हैं जहाँ पहुँचना अभी मुमकिन नहीं है।
इसके अलावा, अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्र और भी महत्वपूर्ण हो जाएँगे, क्योंकि संचार, नेविगेशन और खुफ़िया जानकारी इन्हीं पर टिकी होगीं।
आने वाले दिनों में ये तमाम बदलाव युद्ध को और भी जटिल बना देंगे। ऐसे में जीत उसी की होगी जो इन बदलावों के लिए तैयार होंगे और जिसके पास बेहतर तालमेल, मज़बूत हौसला और बड़े पैमाने पर संसाधन होंगे।
शक्ति का कोई शॉर्टकट नहीं
जैसे-जैसे भारत दुनिया में आगे बढ़ेगा, उसकी ज़िम्मेदारियों और हितों का भी विस्तार होगा। जो देश 10-20 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखता हो, वह अपनी सैन्य शक्ति को लेकर कामचलाऊ सोच रखने का जोखिम नहीं उठा सकता।
जैसे-जैसे भारत का प्रभाव बढ़ेगा, उसके हित बढ़ेंगे, उसकी चुनौतियाँ बढ़ेंगी और दुनिया की उससे उम्मीदें भी बढ़ेंगी।
इस चुनौती का सामना करने के लिए हमें गलत विकल्पों को नकारना होगा। सवाल यह नहीं है कि हमें ड्रोन चाहिए या एयरक्राफ्ट कैरियर, मिसाइल चाहिए या लड़ाकू विमान। सवाल एक ऐसी सेना बनाने का है, जो हर मोर्चे पर, लंबे समय तक और किसी भी स्तर के संघर्ष में दुश्मन को धूल चटा सके।
भारत के लिए सबक बिल्कुल स्पष्ट है: एक मज़बूत और भरोसेमंद सैन्य शक्ति बनाने का कोई शॉर्टकट नहीं है। आने वाले दशकों में केवल एक संतुलित, मज़बूत और आत्मनिर्भर सेना ही भारत के हितों की रक्षा कर सकती है।
— युसूफ उंझावाला
युसूफ तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में एडजंक्ट स्कॉलर हैं। वे रक्षा तथा भू-राजनीति में विशेष रुची रखते हैं और इन विषयों पर नियमित रूप से लिखते हैं।
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हम सब अक्सर कहते और सुनते आए हैं कि देश में कानून का राज होना चाहिए। लेकिन यह कानून का राज होता क्या है? क्या देश में लागू कायदे-कानून के अनुसार व्यवहार इतनी ही इसकी व्याख्या है या इसमें कुछ सुक्ष्मताएँ भी हैं? क्या कानून के शासन का संबंध सिर्फ़ नागरिकों के दैनंदिन जीवन से है, या इसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था तक पर पड़ता है? यदि हाँ, तो कहाँ, कैसे और क्यों?
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