गणतंत्र, अगर आप इसे संभाल सकें
Understanding our Republic and celebrating it in the right manner
कुछ ही दिनों में हम भारत का 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा हैं। इस मौके पर गणतंत्र के सही मायनों को समझना और उसे सही तरीके से कैसे मनाया जाए, यह जानना लाज़िमी है। तो आइए इस हफ़्ते बात करते हैं भारतीय गणतंत्र की।
—प्रणय कोटस्थाने
बेंजामिन फ्रैंकलिन का एक मशहूर किस्सा है। जब उनसे कुछ लोगों ने पूछा कि संविधान सभा के सदस्यों ने आखिर किस तरह की सरकार बनाई है, तब उन्होंने अपने खास अंदाज़ में जवाब दिया: एक गणतंत्र, अगर आप इसे संभाल सकें।
यह छोटी सी व्याख्या आज भी भारत समेत सभी लोकतांत्रिक गणराज्यों के लिए उतनी ही प्रासंगिक है। हम अक्सर अपने लोकतंत्र की चिंता करते रहते हैं, जबकि असली खतरा होता है हमारे गणतंत्र को। सच तो यह है कि हम इस शब्द का अर्थ भी शायद ही समझते हैं। आज भी ज़्यादातर लोगों को लगता है कि गणतंत्र का मतलब बस इतना है कि देश का प्रमुख कोई राजा-महाराजा न हो।
आखिर गणतंत्र इतना ज़रूरी क्यों है और हमें इसे मज़बूत क्यों करना चाहिए? यह समझने के लिए गणतंत्र दिवस से बेहतर दिन और कौन-सा हो सकता है? इसलिए आइए समझते हैं गणतंत्र की परिभाषा हमारी किताब ‘Missing in Action’ के इस अंश से:
भारत में मतभेद, विरोध प्रदर्शन और गिरफ़्तारी का जो सिलसिला हम अक्सर देखते हैं, वह एक बुनियादी विरोधाभास दर्शाता है: हमने लोकतंत्र के लिए अपने गणतंत्र के साथ समझौता कर लिया है। आइए देखते हैं कैसे।
दुनिया में लोकतंत्र की कोई एक परिभाषा नहीं है, फिर भी इसका शब्दशः अर्थ होता है ‘जनता का शासन’, यानी जहाँ किसी राजा आदि का शासन नहीं है। वास्तव में इसे ‘बहुमत का शासन’ कहा जा सकता है। अब बहुमत का मतलब भी अलग-अलग हो सकता है, पर किसी भी लोकतंत्र में सरकार वही करती है, जो बहुमत चाहता है।
इसलिए एक शुद्ध लोकतंत्र में, सभी मामलों में बहुमत का ही राज चलता है, फिर चाहे उसका नतीजा उन लोगों के लिए कुछ भी हो जो बहुमत में नहीं है। मिसाल के तौर पर, प्राचीन ग्रीस के नगर लोकतांत्रिक थे, और इसीलिए बहुमत की इच्छा से सुकरात को मारना वहाँ पूरी तरह कानूनी था। अब आते हैं सदियों बाद, 2016 के JNU विरोध प्रदर्शन में। यहाँ जब बहुमत किसी छात्र के भाषण को ‘राजद्रोह’ करार देकर उसकी गिरफ़्तारी की माँग करता है, तो इससे लोकतंत्र का कोई खास नुकसान नहीं होता। नुकसान होता है हमारे गणतंत्र का क्योंकि गणतंत्र ही बहुमत को अपनी ताकत का इस्तेमाल कमज़ोर व्यक्ति और समूहों के खिलाफ़ करने से रोकता है।
सैद्धांतिक रूप से, एक गणतंत्र में कानून का राज होता है, न कि किसी इंसान का। इसका मतलब है गणतंत्र में कानून सर्वशक्तिमान होता है, कोई राजा या शासक नहीं। कानून के राज का अर्थ यह भी है कि देश का कानून हर किसी पर समान रूप से लागू होगा। पर इसका मतलब यह नहीं है कि प्रधानमंत्री और आम नागरिक दोनों के अधिकार एक समान होंगे, बल्कि इसका मतलब यह है कि प्रधानमंत्री भी कानून के दायरे में रहकर ही अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकेंगे। एक गणतंत्र में, किसी भी राजनेता की सबसे बड़ी आकांक्षा यही होनी चाहिए कि वह कानून का पालन करे और उसे सही ढंग से लागू भी करवाए।
कानून के राज यानी गणतंत्र का एक अनिवार्य सिद्धांत यह भी है कि इसमें नागरिकों को कुछ विशिष्ट व्यक्तिगत अधिकार होते हैं, जिन्हें कोई छीन नहीं सकता। किसी विधेयक या चार्टर के ज़रिये इन अधिकारों को औपचारिक रूप दिया जाता है। हर नागरिक को यह अधिकार अपने आप प्राप्त होते हैं और संविधान जैसा दस्तावेज़ यह तय करता है कि इन अधिकारों की रक्षा कैसे की जाएगी।
तो यह हमारा गणतंत्र है जो बहुमत को अपनी संख्या के बल पर मनमानी करने से रोकता है। भारत जैसे गणतंत्र में, संविधान व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार और समूहों की ताकत पर अंकुश लगाता है।
लोकतंत्र और गणतंत्र के बीच का यह संघर्ष बहुत पुराना है। इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब ‘सामूहिक भलाई’ या ‘देश और नागरिकों की सुरक्षा’ के नाम पर व्यक्तिगत आज़ादी को खत्म कर दिया गया। इस संघर्ष की पहली झलक भारतीय संविधान के पहले संशोधन (First Amendment) के रूप में दिखाई दी, जिसने ‘उचित’ (Reasonable) प्रतिबंधों की संकल्पना पेश की। इस संशोधन ने सरकार को लोगों की बोलने की आज़ादी (Freedom of Speech) पर लगाम लगाने का अधिकार दे दिया। अगर सरकार को लगता है कि किसी का कहा या लिखा—‘भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ दोस्ताना संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता को हानि पहुँचाता है, अदालत की अवमानना, किसी की मानहानि करता है या किसी अपराध के लिए उकसावा देता है’—तो सरकार उस व्यक्ति पर पाबंदी लगा सकती है या उसे अनुशासित भी कर सकती है। इस ‘उचित’ शब्द और पाबंदी के कारणों की अस्पष्टता ने बड़ी संदिग्धता पैदा कर दी है—इसने हमारे मीडिया, प्रशासन, संसद और अदालतों को एक ऐसे चौतरफा मुकाबले में फँसा दिया है जो आज तक जारी है।
अंत में सार यही है कि हमारा लोकतंत्र तो ठीक-ठाक चल रहा है, असली ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने गणतंत्र पर ध्यान दें।
पुलियाबाज़ी टीम की तरफ़ से आप सभी को आनेवाले गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
— प्रणय कोटस्थाने
मूल अंग्रेज़ी लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं: A Republic, If You Can Keep It
अनुवाद—परीक्षित सूर्यवंशी
गणतंत्र दिवस मनाने का सही तरीका!
नमस्ते दोस्तों!
अगला गणतंत्र दिवस अब ज़्यादा दूर नहीं है। ज़्यादातर लोग गणतंत्र दिवस भी स्वतंत्रता दिवस की तरह ही मनाते है। हालाँकि ये दोनों ही दिन हमारे लिए बेहद अहम हैं, इन दोनों को मनाने का मकसद अलग-अलग है। इसलिए नितिन पई और सौरभ चंद्रा ने सोचा कि क्यों न इस दिन को इसके असली मकसद के हिसाब से मनाने के लिए कुछ अलग किया जाए और उन्होंने इसके लिए एक “टूलकिट” तैयार की।
मैंने पिछले साल की शुरुआत में इसे आज़माया था और मेरे लिए यह बहुत ही अच्छा अनुभव रहा था। इसलिए इस बार मैं इसे आप सबके साथ भी साझा कर रहा हूँ, ताकि आप भी अपनी सोसाइटी या मोहल्ले में एक नए और बेहतर तरीके से गणतंत्र दिवस मना सकें।
गणतंत्र दिवस ‘टूलकिट’
झंडा फहराने और राष्ट्रगान के बाद, सब मिलकर संविधान की प्रस्तावना को एक साथ पढ़ें। मैंने मूल प्रस्तावना पढ़ी।
संविधान और भारतीय गणतंत्र पर एक छोटा सा लिखित सवाल-ज़वाब सत्र लें। मैं वे सवाल यहाँ साझा कर रहा हूँ जो मैंने इस्तेमाल किए थे। आप चाहें तो इनमें अपनी ज़रूरत के हिसाब से बदलाव कर सकते हैं।
10 साल से ऊपर के बच्चों के लिए ‘बंधुता’ (Fraternity) की अहमियत पर एक निबंध या कविता प्रतियोगिता रखें।
10 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए ‘भारतीय संविधान’ पर एक चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित करें।
विजेताओं को इनाम में किताबें दें। Eastern Book Store की पॉकेटबुक ‘Constitution’ बहुत ही सुंदर दिखती है और एक बेहतरीन गिफ्ट हो सकती है। हमारी किताब ‘We, the Citizens: Strengthening the Indian Republic’ भी 10 साल से ऊपर के बच्चों के लिए एक शानदार तोहफ़ा हो सकती है।
इसे आज़माने के बाद अपना अनुभव हमारे साथ ज़रूर शेयर करें।
—प्रणय कोटस्थाने
अंग्रेज़ी लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Celebrating Republic Day Appropriately
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