भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, यह हम सभी जानते हैं। लेकिन ये शब्द इतने आम हो चुके हैं कि हम इनके अर्थ पर गौर ही नहीं करते। इसलिए इस बात को दोहराना ज़रूरी है कि हम सिर्फ़ लोकतंत्र नहीं, गणराज्य भी हैं। गणराज्य या रिपब्लिक का अर्थ होता है - कानून का शासन यानी Rule of Law।
लेकिन आज देश में जो हालात हैं, उन्हें देखकर लगता है कि Rule of Law की जगह Rule by Law ने ले ली है। फ़िलहाल कानून का इस्तेमाल शासन में मार्गदर्शक की तरह नहीं, बल्कि हथियार की तरह किया जा रहा है। इस परिस्थिति में, फिर एक बार गणराज्य का अर्थ अच्छी तरह समझना लाज़मी हो जाता है।
तो आइए, समझते हैं गणराज्य के मायने अमेय नाइक से।
(यह लेख पुलियाबाज़ी मैगज़ीन के द्वितीय अंक में प्रकाशित हुआ है। पुलियाबाज़ी मैगज़ीन के बारे अधिक जानकारी आपको इसी लेख के अंत में मिल जाएगी।)
गणतंत्र की कसौटी: जहाँ ताकतवर भी नियमों के अधीन है
—अमेय अशोक नाइक
आजकल मैं विदेश में रहता हूँ। मेरा ठेठ पेहचानपत्र मेरा पासपोर्ट है। जब भी मैं उसे अपनी जेब से निकालता हूँ, तब उसके मुखपृष्ठ पर, अशोक स्तंभ के ऊपर लिखे शब्द पढता हूँ: भारत गणराज्य। पासपोर्ट के पहले दो पन्ने ये शब्द चार बार दोहराते हैं। सिर्फ़ भारत की नहीं, हरेक भारतीय नागरिक की आत्म-पहचान, इन शब्दों से जुड़ी हुई है: हम एक गणराज्य हैं।
हमारे संविधान की मूल प्रस्तावना में लिखा है कि भारत “सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य” है। India is a Sovereign, Democratic, Republic. इसमें सोशलिस्ट और सेक्युलर, ये शब्द बाद में जोड़े गए थे। ब्रिटिश राज से आज़ाद होने पर खुदमुख्तारी का महत्त्व हम सब समझते हैं। लोकतंत्र क्या है, यह भी हम जानते हैं, क्योंकि भारत में हर समय कहीं न कहीं चुनाव चल रहा होता है। लेकिन यह तीसरा शब्द—गणराज्य—यह क्या होता है?
लोकतंत्र और गणतंत्र के बीच का अंतर नीति और न्याय के बीच का अंतर है। दोनों संकल्पनाओं में हम नियमों के बारे में सोचते हैं। लोकतंत्र के नियम हमें ये बताते हैं कि कोई भी निर्णय किस तरह लिया जाए। इन नियमों के पालन से देश नीति-धारक कहलाता है।
संविधान में लिखा है कि कई सारे महत्वपूर्ण निर्णय सरकार तय करेगी। लोकतंत्र के लिए अनेक नियमों का पालन ज़रूरी है, जैसे मतदान के नियम, लोकसभा के कामकाज के नियम, वगैरह। ये नियम संविधान के अलावा और भी कई सारे कायदों में लिखे हैं। उदाहरण के तौर पर, मतदान कैसे होना चाहिए, इसके नियम लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) 1951 में हैं। इन सब नियमों के पालन से लोकतंत्र चलता है।
गणतंत्र के अनेक नहीं, सिर्फ़ एक नियम है—‘Rule of Law’ यानी न्याय की सर्वोपरिता। अक्सर लोग इसे नियम या कानून के राज की तरह सोचते हैं, लेकिन गणतंत्र के लिए शायद ये परिभाषा अधूरी होगी। गणतंत्र सिर्फ़ नियम का शासन नहीं है, इसमें न्याय का भाव लिप्त है। कानून ऐसे भी बनाए जा सकते हैं, जिनमें न्याय न हो तो क्या वो गणतंत्र कहलाएगा? नहीं। गणतंत्र सुनिश्चित करता है कि अन्याय न हो। एक तरफ़ लोकतंत्र ये बताता है कि राज्य किसके द्वारा और कैसे चलेगा, दूसरी तरफ़ गणतंत्र राज्य की शक्तियों पर नियंत्रण लगाता है। जिस राज्य में हुकूमत अपनी मनमर्ज़ी से कुछ भी कर सकती है, वह गणतंत्र नहीं, तानाशाही है। जहाँ सबसे ताकतवर व्यक्ति भी नियमों का पालन करने के अधीन है, वह गणतंत्र कहलाता है।
गणतंत्र सिर्फ़ नियमों के अस्तित्व पर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक पालन पर निर्भर करता है। गणतंत्र और तानाशाही दोनों में कई सारे नियम होते हैं; अधिनियम, पुलिस और न्यायालय होते हैं; दैनिक शासन भी रहता है। दोनों में सरकार आपकी जायदाद ज़ब्त कर सकती है, आपको गिरफ़्तार कर सकती है, फाँसी भी चढ़ा सकती है। अगर दोनों में नियम और संस्थाएँ मौजूद हैं तो इनमें अंतर क्या है?
इनमें अंतर यही है कि गणतंत्र में सरकार न्याय और नीति के अधीन है और तानाशाही में न्याय, नियम, निर्णय सब एक व्यक्ति की इच्छाओं पर निर्भर हैं। तानाशाही में अधिनियम, पुलिस, न्यायालय, शासन इत्यादि सिर्फ़ उस हद तक चल पाते हैं, जितना उस तानाशाह को मंज़ूर हो। अगर तानाशाह नियमों के विपरीत कुछ करना चाहे तो न तो पुलिस उसे रोक सकती है और न ही न्यायालय।
पेरु के पूर्व राष्ट्रपति ऑस्कर बेनाविडेस (Oscar Benavides) ने इस संकल्पना को इन शब्दों में स्पष्ट किया—“For my friends, anything; for my enemies, the law”। मेरे दोस्तों के लिए सब कुछ (मुमकिन है), मेरे दुश्मनों के लिए कायदा (कड़ा है)। अगर तानाशाह आपका दोस्त है, शायद आपको यह व्यवस्था पसंद आएगी। लेकिन अगर वह आपसे नाराज़ हो, तब आपको न्याय की सर्वोपरिता की कमी महसूस होगी।
इतिहास हमें सिखाता है कि प्राचीन समय से लेकर सिर्फ़ कुछ सदियों पहले तक विश्व में ज़्यादातर देश गणतंत्र नहीं थे, न कागज़ी स्वरूप में और न ही वास्तव में। आज जिन देशों को हम चीन, भारत, यूनान, तुर्की, रूस, इंग्लैंड, इत्यादि के नाम से जानते हैं, ऐतिहासिक दौर में वहाँ एक या अनेक साम्राज्य थे।
साम्राज्य में न्याय नहीं, सम्राट सर्वोच्च था। फ्रांस के महाराजा लुइ द ग्रेट (Louis XIV) ने अपनी संसद को इन शब्दों से नीचा दिखाने की कोशिश की: स्वयं मैं ही राज्य हूँ। “L’État, c’est moi”। फ्रांस में अब दो सदियों से कोई राजा नहीं है, लेकिन आज भी अगर आप LL.B. पढ़ने जाएँ तो सबसे पहली क्लास में आपको जॉन ऑस्टिन की लिखी हुई यह परिभाषा सिखाई जाएगी—“Law is the command of the sovereign”—विधि सम्राट का आदेश है।
कहने का मतलब यह नहीं है कि प्राचीन ज़माने में गणतंत्र नहीं थे। इतिहासकारों की राय है कि कई सारी सभ्यताओं ने किसी न किसी वक्त, किसी न किसी स्वरूप में गणतंत्र को अपनाने की कोशिश की थी। प्राचीन एथेंस या भारत में ईसा पूर्व ~500 के महाजनपद इसके उदाहरण हैं। आधुनिक मानकों से इनमें से अधिकांश में यह कमी थी कि अधिकार व मान्यता समाज के किसी वर्ग तक सीमित थी और कोई श्रेणी हमेशा उस ‘गण’ से बाहर थी। उम्र, लिंग, हैसियत, जाति, इत्यादि के मुताबिक राज्य-व्यवस्था में शामिल होने का अधिकार तय किया जाता था।
आधुनिक गणराज्य इस अवस्था के क्रमशः बदलाव से बने हैं। इस बदलाव की शुरुआत इंग्लैंड में सन् 1215 में मानी जाती है। 15 June, 1215 को इंग्लैंड के महाराजा जॉन ने दो ऐतिहासिक दस्तावेज़ों पर दस्तखत किए: ‘महान प्राधिकार’ (‘Great Charter’, Magna Carta) और ‘जंगलों का प्राधिकार’ (‘Charter of the Forest’)। इन दोनों चार्टरों में ऐसे प्रावधान थे, जो तख्त की ताकत पर सीमा डालते थे। राज्य के रईस सामंतों (Barons) के अधिकार मैग्ना कार्टा में थे और साधारण लोगों (Serfs) के अधिकार फ़ॉरेस्ट चार्टर में थे।
वास्तव में, मैग्ना कार्टा अद्वितीय नहीं था। करीबन एक सदी पूर्व, किंग जॉन के परदादा महाराजा हेनरी I ने एक स्वतंत्रता प्राधिकार (‘Charter of Liberties’, Carta Libertatum) घोषित किया था और इस तरह के और भी प्राधिकार इंग्लैंड और अन्य राज्यों में घोषित किए जा रहे थे। उन्होंने तख्त के कराधान के अधिकार पर सीमाएँ लगाईं और गिरफ़्तारी से व्यक्तिगत आज़ादी का आश्वासन दिया।
लेकिन इन चार्टर्स का पालन करना या उल्लंघन करना राजा की मर्ज़ी थी—उन पर यह नियम लागू करने की काबलियत किसी की नहीं थी। इसलिए मैग्ना कार्टा में एक नया प्रावधान था, Clause 61, जो इसे गणराज्य की उत्पत्ति बनाता है। Clause 61 में लिखा था कि 25 सामंतों की एक परिषद बनेगी, जो इस बात की निगरानी करेगी कि राजा इस चार्टर का पालन कर रहा है या नहीं; अगर परिषद की राय हो कि राजा अपने कर्तव्यों का उल्लंघन कर रहा है तो उनके पास उसकी ज़मीन और किले ज़ब्त करने का अधिकार था। यह एक प्रकार से न्याय की सर्वोच्चता का तंत्र है।
महाराजा जॉन की इच्छा थी कि इन चार्टरों से इंग्लैंड के सामंत उनका समर्थन करें और फ्रांस में जारी युद्ध के लिए सैनिकों व अपनी मालमत्ता का योगदान करें। लेकिन ये कोशिश विफल रही। जॉन और उनके सामंतों दोनों ने मैग्ना कार्टा के प्रावधानों का पालन नहीं किया और अगले कई सालों तक इंग्लैंड में गृहयुद्ध चलता रहा। आखिर और बारह साल बाद जॉन के बेटे, महाराजा हेनरी III, ने मैग्ना कार्टा को एक बार और घोषित किया—इस बार बिना Clause 61 के, लेकिन तब तक राजा और सामंतों के बीच ताकत का अंतर इतना ज़्यादा नहीं रह गया था और किसी न किसी रूप में तख्त के अधिकारों पर सीमा बनी रही।
मैग्ना कार्टा और आधुनिक गणतंत्र में काफ़ी अंतर है, लेकिन उससे गणतंत्र का एक मूल सिद्धांत प्रकट हुआ। वह ये कि साम्राज्य में सम्राट भी अपनी घोषणाओं और नियमों से बँधा हुआ है। आधुनिक गणतंत्र का दूसरा सिद्धांत है कि मानव अधिकार सार्वभौमिक हैं, न कि सिर्फ़ कुछ लोगों या वर्गों का विशेषाधिकार और इन नियमों का उद्देश्य है—इन अधिकारों का संरक्षण व बढ़ाव। यह संकल्पना मैग्ना कार्टा में नहीं है, जो कि अधिकांशतः सिर्फ़ सामंतों के अधिकारों से संबंधित है।
अठारहवीं सदी में अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियों में ये भावना महत्वपूर्ण थी और इसका उल्लेख अमरीका के स्वतंत्रता घोषणापत्र में है: हरेक व्यक्ति निर्माण-स्वरूप समान है और निर्माता ने उन्हें ऐसे अधिकार दिए हैं, जो उनसे छीने नहीं जा सकते। “That all men are created equal, that they are endowed by their Creator with certain unalienable rights”। उसी तरह, फ्रांस के मानव व नागरिक अधिकार घोषणापत्र में लिखा है कि हरेक व्यक्ति जन्म से और आजीवन स्वतंत्र है व अधिकारों में समान है। “Les hommes naissent et demeurent libres et égaux en droits”।
जैसे मैग्ना कार्टा ने इंग्लैंड को तुरंत गणतंत्र नहीं बनाया, वैसे ही इन घोषणाओं से अमरीका और फ्रांस भी आधुनिक मायने में गणतंत्र नहीं बने। अमरीका में उस वक्त और अगले काफ़ी समय तक गुलामी की प्रथा जारी रही। 1861 से 1865 तक अमरीकी गृहयुद्ध गुलामी की समाप्ति के विषय पर चला और उसके आगे भी और सौ सालों तक मतदान के अधिकार में समानता नहीं थी। यहाँ तक कि औरतों को मतदान का हक भी 1920 में मिला (इंग्लैंड में 1918 में)। दूसरे विश्वयुद्ध तक फ्रांस की कई कॉलोनियाँ रहीं और इन कॉलोनियों के नागरिकों के अधिकार समान नहीं थे। फ्रांस में भी औरतों को मतदान का अधिकार 1945 में मिला।
इस कालक्रम से हम देख सकते हैं कि गणतंत्र के सिद्धांतों की घोषणा से लेकर उनके वास्तविकता में बदलने तक सदियाँ बीत जाती हैं। बीसवीं सदी के इतिहास में भारत ऐसा पहला देश है, जिसने स्वतंत्रता के पहले क्षण से हरेक नागरिक को मतदान का अधिकार दिया—चाहे वह आदमी हो या औरत, गरीब हो या रईस, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़ या फिर वह किसी भी धर्म या जाति का ही क्यों न हो। इस निर्णय की वजह से और संविधान में लिखे मौलिक अधिकार के प्रावधानों के बल पर, हम गर्व से कहते हैं कि स्वतंत्र भारत का निर्माण ही एक गणतंत्र के रूप में हुआ।
लेकिन जो देश गणतंत्र के रूप में जन्म लेता है, उसका भी गणतंत्र बने रहना सुनिश्चित नहीं होता। गणतंत्र का तीसरा सिद्धांत, जो कि उसके दीर्घायु रहने का रहस्य है—‘checks and balances’ यानी अंकुश और संतुलन। जिसका मतलब है कि देश की संस्थाएँ और राज्य-व्यवस्था इस तरह से रची हुई हो कि कोई भी एक व्यक्ति, अधिकारी या राजनेता इतनी ताकत न जमा कर सके कि जिससे वह नियमों को अपनी इच्छा से या अपने लाभ के लिए बदल पाए।
अंकुश और संतुलन के कई रूप और तंत्र हैं। संविधान में ऐसे तीन तंत्र हैं: मौलिक अधिकार, शक्तियों का बँटवारा (‘separation of powers’) और विशेष संवैधानिक संस्थाएँ। मौलिक अधिकार सरकार की ताकत पर सीमाएँ लगाते हैं। ऐसा कोई भी कार्य, जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे, सरकार के दायरे से बाहर (‘ultra vires’) है। और हरेक व्यक्ति के पास इन अधिकारों के अमल के लिए न्यायालय की सहायता लेने का मौलिक अधिकार है। शासन के कारनामों पर रोक लगाने की कोर्ट की यह भूमिका शक्तियों के बँटवारे का एक भाग है।
न्यायालय के साथ-साथ संसद भी जाँच और संतुलन का हिस्सा है। संसदीय बहस और समितियाँ सरकार द्वारा गुप्त निर्णय लेने पर एक बहुत महत्वपूर्ण नियंत्रण है। दुर्भाग्य से भारत में संसद की यह भूमिका कई सालों से नाकाम रही है। 1985 के दलबदल विरोधी कानून और उससे जुड़ी घटनाओं की वजह से आजकल सरकार संसद को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक चलाती है। इस विषय पर कई निबंध लिखे गए हैं, इसलिए यहाँ हम इसकी विस्तृत चर्चा नहीं करेंगे।
संसद में शामिल होने के लिए चुनाव ज़रूरी हैं और चुनाव का नियंत्रण निर्वाचन आयोग करता है। निर्वाचन आयोग जैसी विशेष संवैधानिक संस्थाएँ, संसद व न्यायालयों के साथ मिलकर सरकार पर नियंत्रण बनाए रखने का काम करती हैं। लोक सेवा आयोग (UPSC), नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG), वित्त आयोग और अब GST आयोग इस तरह की संस्थाएँ हैं। ये आयोग ऐसे अति-महत्वपूर्ण कामकाज के लिए ज़िम्मेदार हैं, जिन्हें सरकार और संसद के रोज़ाना के कामों से अलग रखा जाना ज़रूरी है। उनका सही तरीके से काम करना विधि की सर्वोपरिता के लिए ज़रूरी है।
इस विवरण से हम देख सकते हैं कि गणतंत्र बने रहना आसान नहीं है। भले ही कागज़ी रूप में सारी संस्थाएँ और सारे नियम मौजूद हों, वास्तव में इनका रचे हुए तरीके से कार्यरत रहना गणतंत्र के लिए बेहद ज़रूरी है। जब इनमें कोई बाधा आती है और जब ऐसी बाधाएँ सालों-साल इकठ्ठा होती रहती हैं, तब देश सिर्फ़ नीति-धारक बन जाता है; जहाँ नियमों के पालन से भी न्याय प्राप्त नहीं होता। न्याय की सर्वोपरिता को बरकरार रखने के लिए, हमें इन तीनों सिद्धांतों पर अमल करना होगा: तख्त की ताकत पर सीमाएँ लगाना, सार्वभौमिक मानवाधिकारों का संरक्षण और सही मायने में जाँच और संतुलन की ज़िम्मेदारी निभानेवाली संस्थाएँ बनाए रखना।
—अमेय अशोक नाइक
अमेय एक पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं और मनोविज्ञान, कानून तथा शांति और संघर्ष के अध्ययन में दिलचस्पी रखते हैं। वे ODI Global में रिसर्च फ़ेलो हैं और तक्षशिला इंस्टिट्यूशन में नीति विश्लेषण भी पढ़ाते हैं।
Note by Ameya:
यहाँ ‘नीति-धारक’ मेरा खुद का बनाया हुआ शब्द है। शायद अंग्रेज़ी का सही लफ़्ज़ ‘Procedural’ होगा, लेकिन अंग्रेज़ी में भी आप किसी राज्य के लिए इस विशेषण का इस्तेमाल नहीं करेंगे। हमें ऐसा शब्द चाहिए था जो ‘क़ानूनी’ या ‘न्यायपूर्ण’ से थोड़ा कम लगे। सिर्फ़ रस्मों से या ‘कायदे-क़ानून पर चलने वाली’ व्यवस्था, लेकिन उसकी नैतिक महानता से रहित। इसलिए ‘नीति-धारक’, जिसमें नीति तो है, पर न्याय नहीं। इसीलिए वो गणतंत्र नहीं।
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