आदिवासी महिलाओं ने कैसे बदली बिजलपुर की तकदीर?
How desilting of a check dam transformed the lives of tribal women and their families in a Rajasthan village
—विकास मेश्राम
राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के सज्जनगढ़ ब्लॉक में अधिकांश आबादी आदिवासी समुदाय से है। यहाँ के लोग पहाड़ियों और फलियों (hamlets) में बसे हुए हैं, जहाँ न पर्याप्त सिंचाई है, न स्थायी रोज़गार। परिवार वर्षा आधारित खेती और दिहाड़ी मज़दूरी पर निर्भर हैं। जब बारिश नहीं होती, तो पूरे के पूरे परिवार अहमदाबाद जैसे शहरों में भवन निर्माण के काम के लिए निकल जाते हैं, कभी-कभी साल के बारह में से छह महीने से भी ज़्यादा समय के लिए। यह पलायन सिर्फ़ आर्थिक समस्या नहीं है। इसका सबसे गहरा असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर, बच्चों की पढ़ाई पर और परिवार के रोज़मर्रा के रिश्तों पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन ने इन मुश्किलों को और बढ़ा दिया है।
इन्हीं हालात में बिजलपुर गाँव में रहती हैं दयाबाई मोतीलाल डोडीयार। उम्र छियालीस साल, पाँच सदस्यों का परिवार और आठ बीघा ज़मीन। लेकिन सिंचाई की सुविधा न होने के कारण साल में केवल एक ही फ़सल हो पाती थी। बाकी समय परिवार सहित शहर जाकर मज़दूरी करना उनकी मजबूरी थी।

उनके खेत के पास ग्राम पंचायत गोदावाड़ा नारंग ने वर्ष 2013 में एक चेकडैम बनाया था। लेकिन एक दशक में उसमें इतनी मिट्टी भर गई कि वह पूरी तरह बेकार हो गया। ढाँचा तो खड़ा था, पर न पानी रुकता था, न खेतों को कोई फ़ायदा होता था। उसी चेकडैम से सटे खेत सक्षम समूह की तेरह अन्य महिला किसानों बिनुबाई, हीरा, राधिका, मीरा, संगीता, राजकुमारी, मंजुला, काली, लक्ष्मी, शीला, देवली और सीता डोडीयार के भी थे। उन सभी के लिए यह जर्जर चेकडैम एक साझी समस्या थी, जिसका समाधान कभी कोई नहीं ढूँढ पाया था।
इसी दौरान वागधारा (कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन) हिंदुस्तान यूनिलीवर फाउंडेशन के सहयोग से इस क्षेत्र में सतत कृषि, जल के कुशल उपयोग और समुदाय की आत्मनिर्भरता के लिए काम कर रही थी। ग्राम स्वराज समूह, सक्षम समूह और बाल स्वराज समूह के ज़रिये नियमित प्रशिक्षण और बैठकें होती थीं। वर्ष 2023 से जल संरक्षण संरचनाओं की मरम्मत पर विशेष संवाद शुरू हुआ था।
एक बैठक में जब जल संरचनाओं की चर्चा छिड़ी, तो दयाबाई के मन में वह निष्क्रिय चेकडैम कौंध गया। उन्होंने सोचा—यदि इसे गहरा किया जाए, तो न केवल उनके खेत को, बल्कि आसपास के सभी किसानों को पानी मिल सकता है। दयाबाई ने पहले सक्षम समूह की साथियों बिनुबाई, हीरा, राधिका और मीरा से इस विचार पर बात की। सबकी सहमति बनी और ग्राम स्वराज की बैठक में प्रस्ताव रखा गया। सामूहिक विचार-विमर्श के बाद ग्राम पंचायत गोदावाड़ा नारंग के नाम प्रस्ताव तैयार हुआ और ग्राम सभा में जमा किया गया।
ग्राम पंचायत ने प्रस्ताव स्वीकार किया। महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना यानी मनरेगा के अंतर्गत चेकडैम गहरीकरण का काम स्वीकृत हुआ।
जब काम शुरू हुआ, तो आसपास के सत्तर परिवारों के सदस्य कंधे से कंधा मिलाकर जुट गए। दो महीने तक यह सिलसिला चला। दयाबाई और उनकी साथियों की भूमिका विशेष रही। वे मज़दूरों को पानी पिलाने से लेकर हलमा के ज़रिये सफ़ाई और पिचिंग के काम में भी सक्रिय रहीं। हलमा आदिवासी परंपरा में सामूहिक श्रमदान की वह प्रथा है, जिसमें पूरा समुदाय किसी एक काम के लिए बिना किसी मज़दूरी की उम्मीद के एकजुट होता है। इस पुरानी परंपरा ने यहाँ एक आधुनिक ज़रूरत को पूरा किया और पूरा समुदाय एक नई उम्मीद के साथ जुड़ गया।
मनरेगा के तहत हुए इस काम से आसपास के परिवारों को करीब दो महीने का रोज़गार मिला। अनुमानतः 2,200 रोज़गार दिवस सृजित हुए।

बारिश के मौसम में जब चेकडैम में पानी ठहरने लगा, तो उस पानी में इन महिलाओं को अपना भविष्य दिखाई दिया। सभी ने तय किया कि इस बार पलायन नहीं होगा। इस बार घर पर रहेंगे, अपनी ज़मीन पर खेती करेंगे। चेकडैम से जुड़ी बासठ बीघा भूमि पर चौदह किसानों ने रबी की फ़सल बोई। चना, गेहूँ, मक्का, मटर और तुवर की फ़सलें लहलहाईं। यह संतुष्टि किसी मज़दूरी से नहीं मिल सकती थी।
पानी ठहरने का असर केवल खेतों तक नहीं रहा। आसपास के कुओं, हैंडपंपों और बोरवेल में भूमिगत जल स्तर में सुधार के संकेत मिले। पशुओं को पानी के लिए दूर नहीं जाना पड़ा, जिससे पशुपालन में भी राहत मिली। सिंचाई का रकबा बढ़ा और उसी के साथ घर में टिके रहने का हौसला भी।
आज दयाबाई केवल अपने घर तक सीमित नहीं हैं। वे सक्षम समूह को मज़बूत करने के लिए अन्य महिलाओं से नियमित संपर्क करती हैं और अपने समुदाय को जल, ज़मीन, जंगल, जानवर और देसी बीज के महत्व के बारे में समझाती हैं। उनके पति और परिवार के सदस्य जो पहले छह महीने से ज़्यादा समय के लिए शहर चले जाते थे, आज अपनी ज़मीन पर खेती करते हुए परिवार के साथ हैं।
यह बदलाव किसी एक व्यक्ति की मेहनत का नतीजा नहीं है। यह उस पूरी प्रक्रिया का परिणाम है जिसमें महिलाओं ने अपनी आवाज़ उठाई, समुदाय ने साथ दिया और परंपरागत ज्ञान तथा सरकारी योजनाओं का मेल हुआ। बिजलपुर की यह कहानी इस बात की मिसाल है कि जल संरक्षण के छोटे-छोटे प्रयास भी किस तरह एक पूरे समुदाय की दिशा बदल सकते हैं।
— विकास मेश्राम
विकास परसराम मेश्राम वागधारा संस्था के साथ राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में कृषि और जल प्रबंधन पर काम करते हैं।
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